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Monthly Archives: September 2015

मीडिया और बाज़ारीकरण

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प्रभात चन्द्र झा। आज हर जगह बाजार की घुसपैठ हो चुकी है चाहे वह मीडिया हो राजनीति या कुछ और। ऐसे में यह मीडिया चिंतकों और नीति निर्माताओं पर निर्भर करता है कि वे इसकी हद तय करें। जिससे एक सामंजस्य मीडिया और विज्ञापन, दोनों के बीच बना रहे और ...

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सूचना क्रांति के युग में फिल्में समाज के आईने के बजाय संस्था बनीं

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कपिल शर्मा। फिल्मकारों को ये बात समझनी होगी कि समाज की सच्चाई दिखाने से आगे बढ़कर फिल्में समाज के लिए मानकों और आदर्शो का निर्माण भी करती है। ऐसे में फिल्मकार दिशानिर्देशक की भूमिका में है और समाजविज्ञान के गुणा गणित से अनभिज्ञ आम दर्शक को सामाजिक परिवर्तन कर सामाजिक ...

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समय के साथ बदली हिंदी पत्रकारिता की भाषा

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संजय कुमार। हालांकि, इलैक्टोनिक मीडिया में आम बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। इसके पीछे तर्क साफ है कि लोगों को तुंरत दिखाया/सुनाया जाता है यहाँ अखबार की तरह आराम से खबर को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए रेडियो और टी.वी. की भाषा सहज, सरल और बोलचाल ...

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टीवी रिपोर्टर : लगन के अलावा इमेजिनेशन भी जरूरी

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शैलेश और डॉ. ब्रजमोहन। न्‍यूज को घटनास्‍थल से इकट्ठा करने का काम संवाददाता (रिपोर्टर) करता है। हर न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में रिपोर्टरों की फौज होती है और अनुभव के आधार पर उनके पद और काम तय होते हैं। टेलीविजन न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में भी सीनियरिटी के आधार पर रिपोर्टर के कई पद ...

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जन संपर्क : भारत में मीडिया परिदृश्‍य

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जयश्री एन. जेठवानी और नरेन्‍द्र नाथ सरकार। मीडिया के नये परिदृश्‍य में जन-संपर्क को व्‍यवहार में लाने वालों के लिए न केवल संवाद में कुशल बल्कि अच्‍छा रणनीतिकार और समय प्रबंधक भी होना चाहिए। नयी सदी में गति ही सब कुछ होगी। किसी ने ठीक ही कहा है बीसवीं सदी ...

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Public Relations: Digital Age is Setting In

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Prof. Jaishri Jethwaney | Internet and its access & reach across the world have been the most defining technological breakthroughs that the world has witnessed in the last few decades. In fact internet has changed the way we see and interpret our world. It has got us in touch with ...

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ग्लोबल सीढ़ी पर चढ़ती हिन्दी

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प्रमोद जोशी | दुनिया के तकरीबन 150 विश्वविद्यालयों और सैकड़ों केन्द्रों में हिन्दी का अध्ययन, अध्यापन हो रहा है। विदेशों से 25 से अधिक पत्र-पत्रिकाएं हिन्दी में प्रकाशित हो रही हैं। बीबीसी, जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड, चीन के रेडियो इंटरनेशनल, रूसी रेडियो और ईरानी रेडियो की हिन्दी सेवाओं ...

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संस्मरण : पत्रकारिता में नए शब्द-विन्यास और भाषा का योगदान

Suresh-Nautiyal

सुरेश नौटियाल। किसी भी भाषा को जीवंत बनाए रखने के लिये उसमें नए-नए प्रयोग होते रहने चाहिए। उसमें नये-नये शब्द जुड़ते रहने चाहिये। यदि आप हिंदी साहित्य को देखें तो पाएंगे कि इसे उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, गढवाली, कुआउंनी, जैसी सुदूरांचल भाषाओं और मराठी, बंगला, पंजाबी जैसी अनेक भगिनी भाषाओं ...

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भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है

Indian-Languages

कुमार मुकुल। धूमिल ने लिखा है – भाषा की बधिया वक्‍त के सामने बैठ जाती है। इधर हिन्‍दी के लेखक, कवि और पत्रकार जिस तरह भाषा को बरत रहे हैं उसे देखकर उसकी बधिया बैठती नजर आती है। अपने एक वरिष्‍ट और प्रिय कवि के यहां भी जब एक कविता ...

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बाजारी ताकतों का पत्रकारिता पर प्रभाव

Hindi-Journalism

अन्नू आनंद। बाजारी ताकतों का पत्रकारिता पर प्रभाव निरंतर बढ़ा है। प्रिंट माध्यम हो या इलेक्ट्रॉनिक अब विषय-वस्तु (कंटेंट) का निर्धारण भी प्रायः मुनाफे को ध्यान में रखकर किया जाता है। कभीसंपादकीय मसलों पर विज्ञापन या मार्केटिंग विभाग का हस्तक्षेप बेहद बड़ी बात मानी जाती थी।प्रबंधन विभाग संपादकीय विषयों पर ...

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