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जन सम्‍पर्क के सिद्धांत, क्या ये अवैज्ञानिक है?

जयश्री एन. जेठवानी, नरेन्‍द्र नाथ सरकार |

क्‍या जन-सम्‍पर्क बिना किसी वैज्ञानिक सिद्धान्‍त पर आधारित तकनीक है? इसके आलोचक निश्चित रूप से हां कहेगें, लेकिन इस क्षेत्र से जुड़े पेशेवर और शिक्षाविद् इससे कतई सहमत नहीं होगें। 1920 के दशक में जब जन-सम्‍पर्क की अवधारणा शुरूआती स्‍तर पर थी तो एडवर्ड बर्नेज की पुस्‍तक ”प्रॉपगैंडा” ने इस बात के पक्ष में तर्क पेश किए कि क्‍यों और कैसे जन-सम्‍पर्क का व्‍यवहार सिद्धान्‍त और सामाजिक विज्ञान के तरीकों पर आधारित होना चाहिए। चार दशक के बाद एडवर्ड जे रॉबिन्‍सन ने अपनी पुस्‍तक ”कम्‍युनिकेशन एंड पीआर” में इसे दोहराया। नब्‍बे के दशक में ह्यूग एम क्‍लबर्सन और उनके साथी लेखकों ने महसूस किया कि जन-सम्‍पर्क के पेशे से जुड़े लोग और अनुसंधानकर्ता जितने सिद्धान्‍तों की बात करते हैं, प्रयोग में उतना नहीं लाते।

इस क्षेत्र के सह-संस्‍थापक माने जानेवाले इवी लेडबेटर ली ने अनुभव किया कि मूल सिद्धान्‍तों के उपयोग के आधार पर विश्‍लेषण मामला-दर-मामला अलग-अलग हो सकता है। जैसे कि सकारात्‍मक प्रचार पाने के लिए खुलेपन और अच्‍छे काम की जरूरत होती है। उनके समकालीन बर्नेज मानते हैं कि जन-सम्‍पर्क को व्‍यावहारिक सामाजिक विज्ञान के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्‍होनें इसके पक्ष में तर्क दिया कि मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक निरीक्षण जन-सम्‍पर्क की जरूरतों और प्राथमिकताओं से जुड़ी जानकारियों तथा उसके विश्‍लेषण में मददगार होती हैं। ग्रुनिंग और हंट मानते हैं कि जन-सम्‍पर्क को अगर दोतरफा संचार माध्‍यम बनना है तो ऐसी प्रक्रिया जरूरी है, जबकि बर्नेज इसे ग्राहक और लोगों के बीच बेहतर पार‍स्‍परिक संबंध बनाने के लिए जरूरी मानते हैं।

वैसे शिक्षाविद् और अनुसंधानकर्ता वर्षों से अलग-अलग राय रखते रहे हैं। कुछ लोग इवी एल ली के मत से सहमत होते हुए प्रचार लेखन और तकनीक पर ज्‍यादा जोर देते हैं, जबकि दूसरे लोग बर्नेज के मतानुसार व्‍यावहारिक विज्ञान सिद्धान्‍त को अधिक तवज्‍जो देते हैं।

जन-सम्‍पर्क के सिद्धान्‍त
हम सब जानते हैं कि जन-सम्‍पर्क आज एक उभरता हुआ सामाजिक विज्ञान है। यही कारण है कि इसने सामान रूप से विद्वानों और अनुसंधानकर्ताओं को अपनी ओर आकर्षि‍त किया है। बोटेन और हजलेटन के अनुसार सिर्फ व्‍यावहारिक समझ ही वांछित परिणाम देने में मददगार नहीं होते, किसी भी व्‍यवसाय के विकास और उन्‍नति के लिए सैद्धान्तिक ज्ञान भी जरूरी है। इसके पक्ष में वे तर्क देते हैं कि पेशे के रूप में इंजीनियरिंग का विकास भौतिकी-व अन्‍य प्राकृतिक विज्ञानों से हुआ है, न कि निर्माण के व्‍यवसाय से। इसी तरह चिकित्‍सा विज्ञान को जीव विज्ञान और रसायन से जोडे़ जाने से पहने यह व्‍यवसाय नाइयों की दुकान पर चलता था। इसलिए जन-सम्‍पर्क के सिद्धान्‍त को विकसित करने के लिए हमें सामाजिक विज्ञान की मानवतावादी और प्रयोग पर विश्‍वास करने की परंपरा की ओर रूख करना होगा।

जेम्‍स ई. ग्रुनिंग तर्क देते हैं कि सामान्‍यत: दुनिया जनसंपर्क (पीआर) को थोपा हुआ और कौशल से निर्देशित मानती है। इसलिए उन्‍होनें आपसी समझ विकसित करने वाले और संघर्ष को नियंत्रित करने वाली अवधारणा के रूप में जन-सम्‍पर्क को पेश किया। ”द रोल ऑव थ्‍योरी इन पब्लिक रिलेसन्‍स” के संपादकों ने सिद्धान्‍त के विश्‍लेषण के चार उददेश्‍य सुझाए हैं। पहला-सिद्धान्‍त को निर्देशक के रूप में कार्य करते देखा जा सकता है। ये पीआर के अध्‍ययन व विमर्श के लिए शब्‍दकोष प्रदान करने में मदद करते हैं। दूसरा- सिद्धान्‍त का उददेश्‍य समझ को बढ़ावा देना है। पीआर क्‍या है, यह बताने क अलावा सिद्धान्‍त यह भी बताता है कि पीआर का अस्तित्‍व क्‍यों है। तीसरा- आकलन और नियंत्रण वर्तमान और अतीत के निरीक्षणों के आधार पर किसी अवधारणा का भविष्‍य क्‍या होगा, इसे पहचानने के सिद्धान्‍त की क्षमता को आकलन कहते हैं। जबकि, सिद्धान्‍त द्वारा आकलन किए गए परिणाम को सिद्धान्‍तकार के प्रभावित करने की क्षमता को नियंत्रण कहते हैं और अंत में सिद्धान्‍त का काम अनुसंधान के माध्‍यम से सीख देना भी है। यह सिद्धान्‍त के अनुसंधान और अतिरिक्‍त सिद्धान्‍त देने की प्रवृति को दर्शाता है।

ग्रुनिंग मानते हैं कि व्‍यावहारिक रूप से पीआर का प्रयोग भले ही एक सदी से किया जा रहा हो, लेकिन बौद्धिक दृष्टि से यह नया क्षेत्र है। ऐसे बहुत सारे सामाजिक सिद्धान्‍त हैं जिनका पीआर में भी प्रयोग हो सकता है। वैसे भी पीआर में किसी ऐसे सिद्धान्‍त का मिलना मुश्किल है, जो किसी न किसी अन्‍य विषय से उधान न लिया गया हो। ग्रुनिंग के अनुसार पीआर का प्रयोग भी अलग-अलग होता है। इस पेशे से जुड़े लोग एक ही तकनीक अथवा एक ही शैली के ज्ञान का प्रयोग नहीं करते। जबकि, टी. एस. कुन के अनुसार व्‍याव‍हारिक रूप से पीआर एक ही उददेश्‍य से नियंत्रित होता है। उनके अनुसार, संस्‍था अथवा संगठन के फायदे के लिए संचार संसाधनों का दक्षता से प्रयोग कर लोगों को पक्ष में करना ही पीआर है। विश्‍लेषक ”दक्षता से पक्ष में करने” के बजाय ”विश्‍वास दिलाने” को पीआर के लिए अधिक सुरक्षित संदर्भ मानते हैं। हालांकि, संदर्भ अथवा शब्‍द बदल जाने से उददेश्‍य नहीं बदलते। दूसरी आरे इस पेशे से जुड़े लोग ”दक्षता से पक्ष में करने” को लोगों के लिए भी मददगार मानते हैं।

पूरी बहस को समाहित करते हुए ग्रुनिंग लिखते हैं कि मोटे तौर पर ज्‍यादातर लोग पीआर को इस प्रकार परिभाषित करते हैं- ”प्रायोजित करने वाली संस्‍था और प्रभावित जनता के पक्ष में जन असाधारण को प्रभावित करना ही पीआर है।” यह परिभाषा संचार के कुछ स्‍वाभाविक सिद्धान्‍तों की उपयोगिता भी सुझाता है, खासकर विश्‍वास और मनोवृति के सिद्धान्‍तों की।

ग्रुनिंग दिमाग की इस अवस्‍था को जन-संपर्क असंगतावयव मॉडल (asymmetrical model of public relations) से जोड़ते हैं और इसके लिए वह एक वैकल्पिक व्‍यवस्‍था जन-संपर्क का संगतावयव मॉडल (symmetrical model of public relation) सुझाते हैं। ऐसे अलग तरह के सिद्धान्‍तों के लिए अलग तरह की शर्तों और पूर्वानुमानों की जरूरत होती है।

ग्रुनिंग का जन संपर्क का संगतावयव (सिमेट्रिकल)
संगतावयव की व्‍याख्‍या करते हुए ग्रुनिंग कहते हैं कि भले ही यह शब्‍द नया हो लेकिन जन-संपर्क के इतिहास में हर जगह इस मॉडल का हवाला दिया गया है। खासकर इवी ली, एडवर्ड बर्नेज, जॉन हिल, स्‍कॉट और क्‍यूटलिप के कामों मे। मॉडल के लेखक के अनुसार संचार का संगतावयव सिद्धान्‍त निम्‍न परिकल्‍पनाओं पर आधारित है:

समझ बढ़ाने में सहायक है संचार
हम संगठन, समूह या समाज अथवा व्‍यक्तियों के बीच समझ वि‍कसित करने के लिए संचार करते हैं। इसमें किसी व्‍यक्ति अथवा प्रणाली का दूसरे व्‍यक्ति अथवा प्रणाली की समझ से तुलना अल्‍प वांछित होता है।
इस सिद्धान्‍त से चार और परिकल्‍पनाएं बाहर आती हैं:

पवित्रता
प्रणाली, उप प्रणालियों और वृहद प्रणालियों से मिलकर बनती है। सम्‍पूर्ण हमेशा कुछ हिस्‍सों के योग से बड़ा होता है और प्रणाली का प्रत्‍येक हिस्‍सा हर दूसरे भाग को प्रभावित करता है।

अंतनिर्भरता
हालांकि हर प्रणाली की सीमा होती है, जो उसे उसके परिवेश से अलग करती है लेकिन परिवेश में मौजूद प्रणाली इस सीमा को तोड़कर प्रणाली का अंतर्वेधन करती है।

खुली प्रणाली
संगठन अंतर्वेधन प्रणाली के लिए तैयार रहते हैं और उन प्रणालियों से सहर्ष सूचना का आदान-प्रदान भी करते हैं।
प्रणाली किसी दूसरी प्रणाली के साथ समतुल्‍यता हासिल करने के लिए कठिन प्रयास करती रहती है, हालांकि वो इसे विरले ही हासिल कर पाती है। वांछित समतुल्‍यता स्थिति बदलते पर्यावरण के साथ निरंतर बदलती रहती है। प्रणाली दूसरी प्रणाली को नियंत्रित कर समतुल्‍यता स्‍थापित करने का प्रयास कर सकती है। इसके लिए वह खुद को निरंतर दूसरी प्रणाली के अनुरूप ढाल सकती है अथवा पारस्‍परिक सहयोगात्‍मक समायोजन का रास्‍ता अपना सकती है। जन-संपर्क के संगतावयव मॉडल में नियंत्रण एवं नई परिस्थिति में ढलने के लिए सहयोगात्‍मक एवं पारस्‍परिक समायोजन को प्राथमिकता दी जाती है।

ग्रुनिंग के अनुसार कुछ और परिकल्‍पनाओं में शामिल हैं:-

समानता : सभी के साथ समान रूप से व्‍यवहार करना चाहिए और उनका आदर करना चाहिए। कोई भी संगठन के लिए अहम जानकारी दे सकता है, चाहे उसकी शिक्षा और पृष्‍ठभूमि कुछ भी हो।

स्‍वायत्‍ता : आदमी उस समय अधिक सृजनशील, रचनाशील और आत्‍म संतुष्‍ट होता है, जब उसे व्‍यवहार को प्रभावित करने की स्‍वायत्‍ता होती है, न कि उस दौरान जब वह दूसरों के द्वारा नियंत्रित होता है।

सृजनशीलता : परंपरा और सृजनशीलता के बजाय नए विचारों और लचीले विमर्श पर दबाव रहना चाहिए।
प्रबंधन का विकेंद्रीकरण : प्रबंधन सामूहिक होना चाहिए। प्रबंधकों को आदेश देने के बजाय समन्‍वय करना चाहिए। विकेंद्रीकरण से स्‍वायत्‍ता, कर्मचारियों की संतुलित और सृजनशीलता को बढ़ावा मिलता है।

मतभेद सुलझाना : मतभेद को वार्ता और संचार से सुलझाना चाहिए न कि बल, जोड़-तोड़, बाध्‍य करके अथवा हिंसा से।
लाभ पाने वाले समूह की उदारता यह राजनीति प्रणाली को लाभ पाने वाले समूह के बीच खुली प्रतिस्‍पर्द्धा की यांत्रिकी के रूप में प्रस्‍तुत करता है। इससके गैर-जिम्‍मेदार सरकार और निगमित ढांचा के खिलाफ आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए नागरिक समूहों को बल मिलता है।

ग्रुनिंग के सिद्धांत का विश्‍लेषण करते हुए ग्रेग लिश्‍टे ने अपने विद्वतापूर्ण लेख ”सहयोग की सीमाएं” में लिखा है कि संगतावयव जनसंपर्क के बारे में दुनिया के विचारों में अंतर को असंगतावयव जन-संपर्क के दो उदाहरणों से समझा जा सकता है। जहां पहला सहयोग के लिए कहता है, वहीं दूसरा मॉडल संगठन के फायदे के लिए लोगों की प्रवृति और व्‍यवहार को कौशल से नियंत्रित करने की पैरवी करता है। संगतावयव जन-संपर्क या प्रबोधक (समझाना-बुझाना) मॉडल के बारे में कहा जाता है कि यह हार-जीत की अवधारणा का विकल्‍प है, जिसमें किसी एक के फायदे की तुलना दूसरे के नुकसान से की जाती है। हालांकि, लिश्‍टे इस दावे पर ही प्रश्‍न चिहन लगाते हैं कि दोतरफा संगतावयव अथवा सहयोगात्‍मक जन-संपर्क हमेशा संभव है। मामलों के अध्‍ययन से यह बात सामने आई है कि संघर्ष की स्थिति में सहयोगात्‍मक जन-संपर्क के उदाहरण विरले हैं, जबकि ज्‍यादातर मामलेां में टकराव का रवैया ही अपनाए जाने के प्रकरण सामने आते हैं।

इकतीस संगठनों पर लारिसा ग्रुनिंग के अध्‍ययन से पता चलता है कि किसी भी संगठन ने कार्यकर्ताओं के समूहों के साथ बातचीत की प्रक्रिया में व्‍यावहारिक रूप से दोतरफा संगतावयव जन-संपर्क को प्रयोग में नहीं लाया। आश्‍चर्यजनक रूप से हालांकि किसी भी संगठन के लिए टकराव की रणनीति भी नहीं आई। लारिसा ग्रुनिंग का तर्क है कि सहयोगात्‍मक जन-संपर्क ज्‍याद उचित है। क्‍योंकि इसमें विभिन्‍न ऐसे समूहों की सहभागिता होती है, जिनके हित हमेशा एक नहीं भी हो सकते हैं। किसी एक के हित की सुध लेने से हो सकता है कि मूल कारणों का ही पता चल जाए। रिचर्ड आइस ने इस घटना का अध्‍ययन 1984 में भोपाल गैस दुर्घटना के बाद किया। दुर्घटना के तत्‍काल बाद यूनियन कार्बाइड ने इस बात पर जोर दिया कि बनावट और कार्य प्रणाली की दृष्टि से भोपाल प्‍लांट अमेरिकी प्‍लांट के समान ही था। यह रणनीति इसलिए अपनाई गई थी ताकि इन आरोपों को नकार जा सके कि अमेरिकी श्रमिकों की तुलना कंपनी ने भारतीय श्रमिकों और नागरिकों के जीवन को कम महत्‍व दिया। सुरक्षा मानाकें को लेकर कंपनी की इस वाकपटुता का अपेक्षित परिणाम सरकारी नियामकों और यूनियन कार्बाइड के श्रमिकों की मतभिन्‍नता के रूप में सामने आया। कंपनी का सतत् प्रयास उठ रहे सवालों को दबाना था, न कि यूनियन कार्बाइड और भारत सरकार के संबंधों में तनाव लाना।
मार्सिया प्रायर मिलर मानते हैं कि जन-संपर्क स्‍वाभाविक रूप से सांगठनिक संचार का स्‍वरूप है। समकालीन सांगठनिक सिद्धान्‍त की जडे़ं कई सारी सामाजिक-वैज्ञानिक विधाओं में है। जन-संपर्क में संबंधों की व्‍याख्‍या करने के लिए अनुसंधानकर्ता एक से अधिक अवधारण व्‍यवहार में लाते हैं। कटलिप और सेंटर समेत कई लेखकों ने पाया कि जन-संपर्क में अनुसंधान दस या उससे भी अधिक भिन्‍न अनुसंधान परंपराओं को आकृष्‍ट कर सकता है।

जैसा कि ऊपर भी कहा जा चुका है कि समकालीन सांग‍ठनिक सिद्धान्‍त की जडे़ं ढेरों सामाजिक-वैज्ञानिक विधाओं में है। अनुसंधानकर्ता समाजशास्‍त्र में इसके लिए चार रूपरेखा का उल्‍लेख करते है : सांकेतिक पार‍स्‍परिक क्रियावाद, विनियम का सिद्धान्‍त, संघर्ष का सिद्धान्‍त और रचना संबंधी क्रियाशील सिद्धान्‍त। इन ढांचाओं अथवा रूपरेखाओं के आधार पर विश्‍लेषकों ने संगठनों में विभिन्‍न व्‍यक्तियों के व्‍यवहार को समझने की कोशिश की। इसके अलावा इसके माध्‍यम से संगठनों की बनावट और संगठन के अंदर तथा संगठनों के नेटवर्क को समझने के भी प्रयास किए गए। आइए इन चारों सिद्धान्‍तों को अधिक गहनता से समझें :-

सांकेतिक पार‍स्‍परिक क्रियावाद (Symbolic Interactionism) : व्‍यवहारवाद से इसकी उत्‍पत्ति होने की वजह से सांकेतिक पारस्‍परिक क्रियावाद का विकास समाजशास्त्रियों द्वारा लोगों के बीच पारस्‍परिक क्रिया को समझने और उनके पार‍स्‍परिक क्रिया के समाज पर प्रभाव को समझने के कुछ प्रारंभिक प्रयासों से हुआ।

सांकेतिक पारस्‍परिक क्रियावाद प्रतिपादित करता है कि लोग जिसे समझते हैं वही सामाजिक सच्‍चाई है। इसका मतलब यह हुआ कि सामाजिक क्रियाएं समझौता वार्ता की स्थिर अवस्‍था में हैं। इसलिए संगठन भी वैसा ही होगा, जैसा लोग मानेंगे। वे सामाजिक पारस्‍परिक क्रिया के उत्‍पाद हैं।

संगठन के भीतर के आयामों और प्रक्रियाओं को समझने के लिए सां‍केतिक पार‍स्‍परिक क्रियावाद को सामाजिक मनोविज्ञानी एक महत्‍वपूर्ण्‍ अवधारणा मानते हैं। लोग किस तरह संगठन से व्‍यवहार करते हैं और किसी सांगठनिक पद्धति व संरचना का किसी व्‍यक्ति विशेष के व्‍यवहार पर क्‍या प्रभाव पड़ता है, इससे समझने में मदद मिलती है।
विल्‍सन ओर स्‍ट्राइकर ने संगठनों की निगमित पहचान में इस अवधारणा की भूमिका तलाशी है। कोई संकेत कैसे रणनीतिक विकल्‍प का वक्‍तव्‍य बन जाते हैं, इसकी खोज करने के लिए सांकेतिक पारस्‍परिक क्रियावाद का प्रयोग किया जा सकता है।

सभी पहलुओं को समा‍योजित करते हुए मार्सिया प्रायर- मिलर कहते हैं कि जितना ज्‍यादा एक सांग‍ठनिक संकेत को सांगठनिक वास्‍वविकताओं से जोड़ा जायेगा उतना ही ज्‍यादा वास्‍तविकता की अपेक्षा होगी, जब सिर्फ संकेत को ही पेश किया जाएगा।

विनियम का सिद्धान्‍त (Exchange Theory) : इस सिद्धान्‍त की व्‍याख्‍या प्रमुख सिद्धान्‍तकार पीटर एम. ब्‍लायू, जार्ज सी होमन्‍स और रिचर्ड एम. इमरसन के द्वारा की गई है। यह सिद्धान्‍त इस अवधारणा पर आधारित है व्‍यक्तियों के बीच सामाजिक विनियम से सामाजिक ढांचा बनता है। इस सिद्धान्‍त के अनुसार लोग तभी संबंध बनाते और कायम रखते हैं, जब उनमें यह विश्‍वास होता है कि इससे मिलने वाला ”पारितोषिक” इसमें लगी ”लागत” से अधिक होगा। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सांगठनिक संचार होगा अथवा नहीं होगा, जब आवागमन (इनपुट) और परागमन (आउटपुट) में संतुलन न हो तथा सांगठनिक बदलाव इन दोनों में लगातार सौदेबाजी का परिणाम हो। इसलिए इस तरह के संगठन में प्रबंधन पहले से सक्रिय और प्रतिक्रियावादी, दोनों ही होगा।

इसलिए विनिमय सिद्धान्‍त से किसी संगठन के संदर्भ में निम्‍न बातें कही जा सकती हैं-

1. जब कोई संगठन पाता है कि वह अनुभवी और तेज-तर्रार कर्मी कम तनख्‍वाह और छोटे ओहदे पर रख सकता है, तो वह कम वेतन का ही प्रस्‍ताव देता रहेगा।
2. जब किसी संगठन का यह दर्शाने वाला फीडबैक मिले कि पेशे से जुडे़ लोग बिना किसी बड़े फायदे के भी आवेदन देते हैं और पद स्‍वीकार भी कर लेते हैं, तब अधिक संभावना यही रहती है कि वह अनुभवी लोगों के पास भी कम वेतन का प्रस्‍ताव करेगा।
3. ऐसे संगठन का फायदा अगर जारी रहे तो उपरोक्‍त दोनों पद्धतियों के भी जारी रहने की पूरी संभावना रहती है।
4. जब पेशेवर लोग नौकरी की अवधि के लिए संगठन पर अधिक निर्भर होते हैं तो संगठन की सत्‍ता भी उन पर उतनी ही अधिक हावी होती है।

संघर्ष का सिद्धान्‍त (Conflict theory) : इस सिद्धान्‍त के अनुसार संघर्ष सामाजिक बदलाव का आधार और परिणाम दोनों ही है। इस सिद्धान्‍त का विकास कार्ल मार्क्‍स, जार्ज सिमेल, राल्‍ड डेरेनडोर्फ और एल ए कोलर के लेखों से हुआ है।
संघर्ष का सिद्धान्‍त इस तर्क पर आधारित है कि संघर्ष सामाजिक अंतर्संबंधों का अनिवार्य हिस्‍सा है। ऐसा प्रतिस्‍पर्धात्‍मक उददेश्‍यों तथा संगठन व व्‍यक्तिगत मूल्‍यों के कारण होता है। दूसरे शब्‍दों में प्रत्‍येक क्रिया का धनात्‍मक और नकारात्‍मक दोनों पहलू होता है और इसके परिणामस्‍वरूप बदलाव आता है।

रचना संबंधी-क्रियाशील सिद्धान्‍त (Structural -Functional theory) : इस सिद्धान्‍त के अनुसार लोगों की सामाजिक क्रियाओं का निर्धारण वृहतर सामाजिक क्रम के द्वारा होता है। यही पारस्‍परिक क्रियाएं क्रम को बरकरार रखती हैं, न कि इन्‍हें सुविधानुसार व्‍यवस्थित करने के लिए बनाए गए नियम। इस सिद्धान्‍त का प्रतिपादन टालकोट पारसन, रॉबर्ट मेरटोन और पीटर ब्‍लायू ने किया है। इन प्रस्‍तावनाओं की वजह से जटिल संगठनों को समझने में इस सिद्धान्‍त की महत्‍वपूर्ण भूमिका है। हालांकि संगठनों के संचार खासकर जनसंचार के अध्‍ययन में इसके प्रस्‍तावनाओं का बहुत कम उपयोग हुआ है। विश्‍लेषक मानते हैं कि इन चारों सिद्धान्‍तों के सावधानीपूर्वक अध्‍ययन से अनुसंधानकर्ता पीआर के सिद्धान्‍त और व्‍यवहार में तारतम्‍य बैठाने में सक्षम होंगे।

कार्ल बर्टन पीआर की समीक्षा संचार पर आधारित व्‍यावहारिक सामाजिक विज्ञान के तौर पर करते हैं। पीआर संचार का प्रयोग संगठन एवं जनता के बीच संबंध बनाने और उसे बहाल रखने के लिए करता है। इसलिए बर्टन मानते हैं कि पीआर व्‍यावहारिक संचार का एक उदाहरण है, जिसका अध्‍ययन सैद्धान्तिक और अनुसंधान के उपकरणों से किया जा सकता है।

हेव्‍स के अनुसार, ”सामाजिक विज्ञानियों का प्राथमिक कार्य सभी प्रकार के मानव व्‍यवहारों की व्‍याख्‍या करना है। यह व्‍याख्‍या सिद्धान्‍तों से ही संभव है” उदाहरण के तौर पर जब इस पेशे से जुड़ा कोई व्‍यक्त्‍िा किसी व्‍यावसायिक प्रयास की सफलता या विफलता की व्‍याख्‍या करता है, तो वास्‍तव में वह सिद्धान्‍त के प्रतिपादन का पहला कदम है। इसलिए वर्षों से उपयोग में लाए जाने वाले सामान्‍य व्‍याख्‍या और तकनीक प्राथमिक सिद्धान्‍त माने जा सकते हैं।

सिद्धांत का विकास अनुसंधान पर आधारित होता है। कैसे काम होता है अथवा होना चाहिए, वे जांचे हुए होते हैं। परिणाम का प्रयोग जिससे प्रक्रिया शुरू हुई है उस सिद्धान्‍त में सुधार लाने के लिए होता है। ए. कपलन के अनुसार जब हम किसी सिद्धान्‍त का विकास ज्ञान की तलाश की राह में मिलने वाली हर ‘छोटी जानकारी’ से आगे की ‘छोटी जानकारी’ का पथ प्रशस्‍त करने के लिए करते हैं, तो इसे विस्‍तारीकरण के द्वारा सिद्धान्‍त का विकास करते हैं। इसी प्रकार, जब हम पहले से मौजूद ज्ञान के गहन अध्‍ययन और समझ से किसी सिद्धान्‍त को विकसित करते हैं, प्रबलीकरण के द्वारा सिद्धान्‍त का विकास कहते हैं।

उपरोक्‍त दोनों प्रक्रिया से विकास की राह पर कुछ दूर चलने के बाद ऐसी परिस्थिति आती है, जिसमें कदम दर कदम आगे बढ़ने के बजाय लंबी छलांग लगाने की जरूरत होती है। टी एस कुन इसे वैज्ञानिक क्रान्ति की संज्ञा देते हैं। उन्‍होंने इसकी तुलना आइंस्‍टीन के भौतिक-विज्ञान के सापेक्षिकता के सिद्धान्‍त जैसे क्रान्तिकारी आविष्‍कार से की है।

हालांकि, विश्‍लेषक महसूस करते हैं कि पीआर को संचार आधारित व्‍यावहारिक सामाजिक मानने से इस पेशा तथा इससे जुड़े लोग और अनुसंधानकर्ताओं के सामने उलझने आयेगी। जे वी पालविक और सीटी सलमान मानते हैं कि ज्ञान के व्‍यवस्थित निकाय का अभाव पीआर के ‘व्‍यवहार’ से ‘व्‍यवसाय’ बनने की राह में बहुत बड़ी रूकावट है। दोनों के अनुसार पत्रकारिता में भ पत्रकार कार्य के दौरान जिस ज्ञान का प्रदर्शन करते हैं और सिद्धान्‍त में तालमेल के लिए किसी व्‍यवस्थित निकाय के न होने से यही स्थिति है।

वैसे तथ्‍य यह भी है कि व्‍यावहारिक अनुसंधान से कोई भी सिद्धान्‍त स्‍वत: विकसित नहीं हो जाता। बहुत से विश्‍लेषक मानते हैं कि पीआर समृद्ध अनुभव की राह तय कर चुका है, पर उसे सिद्धान्‍त के विकास की प्रक्रिया का लाभ उठाना है। इसलिए व्‍यावहारिक सामाजिक विज्ञान सैद्धान्तिक ज्ञान को संचार तकनीक के सहारे की जरूरत के अनुसार व्‍यवहार में लाए जाने योग्‍य पीआर में तब्‍दील करने की क्षमता है।

आशा है कि उपरोक्‍त वर्णित कुछ विचार पेशे से जुड़े लोगों को सैद्धान्तिक आधार को व्‍यवहार से जोड़ने की जरूरत को समझने के लिए प्रेरित करेगा। इसके अलावा बहुत कुछ समाज पर निर्भर है, जहां पीआर एक पेशा है और शिक्षा की एक धारा के रूप में इसे सिखाया जाता है।

प्रो. जयश्री जेठवानी दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, हिंदू कॉलेज की छात्रा रही हैं जहां से उन्‍होने राजनीति विज्ञान में स्‍नातकोत्‍तर किया। उन्‍होनें जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय से डॉक्‍टरेट किया। उनका शोधपत्र संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका, जर्मनी तथा भारत में चुनाव अभियानों मे जनसंचार माध्‍यमों की भूमिका तथा प्रभाव, पर था। इस पर विस्‍तृत अनुसंधान के लिए उन्‍होनें उपर्युक्‍त देशों की यात्रा की। डॉ0 जेठवानी ने भारत तथा भारत से बाहर भी विज्ञापन, जन-सम्‍पर्क एवं पत्रकारिता का अध्‍ययन किया है। ”जन-सम्‍पर्क : संकल्‍पनाएं, रणनीतियां एवं उपकरण” की सहलेखिका होने के साथ-साथ उन्‍होनें ”विज्ञापन” (एडवर्टाइजिंग) नामक पुस्‍तक भी लिखी है जो विज्ञापन प्रबंधन के छात्रों के बीच पर्याप्‍त रूप से लोकप्रिय है। वर्तमान में डॉ0 जेठवानी बहुप्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्‍थान में विज्ञापन एवं जन-सम्‍पर्क विभाग में प्रोफेसर तथा विभागाध्‍यक्ष हैं।

प्रो. नरेन्‍द्र नाथ सरकार एक अग्रणी ग्राफिक डिजाइनर हैं और दो दशकों से भी अधिक समय से आई आई एम सी में ग्राफिक्‍स और प्रोडक्‍शन पढ़ाते रहे हैं। व्‍यापक रूप से प्रशंसित पुस्‍तकों ”आर्ट ऐंड प्रोडक्‍शन” तथा ”डिजा‍इनिंग प्रिंट कम्‍युनिकेशन” के लेखक प्रो. सरकार को तकनीकी विषयों को छात्रों एवं व्‍यवसाय कर्मियों के बीच इतना रोचक बनाने का श्रेय प्राप्‍त है। प्रो0 सरकार अनेक विश्‍वविद्यालयों एवं संस्‍थाओं में ‘विजिटिंग फैकल्‍टी’ हैं। शिक्षण के क्षेत्र में प्रवेश से पूर्व 20 वर्षों से अधिक समय तक ग्राफिक डिजाइनर के कार्य व्‍यवसाय से सक्रिय तौर पर जुड़े रहे हैं।

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