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पब्लिक रिलेशन और मीडिया: वैश्विक अनुभव और भारत

दिलीप मंडल। 

पब्लिक रिलेशन वैसे तो पुरानी विधा है लेकिन आधुनिक कॉरपोरेट पब्लिक रिलेशन की शुरुआत 20वीं सदी के पहले दशक से हुई। पब्लिक रिलेशन का इतिहास लिखने वाले कई लोग आईवी ली को पब्लिक रिलेशन का जनक मानते हैं। कुछ इतिहास लेखक यह श्रेय एडवर्ड बर्नेस को देते हैं।

आईवी ली ने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में पत्रकार के तौर पर काम किया था। उसने न्यूयॉर्क अमेरिकन, न्यूयॉर्क टाइम्स और न्यूयॉर्क वर्ल्ड में पत्रकार के तौर पर काम किया और मुख्य रूप से आर्थिक और कारोबारी विषयों पर लिखा। वे खुद लिखते हैं कि कम तनख्वाह और देर तक नौकरी करने की मजबूरी की वजह से उसने पत्रकारिता छोड़ दी और पब्लिसिटी का काम करने लगे। मीडिया में काम करने की वजह से उसे मीडिया की आंतरिक संरचना और उसके असर के बारे में अंदाजा था।

पब्लिक रिलेशन के क्षेत्र में उसका पहला काम सिटिजन यूनियन के पब्लिसिटी मैनेजर के रूप में था। उसे दुनिया का पहला पूर्णकालिक पब्लिक रिलेशन अफसर माना गया। इसी दौरान उसने बफलो शहर के पत्रकार पार्कर के साथ मिलकर पार्कर एंड ली नामक पब्लिक रिलेशन फर्म बनाई, जिसे अमेरिका का तीसरा लेकिन उस समय, इस क्षेत्र का सबसे सफल फर्म माना गया। यह संयोग नहीं है कि उस समय अमेरिका में सक्रिय तीन पब्लिक रिलेशन फर्म में से दो के मालिक पत्रकार थे।

आईवी ली को पहला बड़ा एसाइनमेंट कोयला खान मालिकों से मिला। कई विद्वान यह मानते हैं कि आधुनिक कॉरपोरेट पब्लिक रिलेशन की वास्तविक शुरुआत इसी एसाइनमेंट से हुई। 1902 के बाद 1906 में अमेरिका के कोयला खान मजदूर फिर से हड़ताल करने की तैयारी में थे। यह दौर अमेरिका में काफी गहमागहमी वाला था। वामपंथी मजदूर आंदोलन जोर पकड़ रहे थे और उस समय के उद्योगपति इसे कुचलने के लिए बेहद हिंसक तरीके अपनाते थे। लेकिन इस तरह की हिंसा के बावजूद मजदूर आंदोलन दब नहीं रहा था। मजदूरों का आंदोलन खास तौर पर कोयला खदानों में काफी मजबूत था। इसकी वजह शायद यह भी थी कि कोयला खादानों में काम की स्थितियां बेहद खराब थी। मजदूर आंदोलनों को कुचलने के परंपरागत तरीके विफल हो रहे थे और खान मालिक चार साल में होने वाली दूसरी हड़ताल से निबटने के तरीके ढूढ रहे थे।

मास मीडिया की बात करें, तो यह वही दौर था जब सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए अखबारों के बीच होड़ शुरू हो गई थी और अखबार ज्यादा से ज्यादा सनसनीखेज खबरें छापकर लोकप्रिय होने की कोशिश कर रहे थे। अखबारों का सर्कुलेशन बढ़ने की वजह से मीडिया का असर बढ़ रहा था और संगठित रूप से पब्लिक ओपिनियन का विकास हो रहा था। हालांकि उस समय तक अखबारों का पूरी तरह कॉरपोरेटीकरण नहीं हुआ था और अखबारों का एक बड़ा हिस्सा मजदूर आंदोलनों के प्रति सहानूभूति का रवैया रखता था। खान मालिकों के लिए यह मुश्किल बढ़ाने वाली बात थी क्योंकि अखबारों के इस रुख से मजदूर आंदोलन को ताकत मिलती थी। इससे पूरे देश का मूड आंदोलन के पक्ष में बन जाता था और खाम मालिकों की छवि खराब हो गई थी। आम तौर पर, लोग मानते थे कि खान मालिक अत्याचारी हैं। खान मालिक इस स्थिति से बचना चाहते थे और वे आम तौर पर नेताओं को पैसे देकर उनसे अपने पक्ष में बयान छपवाते थे। लेकिन इससे बात बन नहीं रही थी।

खान मालिकों ने मास मीडिया का रुख बदलने का जिम्मा आईवी ली को सौंपा। इस समय तक छवि सुधारने और बदलने के खेल को कंपनियां समझ नहीं पाई थीं। आईवी ली ने खान कंपनियों की छवि सुधारने के लिए एक ऐसा तरीका अपनाया, जो अब काफी लोकप्रिय है, लेकिन उस जमाने में यह कोई नहीं करता था। उसने कंपनियों के मालिकों के बयान अखबारों को भेजना शुरू किया। इन बयानों में खान मालिक अपना पक्ष रखते थे और आरोपों का खंडन करते थे। ली का आइडिया यह था कि अगर मीडिया को कंपनियों के पक्ष के बारे में नियमित बताया जाएगा तो उनकी बात सुनी जाएगी और उसमें से काफी कुछ छप भी सकता है। इस तरह लोगों का कंपनियों के प्रति रुख बेहतर होगा। इसलिए ली ने बड़ी संख्या में छपी हुई सामग्री मीडिया को भेजी। ली के तौर तरीकों की जब मीडिया में आलोचना शुरू हुई तो उसने स्पष्ट किया कि वह तो सिर्फ तथ्य रख रहा है। इसे छापना या न छापना अखबारों पर निर्भर है।

इसी दौरान ली ने पार्कर के साथ रिश्ता तोड़ दिया और स्वतंत्र रूप से पेंसिलवीनिया रेलरोड के साथ प्रचार निदेशक के तौर पर काम शुरू किया। अटलांटिक सिटी में हुई रेल दुर्घटना के बाद ली ने जिस तरह से पब्लिसिटी की काम संभाला, वैसे इससे पहले कभी किसी कंपनी ने नहीं किया था। 28 फरवरी 2006 को ली ने इस दुर्घटना की जानकारी मीडिया को देने के लिए एक प्रेस रिलीज बांटी, जिसे किसी भी कंपनी द्वारा जारी की गई पहली प्रेस रिलीज भी कहते हैं। ली की पहल पर कंपनी की ट्रेन प्रेस रिपोर्टरों को लेकर घटनास्थल पर गई, जहां उन्हें प्रेस रिलीज की कॉपी बांटी गई। यह सब बेकार नहीं गया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने वह प्रेस रिलीज जस की तस छाप दी। इस तरह लोगो ने ट्रेन दुर्घटना के बारे में वही जाना जो कंपनी ने खुद लिखकर दिया था। इसके अलावा ली ने सरकारी नीतियों को कंपनी के पक्ष में मोड़ने के लिए लॉबिंग भी की।

ली दरअसल यह मानते थे कि मीडिया पूंजीवाद विरोधी विचारों को काफी जगह दे रहा है और यह चिंताजनक है। उनकी राय में उद्योगपतियों को इसका मुकाबला करना चाहिए और इसके लिए अपनी बात मीडिया तक पहुंचानी चाहिए। ली ने जब पब्लिक रिलेशन का काम शुरू किया तब उसके विचारों में एक तरह का आदर्शवाद दिखता है। पब्लिक रिलेशन के बारे में अपने विचारों को उसने डिक्लियरेशन ऑफ प्रिंसपल नाम के दस्तावेज में दर्ज किया है। इसमें ली लिखता है-“यह कोई पब्लिक रिलेशन एजेंसी नहीं है। हम स्पष्ट तौर पर सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं के लिए काम करते हैं। हम प्रेस और अमेरिकी जनता को उन विषयों पर और वह जानकारी देना चाहते हैं, जिन्हें जानना उनके लिए जरूरी है।” लेकिन कुछ ही साल के अंदर ली वह सब करने लगा, जिसका सच से कोई वास्ता नहीं था। क्लाइंट की जरूरत के हिसाब से उसने झूठ को भी सच बताकर बेचने की कोशिश की और इसमें एक हद तक कामयाब भी रहा।

ली 1914 में उस समय के प्रमुख उद्योगपति जॉन डी रॉकफेलर की कंपनी में जुड़ गए। ली के इस कंपनी में रहते हुए कंपनी के खानों में हड़ताल हुई और इस दौरान कोलेराडो के लुडलो में हिंसा भड़क उठी। इस दौरान हड़ताली मजदूरों के एक कैंप से औरतों और बच्चों की लाश मिलने से सनसनी फैल गई। इसके बाद दस दिनों तक हिंसा होती रही और कुल मिलाकर 53 लोग मारे गए। इस दौरान कंपनी का पक्ष रखने के लिए ली ने प्रेस और प्रमुख लोगों को 19 बुलेटिन भेजे। ली ने ऐसा करते हुए सच और झूठ के बीच फर्क नहीं किया। औरतो और बच्चों की मौत के लिए उसने मजदूरों को ही जिम्मेदार ठहराया। ली के इस काम की काफी निंदा हुई और इस वजह से उसे पॉयजन आईवी भी कहा गया। ली काफी समय तक रॉकफेलर के साथ जुड़े रहे और उनकी छवि बेहतर करने की कोशिश करते रहे। इसमें वे एक हद तक सफल भी रहे क्योंकि 1934 में जब रॉकफेलर का निधन हुआ तो उनसे जुड़ी नकारात्मक बातें लोग भूल चुके थे।

आईवी ली जिस समय पब्लिक रिलेशन के अपने प्रयोग कर रहे थे उसी दौरान एक और शख्स लोगों के सोचने के तरीकों को बदलने में जुटा था। एडवर्ड एल बरनेस को ली के साथ ही अमेरिकी पब्लिक रिलेशन का पितामह कहा जाता है। ली की तरह बरनेस भी पहले पत्रकार ही था और मेडिकल पत्रिकाएं संपादित करता था। बरनेस ने भीड़ की मानसिकता के परंपरागत सिद्धांत और अपने चाचा साइमंड फ्रॉयड के साइको एनालिसिस और सबकंसस संबंधी विचारों का प्रयोग पब्लिक रिलेशन के लिए किया। बरनेस ने कई कंपनियों और संस्थाओं के लिए काम किया और माना जाता है कि उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी अपनी छवि सुधारने के लिए बरनेस की सेवाएं लीं।

पहल विश्व युद्ध के दौरान बरनेस को पब्लिक रिलेशन के अपने सिद्धांतों अमल में लाने का एक बेहतरीन मौका मिला। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन इस बात को लेकर चिंतित थे कि देश के कई लोग इस युद्ध के उद्देश्यों से सहमत नहीं हैं और मानते हैं कि यह युद्ध पूंजीवादियों के हित में लड़ा जा रहा है इस सोच को बदलने के लिए विल्सन ने बरनेस और दूसरे पब्लिक रिलेशन एक्सपर्ट को लेकर कमिटी ऑन पब्लिक इन्फॉर्मेशन (सीपीआई) का गठन किया जिसका काम लोगों को युद्ध के प्रति सरकार के विचारों से अवगत कराना और संदेह करने वालों के विचारों को बदलना था। बरनेस अपने चाचा साइमंड फ्रॉयड के सिद्धांतों के अध्ययन के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचे थे कि लोग किसी बात को लेकर नतीजे पर पहुंचने के लिए खुद अध्ययन करने की जगह किसी भरोसमंद व्यक्ति या नेता की बात पर विश्वास करते हैं। इसी आधार पर सीपीआई ने कस्बो में स्थानीय बैंक मैनेजरों और प्रभावशाली लोगों से युद्ध के पक्ष में भाषण दिलवाए। सिनेमा घर से लेकर अन्य जगहों पर हुए इन छोटे-छोटे भाषणों से सरकार को लोगों का जनमत बदलने में काफी मदद मिली। भाषण देने वाले कई लोगों ने ऐसा दावा भी किया कि युद्ध विरोधी लोग दरअसल जर्मनी के एजेंट हैं और अमेरिका पर रूस चढ़ाई कर सकता है। इस अभियान की कामयाबी से बरनेस को काफी शोहरत हासिल हुई।

पब्लिक रिलेशन का बरनेस का सबसे चर्चित और विवादास्पद काम अमेरिकी टौबैको कंपनी के लिए था। अमेरिकी टोबैको कंपनी चाहती थी कि महिलाएं भी सिगरेट पीएं ताकि उनका कंज्यूमर बेस बड़ा हो। लेकिन उस दौर में सिगरेट पीने वाली महिलाओ की छवि अच्छी नहीं थी और उनके चरित्र पर सवाल उठाए जाते थे। बरनेस ने न्यूयॉर्क सिटी परेड में ग्लैमरस मॉडल्स का एक दल भेजा। इस बीच प्रेस को सूचना दी गई कि वे महिलाएं “आजादी की मशाल” जलाएंगी। एक खास जगह पर पहुंचकर इन मॉडल्स ने अमेरिकी टोबैको कंपनी की सिगरेट लकी स्ट्राइक जलाई और उसे होठों से लगा लिया। इसी मौके का इंतजार कर रहे फोटोग्राफरों ने उनकी तस्वीर उतारी और यह तस्वीर देश भर में छपी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस खबर को शीर्षक दिया- ग्रुप ऑफ गर्ल्स पफ एट सिगरेट एज ए जेस्चर ऑफ फ्रीडम। बरनेस ने अपने अभियान में सिगरेट को महिलाओं की आजादी के साथ जोड़ दिया। यह छवि लगातार लोगों के मन में बिठाई गई और अब भी सिगरेट को कई महिलाएं अपनी आजादी के साथ जोड़कर देखती हैं।

इस तरह के अभियानों की कामयाबी से बरनेस और दूसरे पब्लिक रिलेशन एक्सपर्ट्स का रुतबा काफी बढ़ गया। वे एक कंपनी से जुड़कर काम करने की जगह फर्म बनाकर काम करने लगे और कई कंपनियों और संस्थाओं के लिए सेवाएं देने लगे।

बरनेस की हमेशा यह मान्यता रही कि भीड़ या ढेर सारे लोग कोई फैसला नहीं कर सकते। उसकी राय में समाज में लोगों की राय को दिशा देना जरूरी है क्योंकि भीड़ की मानसिकता देश और समाज के लिए खतरा हो सकती हैं। 1928 में पहली बार छपी किताब प्रोपोगैंडा में बरनेस यह समझाने की कोशिश करते हैं कि लोगों की राय को बदलना कैसे मुमकिन है।

इस पुस्तक में बरनेस यह बताते हैं कि आधुनिक पब्लिक रिलेशन का विकास आधुनिक जीवन में जटिलताओं के विस्तार के साथ हुआ क्योंकि इस दौर में यह आवश्यक हो गया था कि लोगों का एक समूह दूसरे समूह तक अपनी बात पहुंचा सके और उसे सहमत कर सके। सरकार चाहे किसी भी तरह की क्यों न हो, उसके लिए आवश्यक है कि वह जनमत को अपने पक्ष में करे। यह उसके अस्तित्व की शर्त है। वह चाहे उद्योग हो या कोई शिक्षण संस्थान या कोई भी समूह या संस्था जो अपना उत्पाद या विचार लोगों तक पहुंचाना चाहता है, उसकी सफलता जनमत को अपने पक्ष में मोड़ने के साथ जुड़ी है। इसलिए पब्लिक रिलेशन की आवश्यकता है। बरनेस पब्लिक रिलेशन अधिकारी की परिभाषा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करते हैं जो संचार के आधुनिक माध्यमों का इस्तेमाल करके किसी विचार को लोगों के मन में बिठाने की कोशिश करता है।

बरनेस जब लोगों की मानसिकता बदलने की बात कर रहे थे तो इसके पीछे समाज के बारे में उनके विचारों को समझना आवश्यक है। उनकी राय में समाज स्तरों में बंटा हुआ है। ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जो किसी भी बात को ज्यादा सोच विचार किए बगैर मान लेते हैं। लेकिन कुछ ऐसे बुद्धिमान लोग होते हैं जिन पर इतिहास की धारा को चलाने और मोड़ने की जिम्मेदारी होती है। बरनेस आम लोगों को सोचने समझने की शक्ति को अहमियत नहीं देते। जीवन के आखिरी दिनों में दिए एक इंटरव्यू में बरनेस कहते हैं कि आम आदमी के विवेक के भरोसे नहीं रहा जा सकता क्योंकि वह भीड़ की तरह सोचता है। उनकी अपनी दिमागी संरचना उसे तथ्यों से दूर रखती है। वे आम लोगों को तर्कहीन कहते हैं।

बरनेस पब्लिक रिलेशन को विज्ञान मानते हैं जिसके माध्यम से समाज के नेता अराजकता के बीच व्यवस्था कायम करते हैं। उनकी राय में अगर समूह के सोचने के तरीकों ओर उसके पीछे के मकसद को समझ लिया जाए तो लोगों की राय को इस तरह नियंत्रित किया जा सकता है कि उन्हें इसका पता भी न चले। बरनेस इसकी तुलना मोटरसाइकिल ड्राइवर से करते हैं जो इंजन में पेट्रोल जाने की मात्रा को नियंत्रित करके बाइक की गति को नियंत्रित करता है। उनकी राय में ऐसा करना न सिर्फ जरूरी है बल्कि यह समाज के सोचने वाले लोगों का कर्तव्य भी है। एक पब्लिक रिलेशन अधिकारी को भी यह हुनर आना चाहिए क्योंकि उसे लोगों के सोचने समझने के तरीके की शिक्षा मिली होती है। इस वजह से वह आम लोगों से हटकर सोच सकता है और समूह तथा व्यक्ति के सोचने के तरीकों की जानकारी होने की वजह से अपने क्लाइंट के विचारों को लोगों तक पहुंचा सकता है।

ली और बरनेस के विचारों पर ही आधुनिक पब्लिक रिलेशन काम करता है। हम देख सकते हैं कि पब्लिक रिलेशन अपनी अंतर्वस्तु में एक ऐसी विधा है जो आम लोगों के सोचने के तरीकों पर भरोसा नहीं करता। पब्लिक रिलेशन का मतलब ही है कि लोगों के सोचने के तरीकों के बदलने की जरूरत है और ऐसा किया जा सकता है। यह काम सरकारी और निजी संस्थाएं तथा एनजीओ करते हैं। संस्थाएं कई बार यह काम सीधे तौर पर करती हैं और कई बार इसके लिए विशेषज्ञ कंपनियों की मदद लेती हैं। पब्लिक रिलेशन का काम जिन मंचों से होता है उसमें मास मीडिया प्रमुख हैं। इस वजह से पत्रकारिता और पब्लिक रिलेशन का काम साथ साथ चलता है। मीडिया और पब्लिक रिलेशन दोनों की विधाओं और संस्थाओं पर इलीट का नियंत्रण होता है और दोनों ही इलीट के हित में काम करते हैं।

पब्लिक रिलेशन: मोहॉक वैली फॉर्मूला
क्या आपने इस बात पर कभी गौर किया है कि जब कभी सरकारी बैंकों के कर्मचारी निजीकरण की सरकार की कोशिशों के खिलाफ आंदोलन या हड़ताल करते हैं तो उसकी मीडिया कवरेज किस तरह होती है। या किसान अगर कभी फसल की कीमत में बढ़ोतरी की मांग को लेकर या फसल खराब होने पर मुआवजे की मांग पर आंदोलन करने राजधानियों में आते हैं तो मीडिया उसे किस तरह कवर करता है।

बैंकों में हड़ताल की खबर हमेशा इस नजरिए से कवर होती है कि हड़ताल की वजह से आम लोगों को कितनी तकलीफ हुई और देश की अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान हुआ। इसी तरह राज्यों की राजधानियों में होने वाली रैलियों को भी स्थानीय लोगों को होने वाली दिक्कत और ट्रैफिक जाम के नजरिए से कवर किया जाता है। दिल्ली में गन्ना किसानों की रैली को तो बलवा करने वालों के हमले की तरह कवर किया गया था। मजदूरों के आंदोलन या तो मीडिया में कवर नहीं किए जाते हैं या फिर हिंसा भड़कने पर ही इन्हें खबर माना जाता है। लेकिन इन्हीं राजधानियों में जब आरक्षण विरोधी छात्र उत्पात मचाते हैं और बस और अन्य सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं तो उसे न्याय के लिए होने वाली लड़ाई के तौर पर दर्ज किया जाता है और मीडिया इसे बढ़ावा भी देता है। इसी तरह 1990 के दौर में राम मंदिर आंदोलन के लिए बलवा करने वालों को मीडिया ने देशभक्ति के आंदोलन के तौर पर कवर किया।

मजदूरों, कर्मचारियों और किसानों के आंदोलनों को लेकर मीडिया हमेशा आक्रामक रहता है और इसे शांति-व्यवस्था और देश की प्रगति के दुश्मनों के कृत्य के तौर पर देखता है। ऐसा सिर्फ भारत में नहीं है और यह सिलसिला नया भी नहीं है। नोम चोमस्की ने अपनी किताब मीडिया कंट्रोल में मोहॉक वैली फॉर्मूले का जिक्र किया है, जो पब्लिक रिलेशन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। पब्लिक रिलेशन का मकसद लोगों को दिमाग पर नियंत्रण करना है और मोहॉक वैली फॉर्मूला इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। मीडिया कंट्रोल किताब में इस फॉर्मूले के जन्म की कहानी बताई गई है।

अमेरिका में मजदूर आंदोलन के लिए 1935 एक महत्वपूर्ण साल था, क्योंकि इसी साल वेगनर एक्ट के तहत उन्हें संगठित होने का अधिकार मिला। इसके दो साल के अंदर 1937 में पश्चिमी पेंसिल्वेनिया में इस्पात मजदूरों की बड़ी हड़ताल हुई। इससे पहले तक हड़ताल को तोड़ने के लिए मिल मालिक बेहत हिंसक तरीके अपनाते थे, लेकिन इस बार की हड़ताल को तोड़ने के लिए एक नायाब हथियार- पब्लिक रिलेशन का इस्तेमाल किया गया। अखबारों के जरिए यह बात फैलाई गई कि यह हड़ताल जन विरोधी और अमेरिका विरोधी है। ऐसा माहौल बनाया गया ताकि लोगों को लगे कि हड़ताली मजदूर देश के विरोधी हैं और अमन चैन खत्म करना चाहते हैं। मीडिया पर नियंत्रण होने के कारण कॉरपोरेट जगत के लिए ऐसा करना मुश्किल भी नहीं था। यह फॉर्मूला असरदार साबित हुआ। उसके बाद से दुनिया भर में इसका अनगिनत बार इस्तेमाल हो चुका है।

भारत में इस फॉर्मूले का हर हफ्ते-महीने इस्तेमाल होता देखा जा सकता है। यहां मजदूर आंदोलन की बात करने वाले ही नहीं, मूल्य वृद्धि और बेरोजगारी के खिलाफ आंदोलन करने वालों को भी सुख-शांति के विरोधियों की तरह पेश किया जाता है। आंदोलन की तस्वीरों को देखें, तो हमेशा हिंसक तस्वीरों को प्राथमिकता दी जाती है। आंदोलन को तोड़ने के लिए पुलिस द्वारा किए गए बल प्रयोग की तस्वीरों के जरिए आंदोलन के हिंसक होने की छवि स्थापित की जाती है।

भारत में पब्लिक रिलेशन: फूलता-फलता कारोबार
उद्योग संगठन एसोचैम का अनुमान है कि भारत में पब्लिक रिलेशन का उद्योग 32 फीसदी की सालाना रफ्तार से बढ़ रहा है। 2008 में इस उद्योग का सालाना कारोबार 300 करोड़ डॉलर था, जब 2010 के अंत में दोगुना होकर 600 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है। इसके पीछे तर्क यह है कि आर्थिक तेजी के दौर में बिक्री और कारोबार बढ़ाने के लिए कंपनियां पब्लिक रिलेशन पर ज्यादा भरोसा कर रही है। कंपनियों के बीच होड़ बढ़ी है और ऐसे में मार्केटिंग की रणनीति के तौर पर पब्लिक रिलेशन का महत्व बढ रहा है। ऐसोचैम को तो इस बात की चिंता है कि इतनी तेजी से बढ़ते कारोबार के लिए काम करने वाले कहां से मिलेंगे। ऐसा अनुमान है कि इस समय देश में 1000 से 2000 पब्लिक रिलेशन कंपनियां हैं जिनमें 30,000 से 40,000 लोग काम करते हैं। इस उद्योग में भी पर्यायवरण और कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी का क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है।

इसी रिपोर्ट में कहा गया है किस स्थानीय स्तर पर हजारों एजेंसियां और कसंल्टेंट पब्लिक रिलेशन का काम कर रहे हैं, वहीं बड़ी कंपनियां अपनी पहुंच का दायरा बढ़ाने के लिए वैश्विक स्तर पर करार भी कर रही हैं। देश में लगभग 100 बड़ी पब्लिक रिलेशन कंपनियां हैं जिनमें से हरेक की देश भर में 10 से 15 तक शाखाएं हैं। इसके अलावा मझौले आकार की पीआर कंपनियां भी हैं,और कुछ कंपनियां शहर के स्तर पर काम करती हैं। अंतरराष्ट्रीय पीआर कंपनियों की भारतीय शाखाएं भी यहां काम करती हैं। कुछ पीआर कंपनियां खास क्षेत्र में काम करते हीं जैसे टेक्स्ट 100 और 20 20 का मुख्य काम आईटी क्षेत्र में है जबकि इंप्रिमिस का काम स्वास्थ्य क्षेत्र में है।

एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में पीआर के महत्व को दर्ज करते हुए लिखा है कि कम्युनिकेशन को असरदार बनाने के लिए विज्ञापन के पूरक के रूप में पब्लिक रिलेशन का इस्तेमाल किया जाता है। कई बार विज्ञापनों से कम्युनिकेशन के लक्ष्य पूरे नहीं होते, तो पब्लिक रिलेशन का सहारा लिया जाता है। भारतीय पब्लिक रिलेशन कंपनियां अपना कारोबार विदेशों में भी फैला रही हैं।

इकॉनोमिस्ट, 16 दिसंबर, 2010
प्रोपोगैंडा, एडवर्ड एल बरनेस, आईजी पब्लिकेशन, 2005
वही, पेज 63
द बर्थ ऑफ स्पिन, ट्रस्ट अस, वी आर द एक्सपर्ट पुस्तक से, स्रोत- थर्ड वर्ल्ड ट्रेवलर
एसोचैम की प्रेस रिलीज, 27 जनवरी, 2011 http://www.assocham.org/prels/shownews.php?id=2739

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