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कंप्यूटरों के आने से हुआ अखबारों का कायाकल्प

मुकुल व्यास।

एक समय था जब हिंदी के अखबार बहुत ही साधारण ढंग से निकलते थे। उनमें खबरों के स्थान निर्धारण और पृष्ठों की सजावट में प्लानिंग का अभाव साफ दिखाई देता था। भारी भरकम लाइनों मशीनों पर खबरें कम्पोज होती थीं और खबरों के स्लग हाथ से पेज पर लगाए जाते थे। अस्सी के दशक में कंप्यूटरों के आगमन के बाद खबरों की कंपोजिंग तो आसान हो गई, लेकिन काफी समय तक पृष्ठ निर्माण हाथ से होता रहा। मेकअप मैन को कंप्यूटरों से निकलने वाले खबरों के ब्रोमाइड को काट-काट कर पेज पर चिपकाना पड़ता था। मेकअप मैन और मुख्य उप-संपादक की मिलीजुली कल्पनाशीलता से ही पेज का लेआउट निर्धारित होता था।

तकनीकी सीमाओं की वजह से अखबार के पृष्ठों पर बहुत ज्यादा परिवर्तन करना संभव नहीं था। बहुत जरूरत पड़ने पर प्रथम लीड को बदलने की गुंजाइश अवश्य रहती थी। लेकिन क्वार्कएक्सप्रेस सॉफ्टवेयर के आगमन ने अखबारों की दुनिया बदल डाली। कंप्यूटर पर ही मनचाहे ढंग से पेज बनाने की सुविधा हो गई और अखबारी पेजों को सुंदर बनाने के लिए डिजाइनर भी मैदान में आ गए।

शुरू-शुरू में खबरों के मामले में प्लानिंग ठीक से नहीं होती थी। यदि प्रथम लीड के लिए खबर नहीं मिलती थी तो बाढ़ की खबर ही लीड बन जाती थी। धीरे-धीरे अखबारों ने संपादकीय मीटिंगों का सिलसिला शुरू किया और खबरों को बेहतर ढंग से चुनना शुरू किया। महत्वपूर्ण स्थानीय खबरें पहले पेज पर स्थान पाने लगीं और कभी-कभी इनको प्रथम लीड की भी जगह मिलने लगी। कुछ अखबारों ने पहले पेज पर राजनीतिक ख़बरों को कम करके दूसरी रोचक ख़बरों के लिए जगह बनाई और नियमित रूप से एक एंकर देने की परंपरा शुरू की।

कंप्यूटरों द्वारा किए गए तकनीकी रूपांतरण के बाद अखबारों के जीवन में दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव इंटरनेट और टीवी चैनलों के आगमन के बाद आया। इंटरनेट ने अखबारों में कार्यरत पत्रकारों के लिए समाचार स्रोतों का विस्तार किया और उनके लिए संदर्भ सामग्री की उपलब्धता को आसान बनाया। टीवी चैनलों ने पूरे दिन खबरें दिखाकर अखबारों के समक्ष एक प्रतिस्पर्धात्मक माहौल उत्पन्न करके उन्हें बेहतर अखबार निकालने के लिए ललकारा। बहुत से अखबार टीवी न्यूज चैनलों की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए समाचारों का सार विस्तार करने अथवा उनमें वैल्यू एडिशन करने के लिए विवश हुए। कई अखबारों ने मनोरंजन, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और रीयल एस्टेट जैसे विषयों पर सप्लीमेंट्स निकालने शुरू किए। कुछ अखबारो ने अपने पाठकों से सीधा संवाद करने के लिए विशेष कालम भी स्थापित किए। इन तमाम परिवर्तनों की वजह से ही आज अखबार पहले की तुलना में ज्यादा चुस्त और कंपैक्ट नजर आते हैं।

लेखक नवभारत टाइम्स में समाचार संपादक रहे चुके हैं।

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