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जनसंचार: आखिर विकल्प क्या हैं?

देवाशीष प्रसून।

पूंजी संकेन्द्रण की अंधी दौड़ में मीडिया की पक्षधरता आर्थिक और राजनीतिक लाभ हासिल करने में है। कभी-कभार वह जनपक्षीय अंतर्वस्तु का भी संचरण करता है, परंतु जनहित इनका उद्देश्य न होकर ऐसा करना केवल आमलोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाये रखने हेतु एक अनिवार्य अभ्यास है। मीडिया को ले कर इस तरह की बातें आम धारणाएँ हैं। इनके कारणों को बड़े गहराई से समझने की जरूरत है और यह पड़ताल करना जरूरी है कि आख़िर ऐसा है, तो है क्यों? यह आलेख इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है।

मीडिया का मतलब
आमतौर पर मीडिया का मतलब प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मास-मीडिया से ही लगाया जाता है। जबकि ऐसा सोचना पूरी तरह सही नहीं है। मीडिया का अर्थ बड़ा व्यापक है। इसे समझने के लिये संचार या कम्युनिकेशन की अवधारणा को ठीक से समझना बहुत जरूरी है। संचार एक सामाजिक व्यवहार है, जिसके अन्तर्गत किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के द्वारा स्वयं को, दूसरे व्यक्ति को या व्यक्तियों के किसी दूसरे समूह को प्रभावित किया जाता है। प्रभावित करना ही संचार की सफलता का निहितार्थ है।

1948 में प्रख्यात राजनीति वैज्ञानिक लॉसवेल ने संचार द्वारा किसी को प्रभावित करने के लिये चार तत्वों को आवश्यक माना है, जिसमें से एक माध्यम भी है। उन्होंने कहा कि किसी भी संचार प्रक्रिया में संदेश, उसका स्रोत, उसके संचरण का माध्यम और श्रोता का होना जरूरी है और इस प्रक्रिया के अंत में श्रोता पर सुस्पष्ट एवं मापने योग्य प्रभाव पड़ता है। संचार के परिपेक्ष्य में माध्यम का ज़िक्र यहीं से आगे बढ़ा है। दो लोग किसी भाषा के माध्यम से आपस में बातचीत करते हुये एक-दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। अगर वे प्रभावित करने के इस प्रक्रिया में सफल होते हैं तो उनके बीच हुये संचार को मुकम्मल माना जायेगा। संचार की प्रक्रिया में माध्यम या मीडिया (यानि माध्यम शब्द के बहुवचन का अँग्रेज़ी) का अपने लक्ष्यश्रोता तक संदेश पहुँचाने में एक नितांत आवश्यक योगदान है।

भाषा एक प्राथमिक माध्यम है एवं अन्य सभी मीडिया इसका विस्तार (extension) हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे लेंस आँखों की क्षमता का विस्तार करता है और छड़ी हाथ का विस्तार होता है। तकनीक के विस्तार के साथ-साथ मीडिया का भी विस्तार हुआ है। मीडिया के तकनीकी विस्तार से लाभ यह हुआ कि एक साथ लोगों की एक बड़ी संख्या तक सूचनाएँ सम्प्रेषित होना संभव हो सका। प्रोद्योगिकी से युक्त इस मीडिया को मास-मीडिया या जनसंचार के रूप में चिह्नित किया गया।

जनसंचार लोगों की व्यापक संख्या और विविध भौगोलिक क्षेत्रों की बाधा को पार करते हुए सूचनाओं के संचरण को संभव बनाता है। लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। पारंपरिक मीडिया की तरह इसमें संवाद की स्थिति नहीं बन पाती है और साथ ही, संयंत्रों एवं एक्सपर्ट तकनीकी सूझ-बूझ पर खर्च हुई बड़ी राशि के कारण इन पर लाभ कमाने का दबाव सदैव बना रहता है। लाभ कमाने के पीछे एक सामान्य तर्क है कि किसी काम को करने की पीछे प्रेरणा क्या है? कौन-सा अर्थशास्त्र है मीडिया की सभी क्रियाकलापों पर?

पूंजीपति जब पूंजी का निवेश करते हैं, तो उनका ध्येय लाभ कमाना और पूंजी में इजाफा करना ही होता है। इसमें असमान्य क्या है? लेकिन किसी भी व्यापार की तरह सावधानी यह बरतने की जरूरत है कि कोई धोखाधड़ी न हो, किसी को ठगा न जाए और उपभोक्ताओं के साथ किसी तरह की कोई बेईमानी न हो।

मीडिया का अर्थशास्त्र
1964 में प्रकाशित ‘Understanding Media: The Extension of Man’ में मार्शल मक्लूहन कहते हैं कि माध्यम संदेश है। माध्यम संदेश को अपने मुताबिक इस तरह से प्रभावित करता है कि कहा जा सकता है कि माध्यम अपने में ही संदेश है। माध्यम का उस पर लगे पूँजी और अन्य दूसरे तरह के नियंत्रण के कारण एक चरित्र होता है, जिसके तहत किसी विशेष प्रकार का माध्यम एक ही प्रकार के प्रभाव छोड़ने वाले संदेशों (जिनका उद्देश्य उसी माध्यम के निहित स्वार्थ से जुड़ा है) का ही सम्प्रेषण करता है। यह इसका अर्थशास्त्र है। पूँजी केन्द्रित मीडिया के द्वारा प्रेषित संदेशों का प्रमुख लक्ष्य हमेशा अधिक से अधिक लाभ कमाना ही है, क्योंकि कभी भी कोई कॉरपोरेट निगम या पूँजीपति आम लोगों के हितों के लिये प्रेरित होकर मीडिया में निवेश नहीं करता।

इसके उलट, जब मीडिया के तकनीकी विकास के कारण खर्चीला विस्तार नहीं होता है, तब संदेश प्रसारण हेतु मीडिया भी अधिक लाभ कमाने के दबाव से मुक्त रहता है। खर्च, खर्च की भरपाई के लिए हमेशा एक निर्वात का निर्माण करता है, जिसे अधिक से अधिक लाभ से भरा जाना होता है। जब खर्च को सीमित या नियंत्रित कर दिया जाए, तो एक स्थिति ऐसी बन सकती है, जहां मीडिया लाभ के दबाव से निश्चिंत रहे।

आज जो मुख्यधारा की मीडिया के साम्राज्यवादी चरित्र को ले कर हाय-तौबा मच रही है, यह बड़ी पूँजी के बदौलत खड़ी मास मीडिया की नियति है। मास मीडिया में संयंत्रों एवं तकनीकी सूझ-बूझ पर खर्च हुई बड़ी राशि सदैव मुनाफाखोरी या सियासी उद्देश्यों से प्रेरित होती है। ऐसे मीडिया के लिये कार्यरत लोग भी ज्यादा से ज्यादा कमाई के इच्छुक रहते हैं। यह समझ लेना होगा कि साम्राज्यवादी शक्तियों एवं आम लोगों के हित हमेशा अलग-अलग हैं और कोई भी मास मीडिया खुद में लगे बड़े साम्राज्यवादी निवेश के कारण, बीच का रास्ता नहीं निकाल सकता है।

विकल्प क्या हैं?
जनपक्षीय संचार (जो समाज के कमज़ोर वर्गों की एजेन्सी बने) के वास्ते कैसा माध्यम हो सकता है? मास मीडिया पर पूँजी का घोर दबाव है और यह दबाव स्वाभाविक है। लेकिन, समूह- संचार (Group Communication) में प्रयुक्त कम खर्च पर उपलब्ध मीडिया इस दबाव को प्रभावी रूप से कम करते हुये जनपक्षीय संचार को अंजाम दे सकता है। इसमें पूँजी की आवश्यकता तो पड़ती है,परंतु इसके लिये बड़े कॉरपोरेट निगमों या पूँजीपतियों का मुँह ताकने की जरूरत नहीं है। कुछ लोगों का समूह छोटी पूँजी के साथ जन-चेतना के संवर्धन हेतु संचार प्रक्रिया की शुरुआत कर सकता है। समूह- संचार के लिये बतौर मीडिया प्रयुक्त होने वाले पारंपरिक कलाओं, सामुदायिक रेडियो एवं लघुपत्रिकाओं को उन आर्थिक-राजनीतिक मज़बूरियों के आगे झुकना नहीं पड़ता है, जिन्हें पालना मास मीडिया का स्वभाव है।

लोकनाट्य, नुक्कड़ नाटक, किस्सागोई या लोकगीत आदि जैसे पारंपरिक मीडिया पूँजी के ज़ोर से आज़ाद होकर आमलोगों के हितों को ध्यान में रखकर हमेशा से समाज को दिशा देते रहे हैं। इसकी स्वीकृति भी लोगों में काफी होती है। राजनीतिक चेतना के विकास, मानवाधिकार की लड़ाई, सामाजिक समरसता को स्थापित करने और अंधविश्वास के विरुद्ध संघर्ष में पारंपरिक मीडिया का योगदान ऐतिहासिक एवं एक मुकाम तक सफल रहा है। आगे भी इसके प्रभाव को बढ़ाते रहने की जरूरत है।

प्रभावों की तुलना
छोटे-छोटे जनसमूहों से अलग-अलग मिलकर लोगों के साथ पारंपरिक कलाओं, सामुदायिक रेडियो या लघुपत्रिकाओं के माध्यम से संवाद स्थापित करते हुये, उनके हितों के प्रति उन्हें जागरुक बनाने की संचार प्रक्रिया अपेक्षाकृत ज्यादा विश्वसनीय और प्रभावशाली होती है। सूचनाओं के प्रसारण (broadcasting) से अधिक प्रभाव सूचनाओं को निश्चित लक्ष्यश्रोता के लिये संप्रेषण करने (narrowcasting) में है। मौखिक संचार(word of mouth) अन्य तकनीकी संचार से ज्यादा असरदार है। क्योंकि, इस प्रक्रिया में संवाद की स्थिति बनने पर संदेश देने वालों को आसानी से श्रोताओं के प्रतिक्रिया को जान पाने का मौका मिलता है। इसके कारण वस्तुनिष्ठ जबाव देते हुये श्रोताओं के जिज्ञासा को शांत करने का मौका संचारकों को मिलता है। और इससे संचार के निहितार्थ (जो कि यहाँ जन-चेतना का विकास है) के प्रति श्रोताओं को संतुष्ठ कर श्रोताओं पर एक असरदार छाप छोड़ने का अवसर मिलता है।

काट्ज़ एवं लेज़र्सफ़ेल्ड के संचार का द्विचरणीय प्रवाह के सिद्धांत(1955) के अनुसार संचार की इस तरह की प्रक्रिया के दूसरे चरण में संचार से प्रभावित श्रोताओं में से जनमत का नेतृत्व करने वाले कुछ लोग (opinion leaders) चाय-पान दुकानों जैसे जन-क्षेत्रों में उनके द्वारा प्राप्त संदेशों के प्रभाव को दूसरे लोगों तक बातचीत और बहसों के जरिये पहुँचाते हैं। इस तरह से कम लागत में जनपक्षीय विषयों का वहन करते हुये संचार का प्रभाव बहुत व्यापक पड़ता है और जनचेतना का विकास संभव हो सकता है।

सीमा व निष्कर्ष
संचार के इस विकल्प को एकमात्र विकल्प मान लेने में एक गंभीर संकट है। सिर्फ़ समूह- संचार सभी तरह के सम्प्रेषण को अंजाम देने में अक्षम है। श्रोताओं के विचारों को प्रभावित करने और विभिन्न समूहों से संवाद कायम करते हुये उनकी विशेष जरुरतों को पूरा करने में समूह-संचार एक उल्लेखनीय काम कर सकता है, परंतु देश-विदेश में घट रहे पल पल की खबरों से लोगों को तुरंत अवगत कराने के लिये मास मीडिया की ओर वापस लौटना होगा। समूह-संचार लोगों को यह दृष्टि प्रदान कर सकता है कि वे मास मीडिया द्वारा प्रस्तुत खबरों व विचारों में से जरूरी सूचनाओं एवं सिर्फ़ बाज़ार को लाभ पहुँचाने वाले संदेशों में अंतर कर सके। ध्यान देने की जरूरत है कि समूह- संचार की ओर इसके लक्ष्य-समूह को आकर्षित करने के लिये उपयुक्त विभिन्न मीडिया में कलात्मकता का उच्च-स्तर बना रहे और उद्देश्यों के निर्धारण में ये आम लोगों के हितों को पहचान कर उनको साधने के प्रयास से कभी नहीं भटके। जरूरत यह भी है कि सचेत लोग इस दिशा में पहल करें और सतत इसका विकास करते रहें।

संदर्भ-सूची

• Katz,E. and Lazarsfeld,P.F. (1955); Personal Influence. Glencoe:Free Press.
• Lasswell,Harold D.(1948); The Structure and function of communication in society in Bryson, (ed.) The Communication of Ideas. New York:Harper and Brothers.
• McLuhan,Marshal(1964); Understanding Media:The Extension of Man. New York:Singet.
• Verghese,B.G.(September 16, 2006); “Fourth World” Communication; Deccan Herald.
• भारतीय प्रेष परिषद्; वार्षिक रिपोर्ट; 1 अप्रैल, 2006 से 31 मार्च, 2007 तक

संप्रति: सहायक संपादक, अहा ज़िंदगी, दैनिक भास्कर समूह
दूरभाष: 09555053370 ई-मेल: prasoonjee@gmail.com

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