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सस्ता साहित्य और मुख्यधारा साहित्य

अनिल यादव।

मिलिट्री डेयरी फार्म, सूबेदारगंज, इलाहाबाद। लौकी की लतरों से ढके एस्बेस्टस शीट की ढलानदार छतों वाले उन एक जैसे स्लेटी, काई से भूरे मकानों का शायद कोई अलग नंबर नहीं था। हर ओर ऊंची पारा और लैंटाना घास थी। कंटीले तारों से घिरे खेत थे जिनके आगे बैरहना का जंगल था। घास में ट्यूबवेल की नालियों और बिना टोटियों वाले नलकों का पानी रिसता रहता था जिससे हमेशा तरोताजा रहने वाली ऊब मुझे पकड़ लेने के लिए घात लगाए दुबकी रहती थी। सत्तर के दशक के वे दिन बेहद बड़े होते थे।

हर तरफ इतनी ऊब कि घर के पास अस्तबल के घोड़े आधी रात को हिनहिनाते थे और दूर बाड़े में बंद जर्सी गायें तक सूनी दोपहरी से घबराकर चिल्लाती थीं… ऊपर से डेयरी फार्म के मिल्क प्लांट में सफेद वर्दी पहन काम करने वाले लगभग जल्लाद थे। वे मेरी उम्र के बच्चों को पुचकार कर प्लांट के अंदर बुला लेते थे और धमका कर केन के ढक्कनों में जबरदस्ती दूध पिलाते थे। दूध पीते समय हांफने और घुटी हुई सांसों से हमारी यातना का पता चलता था जिससे वे काफी खुश होते थे। यह ऊब ही थी जिससे त्रस्त होकर लड़के एयरगन या गुलेल से मारी गई कोई भी चिड़िया सूखी घास पर भून कर खा जाते थे, फ्रीजर से सांड़ों के सीमन चुरा के कई दिन शैतानी कल्पना में गोते लगाते थे कि किसी लड़की को इससे गर्भवती कर दिया जाए तो पैदा होने वाला बछड़ा या बच्चा कैसा होगा, मैं दबे पांव लेटर बाक्स में करीने से सजी चिट्ठियां पार किया करता था ताकि एकांत में पढ़कर जान सकूं कि यहां रहने वालों के पेट में और फौज के भीतर क्या चल रहा है।

मैं छठी या सातवीं में पढ़ता था। स्कूल में हमेशा से नींद आती थी क्योंकि वह मधुमक्खी का छत्ता था जिसमें टीचरों, छात्रों का अस्तित्व भन-भन-भन से ज्यादा कुछ नहीं था जो कभी कभार डंक भी मारते थे। पढ़ाई बोझ थी लेकिन बाहर पढ़ने का चस्का विकट था। साइनबोर्ड, सामानों के लेबल, लिफाफे, कॉपियों पर चढ़े अखबारों के कवर सब चाट जाता था फिर भी ऊब से छुटकारा नहीं था। छिपकर घोड़ों की प्रणयलीला देखने के बाद उफनाई बौराहट से भरकर स्टॉक यार्ड में घास के बंडलों पर कूदना पड़ता था, ट्यूबवेल की किलोमीटरों लंबी नाली में लेटकर शलजम खाते हुए दोपहर काटनी पड़ती थी। पढ़ना जादू जैसी चीज है जो उड़ाकर कहां से कहां ले जाती है, यह मैं अनपढ़ लोगों की आंखों में वीरानी और अचरज से भांपने लगा था।

पड़ोस में पंजाब से आए काफी गंभीर से लगते जयपाल सिंह उर्फ पप्पू भइया थे, जिनके पास एक स्टील की कंघी थी। इंटर पास करने में ही उनके घने बाल तिल-चावली हो चुके थे जिन्हें विनोद मेहरा स्टाइल में खूब जतन से संवारते थे। वे नीम के पेड़ के नीचे एक चारपाई पर लेटे हमेशा कोई मोटी किताब पढ़ते या क्रिकेट की कमेंटरी सुनते रहते थे। उनके रेडियो से अक्सर फूटने वाला एक गाना…जलता है जिया मेरा भीगी भीगी रातों में… मेरी जबान पर चढ़ गया था जिसके कारण मुझे शर्मिंदगी झेलनी पड़ती थी क्योंकि सुनने वालों के कान खड़े हो जाते थे और मैं काफी छोटा था। बाद में इसी गाने की धुन तुलसीदास से भी अधिक लोकप्रिय लेखक मस्तराम की सीलबंद किताबें पढ़ते हुए मेरे भीतर बजने लगती थी। बिहारी और घनानंद पर मुंह बिचकाने वाले हिंदी के पुरोधा अपनी कल्पित शालीन छवियों के खोल में घोंघों की तरह सिमटे रहे, इन्हीं किताबों ने कई पीढ़ियों को फर्जी धार्मिक लंतरानियों, नैतिकता, पवित्रता और संबंधों को आंधी की तरह मरोड़ देने वाली सेक्स की शक्ति की सहजता से परिचित कराया, फूहड़ तरीके से ही सही औरत-मर्द को समझने की अंतदृष्टि दी। जाड़े की एक दोपहर क्रिकेट कमेंट्री चल रही थी, आसमान में सरसराती पटरंगा और चांदतारा के पेंच लड़ रहे थे, जर्सी गाएं ऊब के मारे बिलबिला रही थीं, किताब नीचे गिर गई थी और पप्पू भइया खटिया पर मुंह खोले खर्राटे ले रहे थे। मैंने चुपचाप किताब उठा ली और घास पर लेटकर पढ़ने लगा।

वहां ब्लास्ट अखबार का एक रिपोर्टर सुनील था जो दरअसल बड़ा भारी जासूस था। वह लकी स्ट्राइक सिगरेट से धुएं के छल्ले बनाते हुए सोचता था, उसके पास एक बहुत पॉवरफुल बाइक थी और एक रिवॉल्वर था जिसे अनलोड करते समय सावधान न रहे तो कारतूस का खोखा सीधे थोबड़े पर लगता था। उसे एक मर्डर को खोलने का काम सौंपा गया था, उसने पता लगा लिया था कि हत्यारा लंगड़ा है जिसका एक जूता जमीन पर पूरा नहीं पड़ता और वह पूरी सिगरेट नहीं पीता। इसी सुराग के बूते उसे यकीन था कि वह उसे जल्दी ही पकड़ लेगा।

पप्पू भइया जब तक जागे तब तक मैं मटमैले मोटे पन्नों वाली आधी किताब भकोस कर किसी वयस्क में बदल चुका था जो हत्यारे को पकड़ने और बचने की तरकीबें सोचता हुआ दुनिया के दिलफरेब रहस्यों में खोया हुआ था। उन्होंने हैरत से देखते हुए अपनी किताब लेने के लिए हाथ बढ़ाया, मैने याचना के भाव से देखा, जिसका मतलब यह था कि आप मुझसे जो चाहे ले लें लेकिन यह किताब बस थोड़ी देर और मेरे पास रहने दें। मैंने किताब नहीं दी तो वे उठकर मेरी तरफ बढ़े मैं उसे पढ़ते-पढ़ते पीछे सरकने लगा।

थोड़ी देर तक यह खिसकम खिसकाई चली फिर वह ठिठक गए। वह एक विरल क्षण रहा होगा। हम दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया जो दरअसल उम्र में काफी फासला होने के बावजूद एक ही दुनिया के बाशिंदे थे। इत्तफाक था कि वह सुरेंद्र मोहन पाठक का उपन्यास था। वह प्रेमचंद, मुक्तिबोध, शमशेर, निराला, महादेवी, अज्ञेय या धर्मवीर भारती की भी कोई किताब हो सकती थी लेकिन उनमें तब न हम दोनों की रुचि थी न संवेदना कि उन्हें समझ सकें। यह बात अपनी जगह है कि इनमें से किसी ने जासूसी उपन्यास और क्राइम थ्रिलर नहीं लिखे जिनके जरिए हम हर कहीं अपराध की अचूक उपस्थिति, अपराधियों की पारदर्शी भूमिगत दुनिया और उन पर काबू पाने के विचित्र तरीकों जो खुद पुलिस वालों को अपराधियों में बदल देते हैं, के बारे में कोई अनुमान लगा सकें। फिर भी हम दोनों को कुछ वैसा उदात्त सा लगा जैसा शेक्सपियर, कालिदास या दोस्तोयेवस्की की रचनाओं को समझने वाले साहित्यिक लोगों को गहन विमर्श के बीच की चुप्पियों में महसूस होता है।

यह चरित्रों, उनके वर्णन की शैली और किताब में आए सभी की जिंदगियां जी लेने की असंभव इच्छा रखने वाले दो बेमेल रसिकों की साझा अनुभूति थी। इसके बाद उन्होंने मुझे जेम्स हेडली चेइज का उपन्यास ‘दुनिया मेरी जेब’ में पढ़ने को दिया। अक्सर वह किराए पर दो किताबें लाते थे, जिस किताब को नहीं पढ़ रहे होते उसे मैं चुपचाप उठाकर घरों के पिछवाड़े की ओर निकल जाता और पकड़ लिए जाने के डर से हड़बड़ी में असामान्य तेज गति से पढ़कर वापस कर देता था। गुलशन नंदा, कुश्वाहा कांत, प्यारेलाल आवारा, रानू, राजन-इकबाल सीरिज वाले सीएस बेदी, इब्ने शफी आदि को पढ़ना एकांत में प्रेमिका से मिलने जैसा असामाजिक काम था जिसका नतीजा घर वालों की नजर में मेरी पढ़ाई, जिंदगी और उनकी छद्म नैतिकता सबकुछ को तबाह कर सकता था।

इन किताबों ने रहस्यों को पचाकर भी गुमसुम बने रहने का जो आत्मविश्वास दिया उससे जल्दी ही मनोहर कहानियां और सत्यकथाएं पढ़ने का भी जुगाड़ बैठ गया। उन पत्रिकाओं के कटेंट से ज्यादा इंद्रजाल, वशीकरण, मर्दानगी, कुष्ठ रोग, बवासीर, भगंदर, कद बढ़ाने, गोरा बनाने, शराब छुड़ाने, यौन रोगों से मुक्ति दिलाने वाली दवाओं के विज्ञापन आसपास के लोगों के असल व्यक्तित्वों के बारे में बताते थे जो इन्हें वीपीपी से मंगाने के बारे में बड़ी हसरत से बात किया करते थे। वही यह भी बताते थे कि फलां की वीपीपी में कैमरे की जगह ईंट या दवाओं की जगह खड़िया का चूरा निकला, यह सब कुछ फरेब है। एक विज्ञापन जोरो शॉट रिवाल्वर का था जो जानवरों को डराने, आत्मरक्षा और नाटकों में इस्तेमाल के लिए था। साथ में 12 कारतूस मुफ्त थे, जिसे पैसे जुटा लेने के बाद भी मंगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। तब की वीपीपी अब मुझे जिंदगी के रूपक जैसी लगती है जिसमें एेन वक्त पर ऐसा कुछ हो जाता है कि बड़ी हसरतें पूरी नहीं होतीं।

आठवीं पास कर गांव लौटने पर मैंने पाया कि लुगदी साहित्य ने मेरे एक चाचा हरिश्चंद्र ‘हरीश’ को बदल दिया है। उन्होंने अपना उपन्यास ‘प्रतिशोध की ज्वाला’ खेत रेहन रखकर छपवाया था। वे बैक कवर पर अपनी फोटो वाली किताब घर आने वाले मेहमानों को सत्कार के बाद देते थे, पुस्तक भेंट के उन तरल क्षणों में उनके प्रधान पिता उन्हें लेखक नहीं, घर फूंकने वाले लेखक की देह के खास हिस्से पर उगे उपेक्षित बालों के गुच्छे की उपाधि से विभूषित कर रहे होते थे। उनके उपन्यास की शुरुआत ही काफी अविश्वसनीय तरीके से हुई थी जिसमें घोड़े पर भागती चंबल की एक डकैत, पुलिस फायरिंग के बीच पहाड़ी से कूद जाती है और अपने पेटीकोट में फिट पैराशूट के सहारे चकमा देकर बच निकलती है। संभवतः फूलन देवी से प्रेरित वह उनकी आखिरी किताब साबित हुई। उसके बाद उन्होंने स्कूल खोला, नाटक खेले, कविताएं लिखीं और धक्के खाते हुए लगभग तबाह हुए।

मुझे अब तक कम से कम दस ऐसे लोग मिले हैं जिन्होंने ऐसे उपन्यास लिखे और उनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद उन्हें दुनिया के सामने लाना था। ऐसे लोगों में दिल्ली सरकार का परिवहन मंत्री गोपाल राय भी शामिल हैं, जिन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई एक झड़प में गोली खाने के बाद उपेक्षित हालत में गांव में रहते हुए दो रजिस्टरों में एक उपन्यास लिखा था। वे अनछपे रजिस्टर बहुत दिनों तक मेरे पास पड़े रहे। मैं मेरठ के रूढ़िवादी जाट परिवार की पांच बच्चों की उस मां के बारे में बताऊं जो अपने बड़े बेटे की उम्र के एक लड़के से प्यार करती थी, दो चोटियां बांधती थी और हमेशा गुलशन नंदा या रानू को पढ़ती रहती थी। ताश खेलना और छिप कर सिगरेट पीना उसका एक और शौक था। वह मरने के दिन तक ऐसी ही रही। उसका कहना था, अगर मैं ये नॉवेल न पढ़ती तो कब की मर गई होती। ऐसी महिलाओं की हमारे समाज में कमीं नहीं जिन्हें ये उपन्यास कल्पनाओं में मुकम्मल जिंदगी देते हैं।

इन किताबों के लेखक मुझे जनता की नब्ज जानने वाले उन सांसदों जैसे लगते हैं जो जातिवाद, क्षेत्रवाद, प्रलोभन, आतंक और लोकप्रियता के घालमेल से हर बार चुनाव जीत जाते हैं और हिंदी की तथाकथित मुख्यधारा के लेखक टीवी चैनलों पर बैठे जमीन से कटे उन बौद्धिक चुनाव विश्लेषकों जैसे जो हमेशा गलत साबित होते हैं। हिंदी का औसत लेखक साल में जो न पढ़ी जा सकने लायक, अनजानी भाषा में एक-दो कहानियां लिख पाता है उससे कहीं अधिक दिलफरेब कहानियां अखबारों में हर दिन छपी मिलती हैं। उसका अपने पाठक से कनेक्ट टूट गया है इसलिए आमलोग प्रेमचंद के बाद के किसी लेखक का नाम तक नहीं जानते। लुगदी, घासलेट, अश्लील, तथाकथित मुख्यधारा ये छोटे छोटे स्टेशन हैं जो साहित्य की लंबी यात्रा में आते हैं। साहित्य निरंतर बदलते आदमी के धूसर, अज्ञात अब तक न कहे गए हिस्से को कहने की कोशिश ही तो है। (साभार: “तहलका” पत्रकारिता विशेषांक)

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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