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कार्टून पत्रकारिता: आड़ी तिरछी रेखाओं के माध्यम से संप्रेषित होने वाला व्यंग्य

डॉ. सचिन बत्रा।

कई बार सिर्फ चुटीला संवाद ही पर्याप्त नहीं होता उसे कहने वाला पात्र भी मनोरंजन का माध्यम होना चाहिए। जैसे कई बार नेताओं के कार्टून में लालू के सिर और कान के बाल, मनमोहन सिंह की पगड़ी, रामविलास पासवान की दाड़ी, नरेंद्र मोदी के होट और दाड़ी, लालकृष्ण आडवाणी की मूंछ, शरद पंवार के श्याम वर्ण फूले हुए गाल, अन्ना हज़ारे की टोपी और नाक, अरविंद केजरीवाल का मफलर और अमित शाह की दाड़ी को उनके कार्टून कैरेक्टर निर्माण में महत्व दिया जाता है। यह सभी जनता के जाने पहचाने चेहरे हैं लेकिन अक्सर कार्टूनिस्ट आम जि़न्दगी के पहलुओं पर संवाद करने के लिए जनता के बीच से ही ऐसे पात्र का निर्माण करता है जो अपनी पहचान खुद बनाते हैं

कार्टून एक शब्द विहीन संवाद है तो कभी चंद शब्दों के सहारे बहुत कुछ कहने की कला है, वही यह आड़ी तिरछी रेखाओं के माध्यम से संप्रेषित होने वाला व्यंग्य भी है। कुछ लोग कार्टून को या तो उपहास मानते है या किसी का मखौल उड़ाने का ज़रिया। लेकिन वास्तव में कार्टून की मूल आत्मा व्यंग्य है जिसमें संक्षिप्त शब्दों की बैसाखी से हज़ारों शब्दों मे लिखा जाने वाला समाचार व्यक्त किया जाता है। कार्टून किसी भी रूप में बिगाड़ को जन्म नहीं देता है बल्कि वह किसी अव्यवस्था, लापरवाही, अनदेखी, अनहोनी, परिणाम, प्रवृत्ति या योजनाओं के कुप्रभाव को रेखांकित करते हुए कलात्मक और व्यंग्यात्मक प्रस्तुति देने का सटीक माध्यम है। कार्टून मात्र मनोरंजन के उद्देश्य से नहीं बनाया जाता बल्कि वह सच को यथार्थ के अनछुए पहलुओं, परिणामों और संभावनाओं को सम्मिलित करते हुए उसे उधेड़ने या बुनने की बारीक सुई भी है।

आज की पत्रकारिता में अगर दबावों, राजनीतिक हथकंडो और बाज़ारवाद के प्रवाह से बचकर बेबाकी से कहने का अगर कोई हुनर बचा है तो वह कार्टून पत्रकारिता ही है। जो अपने सेंस ऑफ ह्यूमर यानी विनोदवृत्ति से पाठकों या दर्शकों को गुदगुदाता है वहीं मस्तिष्क में कई गहरे सवालों के बीज बोने का भी दमखम रखता है। सच भी है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में कई बार किसी बात पर समाचार या तो बनाया नहीं जा सकता या समाचार के मापदण्ड के अनुरूप नहीं होता अथवा समाचार उसे कहने में हिचकता है या घबरा जाता है लेकिन उसी बात को कार्टून बेखौफ होकर सत्ता के गलियारों से लेकर शासन और प्रशासन से सीधे मुखातिब होकर बेबाकी से कह डालता है। कार्टून की इसी विशेषता के चलते इसे वेटलैस, डाइजेस्टिव और हिडन ट्रुथ टैलर यानी भाररहित, पचने वाला और गुप्त सत्य वाचक भी कहा जाता है।

प्रिंट मीडिया में कार्टून का स्थान एक समाचार से भी अधिक अपील करने वाला होता है क्योंकि किसी भी जटिल समाचार या चर्चा के विषय को पाठकों को सहज रूप से समझाने या विमर्श करने की क्षमता कार्टून में निहित है। कहा जाता है कि हज़ार शब्दों की लम्बी कथा को हावभाव, संकेतों, प्रतीकों और पात्रों के परस्पर संक्षिप्त संवाद के ज़रिए सुगमता से अभिव्यक्त करने की क्षमता कार्टून को असरदार बनाती है। इस सबके बावजूद यह माना जाता है कि पहली नज़र में ही एक कार्टून संवाद करते हुए देखने-पढ़ने वाले के मस्तिष्क में अर्थों का उत्पादन कर देता है यही उसकी सफलता का पैमाना है। इसके लिए सिर्फ पात्रों को उकेरने की कला प्रयाप्त नहीं है बल्कि विषय पर चुटकी लेने वाले संवाद और उसकी प्रस्तुति में भी पारंगत होना जरूरी है यानी कार्टून को मारक बनाने के लिए अर्थ का तुरन्त उत्पादन करने का कौशल आवश्यक है।

कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण, कार्टून कला को शिकायत करने की कला मानते हैं और अबू अब्राहम इसे दुर्भावना रहित शरारत बताते हैं वहीं सुधीर धर इसे एक वॉच डॉग कहते हैं जो भौंक सकता है पर काटता नहीं है जबकि बाल ठाकरे इसे संदान यानी एन्विल पर विषय-वस्तु को रखकर लुहार की तरह पीटने के रूप में देखते हैं। (इतवारी पत्रिका – 19 मार्च 2000 पेज 4- छोटा मुहं बड़ी बात- सुधीर गोस्वामी)

आर के लक्ष्मण के अनुसार एक कार्टून हास्य के समान्य अर्थों के साथ समुदाय की सोच और हितों की सुरक्षा की कोशिश करता है। कार्टून स्वस्थ जुड़ाव और अच्छे मनोविनोद के साथ दुर्भावना रहित रहकर व्यक्तियों और मुद्दों से सरोकार रखता है। लक्ष्मण मानते हैं कि कार्टूनिस्ट अपने चरित्रों के मार्फत हास्य का संचार करता है जबकि वही पात्र उस हास्य के लिए माध्यम बनते हैं लेकिन अभिव्यक्ति नहीं करते यानी कार्टूनिस्ट का उत्पादित हास्य किरदार की सहायता से पाठकों की छोटी से मुस्कान बन जाता है। —यू सैड इट-आर के लक्ष्मण, 1961-1997 प्रीफेस पेज 3-4

कार्टून को परिभाषित करते हुए हम यह भी कह सकते हैं कि यह न्यूनतम रेखाओं की कला है। जिनको इस प्रकार से सार्थक रूप में संयोजित किया जाता है कि जटिल से जटिल बात को सरलतापूर्वक और बिना किसी वैचारिक दबाव के व्यक्त हो जाती है। (नवभारत टाइम्स-कार्टून कुछ करने की ज़रूरत है-27 जुलाई 1990)

सही भी है एक कार्टूनिस्ट किसी निर्णायक क्षण या किसी घटनाक्रम को अपनी कल्पनात्मक क्षमता के अनुभव से तराशकर पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है। ताकि समूचे परिवेश में व्याप्त विसंगति को परिहास की बैसाखी से महसूस किया जा सके। यही नहीं आमजन की असाध्यता, निराशा, असमर्थता और क्रोध को अपनी कूची के बलबूते परिहास में बदलकर पेश करता है। यानी एक घटनाक्रम के समाचार की मीठी गोली बनाकर परोस देते हैं। लोकतांत्रिक परिवेश में कार्टून सत्ता का गुणगान नहीं करते बल्कि पूरे वातावरण में पनप रही व्यवस्था की विसंगतियों को अपनी वक्र दृष्टि से खोजकर तीखा प्रहार करते हैं। सच है कि एक कार्टूनिस्ट समाज और सामाजिक व्यवस्था के हितो और उसके सरोकारों से सीधे जड़कर बोलता है और आम आदमी के जीवन से जुड़े आधारभूत पक्षों को साथ लेकर सभी उतार चढ़ावों से लेकर देश विदेश के शीर्षस्त व्यक्तियों, घटनाओं, सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल की व्यंग्यात्मक तसवीर बनाता है।

 cartoon1कार्टून का इतिहास
कहा जाता है कि कार्टून का पहला प्रयोग इटली में संभवतः 17वीं शताब्दी में हुआ था। जिसमें चित्रों के माध्यम से अपना विरोध जताया जाता था। उस दौरान रोमन अकादमी के अध्यक्ष ऐनीवाल केरास्त ने पोप के विरूद्ध चित्र बनाए। केरीकेचर शब्द इटालियन भाषा के कैरेक्टर और स्पेनिश भाषा के कारा से उपजा है, जिसका सामान्य अर्थ है चेहरे। इटालियन भाषा में इन्हें केरीकेचर कहा गया, जो चित्र या मूर्ति को विकृत रेखाओं में बनाकर अपना विरोध जतलाते थे। इन्हीं केरीकेचर्स का अनुसरण करते हुए दुनियां भर में उपयोग किया जाने लगा और अन्य देशों में इसे कार्टून कहा जाने लगा। हालांकि दोनों में रेखाओं का ही उपयोग किया जाता है लेकिन दोनों के अर्थ अलग-अलग थे। केरीकेचर में एक व्यक्ति विशेष का चित्र इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि उसका व्यक्तित्व और पहचान नहीं बदलती। केरीकेचर में व्यक्ति का मखौल उड़ाया जाता था। दूसरी ओर कार्टून में राजनीतिक, सामाजिक घटनाएं या मनोभाव का मीठा परिहास किया जाता है। ब्रिटिश इतिहास में कटाक्ष चित्रों के पितामह माने जाने वाले विलियम होगार्थ 1679 ने भी कार्टून के सफर में अपना पहला कीर्तिमान दर्ज किया। उन्होंने चारीबारी समाचार पत्र में सर्वप्रथम सामाजिक पहलुओं को विषय-वस्तु बनाते हुए विनोदपूर्ण चित्रों का प्रकाशन किया।
(राजस्थान पत्रिका थावर-सफरनामा कार्टून का–सचिन बत्रा- 23 मई 1998 मुख पृष्ठ)

भारत में कार्टून की शुरूआत के बारे में विद्वानों में कई मत हैं। जिनमें जाॅन लीच की प्रेरणा को अधिक महत्व और समर्थन दिया जाता है। लीच ने 1841 में इग्लैण्ड में अपनी कार्टून कला का सफर आरम्भ किया। जिसमें उन्होंने लगभग 3 हज़ार व्यंग्य चित्र निर्मित किए। द पंच नामक अखबार ने और 1843 में इंग्लैण्ड के संसद भवन की दीवारों पर भी लीच ने कटाक्ष चित्र बनाए। उसी द पंच की तर्ज पर भारत में बरज़ोर जी के संपादन में हिन्दी पंच का जन्म हुआ। भारत में ही नहीं आस्ट्रेलिया में सिडनी पंच और कनाडा में भी इसे अपनाते हुए ग्रिप समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। हालांकि अब भी कुछ विद्वान इस कला को बाहर से लाई और अपनाई नहीं मानते। उनका तर्क है कि भारत में लगभग 2 हज़ार वर्ष पुरानी अजन्ता की गुफाओं में मोटे पेट वाले वामनजी और परिचारिकाओं की चित्रावलियां ही नहीं मध्ययुगीन मंदिरों और ग्रंथों की विनोदपूर्ण आकृतियां इस बात की पुष्टि करती हैं कि भले ही कार्टून की विकसित कला विदेशों से आई हो, परन्तु भारतीय इतिहास में इस कला का विकास बहुत पहले ही हो चुका था।

आज कार्टून कला का जो परिष्कृत रूप हमारे सामने है, वैसा पहले नहीं था। आरंभिक दौर में एक चित्र के नीचे कुछ हास्यपूर्ण अथवा व्यंग्यात्मक संवाद लिखकर ही मनोरंजन किया जाता था। व्यंग्य की अपेक्षा हास्यप्रधान चित्रों का चयन अधिक था। 1873 में भारतेन्दु हरीशचंद्र के समय से ही समाचार पत्रों में हास्य, व्यंग्य पत्रकारिता पाठकों के होटों को अर्द्धचंद्राकार करने को विवश करने लगी थी। हरीशचंद्र मैग्जीन कुछ समय पश्चात हरीशचंद्र चंद्रिका हो गई। उसने चीज़ की बातें, बंदरसभा, ठुमरी जुब़ानी, शुतुमुर्ग परिके, चिडि़या मारका ठोला आदि शीर्षकों के स्तम्भों में हास्य-व्यंग्य चित्र प्रकाशित होने लगे। (राजस्थान पत्रिका थावर-सफरनामा कार्टून का–सचिन बत्रा- 23 मई 1998 मुख पृष्ठ)

भारतेन्दु की इच्छा थी कि विदेशी पंच की भांति हिन्दी में भी विशुद्ध हास्य-व्यंग्य का पत्र प्रकाशित किया जाए और उसकी प्रेरणा से इन स्तम्भों में हास्य-व्यंग्य पाठकों को परोसा गया। कार्टून एवं हास्य रस के सबसे ज्यादा अखबार बनारस से प्रकाशित हुए। बेढब बनारसी इन पत्रों में सबसे चर्चित व्यक्ति थे। तरंग, अस्गर, केला, भूत, बेढब आदि इनके कई पत्रों ने अपने-अपने स्तर पर पाठकों को हास्य और व्यंग्य में डुबोया। बेढब बनारसी और गोविन्द प्रसाद केंजरीवाल के सम्पादकत्व में प्रकाशित करेला समाचार पत्र के मुख पृष्ठ पर बड़ा व्यंग्य चित्र छपता था। इसके बाद खुदा की राह पर हास्य और व्यंग्य मासिक में खैराती खां की झोली से और बनारसी बैठक नियमित कार्टून स्तम्भ थे। 15 जुलाई 1940 को इसके मुख पृष्ठ पर नवाब साहब का चित्र पाठकों में एक अरसे तक चर्चित रहा। इसके अलावा ब्राहम्ण, रसिक पंच, भारतमित्र, मतवाला, नोंक-झोंक आदि कई पत्रों में हास्य व्यंग्य चित्रों को अपने अखबारों में स्थान दिया। जब हमारा देश गुलामी की बेडि़यों में जकड़ा हुआ था, उस समय शंकर पिल्लै ने बम्बई क्रॉनिकल अखबार में अपने कार्टून प्रकाशित करने आरंभ किए। इसके बाद 1932 में हिन्दुस्तान टाइम्स के माध्यम से शंकर ने कार्टून की भारतीय कला को निखरा रूप प्रदान किया और 1948 में अंग्रेजी शंकरर्स वीकली नामक पहली साप्ताहिक कार्टून पत्रिका शुरू हुई। 17 नवंबर 1970 को दिल्ली से हिन्दी शंकर्स वीकली निकाली गई। इसी समय तक कार्टून कला और कलाकार उभरने लगे, जिनमें आर के लक्ष्मण ने देश की पहली कार्टून फिल्म 1946 में जैमिनी स्टूडियो में बनाई। टाइम्स ऑफ इण्डिया में यू सैड इट और हिन्दी नवभारत टाइम्स में आप फरमाते हैं नामक पॉकेट यानी जेबी कार्टून नियमित प्रकाशित होने लगा। उनके कार्टूनों में एक चश्माधारी चेकशर्ट पहने एक बुजुर्ग अलग-अलग संवादों से तालमेल बैठाती भाव भंगिमाएं प्रदर्शित करते हुए आम आदमी की समस्या को पाठकों के सामने ज़ाहिर करता है। उनके इस स्थाई किरदार की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि कई बार वह मूक बना रहता है और आस पास की घटना पर अपने चेहरे की भाव भंगिमाओं से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।

लक्ष्मण के अलावा सेमुअल यानी सामु का बाबूजी पॉकेट कार्टून भी भारतीय कार्टून कला का यादगार इतिहास है। इन उच्च श्रेणी के सभी कलाकारों की अपनी कलम की शैली भी भिन्न-भिन्न रही, जैसे आबिद सुरती, धर्मयुग में डब्बूजी नामक चित्रमाला में फ्रेंच व्यग्य चित्रकारों की भांति पैना व्यंग्य करते थे। मारियो मीरांडा का व्यंग्य मीठा था, जो चुभकर भी कड़वाहट नहीं छोड़ता था। ऐसे ही हिन्दुस्तान में रविंद्र के मुसीबत है नामक कार्टून स्तम्भ ने उन्हें कई बार मुसीबत में डाला, कारण यह रहा कि उनका व्यंग्य बहुत तीखा और प्रहारात्मक था। अबु अब्राहम भी भारत के एक वरिष्ठ कार्टूनिस्टों में से एक रहे हैं। द बुक रिव्यु नामक उनका पहला कार्टून संग्रह प्रकाशित हुआ। ऐसे ही डालचंद कदम, शेखर गुरेरा का चलते-चलते भी मील का पत्थर साबित हुआ। राष्ट्रीय सहारा में आखिरकार नाम से पॉकेट कार्टून देने वाले गोविन्द का नाम भी उल्लेखनीय है क्योंकि वह बिना संवाद के कार्टून देने वाले गिनेचुने कार्टूनिस्टों में आते हैं। उनके कार्टून ही अपनी बात कहते हैं। नवभारत टाइम्स में काक की काक दृष्टि ने भी काफी ख्याति अर्जित की। काक ने राजस्थान पत्रिका में भी नियमित स्तम्भों में अपनी कला का जौहर दिखाया। मनोहर सप्रे, उन्नी का बिज़नेस ऐज़ युज्युअल, सुधीर तैलंग का हेयर एंड नाउ और राजस्थान पत्रिका में अभव वाजपेया यानी त्रिशुकु का झरोखा भी कार्टून कला में उच्च स्थान हासिल किया है। देखा जाए तो हर आम आदमी खबर पढ़ता है लेकिन खबर के पीछे झांकने का काम कार्टूनिस्ट ही कर पाता है। कार्टून एक हास्य या मनोरंजन ही नहीं, एक गंभीर चिंतन भी है। कार्टून वास्तव में वह शक्ति है जो गिनी चुनी रेखाओं की कला और संवाद के साथ एक समाचार से कई गुना अधिक प्रहारात्मक है और आज़ाद भी। (राजस्थान पत्रिका थावर-सफरनामा कार्टून का–सचिन बत्रा- 23 मई 1998 मुख पृष्ठ)

cartoon2जेबी यानी पॉकेट कार्टून
समाचार पत्रों में सबसे नीचे की ओर पहले कॉलम में एक छोटा कार्टून जेबी यानी पॉकेट कार्टून कहलाता है। इसे पॉकेट इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि आपकी शर्ट की जेब की ही तरह यह एक निर्धारित स्थान पर तयशुदा आकार में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जेबी कार्टून की परंपरा इसलिए शुरू हुई कि समाचार पत्र के मुख पृष्ठ पर फोटो, समाचार, विज्ञापन आदि सभी गंभीर सामग्री होती है। ऐसे में पाठकों के चेहरे पर हर सुबह एक मुस्कुराहट पैदा करते हुए समाचार पत्र दिन की शुरूआत प्रसन्नता के भाव से करना चाहते हैं। कई समाचार पत्रों ने इस परंपरा को बरसो तक निभाया लेकिन आज के दौर में कई समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ से पॉकेट कार्टून एक लंबे समय तक गायब रहने लगे हैं। कुछ वर्ष पहले तक तो किसी राष्ट्रीय शोक के मौके पर ही प्रथम पृष्ठ पर कार्टून न छापने की परंपरा थी। लेकिन अन्य दिनों में तो समाचार पत्र पहले पेज पर कार्टून न होने की कल्पना ही नहीं कर सकते थे।

कार्टून का संवाद क्षेत्र यानी डायलाग बॉक्स
सभी कार्टूनों में संवाद की प्रस्तुति ही उसकी सफलता और भेदने की शक्ति कही जाती है। हालांकि ऐसा कोई तय नियम नहीं है कि हर कार्टून में संवाद होना ही चाहिए। कई बार तो कार्टूनिस्ट अपनी रेखाओं के दम पर ही इतना समझा देता है कि शब्दों की आवश्यकता ही नहीं होती। यह कार्टूनिस्ट का कौशल होता है लेकिन अधिकतर अपने विषय को समझाने के लिए संवाद जरूरी हो जाता है। आम तौर पर कार्टून के प्रकाशन क्षेत्र में सबसे ऊपर आसमानी क्षेत्र में ही डायलॉग बॉक्स में प्रस्तुत किया जाता है। नियम यह भी है कि इस संवाद क्षेत्र में पहला बॉक्स संवाद के पहले क्रम को माना जाता है और उसके करीब दिए गए दूसरे बॉक्स को प्रतिक्रिया बॉक्स कहते हैं। हालांकि कई कार्टूनिस्ट इस नियम को मानने के बजाए यह तर्क रखते हैं कि एक बॉक्स ऊपर रखकर उसे प्रथम संवाद के बतौर पेश किया जा सकता है वहीं उसके नीचे एक छोटे बॉक्स में संवाद का दूसरा क्रम तय हो जाता है।

एक कार्टून को बनाने के लिए और कार्टूनिस्ट को अपनी छवि निर्माण के लिए विषय चयन पर बहुत गंभीर होना चाहिए। हमारे देश की प्रसिद्ध और दिवंगत कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। आर के लक्ष्मण के विषय वही होते थे जो आम आदमी की जि़न्दगी से सरोकार रखते हैं। उनके कई कार्टून आज हो रही घटनाओं में भी प्रासंगिक हैं और जनता की समस्याओं को साथ लेकर चलते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि एक कार्टूनिस्ट को ऐसे विषयों का चुनाव करना चाहिए जो जनता को अपने महसूस हों यानी उनमें जनमत होना चाहिए

कुल मिलाकर संवाद का क्षेत्र तो परिभाषित है लेकिन असल चुनौती संवाद का सृजन करने की है। इसके लिए भले ही कोई मान्य नियम न हों लेकिन एक कार्टून की सफलता उसके संक्षिप्त संवाद और चुटीलेपन से होती है यही नहीं कार्टूनिस्ट कई प्रकार की मिश्रित शब्दावली को भी ईजाद करता है जो पाठकों को हास्यविनोद से लोटपोट कर देता है। उदाहरण के लिए एक कार्टून में चुनावी बहुमत को बहु यानी वधु का बयान बताया गया, इसी प्रकार गृह मंत्री को ग्रह यानी उपग्रह मंत्री या एलियन की तरह बताया गया, घर वापसी का मखौल भी उड़ाते हुए कार्टून बनाए गए जिसमें विदेश यात्रा से लौटने वालों को घर वापसी के बतौर पेश किया गया। यानी लिखने के अंदाज़ से पाठकों को तुरन्त प्रभावित करते हुए समझ को उसी क्षण साझा करने की क्षमता होनी चाहिए। जैसे एक बार सार्वजनिक निर्माण विभाग के एक मंत्री का पेट खराब हो गया तो कार्टूनिस्ट ने एक डॉक्टर का संवाद दिखाया, जिसमें डॉक्टर ने मंत्री से कहा कि दवा की जरूरत नहीं है अपनी बनाई किसी भी सड़क पर 10 मिनट साइकिल चलाने से पेट ठीक हो जाएगा। इस संवाद के ज़रिए मंत्रालय की लापरवाह कार्यशैली को उजागर किया गया। कुल मिलाकर कहा जाए तो संवाद कार्टून के असर का मापदण्ड होते हैं और यह बहुत जरूरी है कि वह संवाद पाठकों को अपने चुटीलेपन से प्रभावित करे।

पात्र यानी कैरेक्टर का चयन और पृष्ठभूमि यानी बैकग्राऊंडर
कार्टून में पात्र का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है साथ ही उसकी बनावट, वेशभूषा और हावभाव भी प्रभाव पैदा करने में अपना सक्रिय योगदान देते हैं। कई बार संवाद करने के लिए मानवीय किरदार बनाए जाते हैं तो कभी-कभी जानवर और जीव जन्तुओं ही नहीं निर्जीव वस्तुओं को भी बोलते हुए दिखाया जाता है। उदाहरण के लिए एक कार्टून में एफसीआइ के गोदाम में बीपीएल के लिए रखे गए गेहूं के सड़ने की खबर पर चुटकी लेने के लिए कार्टूनिस्ट ने दो चूहों को संवाद करते हुए दिखाया। इसमें पहला चूहा कहता कि है आज तो पार्टी बनती है इसपर दूसरा चूहा जवाब देता है कि रहने दे, यह सड़ा हुआ अनाज कौन खाएगा, इसे तो बीपीएल ही पचाएगा। इस प्रकार कार्टून में पात्रों का चयन बहुत काम आता है यही नहीं पात्र के अलावा पृष्ठभूमि यानी बैकग्राऊंड की उपयोगिता को भी नकारा नहीं जा सकता। जैसे उपरोक्त कार्टून में गोदाम का दृश्य बनाया गया और सडे़ अनाज के समाचार का शीर्षक भी एक कोने में दिखाया गया। इस प्रकार कार्टून अपनी संपूर्ण विषय-वस्तु के साथ दिया जाता है। यह वैसा ही है जैसे टीवी समाचार में आप किसी रिपोर्टर को देखते हैं और वह जिस समाचार को कवर कर रहा है उसी जगह की पहचान करने वाली ईमारत, ऑफिस की नामपट्टिका या घटनास्थल को ठीक अपने पीछे रखते हुए फ्रेम तय करता है।

कार्टून में भी ऐसे ही बैकग्राऊंडर दिखाकर समझाया जाता है। जैसे एक कार्टून में 10 जनपद को बनाते हुए कार्टूनिस्ट ने ज पर क्रॉस लगाते हुए पाठक को समझाया 10 नपद, जिसका अर्थ निकलेगा यहां पद न पड़े। कई बार तो कार्टूनिस्ट दो पात्रों का संवाद दिखाते हुए उसके बगल में ही उससे जुड़े समाचार की कतरन को दिखाता है जिसमें छपा होता है महंगाई आसमान पर, पैट्रोल के दाम फिर बढ़े, जेल में खेल, मंत्री की फर्जी डिग्री। एक कार्टून में चूहे को किसी नेता की डिग्री कुतरते हुए दिखाया गया और पृष्ठभूमि में समाचार की कतरन थी कि मंत्री की डिग्री फर्जी निकली। इसमें नेता से उसकी पत्नी संवाद करते हुए कहती है कि अरे इस चूहे को रोको। इसपर नेता जवाब देता है कि खाने दे, वैसे भी वो डिग्री फर्जी है। इस प्रकार पात्र का चयन और पृष्ठभूमि सहित प्रस्तुति एक कार्टून के व्यंग्य और कटाक्ष में जान डाल देती है।

विषय का चयन यानी कंटेंट
एक कार्टून को बनाने के लिए और कार्टूनिस्ट को अपनी छवि निर्माण के लिए विषय चयन पर बहुत गंभीर होना चाहिए। हमारे देश की प्रसिद्ध और दिवंगत कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। आर के लक्ष्मण के विषय वही होते थे जो आम आदमी की जि़न्दगी से सरोकार रखते हैं। उनके कई कार्टून आज हो रही घटनाओं में भी प्रासंगिक हैं और जनता की समस्याओं को साथ लेकर चलते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि एक कार्टूनिस्ट को ऐसे विषयों का चुनाव करना चाहिए जो जनता को अपने महसूस हों यानी उनमें जनमत होना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि हमेशा ही ऐसा हो क्योंकि कई बार कार्टून बनाने के लिए राजनीतिक विषय, अपराध, महंगाई, सरकारी फरमान, सामाजिक घटनाक्रम, क्रिकेट और किसी बयान को ही उपयुक्त माना जाता है। इस सबके बावजूद लोगों की जि़न्दगी के आसपास के विषयों को लेकर उसमें पंच के पेच बुने जाते हैं। उदाहरण के लिए एक बार बिजली महंगी होने पर एक कार्टून में बिजली पानी और मोबाईल के बिल को चुकाकर दहेज अदा करने की अनूठी हास्यास्पद मांग को दिखाया गया। यानी कार्टून में विषय का चयन वैसा ही है जैसे समाचार पत्र में पहली खबर यानी लीड का आंकलन करना।

पात्र का निर्माण यानी कैरेक्टर बिल्डिंग
एक कार्टूनिस्ट के लिए पात्र का निर्माण करना भी एक बड़ी चुनौती है। जैसे आर के लक्ष्मण, अबु अब्राहम, काक, शेखर गुरेरा, गोविन्द, राजेन्द्र, उन्नी, सुधीर गोस्वामी, इरफान, नीलाभ, मंजुल, सुरेंद्र, अभिषेक आदि सभी कार्टूनिस्टों के कार्टून बनाने की अपनी शैली भी है और उनके बनाए हुए पात्र अपनी अलग ही पहचान कायम किए हुए हैं। कहा जाए तो आपकी रेखाओं के पात्र पाठकों से एक रिश्ता बनाने में कामयाब होने चाहिएं। ऐसे में कैरेक्टर चूंकि संवाद करता है इसीलिए उसमें भी मनोविनोद करने के उद्देश्य से तैयार किया जाना चाहिए। क्योंकि कई बार सिर्फ चुटीला संवाद ही पर्याप्त नहीं होता उसे कहने वाला पात्र भी मनोरंजन का माध्यम होना चाहिए। जैसे कई बार नेताओं के कार्टून में लालू के सिर और कान के बाल, मनमोहन सिंह की पगड़ी, रामविलास पासवान की दाड़ी, नरेंद्र मोदी के होट और दाड़ी, लालकृष्ण आडवाणी की मूंछ, शरद पंवार के श्याम वर्ण फूले हुए गाल, अन्ना हज़ारे की टोपी और नाक, अरविंद केजरीवाल का मफलर और अमित शाह की दाड़ी को उनके कार्टून कैरेक्टर निर्माण में महत्व दिया जाता है। यह सभी जनता के जाने पहचाने चेहरे हैं लेकिन अक्सर कार्टूनिस्ट आम जि़न्दगी के पहलुओं पर संवाद करने के लिए जनता के बीच से ही ऐसे पात्र का निर्माण करता है जो अपनी पहचान खुद बनाते हैं। जैसे पुलिस वाले का किरदार है तो उसकी तोंद तो होगी ही, नेता चुना है तो टोपी और कुर्ता रखना होगा, अपराधी दिखाने के लिए धारीदार टीशर्ट और गले में रूमाल व चेहरे पर दाड़ी होगी, कहा भी गया है कि एक कार्टूनिस्ट के पात्र उसके संवाद का प्रभाव पैदा करने वाले वाहक होते हैं इसीलिए पात्र के चुनाव और निर्माण के लिए खोजपरक होना जरूरी है।

कार्टूनिस्ट की पहचान उसके हस्ताक्षर यानी सिग्नेचर
अन्ततः एक कार्टूनिस्ट की कला की परख उसके हस्ताक्षर से भी होती है। क्योंकि आपके सिग्नेचर में अगर कला हो तो वह भी आपकी कलात्मक पहचान को स्थापित करने में मदद करती है। अक्सर देखा गया है कि कई कार्टूनिस्ट अपने हस्ताक्षर में ऐसी कला दिखाते हैं कि उनका असली नाम ही समझ नहीं आता। माना जाता है कि जैसे एक समाचार इस प्रकार लिखा जाता है कि कम पढ़े लिखे को भी समझ आ जाए, वैसे ही एक कार्टून में लिखा संवाद ही नहीं कार्टूनिस्ट के हस्ताक्षर भी कलात्मक और सबकी समझ में आने वाले होने चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो उस कार्टूनिस्ट का नाम लोगों के दिमाग में नहीं होगा ऐसे में आप अनचाहे ही उनके बीच अपरिचित बने रहेंगे। कहते हैं कि नाम में क्या रखा है लेकिन आज बाज़ारवाद की इस दुनियां में नाम में बहुत कुछ रखा है। गौरतलब यह है कि एक कार्टूनिस्ट अपना काम भी कर रहा है लेकिन सिग्नेचर में नाम साफ न होने की वजह से उसकी पहचान ही लापता है, ऐसा नहीं होना चाहिए।

बहरहाल, आज हमारे देश में कार्टूनिस्ट देश में सभी विषयों पर अपने बुद्धिकौशल का बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन यह बताना जरूरी है कि यह आसान काम नहीं है क्योंकि कार्टून तो कोई भी बना सकता है लेकिन उसमें पत्रकारिता वाला पुट यानी जर्नलिस्टिक अप्रोच लगाते हुए संवाद गढ़ना हंसी खेल नहीं है। सच तो यह है कि आज के दौर में भी जिस बात को कहने के लिए समाचार में हज़ार बार सोचना पड़ता हो या समाचार में निजी मत व्यक्त करने पर सैद्धांतिक प्रतिबंध क्यों न हो लेकिन कार्टून के ज़रिए एक कार्टूनिस्ट तो बस बेबाकी से कह डालता है। असीम त्रिवेदी वाला घटनाक्रम इस मामले में एक विवाद ज़रूर रहा है लेकिन भयरहित होने के बावजूद एक कार्टूनिस्ट को देश के कानून, संविधान, सेना और किसी व्यक्ति के निजी जीवन पर आक्षेप करने से बचना चाहिए या खास सावधानी रखनी चाहिए। क्योंकि जहां गलती होगी वहां कोई न कोई समस्या तो होगी ही जैसे मोदी और टोपी वाले कार्टून में कार्टूनिस्ट पर कानूनी कार्रवाई का आधार तय हो गया। इसीलिए एक कार्टूनिस्ट को सभी मान्य कानून, संविधान और अदालत ही नहीं दो समुदायों और निजी व्यक्तियों पर कूची चलाने से पहले उसके लीगल काॅन्सीक्वेंसेज यानी कानूनी परिणामों का आंकलन जरूर कर लेना चाहिए।

डॉ. सचिन बत्रा शारदा विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उन्होंने बत्रा जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में एमए और किया हैं। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में पीएच-डी की है, साथ ही फ्रेंच में डिप्लोमा भी प्राप्त किया है। उन्होंने आरडब्लूजेयू और इंटरनेश्नल इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म, ब्रेडनबर्ग, बर्लिन के विशेषज्ञ से पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया है। वे दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और दैनिक नवज्योति जैसे समाचार पत्रों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं और उन्होंने राजस्थान पत्रिका की अनुसंधान व खोजी पत्रिका नैनो में भी अपनी सेवाएं दी हैं। इसके अलावा वे सहारा समय के जोधपुर केंद्र में ब्यूरो इनचार्ज भी रहे हैं। इस दौरान उनकी कई खोजपूर्ण खबरें प्रकाशित और प्रसारित हुई जिनमें सलमान खान का हिरण शिकार मामला भी शामिल है। उन्होंने एक तांत्रिका का स्टिंग ऑपरेशन भी किया था। डॉ. सचिन ने एक किताब और कई शोध पत्र लिखे हैं, इसके अलावा वे अमेरिका की प्रोफेश्नल सोसाइटी ऑफ़ ड्रोन जर्नलिस्टस के सदस्य हैं। सचिन गृह मंत्रालय के नेशलन इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिज़ास्टर मैनेजमेंट में पब्लिक इंफार्मेशन ऑफिसर्स के प्रशिक्षण कार्यक्रम से संबद्ध हैं। उन्होंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक इमीडिया में 14 वर्ष काम किया और पिछले 5 वर्षो से मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
संपर्क: 9540166933 ईमेल: drsachin.journalist@gmail.com

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