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बिज़नेस चैनल का एक दिन और पत्रकारिता

नीरज कुमार।

कोई बिज़नेस चैनल देखिए। पहली बार में शायद ही आपके पल्ले पड़े कि क्या बोला जा रहा है, क्यों बोला जा रहा है। जो आंकड़े या चार्ट दिखाए रहे हैं, उनके मायने क्या हैं। ऐसा आपके साथ तब भी हो सकता है, जब आप अर्थव्यवस्था या बिज़नेस की मोटी-मोटी समझ रखते हों। बिज़नेस चैनल में काम करने की तमन्ना रखने वाले युवा पत्रकारों के लिए कुछ आधारभूत सवालों के जवाब जानने ज़रूरी है।

बिज़नेस चैनल का ढांचा कैसा होता है?
बिजनेस चैनल को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जाता है। पहला, मार्केट आवर यानि दिन का वो वक्त जब घरेलू शेयर और कमोडिटी मार्केट खुले रहते हैं। दूसरा,नॉन मार्केट ऑवर-जब मार्केट बंद रहता है। यहां शेयर बाज़ार का आशय घरेलू शेयर बाज़ार से है,जिसमें ख़ासतौर से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (सेंसेक्स) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (निफ्टी) शामिल हैं। मार्केट आवर में बाजार में ट्रेडिंग पर नज़र रहती है। मार्केट में किन शेयरों की खरीद-बिक्री चल रही है। किन शेयरों का भाव गिर रहा है और क्यों गिर रहा है, ये बताया जाता है। साथ ही, मार्केट एक्सपर्ट निवेशकों को फंडामेंटल, टेक्निकल जैसे आधारों पर शेयरों में निवेश के तरीके बताते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो बिज़नेस चैनल पर दिन भर दर्शकों को ये बताया जाता है कि किन शेयरों में मुनाफ़ा कमाने के मौक़े हैं और किन शेयरों से दूर रहने में भलाई है।

वहीं कम्पनी और पॉलिसी से संबंधी ख़बरों के असर की बातें भी होती हैं। किसी कम्पनी के नतीजे अगर अच्छे आते हैं, या फिर शेयर से जुड़ी कोई सकारात्मक ख़बर आती है तो इसका असर शेयर की बढ़ी हुई क़ीमत के रूप में दिखता है। वहीं अगर नकारात्मक ख़बर हो तो शेयर का भाव नीचे आता है। मार्केट ऑवर कायदे से सुबह 9:15 बजे सेंसेक्स और निफ्टी पर ट्रेडिंग शुरू होने के साथ होता है। और शाम 3:30 बजे तक चलता है…हालांकि सेंसेक्स और निफ्टी में प्री ओपन सेशन सुबह 9 बजे शुरू होता है। प्री ओपन पर चर्चा आगे करेंगे…नॉन मार्केट आवर यानी साढ़े तीन बजे के बाद चैनल पर बिज़नेस ख़बरों का विश्लेषण और बिज़नेस संबंधी दूसरे प्रोग्राम दिखाए जाते हैं।

ट्रेडिंग कैसे शुरू होती है और मार्केट प्री ओपन सेशन क्या है?
शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग सुबह 9:15 शुरू होती है। लेकिन इससे पहले प्री ओपन सेशन होता है। इस सेशन में एक्सचेंज पर ऑर्डर एडजस्टमेंट की जाती है। असल मायने में यहां ट्रेडिंग रिकॉर्डिंग नहीं होती है। निवेशक या तोशेयर खरीदने का ऑर्डर देते हैं या फिर बेचनेका। दोनों तरह के ऑर्डर को एडजस्ट कर शेयर का भाव सप्लाई और डिमांड के आधारपर तय किया जाता है। उसी एडजस्टेड भाव पर शेयरमार्केटकी ओपनिंग होती है। इसके बाज़ार में निवेशक मौजूदा भाव पर शेयर ख़रीदते-बेचते हैं।

बाज़ार में निवेश के क्या-क्या तरीके हैं?कैश मार्केट, फ्यूचर्स और ऑप्शन मार्केटएक दूसरे से कैसे अलग हैं?प्राइमरी मार्केट और सेंकेंडरी मार्केट के क्या मायने हैं?

शेयर बाज़ार में निवेश की सबसे पहली शुरुआत डीमैट अकाउंट खोलने के साथ होती है। जहां आप किसी ब्रोकरेज फर्म के साथ अकाउंट खोलते हैं और फिर ऑनलाइन या फोन के जरिए ट्रेड कर सकते हैं। शेयर बाज़ार में प्राइस डिमांड और सप्लाई के हिसाब से तय होती है। अगर शेयर के लिए बायर्स ज्यादा और सेलर्स कम हैं तो शेयर का भाव ऊपर की ओर जाएगा, वहीं अगर सेलर्स ज्यादा और बायर्स कम हैं तो शेयर में गिरावट आती है।

कैश मार्केट, फ्यूचर्स एंड ऑप्शन मार्केट
आमतौर पर रिटेल निवेशक कैश मार्केट में निवेश करते हैं, लेकिन बाज़ार की अस्थिरता और अपना ज़ोखिम कम करने के लिए फ्यूचर्स और ऑप्शन बेहतरीन स्ट्रैटेजी हैं। जहां आप गिरते बाज़ार में भी कमाई कर सकते हैं। फ्यूचर्स मार्केट में ट्रेडिंगफ्यूचर्स मार्केट यानी भविष्य के भाव का अनुमान लगाकर आज की तारीख में आप सौदा करते हैं और बीच का मार्जिन आपका फायदा होता है।फ्यूचर्स में लॉन्ग और शॉर्ट की स्ट्रैटेजी होती है, जहां लॉन्ग सौदे कर चढ़ते बाज़ार में कमाई कर सकते हैं, वहीं शॉर्ट सौदे में गिरते बाज़ार में कमाई की जाती है। इन सौदे की ट्रेडिंग सिंगल शेयरों की बजाय लॉट में होती है। उदाहरण के तौर पर अगर टाटा मोटर्स के एक लॉट में 100 शेयर हैं, और आप इस शेयर में लॉन्ग सौदे बनाते हैं, तो एक मार्जिन रकम आपको अपने डीमैट अकाउंट में जमा करनी होती है। और आपके खरीद प्राइस से शेयर एक रुपये ऊपर जाता है तो आपको 100 रुपये का फायदा होता है, वहीं एक रुपया नीचे आने पर 100 रुपये का नुकसान होता है।

इसी तरह शॉर्ट सौदे में अगर आप ट्रेड करते हैं तो एक रुपया शेयर चढ़ने पर 100 रुपये का नुकसान और एक रुपये नीचे आने पर 100रुपये का मुनाफा होता है। यानी गिरते बाज़ार में शॉर्ट सेल के जरिए कमाई कर सकते हैं। साथ ही आपको इस सौदे में बने रहने के लिए मार्क-टू मार्केट के हिसाब से मार्जिन मनी देनी पड़ती है, और जिस महीने की सीरीज में ट्रेड किया है उसे आगे ले जाने के लिए रोल-ओवर कॉस्ट भी देनी पड़ती है, नहीं तो आपको अपना सौदा फायदे या नुकसान में एक्सपायरी तक काटनी होगी जिसे हम स्कॉव्यर ऑफ कहते हैं।

प्राइमरी मार्केट और सेंकेंडरी मार्केट
कोई भी कंपनी जब पहली बार बाज़ार से पैसा जुटाने के लिए IPO लाती है तो उस मार्केट को प्राइमरी मार्केट कहते हैं। जब बाज़ार में शेयर लिस्ट हो जाता है तो वो सेकेंडरी मार्केट का हिस्सा बन जाता है। सेकेंडरी मार्केट में आने के बाद भी कंपनियां बाज़ार से पैसा जुटाने के लिए FPO (फॉलोऑन पब्लिक ऑफर), राइट्स इश्यू, OFS और QIP का सहारा लेती हैं। जहां वो मौजूदा निवेशक, नए निवेशक और इंस्टीट्यूशंस को शेयर जारी कर पैसा जुटा सकती हैं।

ऑप्शन ट्रेड क्या होता है?
ऑप्शन ट्रेडिंग में पुट और कॉल दो तरीके से आप ट्रेड कर सकते हैं। कॉल ऑप्शन में आप शेयर खरीदते हैं और पुट ऑप्शन में शेयर बेचते हैं। यानी कॉल ऑप्शन में अगर शेयर आपके स्ट्राइक प्राइस से ऊपर जाता है तो आप पैसा बनाते हैं और स्ट्राइक प्राइस से नीचे आने पर आपको नुकसान होता है। वहीं पुट ऑप्शन में अगर शेयर आपके स्ट्राइक प्राइस से ऊपर जाता है तो आपको नुकसान होता है और स्ट्राइक प्राइस से नीचे आने पर आपको मुनाफा होता है। लेकिन यहां आपकी कॉस्ट सिर्फ आपकी प्रीमियम मनी होती है। फ्यूचर्स में जहां फायदा और नुकसान अनलिमिटेड होता है वहीं ऑप्शन में नुकसान प्रीमियम मनी तक सीमित होताहै और फायदा अनलिमिटेड….ऑप्शन ट्रेडिंग में अगर आप राइटर नहीं है तो छोटा जोखिम उठाकर आप मालामाल हो सकते हैं…

ट्रेडिंग में स्टॉपलॉस और टारगेट पर ज़ोर क्यों दिया जाता है?
शेयर में निवेश करते वक़्त टारगेट और स्टॉपलॉस का ख़ास ख्याल रखा जाता है। शेयर के बढ़ते-घटते भाव के बीच ये तय करना होता है कि शेयर किस भाव पर खरीदना है। शेयर की खरीद या बिक्री मुनाफ़े के लिए की जाती है। शेयर खरीदते समय शेयर का टारगेट यानि लक्ष्य शेयर के मौजूदा भाव से ऊपर रखा जाता है। मान लीजिए कि रिलायंस का मौजूदा भाव 900 रुपये हैं….और ये शेयर खरीदने का फ़ैसला करते हैं तो यहां टारेगट मौजूदा भाव 1-2 परसेंट ऊपर यानि करीब 920 रुपये होगा…इसका मतलब है कि शेयर का मौजूदा भाव चढ़कर जब 920 रुपये हो जाएगा तब आप शेयर बेचकर निकल जाएंगे और प्रति शेयर 20 रुपया मुनाफा कमाने का लक्ष्य पूरा हो जाएगा…उसी तरह स्टॉपलॉस मौजूदा भाव से 1-2 परसेंट नीचे रखा जाता है…900 रुपये के शेयर पर स्टॉपलॉस क़रीब 880 रुपये है…इसका मतलब है कि शेयर का भाव मौजूदा भाव से नीचे 880 तक आ जाएगा तो आप शेयर बेचकर निकल जाएंगे…क्योंकि स्टॉपलॉस ट्रिगर हो गया है…यानि प्रति शेयर 20 रुपये से ज़्यादा का घाटा नहीं सह सकते हैं…शेयर कितने समय के लिए ख़रीदा जा रहा है ये भी अहम है। क्योंकि इसके आधार पर स्टॉपलॉस और टारगेट तय किया जाता है। जितना लंबी अवधि का नज़रिया होगा, टारगेट-स्टॉपलॉस उतना ही डीप होता है। हालांकि बिकवाली के सौदे में टारगेट मौजूदा भाव से कम होता है, जबकि स्टॉपलॉस मौजूदा भाव से ज़्यादा।

शेयरों की खरीद-बिक्री के आधार क्या होते हैं?
शेयरों में निवेश के लिए मुख्यत: 2 तरीके अपनाए जाते हैं। पहला फंडामेंटल और दूसरा टेक्निकल। सबसे पहले बात फंडामेंटल आंकलन की। आखिर फंडामेंटल विश्लेषण क्या होता है। फंडामेटल विश्लेषण में किसी कंपनी की आर्थिक जानकारी इकट्ठा की जाती है। इसमें कंपनी के मैनेजमेंट, तुलनात्मक फ़ायदे, भविष्य में कंपनी की विकास संभावनाएं आदि शामिल होते है। फंडामेटल विश्लेषण में कंपनी के पुराने और मौजूदा वित्तीय आंकड़ों का अध्ययन होता है जिसके जरिए कंपनी के लक्ष्य और भविष्य के बारे में जाना जा सकता है। किस कंपनी में कितनी मजबूती है इसे जानने के लिए कंपनी के आर्थिक आंकड़ों जैसे आय, मुनाफा, घाटा और बैलेंस शीट पर नजर डाली जाती है।

अब बात टेक्निकल आंकलन की। दरअसल अनिश्चितता से भरे शेयर ट्रेडिंग में भावों के उतार-चढ़ाव को समझना सबसे बड़ी चुनौती है। टेक्निकल एनालिसिस के जरिए शेयर के डाटा के जरिए उसकी सही कीमत का अंदाजा लगाते हैं। इसमें मुख्य रूप से दो बातों पर ध्यान दिया जाता है। शेयर की कीमत और ट्रेडिंग की मात्रा यानी वॉल्यूम। सरल शब्दों में कहा जाए तो टेक्निकल एनालिसिस के तहत देखा जाता है कि किसी किस अवधि में किसी स्टॉक की कीमत में कितना उतार-चढ़ाव आया। टेक्निकल एनालिसिस में शेयर के चार्ट का अध्ययन काफी अहम होता है। चार्ट के अध्ययन के बाद ही शेयर के ट्रेंड का अनुमान लगाया जाता है।

रेटिंग एजेंसियों का महत्व
शेयर के भाव में उतार-चढ़ाव सिर्फ टेक्निकल या फंडामेंटल कारणों से ही नहीं आता। दरअसल शेयर बाज़ार में क़ाफी रेटिंग एजेंसियां और ब्रोकरेज हाउस मौजूद हैं जो कंपनी पर रिपोर्ट निकालती रहती हैं। सबसे पहले बात रेटिंग एजेंसियों की। किसी भी कंपनी को विस्तार या रोजमर्रा की जरूरत को पूरा करने के लिए कर्ज़ की जरूरत पड़ती रहती है। रेटिंग एजेंसियां बड़ी कंपनियों या बड़े पैमाने पर उधार लेने वालों का मूल्यांकन करती हैं। इस मूल्यांकन पर निर्भर करता है कि उधार लेने वाले की माली हालत कैसी है और उनकी उधार लौटाने की क्षमता कितनी है। अच्छे मूल्यांकन का अर्थ है कम ब्याज पर आसानी से क़र्ज़ यानि आम निवेशक के लिए निवेश के लिए कंपनी काफी सुरक्षित है। ख़राब मूल्यांकन का मतलब है ऊंची दरों पर मुश्किल से क़र्ज़ यानि कंपनी की वित्तीय स्थिति गड़बड़ है। आम निवेशकों को ऐसी कंपनियों से दूर रहना चाहिए। इस समय रेटिंग की दुनिया में तीन बड़े नाम हैं। स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स, मूडीज़ और फ़िच। भारत में क्रिसिल, ICRA और CARE रेटिंग का काम करते हैं।

रेटिंग एजेंसियों के अलावा बाज़ार में दर्जनों ब्रोकरेज हाउस भी मौजूद हैं। दरअसल कई ब्रोकरेज हाउस अपने निवेशकों के लिए समय-समय पर रिपोर्ट निकालती हैं। इस रिपोर्ट में कंपनी का आउटलुक तो बताया ही जाता है साथ ही कंपनी का लक्ष्य भी बताया जाता है। सिटी, बैंक ऑफ अमेरिका-मैरिल लिंच, CLSA, क्रेडिट सुईस, जैफरीज दिग्गज ब्रोकरेज हाउस हैं।

शेयर बाज़ार का अंतर्राष्ट्रीय पहलू
कंपनी की परफॉरमेंस और इकोनॉमिक पॉलिसी का शेयर बाज़ार पर असर तो पड़ता ही है, साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय कारणों से भी शेयर बाज़ार प्रभावित होता है। विदेशी बाज़ारों में होने वाला कारोबार भी घरेलू बाज़ार के लिए ट्रिगर साबित होते हैं। दरअसल, भारतीयबाज़ार में विदेशी निवेशक यानि FPI(फॉरन पोर्टफोलियो इनवेस्टर्स), FIIs भी पैसा लगाते हैं। विदेशी निवेशक अगर भारतीय बाज़ार में पैसा लगाते हैं तो शेयर का भाव ऊपर जाता है। अगर वह पैसा निकालते हैं, तो भाव नीचे आता है। विदेशी निवेशक दुनियाभर के बाजारों में लगातार पैसा लगाते हैं, जिस मार्केट में कमाई की ज़्यादा संभावना होती है, वहां अपना फंड शिफ्ट कर देते हैं। अगर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार मसलन अमेरिकी बाज़ार (Dow,FTSE, S&P 500), एशियाई(निक्केई, कॉस्पी,शंघाई, हैंगसैंग) में मुनाफे की गुंजाइश ज़्यादा होती है, विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकाल दूसरे बाज़ारों में लगाते हैं। लिहाजा, भातीय बाजारों में कितना निवेश आएगा, ये अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों की स्थिति पर भी निर्भर करता है।

कमोडिटी वायदा कारोबार क्या है?
इक्विटी या शेयर के अलावा कमोडिटी बाज़ार में ट्रेडिंग निवेशकों को मुनाफा कमाने का मौका देता है। अगर कोई शेयर बाज़ार के इतर पैसे निवेश करना चाहता है तो उसके लिए जिंस (एग्री कमोडिटी) बुलियन (सोना-चांदी) और मेटल्स (कॉपर, जिंक आदि) में निवेशके विकल्प मौजूद हैं। कमोडिटी में फ्यूचर ट्रेडिंग होती है। जिसमें निवेशक करंट मंथ और नेक्स्ट मंथ के जरिए अपने पैसे निवेश कर सकता है। इसे वायदा बाजार भी कहा जाता है। यानी जहां आपके निवेश पर कमोडिटी ख़रीदने और बेचने की गारंटी दी जाती है। यहां कमोडिटी की असल मायने खरीद-बिक्री नहीं होती है यानि की अगर किसी ने सोना या चांदी खरीदी है, तो वह उसे फिजिकल रूप में नहीं उठाता है। मौजूदा दौर में कमोडिटी में निवेशकों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है। अलग-अलग कमोडिटी में निवेश के लिए अलग-अलग एक्सचेंज होते हैं।

अगर आप सोना-चांदी, क्रूड, नेचुरल गैस, मेटल्स, सीपीओ और मेंथा कमोडिटी में निवेश करना चाहते हैं तो आपको MCX (मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज) के जरिए निवेश करना होगा। निवेश से पहले एक डीमैट अकाउंट खुलवाना होता है उसके बाद लॉट्स के जरिए इन कमोडिटी में ख़रीदारी करनी होती है। एग्री कमोडिटी में निवेश एक अलग कमोडिटी एक्सचेंज NCDEX के माध्यम से करना होता है। यहां आप ग्वारसीड, ग्वारगम, चना, सोयाबीन, सोया ऑयल, हल्दी, जीरा, धनिया, सरसों, कैस्टरसीड, मक्का, गेहूं, बारले, तेजा मिर्च, चीनी में ट्रेडिंग कर सकते हैं। मुख्यत: ट्रेडिंग सोने-चांदी, क्रूड, बेस मेटल्स में ही होती है…एग्री वायदा में सबसे ज्यादा ट्रेडिंग ग्वारसीड, चना, जीरा, कैस्टरसीड आदि में होता है। फिलहाल MCX और NCDEX की नियामक संस्था FMC है। लेकिन अगले कुछ महीने में इसका विलय SEBI में हो जाएगा।

बिज़नेस चैनल में काम करने के लिए इकोनॉमी, बिज़नेस, फाइनेंस जैसे विषयों की समझ होनी चाहिए। ऊपर उन चीजों का जिक्र किया गया है, जिसका आमतौर इस्तेमाल होता है। मनीकंट्रोल डाट कॉम, शेयखान डाट काम, सेंसेक्स, निप्टी वेबसाइट जैसे साइट बिज़नेस पत्रकारिता के बारीक पहलुओं को समझने में मददगार साबित हो सकते हैं।

नीरज कुमार ज़ी बिजनेस में प्रोड्यूसर हैं।

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फोटो साभार: openmedia.ca

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