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स्टिंग ऑपरेशन: घात लगाकर सुबूत जुटाना

डॉ. सचिन बत्रा।

स्टिंग ऑपरेशन को घात पत्रकारिता या डंक पत्रकारिता भी कहा गया है। दरअसल घात पत्रकारिता खोजी पत्रकारिता की कोख से ही निकली है लेकिन इसमें दस्तावेज से अधिक दृश्य या फोटो का विशेष महत्व होता है क्योंकि घात पत्रकारिता में दृश्यों को सुबूत की तरह इस्तेमाल किया जाता है। टीवी माध्यमों में स्टिंग ऑपरेशन का प्रचलन अधिक है क्योंकि यह सनसनी पैदा करती है। लेकिन आज के दौर में किसी गड़बड़ी का छिपकर फिल्मांकन करना या पहचान छिपाकर यानि डेकॉय बनकर छल से किसी कुकृत्य, गैरकानूनी काम, मिलावट, साजिश, लापरवाही, अपराध, जालसाजी या रिश्वतखोरी को प्रमुखता से दिखाया जाता है क्योंकि उस सनसनी से दर्शक उत्तेजित होते हैं। हमारे देश में इंडियन एक्सप्रेस के अश्विनी सरीन, वरिष्ठ पत्रकार व सांसद रहे अरूण शौरी, तहलका के वरिष्ठ पत्रकार अनिरूद्ध बहल व तरूण तेजपाल, द हिन्दू के संपादक पी साईनाथ, आजतक न्यूज़ चैनल के दीपक शर्मा व धीरेंद्र पुंडीर जैसे कई जाने माने खोजी पत्रकारों ने समाचार संकलन के क्षेत्र में गहन शोध की परंपरा को आगे बढ़ाया है।

दरअसल स्टिंग ऑपरेशन का सीधा संबंध गोपनीयता से है, इसमें संवाददाता अपनी पहचान छिपाकर या किसी अन्य व्यक्ति की मध्यस्थता से गलत काम करने वालों की गोपनीय कारगुजारियों को अपनी नियंत्रित स्थितियों में प्रेरित करता है और उसे कैमरे में कैद किया जाता है। इसमें संवाददाता को धन का पीछा करना, निगरानी, औचक निरीक्षण और बहरूपिया बनकर पूछताछ करने जैसी कलाओं का अच्छा ज्ञान हो चाहिए। स्टिंग ऑपरेशन आसान काम नहीं है क्योंकि इसके लिए सही तरीका, समय और स्थितियों को बुनना पड़ता है। यही नहीं स्टिंग के लिए आपके पास पर्याप्त संसाधन होने भी जरूरी हैं। इसमें मोबाइल, स्पाई कैमरा, वॉयस रिकार्डर और कई बार मिनी सीसीटीवी कैमरे का भी इस्तेमाल किया जाता है। यह जानना जरूरी है कि जब किसी स्टिंग के विरोध में कोई अदालत का दरवाजा खटखटाता है तो संवाददाता को जवाब भी देना पड़ सकता है कि जो स्टिंग किया गया है वह जनहित से कैसे संबध रखता है। यही नहीं, मांगे जाने पर संवाददाता को फॉरेंसिक जांच के लिए उन दृश्यों की मूल प्रति भी देनी पड़ सकती है। जिसमें वीडियो के प्रामाणिक होने की जांच की जाती है और प्रसारण में अनावश्यक संपादन पाए जाने पर कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। अक्सर निजता के अधिकार का उल्लंघन, शासकीय दस्तावेजों की गोपनीयता के कानून और किसी की मानहानि जैसे सवालों के जवाब पाने की बाद ही स्टिंग ऑपरेशन किया जाना चाहिए। लिहाजा स्टिंग ऑपरेशन के लिए अतिरिक्त सावधानी और समझदारी की आवश्यकता होती है।

स्टिंग ऑपरेशन की तैयारी-
1. विषय का निर्धारण- स्टिंग ऑपरेशन से पहले एक संवाददाता को यह तय करना पड़ता है कि उसे सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर स्टिंग करना चाहिए या नहीं। उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि जो विषय तय किया जा रहा है वह पूरी तरह उपयुक्त और कानूनी पेचीदगियों से परे है या नहीं। मतलब यह है कि एक ऐसा विषय जिसमें संवाददाता को ही लग रहा हो कि वह गैरकानूनी है या अदालती हस्तक्षेप में वह समाचार कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा तो उसे उस ऑपरेशन में आगे बढ़ने से पहले ही बचाव के सभी पहलुओं पर काम कर लेना चाहिए। जैसे एक बार एक अपरिचित सूत्र ने संवाददाता से कहा कि वह हिरण शिकार के स्टिंग ऑपरेशन में मदद करना चाहता है। इसपर संवाददाता ने उससे कई सवाल पूछे कि कैसे पता चलेगा कि शिकार कब हो रहा है और अगर मौके पर हमें देख लिया तो शिकारी बदले की कार्यवाही कर सकते हैं।

इसपर सूत्र ने बताया कि शिकार करने वाले जान पहचान के लोग हैं, वे अपने चेहरे पर नकाब ओढ़कर हिरण का शिकार करेंगे और आपको कोई खतरा नहीं होगा। यह जानने पर संवाददाता को सूत्र की बात अनैतिक लगी। उसके मस्तिष्क में सवाल यह था कि क्या सिर्फ पत्रकारिता का दमखम दिखाने के लिए हिरण को मारने देना चाहिए और दूसरा सवाल यह कि ऐसे स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण के बाद पूछा जा सकता है कि अगर संवाददाता वहां मौजूद था तो उसने एक जागरूक नागरिक होने का दायित्व निर्वाह करते हुए संबंधित विभाग को शिकार की जानकारी क्यों नहीं दी। इन दोनों सवालों में पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचने का आंकलन करने के बाद संवाददाता ने उस सूत्र को चेतावनी दी कि अगर उसने किसी अन्य पत्रकार को ऐसा प्रलोभन दिया तो वह उसे गिरफ्तार करवा देगा। लेकिन उस सूत्र ने किसी अन्य संवाददाता से संपर्क कर हिरण शिकार का स्टिंग करवा दिया। जिसपर वन विभाग और अदालत ने संज्ञान लेते हुए उक्त संवाददाता पर कानूनी कार्रवाई की। कुल मिलाकर विषय का निर्धारण बहुत मंथन के बाद किया जाना चाहिए।

2. रैकी यानि आंखों देखी- सबसे पहले आपको तय किए गए विषय, व्यक्ति और उस जगह के बारे में सभी सूचनाएं एकत्र करनी होती है। इसके लिए मौके पर जाकर सभी बातों को समझना पड़ता है यानि रैकी करनी पड़ती है। जैसे संदेह के दायरे में रखे गए व्यक्ति के आने-जाने का समय, उसके नज़दीकी लोग, उसकी आदतें या व्यवहार, काम को करने की उसकी गोपनीय तकनीक, उसके साथ शामिल लोगों की संख्या और लोग उस तक कैसे पहुंचते हैं। कुल मिलाकर रैकी के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जाता है कि अगर कुछ गड़बड़ है तो कहां और कैसे है। इसमें अपनी पहचान छिपाकर यह भी पता लगाना होता है कि गड़बड़ी की मूल वजह तक पहुंचने के लिए सबसे सही माध्यम क्या हो सकता है। जैसे कि कई बार कार्यालयों में चपरासी, जूनियर अफसर और कई बार बाहर के कुछ लोग ऐसे काम में मध्यथ की भूमिका निभाते हैं। ऐसे में आप किसी चपरासी को टिप देकर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यदि आपको किसी विश्वस्त सूत्र ने प्रामाणिक जानकारी दी हो, तब भी रैकी बहुत जरूरी है। गौरतलब है कि रैकी आपको स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए आवश्यक सावधानियां अपनाने, रणनीति बनाने और अपने लक्ष्य तक आसानी से पहुंच बनाने की सही दिशा देती है। यही नहीं रैकी को एक प्रकार का रिसर्च या शोध कहा जाता है जिसमें एक समाचार बनाने के लिए जरूरी सभी छहः कक्कार यानि सभी आवश्यक सवालों के जवाब प्राप्त होते है। जैसे कौन करता है, कब करता है, किसके साथ करता है, कैसे करता है, कहां करता है और क्यों करता है। लेकिन कभी-कभी रैकी के दौरान किसी अनियमितता को समझना आसान काम नहीं होता। जैसे एक बार संवाददाता को सूचना मिली कि लम्बी दूरी की रेल के जनरल डिब्बे में एक गैंग सीटों पर कब्ज़ा जमा लेती है और सीट के बदले प्रति यात्री 50 से 100 रूपए वसूल करके अगले स्टेशन पर उतर जाते हैं। इसकी रैकी करने के बावजूद संवाददाता को कोई खास जानकारी नहीं मिली। इस प्रक्रिया को दूसरे दिन भी दोहराया गया मगर गैंग के लोगों की पहचान बहुत मुश्किल थी। ऐसे में संवाददाता ने तय किया कि रेलवे प्लेटफार्म वेंडर्स से टोह लेते हैं लेकिन वेंडर भी पहचान बताने से मुकर गए। इसके बाद संवाददाता ने एक वेंडर के ठेले पर छिपाकर रखी गई सिगरेट के पैकेट व तंबाखू के पाउच देखे। इसपर संवाददाता ने वेंडर को प्रतिबंधित उत्पाद रखने पर धमकाया और रेल की सीट पर कब्ज़ा करने वाले गैंग के लोंगों के बारे में जानकारी मांगी। इस प्रकार एक सटीक सूचना प्राप्त हुई और स्टिंग ऑपरेशन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

3. मोक ड्रिल यानि अभ्यास जांच- कई बार स्टिंग करने से पहले मौके पर अभ्यास करना पड़ता है। अपने साथ हिडन या स्पाई यानि छिपा कैमरा लेकर मौके पर उसका इस्तेमाल किया जाता है और लौटकर उसके नतीजे देखे जाते हैं। इसमें इस बात की जांच हो जाती है कि कैमरे का प्रदर्शन कैसा है, वहां की रोशनी में दृश्य आवश्यकता के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण हैं या नहीं और जिस प्रकार की ध्वनि या आवाज़ रिकार्ड हो रही है उसमें कहीं ईको यानि गूंज की समस्या तो नहीं आ रही। कुल मिलाकर मौके पर अभ्यास जांच में कैमरे में रिकार्ड दृश्य और ध्वनि में कुछ कमीं पाए जाने पर आप स्टिंग ऑपरेशन के लिए किसी एकांत जगह के चुनाव की रणनीति बना सकते हैं। लेकिन अगर अभ्यास जांच यानि मॉक ड्रिल किए बिना आप स्टिंग कर लेते हैं तो दूसरी बार स्टिंग करना जटिल काम हो जाता है। इस बात की संभावना बहुत कम रह जाती है कि आप उसी प्रक्रिया को किसी दूसरे तरीके से दोहरा सकें। अभ्यास जांच से आपको अपने ऑपरेशन की ठोस और सफल रणनीति बनाने में मदद मिलती है। मसलन कई विभागों में आने जाने वालों की तलाशी ली जाती है ऐसे में आपका छिपा कैमरा पकड़ा जा सकता है। ऐसी स्थिति में आप विभाग के किसी कर्मचारी की मदद लेकर या वहां प्रवेश करने के किसी दूसरे मार्ग का पता लगाकर ऑपरेशन कर सकते हैं या तलाशी से बचने का कोई हल निकाल सकते हैं। एक बार संवाददाता के सामने ऐसी ही स्थिति पेश आई लिहाज़ा स्टिंग ऑपरेशन के लिए सर्दियों का इंतज़ार करना पड़ा ताकि स्पाई कैमरा छिपाने में आसानी हो और तलाशी में बचाव हो सके। इसी प्रकार एक बार संवाददाता को अभ्यास जांच में यह पता चला कि एक अधिकारी रिश्वत लेनदेन की बात करते समय आने वाले का मोबाइल अपने एक कर्मचारी के पास रखवा देता है। अगर जान पहचान वाला हो तो मोबाइल बंद कर टेबल पर रखने को कहता है। इस अभ्यास जांच के लिए संवाददाता किसी सूत्र के साथ पहुंचकर मौके पर पूरी प्रक्रिया को देख आया था इसीलिए उसने तय कि स्टिंग करते समय वह अपने साथ मोबाइल रखने के बजाए अपने साथी को उस अफसर के कमरे के बाहर मोबाइल देकर रखेगा। यानि पूर्व तैयारी में मॉक ड्रिल बहुत सहायक होती है। इसी प्रकार यदि स्टिल कैमरे से ही स्टिंग करना हो तो मोबाइल के सीक्वेंस मोड को मौके पर उपयोग करके यह देख लेना चाहिए कि खींचे गए फोटो साफ आ रहे हैं या नहीं। अगर फोटो संतोषजनक नहीं है तो ज्यादा मेगापिक्सल वाले मोबाइल का उपयोग कर फोटो परिणाम की जांच करनी चाहिए। लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मोबाइल में फोटो खींचने पर शटर के क्लिक की ध्वनि बंद हो। अगर आवाज़ चालू रह गई तो सबको पता चल जाएगा कि आप फोटो खींच रहे हैं ऐसे में आपकी पहचान उजागर हो जाएगी। जिससे आप वहां दोबारा जाकर स्टिंग ऑपरेशन नहीं कर पाएंगे।

4. मोबाइल व कैमरे की जांच- इसमें मौके पर अपने मोबाइल का नेटवर्क भी जांचा जाता है ताकि आवश्यकता पड़ने पर किसी से संपर्क किया जा सके। एक बार संवाददाता ने इसी प्रकार स्टिंग करने की तैयारी की और अभ्यास जांच में यह पाया कि उसका मोबाइल नेटवर्क कमज़ोर था। ऐसे में उसने दूसरे नेटवर्क के मोबाइल फोन को परखा जिसका नेटवर्क वहां सबसे अधिक उपयुक्त था। इसके अलावा पुराने मोबाइल के की-पेड में पांच नंबर पर एक उभरा हुआ बिंदु होता है, ऐसा फोन स्टिंग में बहुत लाभदायक होता है। जरूरत पड़ने पर आप जेब में रखे फोन को छूकर उस बिंदु को तलाश सकते हैं और अगर आपने पांच नंबर पर स्पीड डायल में ऐसे व्यक्ति का नंबर दर्ज कर रखा है जो आपकी मदद के लिए तैयार है या आप उसे तैयार करके आए हैं तो वह तुरन्त ही घटनास्थल पर पहुंचकर आपको बचाने में सहयोग कर सकता है। जैसे एक बार संवाददाता अपने एक साथी पत्रकार सहित एक विश्वस्त पुलिस अधिकारी को अपने ऑपरेशन की जानकारी देकर मौके पर पहुंचा लेकिन रिश्वतखोरों को संदेह हो गया और उन्होंने दरवाज़ा बंद कर संवाददाता को बंधक बना लिया। इसपर संवाददाता ने उन्हें अपनी बातों में उलझाकर जेब में हाथ डाला और पांच नंबर को, की-पैड पर उभरे हुए बिंदु से तलाशकर हार्ड प्रेस कर दिया। इससे नंबर डायल हो गया और आपात स्थिति में मदद के लिए तैयार किए गए संवाददाता व पुलिस अधिकारी ने बातें सुनकर अंदाज़ा लगा लिया कि ऑपरेशन असफल हो रहा है। ऐसे में वे तुरन्त मदद के लिए पहुंचे और संवाददाता को मुश्किल में पड़ने से बचा लिया। इसी प्रकार यदि स्टिल कैमरे से ही स्टिंग करना हो तो मोबाइल के सीक्वेंस मोड की जांच कर लेनी चाहिए कि एक बार फोटो खींचने का बटन दबाने पर वह लगातार कितनी फोटो और कितनी देर में खींच रहा है।

5. कलर कोड यानि उपयुक्त रंग की जांच- रैकी और अभ्यास जांच में आपको यह भी देखना समझना चाहिए कि जिस जगह आपको स्टिंग ऑपरेशन करना है वहां का आम रंग क्या है यानि वहां अधिकांश लोग कौनसे रंग के कपड़े पहनते हैं। आम तौर पर स्लेटी, क्रीम और सफेद रंग ध्यान खींचने वाले नहीं होते। यदि आप चटख या गहरे रंग के कपड़े पहनकर मौके पर स्टिंग करने जाएंगे तो आपके परिधान के रंग की वजह से लोगों का ध्यान आपकी ओर जाएगा। ऐसे में आपका ऑपरेशन खतरे में पड़ सकता है। एक संवाददाता इसी गलती के कारण ऑपरेशन पूरा नहीं कर पाया और उसे यह समझ भी नहीं आया कि आखिर लोग उसकी तरफ देख क्यों रहे थे। क्योंकि रंगों को लेकर सतर्कता का विचार उसे आया ही नहीं। उस संवाददाता के कपड़ों के गहरे लाल रंग के कारण कर्मचारी उसके रंग की ओर आकर्षित हुए क्योंकि वह अकेला ही ऐसे रंग का कमीज़ पहने था और चाहे-अनचाहे उसकी गतिविधि पर गौर करने लगे, फिर उन्हें संदेह हुआ तो सतर्कता बरतने लगे। कुल मिलाकर संवाददाता के परिधान ने ही लोगों को सतर्क कर दिया। यानि परिधान या कपड़ों का चयन देख परखकर खुदको छिपाए रखने के लिए किया जाना चाहिए।

6. मेकअप से पहचान छिपाना- बरसों पहले राजा-महाराजा भी भेष बदलकर अपनी जनता और राजकीय कामकाज की परदर्शिता को परखा करते थे। इसी प्रकार कई बार संवाददाता को स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए अपना रूप बदलना पड़ता है क्योंकि वह अपनी पहचान छिपाना चाहता है। अब सवाल यह उठता है कि जब संवाददाता को अपनी पहचान छुपानी ही पड़ रही है तो उसे खुद ऑपरेशन करने की आवश्यकता क्या है। इसका जवाब यह है कि एक संवाददाता जब स्वयं ऑपरेशन करता है तो वह अपने स्तर पर आवश्यक तथ्यों का संकलन करता है यानि समाचार के लिए सभी आवश्यक तथ्यों के सुबूतों को ध्यान में रखते हुए दृश्य या फोटो खींचता है। दूसरा कारण यह है कि संवाददाता के मौके पर मौजूद होने से वह पूरे मामले का सत्य और तथ्य के आधार पर परीक्षण व जांच करके संतुष्ट हो सकता है लेकिन अगर कोई दूसरा इस काम को करेगा तो हो सकता है कि वह पत्रकारिता के मापदण्ड के अनुरूप काम न करे। तीसरा कारण यह है कि अगर मौके पर कुछ गड़बड़ी हो जाती है तो उसे पत्रकार होने का लाभ मिल पाता है और वह नकारात्मक परिस्थिति में खुदको संभाल सकता है जबकि ऐसे ऑपरेशन में किसी दूसरे का उपयोग करने पर उसे बचाना बेहद जटिल काम हो जाता है। इसीलिए अधिकांश मामलों में संवाददाता खुद ही ऐसे ऑपरेशन को अंजाम देते हैं। अब जहां तक रूप बदलने की बात है तो एक संवाददाता को मेकअप से अपना चेहरा इस प्रकार बदलना चाहिए कि उसकी पहचान उसी अनुरूप हो जैसा वह बताना चाहता है। पहचान छिपाने को लेकर भी अच्छा खासा शोध और अभ्यास करना पड़ता है साथ ही हाव-भाव और बोलचाल की भाषा भी उसी किरदार के मुताबिक चुनी जाती है। यह एक नाटकीय प्रस्तुति होती है इसीलिए यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि मेकअप, भाषा और प्रस्तुति किसी भी स्तर पर संदेह को जन्म देने वाले नहीं होने चाहिए।

7. प्रश्नावली का निर्माण- स्टिंग ऑपरेशन में पूछे जाने वाले सवाल भी संवाददाता को पहले ही तैयार कर लेने चाहिए। जिसमें उसे इस बात का खास ख्याल रखना पड़ता है कि अगर किसी रिश्वतखोरी से जुड़ी सच्चाई को उजागर करना है तो सवालों के ज़रिए प्राप्त जवाबों में इस बात की पुष्टि हो जाए कि किस काम के लिए कितनी रिश्वत ली जा रही है और उसके बदले काम कब और कैसे होगा। इसमें संवाददाता कई बार ऐसे सवाल भी शामिल करता है जैसे रिश्वतखोर से पूछा जाता है कि कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो जाएगी। ऐसे में दो तरह के जवाब आते हैं एक प्रकार के जवाब में रिश्वत लेने वाला अपनी प्रशंसा में कुछ मामलों का जिक्र कर सकता है या फिर पूरी व्यवस्था में शामिल लोगों का उल्लेख करते हुए अपने अभ्यस्त होने की स्वीकारोक्ति कर सकता है। हालांकि सवाल पूछने का कोई तय नियम नहीं है कि आपने पहले से जो सवाल तैयार कर लिए हैं उसी दिशा में चलना होगा। कई बार मौके पर स्थितियां पूरी तरह बदल जाती हैं। ऐसे में आपकी पूर्व तैयारी काम नहीं आती। लिहाजा ऐसे समय संवाददाता के अपने संवाद कौशल और मौके पर बनाई रणनीति ही काम आती है। इसके बावजूद पहले से सवालों की तैयारी स्टिंग ऑपरेशन के दौरान पूछताछ के आपके दायरे का विस्तार करती है। इसमें संभावनाओं के आधार पर सवाल और विविध स्थितियों की संभावना के आधार पर संवाददाता अपनी प्रतिक्रिया के पैटर्न तय कर सकते हैं।

सतर्कता की परीक्षा-
स्टिंग ऑपरेशन का उद्देश्य छिपे हुए गलत कार्यों के प्रमाण एकत्र करना है, लिहाजा आपको सतर्कता की परीक्षा देनी पड़ती है। ऐसे में आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि आप तो सजग हैं लेकिन जो लोग सत्य को छिपाना चाहते हैं और भ्रष्टाचार जैसी गतिविधियों में लिप्त हैं वे भी अपने काम में पूरी सतर्कता बरतते हैं। जिस प्रकार संवाददाता अपने सूत्रों के नेटवर्क का इस्तेमाल करता है वैसे ही गलत काम में लिप्त लोग भी अपने सहयोगियों और मुखबिरों के ज़रिए अपने काम को सुनियोजित ढंग से अंजाम देते हैं। ऐसे में एक संवाददाता को अतिरिक्त सावधानी और दोहरी व तिहरी जांच करते हुए सभी तथ्यों का प्रमाण जुटाना पड़ता है। यही नहीं अगर एक संवाददाता पूरी तरह सूत्र पर ही निर्भर रह जाता है तो माना जाता है कि उसकी कामयाबी का प्रतिशत घट जाता है। इसीलिए एक संवाददाता को सूत्र की बनाई गई रणनीति के बजाए खुदपर भरोसा रखते हुए अनुसंधान के आधार पर तय की गई अपनी रणनीति के तहत ऑपरेशन करना चाहिए।

स्टिंग ऑपरेशन की कामयाबी यानि इम्पैक्ट-
आम तौर पर यह माना जाता है कि एक संवाददाता या उसकी टीम ने एक स्टिंग ऑपरेशन किया और उसे प्रकाशित या प्रसारित कर दिया गया। जिसे दर्शकों ने देखा और सराहा, यही स्टिंग की कामयाबी है। हर बार ऐसा होगा यह जरूरी नहीं है क्योंकि स्टिंग ऑपरेशन का उद्देश्य किसी गड़बड़ी पर रोक लगाना और गलत काम वाले व्यक्ति पर कड़ी कार्रवाई करवाना है। जिसे समाचार की दुनियां में इम्पैक्ट कहा जाता है। आपके ऑपरेशन का मूल्य, इम्पैक्ट यानि असर व परिणाम से तय होता है। लिहाजा प्रकाशन या प्रसारण से पहले भी ठोस तैयारी की जानी चाहिए। इसके लिए कई सवालों के जवाब तलाशने होते हैं कि कहीं आपके ऑपरेशन को दिखाने से सुबूत खुर्दबुर्द तो नहीं कर दिए जाएंगे, आरोपी फरार तो नहीं हो जाएंगे, उस अनियमितता पर पर्दा डालने या उससे इनकार करने के लिए क्या आधार तैयार किया जा सकता है। इन सवालों के जवाब के बाद एक संवाददाता इम्पैक्ट की रणनीति बना सकता है। उदाहरण के लिए टीवी पर उस स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण का ऐसा समय चुन सकता है जिससे सुबूत नष्ट न किए जा सकते हों। जैसे एक बार संवाददाता को लगा कि सरकारी कार्यालय के भ्रष्टाचार से जुड़ा यह स्टिंग ऑपरेशन कार्यालय समय में दिखाने से फाइलें गायब हो सकती हैं। तो वह ऑपरेशन सुबह 6 बजे दिखाया गया और उसकी जानकारी महकमें के वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई। जिसके बाद छापेमारी में सभी दस्तावेज बरामद हो गए और अनियमितता की पुष्टि भी हो गई। इसी प्रकार एक बार एक तांत्रिक का स्टिंग ऑपरेशन करने के बाद संवाददाता को लगा कि पुलिस को साथ लिए बिना अगर उस स्टिंग का प्रसारण कर दिया जाता है तो वह तांत्रिक और उसका गैंग फरार हो सकता है। ऐसे में संवाददाता ने एक ईमानदार पुलिस आयुक्त को वह स्टिंग ऑपरेशन दिखाया और जनहित में कार्रवाई की मांग की। इसके बाद पुलिस आयुक्त ने सादा वर्दी में अपने एक विश्वस्त पुलिस अधिकारी को जांच-पड़ताल के लिए भेजा और दो दिन बाद सीक्रेट ऑपरेशन तय कर रात के तीन बजे भारी पुलिस बल के साथ खुद पुलिस आयुक्त ने छापेमारी कर तांत्रिक और उसके सहयोगियों को धर दबोचा। यही नहीं मौके से लाखों रूपए और सैकड़ों सोने के गहने बरामद किए गए। उल्लेखनीय है कि हर स्टिंग ऑपरेशन में आप किसी वरिष्ठ अधिकारी को साझा नहीं कर सकते लेकिन संभव हो और संवाददाता आश्वस्त हो तो निश्चय ही प्रशासनिक सहयोग से इम्पैक्ट मजबूत रखने के लिए साझेदारी की जानी चाहिए। लेकिन संवाददाता को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उसका स्टिंग ऑपरेशन देशहित और समाज के हित में है या नहीं। उदाहरण के लिए एक बार संवाददाता को यह जानकारी मिली की सीमा पर पाकिस्तानी सेना, भारतीय सरहदों के नज़दीक अपने हज़ारों सैनिकों को तैनात कर रही है और एक तस्कर भी पाकिस्तान से भारतीय सीमा में आने वाला है। यह जानकारी मिलने पर संवाददाता ने सरहद के एक गांव में पहुंचा और देखा कि पाकिस्तानी सेना वाकई सरहदों पर तैनात हो रही है। लेकिन तारबंदी के करीब बीएसएफ के सभी वॉच टॉवर यानि मचाने खाली पड़ी हैं और कई किलोमीटर तक कोई भी जवान नफरी यानि पैट्रोलिंग करता हुआ नज़र नहीं आया। इसपर संवाददाता ने सभी दृश्य अपने कैमरे में बनाए और बीएसएफ के आईजी को इसकी जानकारी दी। इसके बाद आईजी ने तुरन्त संज्ञान लेते हुए जवानों को नफरी के लिए भेजा और कुछ दिन बाद भारी बारिश में एक तस्कर को छिपकर कैमरे में कैद किया गया, जिसे सेना ने गिरफ्तार कर लिया। इस समाचार के प्रसारण में संवाददाता ने देशहित में सरहद पर खाली वॉच टाॅवर और पैट्रोलिंग न होने का कहीं उल्लेख नहीं किया। क्योंकि एक संवाददाता को यह समझना जरूरी है कि आपकी दिखाई गई एक जानकारी राष्ट्र और समाज को नुकसान पहुंचा सकती है। यह पत्रकारिता का नैतिक सिद्धान्त भी है और आचार संहिता में भी इसका उल्लेख किया गया है।

स्टिंग ऑपरेशन यानि पारदर्शिता और प्रतिष्ठा का निर्माण- कुल मिलाकर स्टिंग ऑपरेशन एक पत्रकार या संवाददाता ही नहीं उसके प्रकाशन या प्रसारण माध्यम की छवि, साख और प्रतिष्ठा का निर्माण करता है। इस प्रकार के ऑपरेशन समाज की भीतर पनपने वाली सभी प्रकार की अनियमितताओं को हटाने या नष्ट करने का सटीक तरीका माने जाते हैं। जिस प्रकार एक डॉक्टर ऑपरेशन के ज़रिए किसी मरीज को नवजीवन देता है, उसे बीमारी से मुक्ति देता है और सावधानियों के लिए प्रेरित करता है। उसी प्रकार स्टिंग ऑपरेशन भी समाज, प्रशासन, राजनीति और व्यवस्था में पनप रही बुराई को दूर करने का प्रयास कता है और गलत काम रोकने के लिए आगाह भी करता है। इसीलिए अधिकांश प्रकाशन व प्रसारण माध्यम व्यवस्था, समाज, मानव, देश और जनहित में स्टिंग ऑपरेशन को आज़माते हुए स्वस्थ निर्माण और पारदर्शी व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त करते हुए उल्लेखनीय योगदान देते हैं।

डॉ .सचिन बत्रा शारदा विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट आफ मास कम्युनिकेशन में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। डॉ. सचिन जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में हैं। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में पीएचडी की है, साथ ही फ्रेंच में डिप्लोमा भी प्राप्त किया है। उन्होंने आरडब्लूजेयू और इंटरनेश्नल इंस्टीट्यूट आफ जर्नलिज्म, ब्रेडनबर्ग, बर्लिन के विशेषज्ञ से पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया है। वे दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति जैसे समाचारपत्रों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं और उन्होंने राजस्थान पत्रिका की अनुसंधान व खोजी पत्रिका नैनो में भी अपनी सेवाएं दी हैं। इसके अलावा वे सहारा समय के जोधपुर केंद्र में ब्यूरो इनचार्ज भी रहे हैं। इस दौरान उनकी कई खोजपूर्ण खबरें प्रकाशित और प्रसारित हुई जिनमें सलमान खान का हिरण शिकार मामला भी शामिल है। उन्होंने एक तांत्रिका का स्टिंग ऑपरेशन भी किया था। डॉ सचिन ने एक किताब और कई शोध पत्र लिखे हैं, इसके अलावा वे अमेरिका की प्रोफेश्नल सोसाइटी आफ ड्रोन जर्नलिस्टस के सदस्य हैं। सचिन गृह मंत्रालय के नेशलन इंस्टीट्यूट ऑफ डिज़ास्टर मैनेजमेंट में पब्लिक इंफार्मेशन आफिसर्स के प्रशिक्षण कार्यक्रम से संबद्ध हैं। उन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 14 वर्ष काम किया और पिछले 5 वर्षो से मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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2 comments

  1. Extraordinary situation warrants extraordinary effort. Here, sting operations come handy for investigative reporters. Well written piece.

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