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मीडिया विकास से विकास तक

डॉ. राजेश कुमार।

ऐसी आम धारणा है कि विकास का सीधा असर व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र के विकास पर होता है। इसे m 4 D (Media for Development) या C 4 D (Communication for Development) के रूप में कई शोध लेखों में परिभाषित किया गया है (मेलकोट एवं स्टीव, 2001)। लेकिन एक अह्म प्रश्न यह है कि क्या मीडिया विकास तथा विकास में समानुपातिक सम्बंध है या हो सकता है। इस सम्बंध को विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष जेम्स वोलफेंसन ने 10 नवम्बर, 1999 को वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने लेख “वोयस ऑफ दी पुअर” में स्पष्ट करने कि पुरजोर कोशिश की । वोलफेंसन (1999) कहते हैं :

स्वतंत्र तथा सक्रिय प्रेस – विलास के साधन नहीं हैं। एक स्वतंत्र प्रेस न्यायोचित विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अगर आम लोगों को अपनी बात रखने का अधिकार नहीं हो, भ्रष्टाचार तथा असमान विकास पर पैनी दृष्टि न हो, तो आप इच्छित परिवर्तन के लिए लोक सहमति नहीं तैयार कर सकते।

(अंग्रेजी लेख के अंश का हिन्दी रूपांतरण)

लेकिन उपरोक्त उद्धृत अंश से यह स्पष्ट नहीं होता कि लोक सहमति और विकास में कोई समानुपातिक सम्बंध है। पर वोलफेनसन के इस कथन से कम से कम इतना तो अवश्य तय हो जाता है कि एक महत्वपूर्ण व्यक्ति ने मीडिया विकास को विकास से जोड़ा है।

अमर्त्य सेन (1999) ने अपनी पुस्तक ‘डेवलपमेन्ट एज फ्रीडम’ में यह तर्क दिया है कि मानवीय स्वतंत्रता, विकास के साधन तथा साघ्य दोनों है। सेन की अवधारणा में मीडिया के विकास से मिलने वाली विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में प्राप्त साधन से इच्छित विकास के परिणाम को प्राप्त किया जा सकता है। यूनिवर्सल डिकलेयरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स (1948) के अन्तर्गत विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मनुष्य का मौलिक अधिकार माना गया है। और यह विकास की प्रथम एवम् प्रमुख कड़ी है जो एक सशक्त एवं सबल मीडिया तंत्र के विकास से ही सम्भव है।

सुशासन, प्रजातंत्र एवम् मीडिया का विकास
मीडिया के विकास को कई रूपों में देखा जा सकता है। जैसे कि मीडिया को स्वतंत्र रूप से और बिना किसी दबाव के काम करने देना, मीडिया में विचार एवं अभिव्यक्ति की बहुलता एवं विविधता को बढ़ावा देना या मीडिया के सफल संचालन हेतु सरकारों द्वारा अनुकूल नीतियों का निर्धारण करना आदि। एक स्वतंत्र, सशक्त तथा सुदृढ़ मीडिया प्रजातंत्र की धुरी है। यह तर्क कई उदारपंथी विचारकों एवम् सिद्धांतवादियों जैसे कि जॉन मिल्टन, जॉन लॉके तथा जॉन स्टुअर्ट मिल के कार्यों पर आधारित है (किएन, 1991)। उदाहरण के तौर पर जॉन स्टुअर्ट मिल {2003(1859)} ने प्रेस स्वतंत्रता की वकालत करते हुए कहा कि सभी प्रकार के विचारों के अबाध प्रवाह के द्वारा ही सत्य स्थापित हो सकता है। पीपा नॉरिस (2010) ने अपनी पुस्तक ‘‘पब्लिक सेन्टीनेलः न्यूज मीडिया एण्ड गवर्नेन्स रिफॉर्म’’ में यह स्थापित करने कि कोशिश की है कि आखिर क्यों मीडिया का विकास सुशासन और प्रजातंत्र को प्रभावित करता है। एक विकसित तथा सशक्त माडिया की आदर्श भूमिका की चर्चा करते हुए नॉरिस कहती हैं कि समाचार मीडिया अपने कई कार्यों से विकास को बढ़ावा एवं मजबूती प्रदान कर सकता है। इस संदर्भ में नॉरिस ने मीडिया के कई कार्य जैसे कि ‘वाचडॉग’, ‘एजेंडा सेटिन्ग’, ‘गेटकीपर’ की भूमिका, बहुआयामी सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण का प्रणेता आदि की विशेष चर्चा की है।

पारम्परिक रूप से एक प्रजातांत्रिक देश में मीडिया की सबसे प्रमुख भूमिका ‘वॉचडॉग’ यानि प्रहरी की होती है। अपनी इस भूमिका से मीडिया राजसत्ता से जुड़े व्यक्तियों एवं सस्ंथाओं के क्रियाकलापों पर अपनी पैनी तथा परख दृष्टि रखता है। अपनी इस भूमिका के तहत मीडिया से यह आशा की जाती है कि वह अक्षमता एवं अकुशलता, भ्रष्टाचार तथा भ्रामक सूचनाओं पर अपनी दृष्टि रख जन आकांक्षाओं की रक्षा करेगा तथा लोककल्याण को बढ़ावा देगा। इसी संदर्भ में मीडिया को ‘चौथा स्तंभ’ की संज्ञा दी गयी है- अर्थात मीडिया कार्यकारिणी, व्यवस्थापिका तथा न्यायप्रणाली के बीच संतुलन एवं नियंत्रण की प्रमुख भूमिका अदा करता है (नॉरिस तथा ओडुगबेमी, 2010)। मीडिया ‘वॉचडॉग’ की भूमिका खोजपरक पत्रकारिता द्वारा या सही समय पर सही एवम् उपयुक्त सूचना लोगों तक पंहुचाकर कर सकता है। इससे आम नागरिक सत्ता से जुड़े लोगों एवं संस्थाओं के क्रियाकलापों की अप्रत्यक्ष निगरानी कर सकते हैं। भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं (2जी घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला आदि) जिनमें मीडिया ने अपने ‘वॉचडॉग’ की भूमिका को बखूबी निभाया है।

सुशासन एवं जागरूक लोकतंत्र हेतु मीडिया की दूसरी प्रमुख भूमिका ‘एजेंडा-सेटिन्ग’ की है। मीडिया अपने कार्यों से जनहित से जुडे़ नित्य नवीन मुद्दे समाज के सामने रख सकता है। इस मुद्दों पर एक गहन चर्चा प्रारम्भ हो सकती है जिससे शासन जनोनुकूल तथा प्रजातंत्र मजबूत हो सकता है (मैककॉम्ब एवं रेनॉलड्स, 2002). हाल के दिनों में ‘नेट न्यूट्रेलिटी’ पर छिड़ी बहस मीडिया (खासकर नवीन मीडिया) की ही देन है। वास्तव में ‘एजेंडा सेटिन्ग’ द्वारा मीडिया जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों (जो उनकी जरूरत भी हो सकती है) को शासन एवं सत्ता से जुड़े व्यक्तियों एवं संस्थाओं तक पहुंचाता है। एक तरह से मीडिया यहाँ जनप्रतिनिधित्व का कार्य करता है (क्यूरान, 2000)। अमर्त्य सेन (1999) ने तो यहाँ तक कह डाला कि एक स्वतंत्र प्रेस की उपस्थिति में अकाल की स्थिति नहीं आ सकती। सेन का मानना है कि प्रेस शीघ्र चेतावनी देते हुए आने वाले विषम स्थिति के प्रति शासन-सत्ता को आगाह कर देता है जिससे कि अकाल एवं विपदा की स्थिति टल सकती है।

मीडिया जन सरोकारों से जुड़े विविध एवं बहुआयामी विचारों को रखने का जनमंच भी है। यहाँ मीडिया एक ‘पब्लिक स्फेयर’ यानि जनवृत्त या जनवर्ग की तरह कार्य करता है जिसमें जनमत तैयार होता है। विश्व बैंक ने वर्ष 1999 में 40,000 लोगों का सर्वे कर यह जानने कि कोशिश की कि वे कौन सी चीज सबसे अधिक चाहते हैं। ‘‘हमें अपनी आवाज रखने की जगह चाहिए’’ – यह सबसे अधिक लोगों की चाहत थी। अपनी बात रखने का मौका नहीं मिलना तथा निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी नहीं होना गरीबी का एक प्रमुख कारण माना गया है (विल्सन तथा वारनॉक, 2007)।

मीडिया विकास तथा आर्थिक विकास
कई समाजशास्त्रियों एवं अर्थशास्त्रियों ने अपने प्रयोग आधारित अध्ययन में यह पाया है कि मीडिया विकास एवं आर्थिक विकास में गहरा सम्बंध है। रेमंड निक्सन (1960) ने अपने अध्ययन में पाया कि प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय स्वतंत्र प्रेस के स्तर से समानुपातिक रीति से जुड़ा है। विश्व बैंक के एक अध्ययन के सारांश में वोलफेनसन (1999) ने माना है कि जनराय एवं जवाबदेही का प्रति व्यक्ति आय के साथ धनात्मक सहसम्बंध है। आर्थिक विकास तथा सूचना एवं संचार का व्यक्तिगत निर्णय प्रक्रिया पर भी गहरा असर पड़ता है। किसे वोट करना है या करना चाहिए, कौन सा उत्पाद एवं सेवा लाभकारी है आदि सूचनाओं को देकर मीडिया जननिर्णय प्रभावित करता है जिसका असर विकास पर पड़ता है (स्टीगलीज, 2002)।

आशंकाएं भी कम नहीं
इन सब अध्ययनों ने बीच मीडिया की विकास में भूमिका को लेकर कई आशंकाए भी प्रकट की जाती रही हैं। हाल के दिनों में अपने देश भारत में, जहाँ मीडिया एक सशक्त रूप ले चुका है, मीडिया की सही और समुचित भूमिका को लेकर कई शंकाए प्रकट की गयी हैं। प्रेस कॉसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जस्टीस मार्कण्डेय काट्जू ने तो प्रेस को बौद्धिक रूप से ही कमजोर कह डाला है। जस्टीस काट्जू ने भारतीय मीडिया की तीन कमियों का जिक्र किया है, जिनका सम्बंध विकास से सीधे तौर पर है- पहला, मीडिया महत्वपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दों से ध्यान भटकाता रहा है। दूसरा, सूचनाओं द्वारा लोगों को बॉटता रहा है तथा तीसरा, वैज्ञानिक सोच की जगह पुराणपंथी सोच को बढावा दे रहा है। काट्जू यहाँ तक कहते हैं कि मीडिया को जन सरोकारों की चिन्ता ही नहीं है (काट्जू, 2011)।

विभिन्न रपटों में भारतीय मीडिया के प्रबंधन एवं स्वामित्व में पूँजीपति घरानों या राजनेताओं की प्रत्यक्ष भूमिका बतायी गयी है। कई मीडिया समूहों के प्रबंध समूह में बड़े कॉरपरेट घरानों के लोग हैं। उदाहरण के तौर पर जागरण प्रकाशन के प्रबंध समूह में पेन्टेलून रिटेल के प्रबंध निदेशक किशोर बियानी, मैकेडोनाल्ड के प्रबंध निदेशक विक्रम बक्सी, चमड़ा व्यवसायी रशीद मिर्जा आदि हैं। अत्राद्रमुक की जयललिता का जया टीवी, डी.एम.के. का कलैनगार टीवी तथा कलानिधि मारन के सन टी वी को सभी जानते हैं (जीमीववजण्वतह से संदर्भित)। मीडिया जहाँ सूचना एवं जागरूकता का साधन हुआ करता था, वह अब प्रचार, जनसम्पर्क या सम्पर्क प्रबंधन का साधन मात्र बन गया है। ‘पेड न्यूज’, ‘रेडियागेट’, ‘एडभेटोरियल’ जैसे शब्द आज भी मीडिया के प्रति हमारे विश्वास को झकझोर रहे हैं।

इन शंकाओं के बीच ‘सोशल मीडिया’ की भूमिका पर बहुत जोर दिया जा रहा है। लेकिन यहाँ भी शंकाएं समाप्त नहीं होतीं। हमारे देश में आज भी इन्टरनेट की पहुँच तकरीबन 19-20 प्रतिशत आबादी तक ही है। ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया मुख्यधारा की मीडिया का एक सशक्त विकल्प नहीं हो सकता। साथ ही, सोशल मीडिया पर दी जा रही विषयवस्तु हमेशा संदेश के घेरे में होती है क्योंकि इस हेतु कोई नियमन या नियंत्रण एजेंसी अभी तक नहीं बन पायी है। गूगल के स्किमड्ट तथा कोहेन ने तो इन्टरनेट को “World’s largest ungoverned space” कह डाला है।

विभिन्न रपटों में भारतीय मीडिया के प्रबंधन एवं स्वामित्व में पूंजीपति घरानों या राजनेताओं की प्रत्यक्ष भूमिका बतायी गयी है। कई मीडिया समूहों के प्रबंध समूह में बड़े कॉरपोरेट घरानों के लोग हैं। उदाहरण के तौर पर जागरण प्रकाशन के प्रबंध समूह में पेनटेलून रिटेल के प्रबंध निदेशक किशोर बीयानी, मैक्डोनाल्ड के प्रबंध निदेशक विक्रम बक्शी, चमड़ा व्यवसायी रशीद मिर्जा आदि हैं। अन्नाद्रमुक की जयललिता का जया टीवी, डी.एम.के. का कलैनगार टीवी तथा कलानिधि मारन के सन टीवी को सभी जानते हैं (thehoot.org से संदर्भित)। मीडिया जहाँ सूचना एवं जागरूकता का साधन हुआ करता था, वह अब प्रचार, जनसम्पर्क या सम्पर्क प्रबंधन का साधन मात्र बन गया है। ‘पेड न्यूज़’, ‘एडभेटोरियल’ जैसे शब्द आज भी मीडिया के प्रति हमारे विश्वास को झकझोर रहे हैं।

निष्कर्ष
इन सभी तर्कों, विचारों एवं शंकाओं के बीच इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि एक विकसित एवं सुद्ढ़ मीडिया, सुशासन एवं सफल लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। विभिन्न अध्ययनों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मीडिया एवं विकास का सीधा सम्बंध है। विकसित मीडिया निसंदेह विकास को सीधे रूप में प्रभावित कर सकता है।

संदर्भ
क्यूरान, जे. (2000). ‘मास मीडिया एण्ड डेमोक्रेसीः ए रीएप्रेजल’, जे.क्यूरान तथा एम. गुरेबीच (स.), मास मीडिया एण्ड सोसायटी, लंदनः एडवर्ड अरनल्ड।
कियन, जे. (1991). द मीडिया एण्ड डेमोक्रेसी, कैमब्रीजः पोलिटी।
मैककॉम्ब, एम. तथा ए. रेनॉलड्स (2002). ‘न्यूज इनफ्लूयंस ऑन आवर पिक्चर ऑफ दी वर्ल्ड’, जे. ब्रायण्ट तथा डी. जिलमान (स.), मीडिया इफेक्ट्सः एडवांसेस इन थ्योरी एण्ड रिसर्च, लंदनः रूटलेज।
मेलकोटे, एस. तथा एल. स्टीव (2001). क्यूनिकेशन फॉर डेबलपमेण्ट इन दी थर्ड वर्ल्डः थ्यूरी एण्ड प्रेक्टीस फॉर इमपावरमेण्ट, लंदनः सेज।
मिल, जे. एस. {2003(1859)}. ऑन लिबर्टी, न्यू हेवन, सी.टीः येल यूनिवर्सिटी प्रेस।
निक्सन, आर. (1960) ‘फैक्टर्स रिलेटेड टू फ्रीडम इन नेशनल प्रेस सिस्टम’, जर्नलिज्म क्वाटरली, 37(प)13-28।
नॉरिस, पी. एवं ओडुगबेमी (2010). ‘एसेसिन्ग दी एक्सटेन्ट टु व्हीच दी न्यूज मीडिया एक्ट एज वाचडॉग्स, एजेंडा सेटर्स एण्ड गेटकीपर्स’, पी. नॉरिस (स.), पब्लिक सेन्टीनलः न्यूज मीडिया एण्ड गवर्नेन्स रिकॉर्म, विश्व बैंकः वाशिन्गंटन डी. सी., पृष्ठ-379-93।
सेन, ए. (1999). डेवलपमेण्ट एज फ्रीडम, ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।
विल्सन, एम. और के. वारनॉक (2007) एट दी हर्ट ऑफ चेन्जः दी रोल ऑफ कम्यूनिकेशन इन ससटेनेबल डेवलपमेंट, लंदनः पनोस।
वोलफेनसन, जे. (1999) ‘व्यासेस ऑफ दी पुअर’, वाशिन्गटन पोस्ट, 10 नवम्बर।
स्कीमड्ट, इ. तथा कोहेन, जे. (2013). दी न्यू डिजिटल एजः रिशेपिन्ग दी फ्यूचर ऑफ पिपुल, नेशन एण्ड बिजनेस, नॉफः यू. एस. ए।
काट्जू, एम. (2001). ‘दी रोल मीडिया शुड बी प्लेईंग’, दी हिन्दू, 5 नवम्बर तथा ‘जस्टीस माकण्डेय काट्जू क्येरीफायज’, दी हिन्दू, 15 नवम्बर।
स्टीगलीज, जे. (2002). ‘ट्रान्सपेरेन्सी इन गवर्नमेण्ट’, आर. इस्लाम (स.), दी राइट टू टेल, वाशिन्गटन डी.सीः वर्ल्ड बैंक, पृष्ठ – 27-45।

डॉ. राजेश कुमार दून विश्वविद्यालय, देहरादून में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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