Home / पत्रकारिता / नया पत्रकार, नई पत्रकारिता और नई हो गयी है पत्रकारिता शिक्षा : सब बदल गया

नया पत्रकार, नई पत्रकारिता और नई हो गयी है पत्रकारिता शिक्षा : सब बदल गया

संजय कुमार।

इसी देश में कभी अखबार का मकसद समाज-देश के प्रति समर्पण का था जो आज बाजार का हिस्सा बन गया है। जो खबरें समाज- देश- व्यवस्था-सत्ता को जगाने के लिए लिखी जाती थीं, जिन खबरों का सामाजिक सरोकार था, आज वही खबरें बेची जा रही हैं। सामाजिक सरोकार रखने वाले लोग जुड़ने वाले पत्रकार मिशन के तहत जुड़ते थे और आज व्यवसाय के तौर पर। सम्पादक खबरों का चयन करते थे आज वे प्रबंधक की भूमिका है। सम्पादक नाम की संस्था लगभग बेमानी हो चुकी है

लोकतंत्र के चौथे खंभे पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार और मीडिया हाउस की तस्वीर बदल चुकी है। बदलते दौर में भारतीय मीडिया पूरी तरह बदल चुका है। इसे बदला है कार्पोरेट जगत और आधुनिक संचार तंत्र ने। एक वक्त था जब पत्रकारिता में आने से लोग कतराते थे। लेकिन, आज हर आम-खास इसके ग्लैमर से खींचा लाल कॉपोरेट वाले मीडिया की तरफ चला आ रहा है। पहले पत्रकार खुद से बनते थे। उनके पास जमीनी अनुभव होता था, आज पत्रकारिता संस्थानों द्वारा पत्रकार गढ़े जा रहे हैं। ऐसे पत्रकार जो बंद कमरों से निकलते हैं और खास बंदों की आवाज बनकर रह जाते हैं। इनके पास जमीनी अनुभव तो होता ही नहीं है और इन्हें षिक्षित करने वाले भी किताबी होते हैं। यही कारण है कि कभी खादी का कुरता, कंधे पर झोला लटकाये पत्रकारों की जगह आज कारपोरेट लुक पत्रकारों ने ले ली है। पैदल व साइकिल से चलने वाले पत्रकार कार से चलने लगे हैं। अखबारों के दफ्तरों में पंखे की जगह एसी और टूटे-फूटे टेबुल कुर्सी की जगह आधुनिक फर्नीचरों ने ले लिया है। हजार रुपये प्रति माह मानदेय में काम करने वाले पत्रकारों का वेतन लाखों में पहुंच चुका है। इस बदलाव के साथ पत्रकारिता नेपथ्य में चली गयी है और कॉरपोरेट मीडिया का विस्तार हो गया है। वर्तमान मीडिया शिक्षा व्यवस्था सुनियोजित ढंग से पत्रकारों को आवरण ओढ़ा कर पीआर में बदल रहा है।

इसी देश में कभी अखबार का मकसद समाज-देश के प्रति समर्पण का था जो आज बाजार का हिस्सा बन गया है। जो खबरें समाज- देश- व्यवस्था-सत्ता को जगाने के लिए लिखी जाती थीं। जिन खबरों का सामाजिक सरोकार था, आज वही खबरें बेची जा रही हैं। सामाजिक सरोकार रखने वाले लोग जुड़ने वाले पत्रकार मिशन के तहत जुड़ते थे और आज व्यवसाय के तौर पर। सम्पादक खबरों का चयन करते थे आज वे प्रबंधक की भूमिका है, मीडिया हाउस का मालिक खबरें तय करता है। सम्पादक नाम की संस्था लगभग बेमानी हो चुकी है। एक समय था जब सम्पादकों की लम्बी सूची थी, आज अंतिम सम्पादक के रूप में बार बार और हर बार प्रभाष जोशी के नाम का उल्लेख मिलता है। जैसे कभी भारत सोने की चिड़िया कहलाता था, वैसे ही पत्रकारिता में सम्पादक भी कभी होता था। दरअसल पत्रकारिता के गुम हो जाने के साथ ही सम्पादक की जरूरत भी खत्म हो गई है और मीडिया को सम्पादक नहीं, मैनेजर चाहिए। मैनेजर के साथ मीडिया शिक्षा पत्रकारों के स्थान पर पीआरओ पैदा कर रही है जो खबरों के मर्म को तो समझते नहीं हैं लेकिन संस्थान के हितों को बखूबी जानते हैं और वह इसी तरह का व्यवहार भी करते हैं।

सेटेलाइट चैनलों ने तो मीडिया के मायने को ही बदल डाला है। इसके चकाचैंध ने युवा वर्ग को खासा प्रभावित किया है। मीडिया के व्यवसाय में कार्पोरेट सेक्टर के प्रवेश कर जाने से इसकी दुनिया बदल गयी है। सेटेलाइट चैनलों के दफ्तर तीन व पांच सितारा होटलों की तरह दिखते हैं। वहीं कार्पोरेट जगत ने मुद्रित माध्यम को भी बदला है। अखबार के दफ्तर आधुनिक व सुसज्जित हो गये हैं। जाहिर है जनता के लिए मीडिया, आज कॉरपोरेट के लिए हो चुका है। यानी जन पत्रकारिता, कार्पोरेट मीडिया में तब्दील हो चुका है। कार्पोरेट मीडिया के पैरोकार इस बात के लिए तर्क और कुतर्क से लबरेज हैं। वे इसे शुभ मानते हैं। उनका तर्क होता है कि जब समाज का दूसरा वर्ग सुविधाभोगी हो गया है तो पत्रकार क्यों नहीं? इस तर्क से आप बाबस्ता हो सकते हैं क्योंकि यह आपके हिस्से की दलील दिखती है लेकिन इसे मानने का अर्थ ही पत्रकारिता को गहरे अंधकार में धकेल देना है और यह काम बखूबी मीडिया शिक्षा कर रही है।

पत्रकारिता का अर्थ है स्वयं को समाज के लिए समर्पित कर देना, बिना लोभ-लालच के। एक ऐसी दुनिया के निर्माण की इच्छा के साथ जहां समानता हो। इसी मकसद के साथ पत्रकारिता ने स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को बेदखल कर दिया और स्थिति उलट दिख रही है तो कारण है पत्रकारिता का गुम होते जाना। लेकिन इन सब के बीच कुछ छूटता चला जा रहा है तो वह है एथिक्स, पत्रकारिता के सरोकारा आदि….आदि।

सवाल इसके आकर्षण का है। टी.वी. स्क्रीन पर आने का है और जाहिर है मीडिया के इस कॉरपोरेट संस्कृति आज के युवाओं को अपनी को खींच रहा है। पत्रकारिता संस्थानों से निकलने वाले छात्र छूटते ही कहते हैं उनका लक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जाना ही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ताकत, प्रभाव एवं आकर्षण के मोहपाष में वे बंधे होते हैं। इन विद्यार्थियों के भीतर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आर्कषण को बल देने में पत्रकारिता के संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पत्रकार बनाने को लेकर संस्थानें खुली हैं। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रयास हुए। इसे और व्यापक बनाने के लिए इसमें सैद्धांतिक और शैक्षिक पहलुओं को शामिल किया गया।

हालांकि, वैश्विक और बाजारवाद ने जनसंचार शिक्षा को जन्म दिया है। इसकी व्यापकता ने व्यवसाय को जन्मा है। बाजार व व्यवसाय के मायने बदल दिये हैं। मीडिया जिससे जुड़ने में उच्च वर्ग कतराता था आज इसे व्यवसाय के रूप में चुन रहा है। अभिभावक भी रूचि दिखा रहे हैं। अपने बच्चे को पत्रकार बनाने के लिए अच्छे और महंगे संस्थानों में पढाई के लिए भेज रहे हैं। वैसे, सरकारी तौर पर भारतीय जनसंचार संस्थान इकलौती संस्था रही है जहां जनसंचार की पढ़ाई पढ़कर छात्र मीडियाकर्मी यानी संचारकर्मी बनते आ रहे है। लेकिन अब हालात बदल चुका है। मीडिया के प्रति बढ़ते आकर्षण ने देषभर में जनसंचार की पढ़ाई को सरकारी व गैर-सरकारी स्तर पर बढ़ावा दिया। विश्वविद्यालयों में जन संचार की पढ़ाई होने लगी। आज हकीकत यह है कि देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह जन संचार शिक्षा संस्थानें खुली हुई है, और जहां नहीं है वहां खुल रही हैं। इन संस्थानों में पांच हजार से लेकर लाखों रुपए की फीस छात्रों से वसूली जाती है। हजारों की तादाद में प्रत्येक वर्ष संस्थानों से जन संचार की शिक्षा प्राप्त कर छात्र पत्रकार बन कर मीडिया के ग्लैमरस दुनिया से जुड़ने की कोशिश करते हैं।

जनसंचार संस्थानों से पढ़ाई पूरी कर पत्रकारिता की डिग्री/डिप्लोमा लेकर निकलने वालों की कोशिश तुरंत मीडिया हाउस से जुड़ने की होती है। ज्यादातर सेटेलाइट चैनल से जुड़ाना चाहते हैं। बहुत कम ही मिलेंगे जो प्रिंट की दुनिया से जुड़ना चाहते हो। प्लेसमेंट का सवाल सबसे बड़ा होता है। अच्छे संस्थान जिनका नाम है उनके छात्रों का चयन तो हो जाता है लेकिन छोटे शहरों के छात्रों को संघर्ष करना पड़ता है। यहां फर्क भी है। पहले पत्रकारिता में संघर्ष के बाद जगह मिलती थी लेकिन आज ऐसा नहीं है। मीडिया में जगह पाने के तरीके बदल गये हैं। जुगाड़ सामने आता है। खासकर सेटेलाइट चैनलों में। कहा जाता है रेफरेंस बिना जॉब कहां? वहीं दूसरी ओर जनसंचार संस्थान से जो पत्रकार निकल रहे हैं । उनमें पत्रकारिता के सैद्धांतिक ज्ञान तो है लेकिन व्यवहारिता का अभाव है। भाषा की अषुद्धियों के साथ साथ सामान्य ज्ञान का लगभग शून्य के स्तर पर है।

सबसे बड़ी बात है कि वे सीधे बड़े पद पर आसीन होना चाहते हैं। नीचे से शुरूआत नहीं करना चाहते। यानी खबरों की समझ पैदा नहीं करना चाहते हैं। खबर को मजबूती देने की कोशिश नहीं करते। किताबें पढ़कर किताबी ज्ञान के साथ वे इलेक्ट्रानिक मीडिया में आ जाते हैं जहां मुद्रित माध्यम की तरह चुनौती कम है। दृश्यों के साथ कम शब्दों में बोलकर लोगों को रिझाने की कोशिश में वे सफल हो जाते हैं। मीडिया शिक्षा में उन्हें इस जादूगरी में माहिर बना दिया जाता है। यही पत्रकार, जब प्रिंट की दुनिया में आते हैं तो पसीना छूट जाता है। यहां जादूगरी नहीं चलती है बल्कि चुनिंदा शब्दों के माध्यम से पाठकों को मतंव्य समझाना होता है।

इसमें दो मत नहीं कि जन संचार शिक्षा को लेकर प्रमुख शहरों से होते हुए गली-कुचे में खुले पत्रकारिता संस्थानों के समक्ष कई तरह की चुनौतियां हैं। जहां एक ओर माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में व्यापक बदलाव हुआ है, हजारों की तादाद में मीडिया के ग्लैमर और चकाचैंध से प्रभावित होकर हर वर्ग के छात्र इससे जुड़ रहे हैं। मीडिया को कैरियर बनाने की आपाधापी, छात्र-छात्राओं में देखी जा रही है। संस्थानों ने व्यापकता की सीमा को लांघते हुए संचार के शिक्षा संस्थानों को अति आधुनिक बना डाला है, तो वहीं यूजीसी और अन्य पत्रकारिता संस्थानों से मान्यता प्राप्त कर, चल रहे छोटे-मोटे शिक्षण संस्थानों में पांच हजार के शुल्क पर जनसंचार की शिक्षा छात्र प्राप्त कर रहे हैं। इनके बीच एक संकट है कि आज भले ही भारी तादाद में मीडिया की ओर छात्रों का रुझान बढ़ा है, ज्यादातर मीडिया संस्थानों में मीडिया की पढ़ाई पढ़ने और पढ़ाने वाले अपने प्रोफेशन से न्याय नहीं कर पा रहे हैं। एक हाई-फाई मीडिया संस्थान के विभागाध्यक्ष कहते हैं कि मीडिया की पढ़ाई में प्रत्येक साल छात्रों की संख्या पचास से कम नहीं होती, लेकिन जो छात्र आते हैं उनमें कुछ मीडिया के ग्लैमर के तहत आते हैं तो कुछ टाइम पास के लिए।

दूसरी ओर पत्रकारिता संस्थान की व्यापकता और प्रत्येक वर्ष पढ़ाई पूरी कर निकलने वाले छात्रों के समक्ष प्लेसमेंट की भी समस्या रहती है। बड़े संस्थान तो सब्जबाग दिखा कर छात्रों को दाखिले के लिए प्रलोभित करते हैं, वहीं उनके प्लेसमेंट को लेकर उनमें सजगता नहीं दिखती है। मीडिया उद्योग बन चुका है। लेकिन इसमें जगह पाने की स्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगा है। मीडिया संस्थान भी इससे अछूते नहीं हैं। मीडिया हाउसों से पत्रकारों के निकालने या हाउस पर तालाबंदी की खबरें रोजमर्रा की घटना बन चुकी है। वहीं, नये मीडिया हाउसों के आने की भी खबरें आती है। मीडिया हाउस के बंद होने और पत्रकारों के निकाले जाने की खबर किसी न किसी रूप में तो मिल जाती है। लेकिन मीडिया में एक बात है जो सामने नहीं आती, वह है नियुक्ति की। पत्रकारिता संस्थानों से पढ़ाई पूरी कर निकलने वाले अक्सर सवाल कर बैठते हैं, कैसे मीडिया हाउस में प्रवेश मिले?

मीडिया शिक्षा की शुरूआत को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है लेकिन जितना समय गुजरा है, वह भयावह है। मीडिया शिक्षा, पारम्परिक शिक्षा नहीं है अपितु यह एक प्रोफेशनल एजुकेशन है किन्तु इसके लिए कोई सुनियोजित व्यवस्था नहीं की गई है। विद्यार्थियों के चयन के लिए कुछ मापदंड तय किए गए हैं किन्तु चयन के बाद शिक्षा व्यवस्था पर अनेक सवाल उत्तर पाने को आतुर हैं। जैसे कि मीडिया शिक्षा में किताबों का टोटा है। खासतौर पर हिन्दी माध्यम से शिक्षा पाने के इच्छुक विद्यार्थियों के पास किताबें नहीं है। शोध एवं संदर्भ की दृष्टि से भी बड़ा खालीपन नजर आता है। लगभग प्रतिदिन छह घंटे की शिक्षा के बाद इन विद्यार्थियों के पास व्यवहारिक ज्ञान के लिए समय का अभाव होता है और इस तरफ शिक्षक भी बहुत रूचिवान नहीं दिखते हैं। हालात तो यह है कि मीडिया शिक्षा के लिए आए विद्यार्थी में अधिकांश न तो नियमित रूप् से पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन करते हैं और न ही विभिन्न चैनलों के कार्यक्रमों का अवलोकन करते हैं।

मीडिया संस्थानों के विभागों में ही टेलीविजन सेट्स एवं समाचार पत्रों की व्यवस्था होना चाहिए ताकि सुन, देख और पढ़ कर डिबेट किया जा सके और एक क्षमतावान पत्रकार तैयार किया जा सके। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि विद्यार्थी यह सब करेंगे तो क्लास रूम में कब जाएंगे, इम्तहान की तैयारी कैसे करेंगे? दरअसल, यह एक तरह का बहाना है क्योंकि शिक्षक स्वयं कमजोर होते हैं और उनके पास भी पत्रकारिता की आंख जिसे आप आईक्यू भी कह सकते हैं, कमी होती है तो वे भी उससे बचते हैं। मेडिकल का स्टूडेंट पढ़ाई के साथ-साथ अस्पतालों में मरीजों से रोज क्यों मिलने जाते हैं, उनकी बीमारियों के बारे में और उन्हें दी जा रही दवाओं के बारे में क्यों समझते हैं और उन्हें समझाया जाता है? इसलिए ना कि वे एक काबिल डाक्टर बने और इसके लिए व्यवहारिक शिक्षा की जरूरत होती है। मीडिया शिक्षा एक बेहतर पहल है किन्तु इसके सुपरिणाम तभी मिलेंगे जब हम अपनी दृष्टि का विकास करेंगे और मीडिया के स्थान पर पत्रकारिता शिक्षा के केनवास को विस्तार देंगे अन्यथा कुछ वर्षों बाद समाज की मीडिया शिक्षा से विरक्ति के भाव से इंकार करना मुश्किल होगा।

संजय कुमार दूरदर्शन केन्द्र, पटना में समाचार सम्पादक हैं.
संपर्क: sanju3feb@gmail.com, मो-9934293148

Check Also

cameras

पपराज़ी पत्रकारिता की सीमाएं

गोविन्‍द सिंह। ‘पपराज़ी’ (फ्रेंच में इसे पापारात्सो उच्चारित किया जाता है) यह एक ऐसा स्वतंत्र ...

One comment

  1. संजय कुमार जी की चिन्ता लाजि़मी है, गौरतलब। क्या है, इसे सब जानते हैं। ऐसी प्रवृत्ति लगातार हावी और ख़तरनाक क्यों होती जा रही है, इस बारे में सचमुच चिन्तन-कर्म पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। मीडिया शिक्षा पर प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं। अनगिनत। लेकिन उत्तर ढूंढने की नियत भी, तो चाहिए। यह नहीं है। मीडिया के आभिजात्य प्रोफेसरानों ने कुते के गले में बंधने वाले बेल्ट को अपने गले से लटका लिया है। नेम-प्लेट वही है, इसलिए पशुचरी वृत्तिया भी आरोपित-प्रक्षेपित होती चली गई हैं। मीडिया के अध्यापक अध्ययनशील नहीं रहे है, हैं भी तो खुद में अघाए हुए। ऐसे लोग आत्ममुग्ध अथवा आत्मश्लाघा से इस कदर मोहग्रस्त हैं कि वे कुछ लड़के-लड़कियों से खुद को घिरा देखकर ही इतने अभिभूत हो लेते हैं कि मीडिया के दायित्व, भूमिका, प्रासंगिकता चाय-काॅफी में बदल जाते हैं। यह पटना में रहकर संजय कुमार जी जितना समझ सकते हैं; बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का मीडिया शोधार्थी होकर मैं भी उतनी ही शिद्दत एवं शाइस्तगी के साथ महसूस कर सकता हूं। यह और बात है, अर्थग्रहण एवं चिन्तन-प्रतिमा एकसमान नहीं होंगे। मैं हमेशा उन्नीस बैठूंगा; लेकिन हम ज़मीन से अंकुरित विद्यार्थी है, गमले के पौधे नहीं। अतः हमारी संवेदना, सरोकार और चरित्र उथले नहीं होंगे, यही हमारा संस्कार है; इसे ही सीखा और बरता है। अतः संजय कुमार जी को दिल्लीमार्का युवाओं के साथ हम जैसे मीडिया विद्याार्थियों पर भरपूर दृष्टि रखनी चाहिए, सिर्फ एक आंख नहीं।

    आपका आलेख साधुवाद के काबिल है; बस इल्तज़ा है कि जो लोग भीतर से उमगकर आपके कहे या लिखे को पढ़-सुन रहे है; उन पर भरोसा रखिए। यह वह ज़मात है जो धोखा नहीं देगी, बशर्ते आप सिर्फ लिखने के लिए लिख न रहे हों, कहने के लिए कह नहीं रहे हों। सच बाते चमकती हैं, जाल-जोकड़ के ढेर में अलग से पहचानी जा सकती है….अंतःअपनी ईमानदार, प्रतिबद्ध एवं चेतस भावी पीढ़ी को बस आप टूटकर चाहें, जिसका अभाव आज सर्वाधिक है।

    – राजीव रंजन प्रसाद, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बाराणसी-221 005

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *