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Monthly Archives: August 2015

सस्ता साहित्य और मुख्यधारा साहित्य

literature

अनिल यादव। मिलिट्री डेयरी फार्म, सूबेदारगंज, इलाहाबाद। लौकी की लतरों से ढके एस्बेस्टस शीट की ढलानदार छतों वाले उन एक जैसे स्लेटी, काई से भूरे मकानों का शायद कोई अलग नंबर नहीं था। हर ओर ऊंची पारा और लैंटाना घास थी। कंटीले तारों से घिरे खेत थे जिनके आगे बैरहना ...

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भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है

Indian-Languages

कुमार मुकुल। धूमिल ने लिखा है – भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है। इधर हिन्‍दी के लेखक, कवि और पत्रकार जिस तरह भाषा को बरत रहे हैं उसे देखकर उसकी बधिया बैठती नजर आती है। अपने एक वरिष्‍ट और प्रिय कवि के यहां भी जब एक कविता ...

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मौजूदा पत्रकारिता और कुछ बुनियादी सवाल

book-journalism

डॉ. सुशील उपाध्याय। मौजूदा मीडिया पर जब आप एक सरसरी निगाह डालते हैं तो भौचक्का हुए बिना नहीं रह सकते। हर रोज देखते हैं कि हमारे टीवी चैनल रेडियो की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वे बहुत लाउड हैं। जैसे सब कुछ शब्दों के जरिये ही कह देना चाहते हैं। ...

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भारतीय अखबारों में महिलाओं से जुड़ी खबरें और उनके पीछे की सोच

women-issue

डॉ. शिल्पी झा। भारतीय अखबारों के पन्नों में महिलाओं की स्थिति पर अगर बात करनी हो तो केवल वो शब्द या कॉलम गिनने से काम नहीं चलेगा जो अलग-अलग भाषाओं के अखबार महिलाओं या उनसे जुड़ी ख़बरों के लिए निर्धारित करते हैं। और इन कसौटियों पर मीडिया का देखना कई ...

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प्रेस की आज़ादी : जो सच बोलेंगे, मारे जाएंगे?

press-freedom

सीमा आज़ाद। कमेटी फॉर प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ के मुताबिक सन 2014 में पूरी दुनिया में कुल 221 पत्रकारों को जेल भेजा गया. 2013 में 211 और 2012 में 232 पत्रकारों को. इनमें से ज्यादातर सरकार की अलोकतांत्रिक नीतियों के खिलाफ और आंदोलनों के पक्ष में लिखने वाले पत्रकार हैं. यानी खतरा ...

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‘साहित्य में तुम मेरी पीठ खुजाओ, मैं तुम्हारी खुजाता हूं… बेहद आम बात है

litrature

हिंदी अपराध लेखन में शीर्ष लेखकों में शुमार सुरेंद्र मोहन पाठक का मानना है कि लोकप्रिय साहित्य का पाठक अपने लेखक की हैसियत बनाता है, खालिस साहित्यकार इस हैसियत से वंचित हैं। विकास कुमार की उनसे खास बातचीत विकास कुमार आपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उर्दू और बंग्ला ...

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हाथ में कलम, सिर पर कफन

naxalites

प्रियंका कौशल। नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में हर दूसरे दिन नक्सलियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं। इस खूनी संघर्ष में पत्रकारों की जान पर खतरा बना रहता है. ऐसे में यहां निष्पक्ष पत्रकारिता कर पाना मुश्किलों भरा है। पत्रकार नक्सल प्रभावित इलाकों से न सिर्फ ...

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दूरदर्शन: एक स्वप्न भंग की दास्तां

doordarshan-dd

आनंद प्रधान। लोक प्रसारणकर्ता की गुणवत्ता को टीआरपी की ‘लोकप्रियता’ के मानदंडों पर नहीं मापा जाना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या दूरदर्शन एक लोक प्रसारणकर्ता के बतौर गुणवत्ता के उन मानदंडों पर खरा उतरता है जो एक लोक प्रसारक से अपेक्षा की जाती है? असल में, एक स्वायत्त ...

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आत्म नियमन फेल, नियमन की जरूरत

press-freedom

मुकेश कुमार।… नियमन की वकालत करने का मतलब अकसर ये निकाला जाता है या इसे इस तरह से प्रचारित भी किया गया है मानो ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित-बाधित करने का प्रयास हो। वास्तव में उल्टा है। मीडिया स्वछंदता में धारा 19-1-ए के तहत भारतीय नागरिकों को मिले संवैधानिक ...

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शीर्षक-कला का भी अपना महत्व है!

text-hindi

मुकुल व्यास | याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद दूसरे दिन कुछ अखबारों के शीर्षक गौर करने लायक थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा, ‘नाइट विदाउट एंड, डेथ एट डॉन’। हिंदू ने शीर्षक दिया, ‘याकूब मेमन हैंग्ड ऑन बर्थडे’। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक था, ‘एंड दे हैंग्ड याकूब ...

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टिटिहरी पत्रकार, बरसाती चैनल

P7-NEWS-BREAKING-NEWS-

अभिषेक श्रीवास्तव।… समाचार चैनलों को टिकाए रखना कितना घाटे का सौदा है, यह हाल में बंद हुए या संकटग्रस्त कुछ चैनलों की हालत से समझा जा सकता है। चिटफंड समूह के मामले को देखें तो कह सकते हैं कि देश के इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी चैनल पर ...

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रेडियो माध्यम: जंगल, समुन्दर और ऊँचे ऊँचे पहाड़- कहीं भी सुन लीजिए

radio

रामदत्त त्रिपाठी | हमें यह भी ध्यान में रखना होता है कि हमारे कुछ श्रोता बहुत कम पढ़े लिखे हों या अक्षर ज्ञान बिलकुल न हों. उनको उस समाचार के सम्बंधित सन्दर्भों या पृष्ठभूमि का जानकारी न हो. इसलिए जहां जरुरी लगे उस समाचार की पृष्ठभूमि या सन्दर्भ जरुर बताना ...

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