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इंटरनेट पर समाचार पारम्परिक शैली से कैसे अलग हैं?

शालिनी जोशी |

वेब समाचार आखिर पारंपरिक मीडिया के समाचारों से कैसे अलग है. इसमें ऐसा क्या विशिष्ट है जो इसे टीवी, रेडियो या अख़बार की ख़बर से आगे का बनाता है, उसे और व्यापक बना देता है. कहने को तो वेब समाचार वैसा ही है जैसा पारंपरिक मीडिया का समाचार लेकिन इसके साथ नए विचार भी जुड़ते जाते हैं. ये विचार भाषाई या संपादकीय ही नहीं, ये तकनीकी भी हैं और वेब समाचार को एक नई शक्ल मुहैया करा देते हैं, वेब समाचार ने समाचार की प्रकृति बदल दी है. समाचार के क्या मूल्य हैं पारंपरिक पत्रकारिता के अनुभव से हम जानते हैं और कमोबेश ये मूल्य वेब पत्रकारिता के लिए भी लागू होते हैं:

1. प्रभाव

2. द्वंद्व

3. विशिष्टता

4. असाधारणता

5. दायरा

6. सामयिकता

समाचार मूल्यों का निर्धारण देश काल परिस्थिति के लिहाज़ से भी संभव है. और समाचार में प्रकट अप्रकट रूप से उपरोक्त मूल्यों के अलावा और भी मूल्य समाहित किए जा सकते हैं या अनायास आ जाते हैं. वेब पत्रकारिता में ये मूल्य जस के तस मौजूद हैं. फिर फ़र्क क्या है. फ़र्क ये है कि वहां ये मूल्य क्रांतिकारी तौर पर बदले जा सकते हैं, और बदले जाएंगें. समाचार लिखने की परंपरागत शैलियां टूट रही हैं, टूटेंगी और वेब पत्रकारिता जैसे नए माध्यमों में शब्दों की सार्थकता, उपयोगिता और खपत का विशेष ख़्याल रखा जाएगा. वहां शब्द के साथ अन्य मॉडयूल भी उपलब्ध हैं जिनसे होकर  ख़बर को गुज़रना है लिहाज़ा वो बने बनाए ढांचे में हमेशा फ़िट होती रहे ये आवश्यक नहीं रह गया है, नहीं रह पाएगा. वेब माध्यम में इसकी अनुमति है और बड़ी बात दर्शक या पाठक इस बदलाव की, समाचार की वैविध्यपूर्ण प्रस्तुति की मांग करता रहेगा.

वेब पत्रकारिता में समाचार की क्या विशिष्टताएं हैं या हो सकती हैं:

समाचार, अधिक से अधिकः

वेब सूचनाओं को पारंपरिक मीडिया की तुलना में बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है तो वेब में यह हो रहा है. अपार सूचनाएं हैं और वे सब समाचार का हिस्सा बन रही हैं. वेब पत्रकार ‘इनवर्टेड पिरामिड’ के समाचार लेखन मॉडयूल के अलावा भी ख़बर की प्रस्तुति के तरीक़े तलाश कर रहा है, ईज़ाद कर रहा है. वो एक समग्र और संपूर्ण पैकेज पेश करता है. मिसाल के लिए किसी शिक्षा संस्थान में एक मशहूर लेखक का लेक्चर है. प्रिंट का पत्रकार उसका लेक्चर सुनेगा, अहम बातें नोट करेगा और घटना के बारे में एक रिपोर्ट बना देगा. इसी तरह फोटोग्राफ़र लेखक की एक या कुछ तस्वीरें खींच लेगा. टीवी कुछ विज़ुअल्स ले लेगा और एक रिपोर्ट लेखक की साउंड बाइट और कुछ छात्रों की साउंड बाइट लेकर तैयार कर देगा. रेडियो पत्रकार भी लेखक और अन्य लोगों की ऑडियो क्लिपिंग लेकर रिपोर्ट करेगा. एक वेब पत्रकार इन सबके बीच क्या करेगा या क्या क्या कर सकता है. वो अपनी ख़बर निम्न तरीकों से पेश कर सकता है.

1. उल्टा पिरामिड शैली में एक रिपोर्ट

2. भाषण का पूरा टेक्स्ट

3. भाषण के अहम हिस्से की एक डिजिटल वीडियो क्लिप

4. लेखक के बारे में और जानकारी, उसका पूरा प्रोफ़ाइल

5. लेखक के बारे में किसी अन्य वेबसाइट का लिंक जिसमें उसके लेखन किताबों आदि की चर्चा हो

6. लेखक, सभा कक्ष और कैंपस की तस्वीरें

7. छात्रों की प्रतिक्रियाओं की ऑडियो और वीडियो क्लिपिंग

8. फ़ी़डबैक के लिए निमंत्रण

9. ख़बर की बुकमार्किंग, पॉडकास्टिंग आदि

उपरोक्त बिंदु कमोबेश उस वृहद और रोमांचक वेब न्यूज़ प्रोसेसिंग का हिस्सा है जो वेब माध्यम को व्यापक सघन और नया बनाती है. एक नज़र में ये एक बड़ा फैला हुआ काम लगता है लेकिन एक दक्ष वेब पत्रकार जानता है कि कुछ तकनीकी कौशल और कुछ संपादकीय फ़ुर्ती के साथ वो इस रिपोर्ट को आदर्श बहुआयामी वेब रिपोर्ट में ढाल सकता है. डेडलाइन की छूट और डेडलाइन से आगे अख़बार, टीवी और रेडियो समाचार डेडलाइन से बंधे हैं. वे एक निश्चित समय में आते हैं और निश्चित समय में प्रसारित होकर पुराने होते जाते हैं. टीवी और रेडियो डेडलाइन के कई चक्रों से गुज़रते हैं. अख़बार की छपाई का एक निश्चित समय है, एक निश्चित अवधि के बाद उसे वितरण के लिए भेज देना होता है. अख़बार, टीवी और रेडियो की डेडलाइनों से पाठक दर्शक बंधे हैं. वेब मीडिया ऐसी किसी पारंपरिक डेडलाइन का पालन नहीं करता. वहां हमेशा हरदम ख़बर है  औऱ कहें तो हर पल ही डेडलाइन है या डेडलाइन है ही नहीं .तत्काल औऱ नियमित अपडेट की सुविधा है.समाचार आते ही उसे किसी डेडलाइन का इंतज़ार नहीं करना होता. अगर ख़बर तैयार है तो वेब पर वो फ़ौरन जारी की जा सकती है और देखा जाए तो वेब, ख़बर ब्रेक करने की प्रतिस्पर्धा में सबसे आगे रहता है.विभिन्न वेबसाइटों में  इसे लेकर आंतरिक होड़ शुरू भी हो गई है. पिछले उदाहरण को ही आगे बढ़ा कर देखें तो शिक्षा संस्थान में लेक्चर देने आए प्रसिद्ध लेखक की स्पीच से पहले भी वेब में उस सिलसिले में संबंधित ख़बरें विस्तार से या संक्षेप में दी जा सकती हैं.( ये तरीक़ा न्यूज़ बिफ़ोर न्यूज़ के कंसेप्ट से निकला है) उसके काम के बारे में उसके लेखन और उसके पुराने लेक्चरों के हवाले से सामग्री डाली जा सकती है. एक बैकग्राउंड मैटर उस बारे में पहले ही जारी किया जा सकता है.

इस तरह वेब पत्रकारिता में समाचार का ट्रीटमेंट भी ज़्यादा तीव्र ज़्यादा परिवर्तित होता जाता है. वहां समाचार को पेश करने के एक नहीं अनेक अंदाज़ हैं और सब एक साथ दृष्टव्य और पठनीय है.

नॉनलिनीयरिटी…गैररेखीयता

वर्ल्डवाइड वेब में एक पेज को दूसरे से जोड़ा जा सकता है. एक ही लेख को कई टुकड़ों में बांटा जा सकता है और एक ही विषय को कई दृष्टिकोण से भी लिखा जा सकता है. अख़बार और टीवी-रेडियो में पाठक या दर्शक या श्रोता एक सिरे से पढ़ना या देखना या सुनना शुरू करता है फिर अंत तक पहुंचता है. टीवी-रेडियो तो सबसे ज़्यादा लीनियर या रेखीय है. वहां शुरू से अंत में आना होता है. आप आगे पीछे नहीं हो सकते. आपको समाचार शुरू से आखिर तक देखना लाज़िमी है. एक सीक्वेंस से आप बंधे रहते हैं. अखबार में आप यूं एक समाचार का कोई भी हिस्सा पढ़ सकते हैं या कुछ और सामग्री देख सकते हैं. लेकिन अपनी पूरी साज सज्जा में अख़बार लीनियर है. आपको पहले से आख़िर तक आना ही होता है. वेब लीनियर भी हो सकता है और नॉन लीनियर भी. वेब पत्रकारों को दोनों फ़ॉर्मेट पर काम करना आना चाहिए, दोनों की जानकारी, उपयोगिता और कमियों के बारे में उसे पता होना चाहिए. रेखीयता से समाचार को बचाए रखने के लिए वेब पत्रकार को कुछ तरकीबें आनी चाहिए.उन्हें उन आकर्षक रास्तों-गलियारों का पता होना चाहिए जिनसे होते हुए वो अपने दर्शक पाठक को अपनी ख़बर से गुज़ारना चाहता है.

वेब न्यूज़ में आप आदि से अंत वाले फ़ॉर्मेट को भंग करते रह सकते हैं. आप बीच में कुछ दिलचस्प सूचनाएं डाल सकते हैं जिनका संबंध ख़बर से है, कुछ अहम लिंक्स जोड़ सकते हैं,कुछ ग्राफ़िक ब्यौरे, कुछ तस्वीरें डाल सकते हैं. जैसे-जैसे वेब जर्नलिज़्म का विकास होगा, इन तरीक़ों की छानबीन होगी और इस दिशा में नए शोध, नए अध्ययन और नए प्रयोग सामने आते जाएंगें. कुछ कमियां भी उजागर होंगी लेकिन ज़ाहिर है इन सबके बीच एक ठोस जीवंत वेब समाचार पैकेजिंग देखने को मिल सकती है.

ऑडियंस जेनेरेटड न्यूज़ः पाठक-दर्शक-श्रोता की बनाई ख़बर समाचार उत्पादन या उसके निर्माण में उपभोक्ता की क्या भूमिका हो सकती है, वेब माध्यम में इस सवाल को रेखांकित करते हुए प्रयोगों का सिलसिला चल रहा है. जनता को ज़्यादा से ज़्यादा जोड़ने के लिए, ख़बर को जनोन्मुख बनाने के लिए और उसे यूज़र फ्रेंडली बनाने के लिए वेब पत्रकारिता में कुछ औजार इस्तेमाल किए गए हैं. नए औजार विकसित किए जा रहे हैं. दर्शक पाठक की भागीदारी बढ़ाने, समाचार उत्पादन से लेकर प्रस्तुति तक उसकी भूमिका बनाए रखने में वेब पत्रकारनिम्न तरीक़े इस्तेमाल करते हैं:

1. ईमेलः ईमेल के ज़रिए वेबसाइट अपने उपभोक्ताओं को जोड़े रखती हैं. समाचार या रिपोर्ट के नीचे रिपोर्टर का ईमेल लिखा होता है. पाठक उसके ज़रिए रिपोर्टर को अपनी राय भेज सकते हैं. ख़ामियों और खूबियों के बारे में बता सकते हैं. समाचार से जुड़े किसी एंगल का ज़िक्र कर सकते हैं. इस तरह से न्यूज़ वैल्यू एडीशन कर सकते हैं

2. ऑनलाइन पोलः वेबसाइटें एक सवाल जारी करती हैं और पाठकों को

जवाब देने के लिए आमंत्रित करती हैं. ये जवाब एक लाइन या कुछ

लाइनों में हो सकते हैं या सिर्फ़ हां या नहीं में. वेबसाइट के विज़िटर्स

को मशगूल रखने का ये दिलचस्प तरीका है.

3. बुलेटिन बोर्डः कई वेबसाइटों में पाठक अपनी सूचना या विचार को

पोस्ट कर सकते हैं.

4. फ़ोरमः वे बहस का हिस्सा बन सकते हैं और एक दूसरे से लिखित

संवाद कर सकते हैं.

5. फ़ीडबैकः वेबसाइट में पाठकों की प्रतिक्रिया के लिए एक इंडेक्स रहता

है. जिसमें वे अपनी प्रतिक्रिया भेज सकते हैं.

6. ऑनलाइन चैटः कई वेबसाइटों में ऑनलाइन बातचीत की सुविधा

रहती है, किसी विषय पर संवाद स्थापित किया जा सकता है और ये

वेबसाइट की लोकप्रियता जुटाने का कारगर हथियार बनता है. ये चैट

रिपोर्टरों और समाचार टीम के किसी भी सदस्य के साथ किया जा

सकता है.

इस तरह पाठकों दर्शकों को भागीदारी का अहसास कराकर उनमें बातचीत का सुख

और सक्रियता और ज़िम्मेदारी की भावना भरी जा सकती है. इसमें ध्यान देने

वाली बात ये है कि पाठक दर्शक अपनी प्रतिक्रिया में क्या लिख रहे हैं. वे वेबसाइट

के नियमों का या सामान्य सार्वजनिक नियम क़ायदों और अनुशासन का हनन न

कर रहे हों, वहां किसी की मानहानि या देश समाज नागरिक को नुकसान पहुंचाने

वाली बातें न जाएं, गंभीरतापूर्वक ये देखने की ज़िम्मेदारी भी वेबसाइट की होती है

और इसके लिए बाक़ायदा एक मॉडरेटर या मॉनीटर भी रहता है.

कई समाचार वेबसाइटें लोगों की राय को सीधे, बिना देखे या बगैर संपादित किए

जारी करने से परहेज़ करती हैं.वेबसाइट डिज़ाइन करते समय ही इसका तकनीकी

विकल्प चुना जाता है कि पाठकों की राय सीधे प्रकाशित हो या संपादक की नज़र

से गुज़रने के बाद.

शालिनी जोशी ज़ीटीवी, आज तक टीवी समाचार चैनलों और बीबीसी रेडियो में 18 साल के

पत्रकारीय अनुभव के बाद इन दिनों मीडिया अध्यापन, लेखन और शोध से जुड़ी हैं. वो फिलहाल

जयपुर स्थित हरिदेव जोशी जनसंचार और पत्रकारिता विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के

रूप में कार्यरत हैं.

 

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