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साख बनाए रखनी है तो समाचार की पुष्टि अवश्य करें

डॉ. महर उद्दीन खां।

पत्रकारिता का एक नियम यह भी है कि सुनी सुनाई बात पर पूरा विश्वास न करें। जो भी सूचना आप को मिलती है उसे क्रास चैक अवश्‍य करना चाहिए । ऐसा न होने पर आप धोखा भी खा सकते हैं क्योंकि कई लोग पत्रकार को पटा कर अपनी मर्जी की स्टोरी प्लांट कराना चाहते है

खबर और पापड़ में क्या समानता हो सकती है यह सवाल पूछा जा सकता है। पापड़ और खबर दोनों के बारे में सभी जानते हैं। अब इनका सम्बंध समझिए। पापड़ के तीन रुप होते हैं। एक कच्चा पापड़ दो भुना हुआ पापड़ और तीन तला हुआ पापड़। इसी प्रकार खबर के भी तीन रुप होते हैं एक कच्ची खबर जैसे-बस्ती के एक मुहल्ले में कुत्ते ने बच्चे को नोंच लिया। यह खबर कच्चा पापड़ है। बस्ती के रामनगर मुहल्ले में एक कुत्ते ने बच्चे को नोंच लिया। यह खबर भुना हुआ पापड़ हैं। मुहल्ला रामनगर में श्‍याम लाल के बच्चे को कुत्ते ने नोंच लिया बच्चा घर के बाहर धूप में सो रहा था। इस खबर को तला हुआ पापड़ कह सकते हैं।

पापड़ आप कच्चा खाएंगे तो उस में मसाले, दाल या आलू का स्वाद तो मिलेगा मगर मजा नहीं आएगा और पापड़ मुंह में चिपक भी जाएगा। भुने पापड़ के साथ भी यही होग मगर तले पापड़ में स्वाद तो आएगा ही वह मुंह में चिपकेगा भी नहीं। कच्चे पापड़ रुपी खबर में पूरी जानकारी नहीं है, भुने पापड़ वाली खबर में भी अधूरी जानकारी है मगर तले पापड़ वाली खबर में पूरी जानकारी है उसे पढने के बाद पाठक को सारी जानकारी मिल जाती है।

खबर लिखते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि खबर कच्चा या भुना पापड़ न बन जाए। कई बार हड़बड़ी में संवाददाता पूरी जानकारी नहीं जुटा पाता या आलस के चलते घटना स्थल तक नहीं जा पाता। होना यह चाहिए कि हम घटना स्थल पर जाने का पूरा प्रयास करें। देखने में यह भी आया है कि कई कस्बाई पत्रकार घटना स्थल पर जाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। किसी के यहां डाका पड़ने पर वह पीड़ित के यहां न जा कर थाने जाना अपनी शान समझते हैं और थाने से मिली जानकारी ही खबर बनाई जाती है जो कच्चा या भुना हुआ पापड़ ही सिद्ध होती है। अगर आप पीड़ित पक्ष से मिलेंगे ता इस से आपकी विश्‍वसनीयता तो बढेगी ही साथ ही अखबार की लोकप्रियता में भी वृद्धि होगी। किसी के साथ होने वाली ऐसी घटना पर पीड़ित पक्ष से अवश्‍य मिला जाए उस के बाद पुलिस और प्रशासन से भी बात की जा सकती है।

पत्रकारिता का एक नियम यह भी है कि सुनी सुनाई बात पर पूरा विश्वास न करें। जो भी सूचना आप को मिलती है उसे क्रास चैक अवश्‍य करना चाहिए । ऐसा न होने पर आप धोखा भी खा सकते हैं क्योंकि कई लोग पत्रकार को पटा कर अपनी मर्जी की स्टोरी प्लांट कराना चाहते है । पत्रकार के आलस के चलते कई बार ये लोग अपने मंसूबे में सफल हो जाते हैं मगर पत्रकार संकट में फंस जाता है। ध्यान रहे कि खबर में आलस का कोई स्थान नहीं है। इस सम्बंध में यहां दो घटनाओं का उल्लेख करना जरुरी लगता है। हरियाणा के एक संवाददाता ने एक गांव के खलिहान में आग लगने की खबर कहीं सुन ली और बिना पड़ताल किए खबर बना दी।

खबर को प्रमाणित करने के लिए आग लगने का पूरा सीन क्रिएट कर दिया जिस में लपटें उठती और दूर से धुआं उठता भी दिखा दिया। अंत में यह और लिख दिया कि एक पीड़ित किसान ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि चुनावी रंजिश के चलते इस अग्निकांड को अंजाम दिया गया। कहने का मतलब कि खबर को पूरी तरह फ्राइड पापड़ बना दिया। खबर को पढ़ कर लगा कि संवाददाता ने महनत की है और घटना स्थल पर भी गया है। खबर छपने के बाद अगले दिन पता चला कि ऐसा कोई अग्निकांड हुआ ही नहीं।

ऐसे ही एक अन्य संवाददाता ने अपने इलाके के थानेदार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु का समाचार छपवा दिया जिस पर काफी हंगामा हुआ और अखबार की साख को भी बट्टा लगा। खैर अखबार ने तो खंडन और खेद छाप कर अपनी साख बचा ली मगर इन संवाददाताओं की साख नहीं लौट सकी बाद में किसी अखबार ने इन्हें नहीं अपनाया। ऐसे उदाहरण और भी हैं। इस लिए यह आवश्‍यक है कि सुनी सुनाई बात की जब तक पड़ताल न कर ली जाए उसे खबर न बनाया जाए।

डॉ. महर उद्दीन खां लम्बे समय तक नवभारत टाइम्स से जुड़े रहे और इसमें उनका कॉलम बहुत लोकप्रिय था. हिंदी जर्नलिज्म में वे एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं संपर्क : 09312076949 email- maheruddin.khan@gmail.com

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