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पेड न्यूजः मर्ज बढ़ता गया,ज्यों ज्यों दवा की

डॉ. प्रभात ओझा |

पेड न्यूज भले ही काफी बाद में स्वरूप ग्रहण कर सका हो, प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्था को इस तरह की आशंका पहले भी रही होगी। हम देखते हैं कि प्रेस परिषद आज पेड न्यूज के खिलाफ कोई कारगर कदम नहीं उठा पाता। फिर भी अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू के चेयरमैन बनने के बाद यह संस्था भी पहले से कुछ अधिक सक्रिय दिखाई पड़ी थी। प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया एक संवैधानिक निकाय है जो आत्म-नियमन की अवधारणा पर आधारित है। आत्म नियमन का अर्थ यह कि यदि समाचार पत्रों, संवाद समितियों या पत्रकारों ने पत्रकारिता की आचार संहिता का उल्लंघन किया तो इसके लिए सरकार या किसी अन्य बाहरी अभिकरण को नहीं, बल्कि प्रेस को ही कार्यवाही करना चाहिए। इस प्रक्रिया में प्रेस की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता बनाए रखने का भाव था। फिर भी मीडिया के असीम विस्तार में पेड-न्यूज, प्राइवेट ट्रीट्री, मीडिया नेट और क्रॉस मीडिया हॉल्डिंग जैसे विकृतियों का भी धड़ल्ले से विस्तार हुआ है।

पेड न्यूज रोकने में प्रेस परिषद सफल नहीं हो पाई है लेकिन इसे रोकने के लिए उसने कई प्रयास किए हैं। जानकारों का मानना है कि पेड न्यूज को रोक पाने में प्रेस परिषद की नाकामयाबी का बड़ा कारण इसका खुद कमजोर संस्था होना है। प्रेस परिषद के बारे में यह आम धारणा है कि यह बिना दांतों का शेर है। फिर भी सच्चाई यह है कि पेड नयूज पर पत्रकारों की जिस कमेटी की हम बार-बार चर्चा करते हैं, वह इसी पीसीआई ने ही गठित की थी। श्री पी.साईनाथ ने भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष 13 दिसंबर 2009 और 27 जनवरी 2010 को अपने प्रतिवेदन में कहा कि पेड न्यूज अब एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है। यह कॉरपोरेट की ओर से नियंत्रित है देश के कुछ बड़े मीडिया समूहों के पूर्ण संरक्षण और भागीदारी से काम कर रहा है।

प्रेस परिषद ने पेड न्यूज की बढ़ती प्रवृति को देखते हुए एक सब कमेटी गठित की। इस समिति में वरिष्ठ पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता और के. श्री निवास रेड्डी शामिल थे। इस समिति की रिपोर्ट खबर और विज्ञापन के बीच खत्म होते अंतर को सामने लाती है। प्रकाशक लॉबी के दबाव में इस रिपोर्ट को भी दबाने की कोशिश की गई। आखिरकार रिपोर्ट से वो हिस्सा हटा दिया गया जिसमें अखबारों का नाम लिया गया था।

प्रेस कौंसिल ने अपने गठन के प्रारम्भ में ही पत्रकारों के लिए कुछ मानक तय कर दिए थे। सही मायनों पर उन पर अमल स्वाभाविक रूप से मीडिया को भटकने से काफी हद तक रोक सकता था। प्रेस कौंसिल ने चुनावी पत्रकारों के लिए कुछ दिशा निर्देश तय किए, जो इस प्रकार हैं-

1.प्रेस की यह जिम्मेदारी है कि चुनाव और उम्मीदवारों के बारे में वस्तुनिष्ठ यानी ऑब्जेक्टिव रिपोर्ट देगा। समाचार-पत्रों से यह उम्मीद की जाती है कि वे गलत चुनाव अभियान, या किसी उम्मीदवार या पार्टी या घटना के बारे में बढ़ा चढ़ाकर रिपोर्ट नहीं छापेंगे। किसी उम्मीदवार के उठाये मुद्दे की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

2.साम्प्रदायिक या जातिवादी आधार पर चुनाव प्रचार करना जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के तहत प्रतिबंधित है। प्रेस को वैसी रिपोर्ट के प्रकाशन से बचना चाहिए जो क्षेत्र,धर्म,नस्ल,जाति,समुदाय,या भाषा के आधार पर लोगों के बीच शत्रुता या नफरत को बढ़ावा देते हैं।

 

3.प्रेस को किसी उम्मीदवार के निजी चरित्र या व्यवहार के बारे में,उसकी उम्मीदवारी की पात्रता के बारे में या उसके चुनाव से हट जाने के बारे में आलोचनात्मक बयान नहीं छापने चाहिए।

4.प्रेस को किसी उम्मीदवार या पार्टी को आगे दिखाने के लिए किसी भी तरह का आर्थिक लाभ नहीं लेना चाहिए। पार्टी की ओर से कुछ भी आतिथ्य स्वीकार नहीं करना चाहिए।

5.प्रेस को किसी एक पार्टी के बारे में नहीं छापना चाहिए या फिर अन्य पार्टी को भी बोलने का मौका देना चाहिए।

6.इस तरह का कोई सरकारी विज्ञापन नहीं छापना नहीं चाहिए जो सत्ताधारी पार्टी या उम्मीदवार के बारे में हो।

प्रेस कौंसिल ने ऐसे पत्रकारों के लिए भी दिशा निर्देश दिए हैं, जो व्यावसायिक रिपोर्टिंग करते हैं। काफी हद तक ये निर्देश चुनावी खबर लिखने वाले पत्रकारों पर भी लागू हो सकते हैं-

  • आर्थिक पत्रकार उपहार, लोन यात्रा खर्च,छूट प्रिफरेंशल शेयर या ऐसी कोई चीज या सुविधा स्वीकार नहीं करेंगे जिसके लिए उन्हें समझौता करना पड़ सकता है।
  • अगर कोई रिपोर्ट किसी कंपनी की दी हुई जानकारी पर आधारित है तो उस कंपनी का नाम रिपोर्ट में स्रोत के तौर पर प्राथमिकता के साथ आना चाहिए।

 

  • जब कोई कम्पनी अपने प्लांट या संस्थान के दौरे का खर्च उठाती है तो दौरा करने वाले रिपोर्टर को अपनी रिपोर्ट में जरुर लिखना चाहिए कि यह प्रायोजित था और आवभगत का खर्च कंपनी ने उठाया था ।
  • किसी कम्पनी से जुड़ा कोई मामला उस कम्पनी से पुष्ट किए बगैर नहीं छापा जाना चाहिए और ऐसी रिपोर्ट का स्रोत जरुर बताना चाहिए।
  • अगर कोई रिपोर्टर किसी घोटाले का पर्दाफाश करता है या किसी अच्छे काम के बारे में रिपेर्ट लिखता है तो उसका उत्साह बढ़ाना चाहिए।
  • किसी पत्रकार का कम्पनी में शेयर हो या हिस्सेदारी हो, उसे उस कम्पनी के बारे में नहीं लिखना चाहिए।
  • रिपोर्टर को अगर कोई जानकारी पहले मिल जाती है तो उसे इसका इस्तेमाल खुद को या अपने रिश्तेदारों या मित्रों को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं करनी चाहिए ।
  • किसी समाचार-पत्र मालिक, संपादक या पत्र से जुड़े किसी शख्स को समाचार पत्र के साथ अपने सम्बंधों का इस्तेमाल अपने कारोबारी हितों को आगे बढाने के लिए नहीं करना चाहिए।
  • जब कभी भी किसी विज्ञापन एजेंसी या किसी विज्ञापनदाता की एडवर्टाइजिंग कौंसिल ऑफ इंडिया निंदा करे तो इसकी खबर प्रमुखता से छापनी चाहिए।

 

प्रेस कौंसिल से अलग कोशिशें

प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया का गठन तो पत्रकारों और पत्रकारिता के नियमन के लिए ही हुआ है। जब कौंसिल में सक्षम लोग होंगे तो उसका असर भी दिखेगा। फिर गठन के बाद बदलते समय के अनुसार संदर्भ भी बदले हैं। प्रेस कौंसिल ने आर्थिक हितों के लिए पत्रकारों और पत्रकारिता में गिरावट की जो सीमा सोची थी, वह और विस्तृत होती गई। लिहाजा, पत्रकारिता को नियंत्रित रखने के लिए खुद कुछ पत्रकारों और दूसरी संस्थाओं को भी आगे आना पड़ा। पेड न्यूज के खिलाफ “प्रभाष जोशी ने जमकर हल्ला बोला। उन्होंने इस बुराई के खिलाफ एक पूरी मुहीम ही शुरु कर दी। अपने लेखन के जरिए इसका उन्होंने जमकर विरोध करना शुरु कर दिया। पी.सीईनाथ और प्रभाष जोशी के लेखन के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया”। इसके कुछ ही महीने के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। उस दौरान और उसके बाद से ‘द हिंदू’ अखबार ने लगातार पैकेज पत्रकारिता के खिलाफ लेखन किया।

कई अन्य संगठनों ने इस बुराई के खिलाफ आवाज उठाई। फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स ने दिल्ली में एक गोष्ठी की थी। गोष्ठी का विषय था ‘ब्लरिंग द लाइन बिटविन न्यूज ऐंड एड’। गोष्ठी का संचालन परांजय गुहा ठाकुरता ने किया था। गोष्ठी में कहा गया कि “पिछले लोकसभा चुनाव में न्यूज स्पेस की खुले आम बिक्री हुई। अखबारों ने उम्मीदवारों के इंटरव्यू, रैली के समाचार, दौरों की रिपोर्ट और विरोधियों की निंदा छापने के लिए रेट तय कर दिए थे। प्रभाष जोशी ने जब हिंदी समाचार-पत्रों में न्यूज के नाम पर किए गये पेड कवरेज के उदाहरण दिए तो सभी ने ध्यान से सुना”।

इस हो हल्ले के कारण ही अखबार और चैनल दबाव में आ गए और कई नामचीन और बड़े मीडिया घरानों को काफी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।इस दबाव का ही नतीजा था कि कई अखबारों को बाद के कई चुनावों में बजाप्ता यह घोषणा करनी पड़ी कि वे अपने अखबार में पेड न्यूज नहीं छापेंगे। अब मीडिया संस्थानों ने पेड न्यूज को लेकर काफी सावधानी बरतनी शुरू कर दी।

ज्यों ज्यों दवा की

पेड न्यूज के खिलाफ मचे शोर-शराबे के बाद मीडिया घराने दबाव में जरूर आये। उन्होंने जोर-शोर के साथ पेड न्यूज से अलग रहने की घोषणा भी की। इसके बावजूद लगता है कि ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता ही गया है। मीडिया की यह बीमारी खत्म नहीं हुई। मीडिया अब सतर्क हो गया है। पेड न्यूज छापने के अब कई अन्य तरीके खोज लिए गये हैं। पेड न्यूज आज भी बरकरार है। उम्मीदवारों के विज्ञापन पर चुनाव आयोग की सख्ती का परिणाम यह जरूर हुआ कि अब अखबारों या टीवी चैनलों पर उम्मीदवारों के विज्ञापन बहुत कम हो गये। इसके बदले उम्मीदवार या तो स्थानीय संवाददातों को को पैसे दे देते हैं या फिर पेड न्यूज में निवेश कर देते हैं। एक पार्टी के नेता बताते हैं “कुछ अखबार वोलों ने हमसे दो करोड़ रुपए की कीमत पर हमारे मुख्य उम्मीदवारों को 25 दिनों तक कवरेज दिलाने के लिए संपर्क किया था। हमने मना कर दिया क्योंकि हमारी उतनी हैसियत नहीं थी। हमारी बिल्कुल नई पार्टी है और हमारे पास पैसे नहीं हैं। जिस प्रमुख पंजाबी दैनिक में हमने विज्ञापन दिया था वह तो दिखा, लेकिन किसी अखबार में रैली की खबर नहीं थी। हमने जब संवाददाताओं से बात की तो उनका कहना था कि ऐसा इसलिए हुआ कि हमने समाचार-पत्र के मुख्य कार्यालय में अपना विज्ञापन बुक करवाया होगा। हमें विज्ञापन दीजिए तो आपकी अच्छी कवरेज मिलेगी।

बड़ी पार्टियों की भी यही शिकायत है। एक कांग्रेसी उम्मीदवार नाम नहीं देने की शर्त पर कहते हैं कि पहले मैंने ऐसी स्थिति नहीं देखी थी। एक बड़े मीडिया घराने का स्थानीय भाषा का एक अखबार तो भुगतान किए बगैर एक शब्द नहीं छापता। यह खुली ब्लैकमेलिंग है। पहले तो मैंने विरोध किया लेकिन जब मेरा प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार अपने साथ जुड़ने पर बाध्य करने के लिए मेरे कार्यकर्ताओं के खिलाफ फर्जी खबरें छपवाने लगा तो मैं दबाव में आ गया। लिहाजा हमें भी भुगतान करना पड़ा और औरों की तरह ही मनगढंत खबरें छपवानी पड़ीं।

मीडिया में पेड न्यूज के बढ़ते प्रचलन पर बहस तो जोरदार होती है और कई बड़े मीडिया घराने यह अभियान भी चलाते हैं कि उनके यहां पेड न्यूज का प्रचलन नहीं लेकिन चुनावों के समय सारे वादे धरे के धरे रह जाते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद पेड न्यूज बरकार है। साल 2012 के विधान सभा चुनावों तक के बारे में कहा गया कि “पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान पेड न्यूज एक बार फिर लौट आया है । वैसे वह कहीं गया नहीं था क्योंकि मुनाफे की बढ़ती भूख के बीच न्यूज मीडिया में पेड न्यूज ही शाश्वत सत्य है, बाकी सब भ्रम है। प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम?…
चुनाव आयोग को पंजाब में पेड न्यूज की कोई 523 शिकायतें मिलीं जिनमें से कोई 339 मामलों में आयोग ने उम्मीदवारों को नोटिस जारी किया। इसके जवाब में 201 उम्मीदवारों ने स्वीकार किया कि उन्होंने खबरों के लिए पैसे दिए और वे उसे अपने चुनाव खर्च में जोडेंगे। अन्य 78 उम्मीदवारों ने इन आरोपों को नकारा है जबकि 38 मामलों में उम्मीदवारों या संबंधित मीडिया संस्थान ने आरोपों को चुनौती दी है। अब उन 201 मामलों में मीडिया संस्थानों की प्रतिक्रिया या उनपर प्रेस काउंसिल की कार्रवाई का इंतज़ार है जिनमें उम्मीदवारों ने खबरों के बदले में पैसे देने की बात स्वीकार की है”।

समाचार पत्रों में कहा गया पंजाब में पेड न्यूज का आलम यह था कि सत्ता की दावेदार पार्टियों का शायद ही कोई ऐसा उम्मीदवार हो जिसने अख़बारों और चैनलों के पैकेज न लिए हों। मतलब यह कि पेड न्यूज जितना व्यापक था, उसकी तुलना में 523 शिकायतें कुछ भी नहीं हैं। आरोप तो यहाँ तक हैं कि पेड न्यूज के पैकेजों को खरीदने के लिए उम्मीदवारों को ब्लैकमेल तक किया गया कि उन्हें ब्लैकआउट कर दिया जाएगा लेकिन इस मामले में पंजाब कोई अपवाद नहीं है। “गोवा के लिए पेड न्यूज कोई नई परिघटना नहीं है। पिछले साल एक पत्रकार ने वहां के सबसे अधिक प्रसार वाले अंग्रेजी दैनिक के मार्केटिंग मैनेजर को एक स्टिंग आपरेशन में चुनावों के एक सम्भावित उम्मीदवार से ‘अनुकूल और सकारात्मक खबर’ के बदले में पैसे मांगते हुए पकड़ लिया। इस घटना से साफ़ हो गया कि अवैध खनन से लेकर विधायकों और वोटरों की खरीद-फरोख्त के लिए कुख्यात हो चुके गोवा के अख़बार और चैनल भी बिकाऊ हैं”।

पंजाब और गोवा के उदाहरण साल 2012 के हैं। दरअसल, पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को 2014 के लोकसभा निर्वाचन का सेमीफाइनल माना गया था। ऐसे में, चुनावी पेड न्यूज की प्रयोगभूमि उत्तर प्रदेश के अखबार और चैनल्स ने भी बहती गंगा में जमकर हाथ धोए। कहा गया कि “इस बार पेड न्यूज का तरीका थोड़ा बदला हुआ है। अखबार और चैनल उम्मीदवारों के पक्ष में प्रशंसात्मक खबरों/रिपोर्टों के बजाय इस बार नकारात्मक या उनकी असलियत बतानेवाली खबरें/रिपोर्टें न छापने के लिए पैसे ले रहे हैं। यह अख़बारों/चैनलों में पेड न्यूज का नया काला जादू है। असल में, इन चुनावों को 2014 के आम चुनावों से पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है और इस कारण इनपर बड़े राजनीतिक दांव लगे हुए हैं। नतीजा, पैसा पानी की तरह बह रहा है. चैनल/अखबार भी दोनों हाथों से बटोरने में जुटे हुए हैं”।

पांच विधानसभाओं के चुनाव 2014 के लोकसभा चुनाव के सेमीफानल थे। फाइनल यानी लोकभा चुनाव के दौरान प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों में फिर ‘पेड न्यूज़’ की भरमार । अब यह सब बड़ी सावधानी और पर्देदारी के साथ हुआ। मीडिया तरह-तरह के अश्लील, फूहड़ और अवैज्ञानिक कार्यक्रमों और विज्ञापनों से काफी मुनाफा कमा रहा था। उपरोक्त तरीकों से भी मीडिया के मुनाफे की हवस शान्त नहीं हुई तो उसने ‘पेड न्यूज़’ नामक नया हथकण्डा अपना लिया। मीडिया ने अपनी नजर चुनावों में नेताओं और चुनावी दलों की ओर से पानी की तरह बहाये जाने वाले पैसे पर टिकाई। “पहले हुए चुनावों और इन चुनावों में यह नंगे रूप में सामने आया कि कई अखबार और न्यूज चैनल नेताओं से पैसा लेकर उनकी प्रशस्ति में लेख व समाचार प्रकाशित व प्रसारित करें और वह भी विज्ञापन के रूप में नहीं बल्कि बाक़ायदा समाचार और सम्पादकीय के रूप में। ऐसा पाया गया है कि चुनावों के समय कई पत्रकार दलालों की तरह ‘रेट कार्ड’ लेकर नेताओं के ईद-गिर्द घूमते हैं, जिसमें न सिर्फ़ किसी नेता के पक्ष में खबरें छापने के रेट लिखे होते हैं, बल्कि इसके भी अलग रेट होते लिखे होते हैं कि विपक्षी उम्मीदार से सम्बन्धित खबरें न छापी जायें या उनकी नकारात्मक तस्वीर ही प्रस्तुत की जाये”।

2014 के लोकसभा चुनाव आते-आते पेड न्यूज के मामलों में मीडिया का ऐसा बीभत्स चेहरा सामने आया कि खुद मीडिया के अंदर भी जुगुप्सा पैदा होने लगी। कुछ पत्रकारों ने हालात पर बड़े तीखे बयान दिए। पेड न्यूज के पीछे मीडिया के भागने को भीख मांगने जैसी उपमा दी गई। “मीडिया के कुलीनपन के ज्वर से पीडि़त कई लिपे-पुते चेहरों को देखा है हजरतगंज या ऐसे ही किसी शॉपिंग या मॉलिंग वाले इलाके में भिखमंगों को देख कर कड़वा सा मुंह बनाते हुए। आपने भी देखा ही होगा। भीख मांगने वालों को देख कर जहरीला हाव-भाव दिखाने वाले लोगों में ‘गरिष्ठ’ पत्रकार और मीडिया संस्थानों के ‘बलिष्ठ’ मालिकान भी होते हैं। ये ऐसे पत्रकार और मीडिया मालिक होते हैं जो भिखमंगों के अठन्नी-चवन्नी मांगने पर तीता चेहरा बनाते हैं लेकिन नेताओं से चवन्नी मांगने में इन्हें शर्म नहीं आती और चेहरे का भाव भी नहीं बदलता। अब लोकसभा चुनाव सामने है। इस मौसम में मीडियाई भिखमंगों की चल निकली है। मीडिया की इस भिखमंगी जमात को ‘पेड न्यूज़’ के कारण हो रहे ‘डेड न्यूज़’ की कोई फिक्र नहीं। इन्हें खबरों की लाश बेच कर अठन्न्नी-चवन्नी कमाने की फिक्र है। इनकी प्राथमिकता नेताओं को अखबार के पन्ने बेचना और भोले पाठकों के समक्ष नैतिकता की झूठी दुहाइयां परोसना रह गई है”।

बात साफ है कि पेड न्यूज पर हंगामे, विरोध, चुनाव आयोग और प्रेस कौंसिल की सक्रियता के बावजूद चुनावी पेड न्यूज जिन्दा है। कहा जाय तो बदले तौर-तरीकों के साथ और मोटा और मजबूत हुआ है। लगता है कि अखबारों और चैनलों को पेड न्यूज के खून का ऐसा स्वाद लग गया है कि उनकी भूख और बढ़ती ही जा रही है। अफसोस की बात यह है कि इस भूख ने उनसे सोचने-समझने की शक्ति छीन ली है। खबरों को बेचकर या खबरों को छुपाकर वे अपने पाठकों और दर्शकों के विश्वास के साथ धोखा कर रहे हैं। ऐसा करते हुए अपनी साख और विश्वसनीयता के साथ खेल रहे हैं। इस खेल में वे सिर्फ अपने धंधे और लोकतंत्र के चौथे खम्भे को ही दांव पर नहीं लगा रहे हैं बल्कि खुद लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। वह इसलिए कि लोकतंत्र में अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए जनता के पास अपने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के बारे में पूरी और सच्ची जानकारी होना जरूरी शर्त है? 2014 के चुनाव के बारे में सवाल खड़ा हुआ कि “क्या हमारे अखबार/चैनल लोगों को पूरी और सच्ची जानकारी दे रहे हैं? संभव है कि कुछ अपवाद हों लेकिन आरोप हैं कि इस बार अखबार/चैनल उम्मीदवारों की असलियत छुपाने के लिए पैसे ले रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि सभी उम्मीदवारों द्वारा दाखिल संपत्ति और आपराधिक रिकार्ड के सार्वजनिक ब्यौरों के बावजूद अख़बारों/चैनलों ने उसे विस्तार से छापने/दिखाने में भी संकोच किया”।

मीडिया के सामने सवाल उठेंगे कि सभी कुछ सामने होते हुए भी उसने पाठकों अथवा दर्शकों तक पहुंचाने में हीलाहवाली क्यों की। शक बना रहेगा कि ऐसा करने के पीछे नीहित स्वार्थ ही काम कर रहा था। सम्पत्ति और आपराधिक रिकार्ड तक नहीं दिखाने वाला मीडिया से उम्मीदवारों के हलफनामों की बारीकी से छानबीन, उनके आय के स्रोतों की पड़ताल,उनके आपराधिक मामलों की पुलिस जांच से लेकर कोर्ट की कार्रवाई तक की ताजा स्थिति से लेकर उनके अन्य कारनामों को सामने लाने की उम्मीद कैसे की जा सकती थी। समाचार पत्रों और चैनलों ने ऐसा जानबूझकर किया। “इसके कारण ही राजनीति और संसद/विधानसभाओं में कृपा शंकर सिंह जैसे माननीयों की संख्या बढ़ती जा रही है जिनकी संपत्ति न जाने किस जादू से देखते-देखते न्यूनतम दस से लेकर सौ और हजार गुने तक बढ़ जा रही है। आखिर इसे सामने कौन लाएगा?”

पेड न्यूज का कथा-विस्तार आज असीम हो चला है। आश्चर्य यह है कि देश के निर्वाचन आयोग की ओर से मई,2010 में यह बताया जा रहा था कि वह प्रेस कौंसिल से इस बारे में जानने की कोशिश कर रहा है। यह कोशिश कागजों पर तब चल रही थी,जब इसके काफी पहले सन् 1997 में कुछ पत्रकार छत्तीसगढ़ में पेड न्यूज के आगमन से परेशान थे। साल 2010 तक तो मीडिया की इस बीमारी को लेकर शोरगुल तक शुरू हो चुका था। मीडिया के ही एक हिस्से के साथ कुछ सामाजिक संगठनों के हो-हल्ला करने पर प्रेस कौंसिल, निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं ने सख्ती दिखाई। इधर सख्ती शुरू हुई और उधर मीडिया ने भी पैंतरे बदलने शुरू कर दिए। विज्ञापनों का रूप बदलने लगा। एक दौर तो ऐसा आया जब किसी राजनेता अथवा उसकी पार्टी के हक में नहीं, बल्कि उसके विरोधी की खबरों को रोकने के लिए भी धन लिया जाने लगा। और तो और,2014 की विजेता बन रही पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के इंटरव्यू तक प्रायोजित होने के आरोप लगे।

आज हालत यह है कि पेड न्यूज के कैंसर ने पत्रकारिता की आत्मा से लेकर उसकी आवाज तक को मारना शुरू कर दिया है। नतीजा, न्यूज मीडिया की धार भोथरी और आवाज कमजोर पड़ने लगी है। बीमार न्यूज मीडिया भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर नहीं है। आनंद प्रधान आशंका जताते हैं कि “कहीं पेड न्यूज से निकला रास्ता पेड लोकतंत्र की राह न बनाने लगे”।

हम देखते हैं कि आज पेड न्यूज का जिक्र होने पर न सिर्फ मीडिया जगत, राजनेता और औद्योगिक घराने इसे समझते हैं, बल्कि आमजन के दिलोदिमाग में भी मीडिया के भयावह चित्र उभरने लगते हैं। मीडिया और लोकतंत्र के बीच बड़ा ही गहरा सम्बंध है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। लोकतंत्र को मजबूत करने में मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान होता है। खास तौर से चुनावों के समय मीडिया से यह उम्मीद की जाती है कि वह जनता को सच्ची खबरें और विश्लेषण देगा। ऐसे में मीडिया जब पेड न्यूज जैसे गलत आचरण में लिप्त हो तो यह समझ लेना चाहिए कि यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नही है। पेड न्यूज आज पत्रकारिता की गंभीर बीमारी बन चुका है जिससे छुटकारा पाना पत्रकारिता के लिए बेहद जरूरी है। ऐसा इसलिए कि इसके कारण पत्रकारिता की विश्वसनीयता दांव पर लगी है ।

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डॉ. प्रभात ओझा प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार हैं संपर्क: prabhat.ojha@rediffmail.com     

 

 

 

 

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