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समय के साथ बदली हिंदी पत्रकारिता की भाषा

संजय कुमार।

हालांकि, इलैक्टोनिक मीडिया में आम बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। इसके पीछे तर्क साफ है कि लोगों को तुंरत दिखाया/सुनाया जाता है यहाँ अखबार की तरह आराम से खबर को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए रेडियो और टी.वी. की भाषा सहज, सरल और बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। कई अखबारों ने भी इस प्रारूप को अपनाया है खासकर हिन्दी के पाठकों को ध्यान में रख कर भाषा का प्रयोग होने लगा है।

शुरुआती दौर की हिन्दी पत्रकारिता की भाषा साहित्य की भाषा को ओढे हुए थी। ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता साहित्य के बहुत करीब थी। जाहिर है इससे साहित्यकारों का ही जुड़ाव रहा होगा। बल्कि हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डालने से यह साफ हो जाता है। 30 मई 1826 में प्रकाशित हिंदी के पहले पत्र ‘‘उदंत मार्तण्ड’’ के संपादक युगल किशोर शुक्ल से लेकर भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र, पंडित मदनमोहन मालवीय, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, अंबिका प्रसाद वाजपेयी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी सहित सैकड़ों ऐसे नाम है जो चर्चित साहित्यकार-रचनाकार रहे हैं। अपने दौर में हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े रहे और दिशा दिया। लेकिन समय के साथ ही हिंदी पत्रकारिता भी बदली है। संपादन, साहित्यकार से होते हुए पत्रकार के हाथों पहुंच गया और हिन्दी पत्रकारिता में हिन्दी भाषा की बिंदी अंग्रेजी बन गयी।

हिन्दी पत्रकारिता ने आज तकनीक विकास के साथ-साथ भाषायी विकास भी कर लिया है। भाषा को आम-खास के लिहाज से परोसा जा रहा है। जहाँ प्रिंट मीडिया व निजी सेटेलाइट चैनलों की भाषा अलग है वहीं सरकारी मीडिया रेडियो और दूरदर्शन की बिलकुल ही अलग। लेकिन, यह बात अहम है कि आज रेडियो, दूरदर्शन, सेटेलाइट चैनल और सोशल मीडिया पर हिन्दी को तरजीह मिल रही है। हिन्दी का वर्चस्व बढ़ा है, जो पूरे प्रभाव में है।

जहाँ धीरे-धीरे बदलाव के क्रम में पत्रकारिता से साहित्य और साहित्यकार दूर होते गये। वहीं भाषा में भी बदलाव आता गया। पत्रकारिता की साहित्यिक भाषा के स्थान पर सहज व सरल हिन्दी भाषा जो बोलचाल की भाषा रही है ने पांव जमा लिया। पैमाना बना कि पत्रकारिता की अच्छी भाषा वही है जिससे सूचना/खबर/जानकारी को साफ, सरल तथा सहज तरीके से लोगों तक पहुँचायी जा सके। पत्रकार और पत्रकारिता के उद्देश्य का वास्ता देकर कहा जाने लगा कि लाखों लोगों तक सूचना/खबर/जानकारी पहुँचे और सहजता से आम-खास जनता उसे समझ सकें। यही हुआ, हिन्दी पत्रकारिता में भाषा को आम चलन के तौर पर प्रयोग होते देखा गया।

मालवीय पत्रकारिता संस्थान, काशी विद्यापीठ के पूर्व निदेशक, राममोहन पाठक की माने तो, ‘वर्तमान दौर की शायद सबसे बड़ी चुनौती पत्रकारिता की भाषा है। पौने दो सौ से ज्यादा साल में भी संचार और जन माध्यमों की एक सर्वस्वीकृति वाली भाषा का प्रारूप नहीं तैयार हो सका है। यह भी सच है कि इस बीच समाज की भाषा भी काफी बदली है और लगातार बदल रही है। बाबूराव विष्णु पराड़कर ने मीडिया की भाषा को आमजन, मजदूर, पनवाड़ी पान बेचने वाले, अशिक्षित या कम शिक्षितों की भाषा बनाने का विचार दिया था।

इसके साथ ही, वह व्याकरण या शब्द-रचना को भ्रष्ट भी नहीं होने देना चाहते थे। वैश्विक स्तर पर ‘नव परंपरावादी’ कन्जर्वेटिस्ट, स्कूल व्याकरण को बाध्यकारी न मानकर, यह मानता है कि संदेश पहुंचना चाहिए, व्याकरण जरूरी नहीं है। इस आधार पर व्याकरण को न मानने वालों की मीडिया में तादाद बढ़ी है, किंतु इससे एक अनुशासनहीन भाषा संरचना विकसित होने का खतरा है। (देखें-‘‘नई भाषा गढ़ रहा है हिंदी मीडिया’, हिन्दुस्तान लाइव ,30-5-2014)। हुआ भी यही। हिन्दी पत्रकारिता की भाषा को लेकर सवाल उठने लगे। बाबूराव विष्णु पराड़कर की सोच जहाँ दिखी वहीं राममोहन पाठक की चिंता भी। व्याकरण को न मानने वालों की मीडिया में तादाद बढ़ी है। देसज शब्द के साथ-साथ अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन बढ़ता ही गया और आज यह हिन्दी पत्रकारिता का हिस्सा बन चुका है।

इन सबके बीच आज के दौर में सबसे बड़ी चुनौती हिन्दी पत्रकारिता की भाषा को है। इसे लेकर कोई मापदण्ड तय नहीं हो पाया है। बल्कि कोई प्रारूप भी नहीं है। जिसे जो मन में आया वह करता जा रहा है। जल्द से जल्द और पहले पहल खबर लोगों तक पहुंचने की होड़ में लगे खबरिया चैनलों में कई बार भाषा के साथ खिलवाड़ होते देखा जा सकता है। कहा जा सकता है कि अनुशासनहीन भाषा की संरचना विकसित हो गयी है। खबर के लिए सुबह अखबार के इंतजार को इंटरनेट मीडिया और 24 घंटे खबरिया चैनल ने खत्म कर दिया है। चंद मिनट में घटित घटना लोगों तक पुहंच रहा है। ऐसे में भाषा का की गंभीरता का सवाल सामने आ जाता है।

हालांकि, इलैक्टोनिक मीडिया में आम बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। इसके पीछे तर्क साफ है कि लोगों को तुंरत दिखाया/सुनाया जाता है यहाँ अखबार की तरह आराम से खबर को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए रेडियो और टी.वी. की भाषा सहज, सरल और बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। कई अखबारों ने भी इस प्रारूप को अपनाया है खासकर हिन्दी के पाठकों को ध्यान में रख कर भाषा का प्रयोग होने लगा है। इसके पीछे सोच यह है कि हिन्दी के पाठक हर वर्ग से हैं। इसमें पढे़-लिखे, आमजन, मजदूर, पनवाड़ी, चाय विके्रता, अशिक्षित या कम शिक्षित सब शामिल है। बाबूराव विष्णु पराड़कर ने भी मीडिया की भाषा को आमजन, मजदूर, पनवाड़ी, अशिक्षित या कम शिक्षितों की भाषा बनाने का विचार दिया था। हिन्दी के साथ यह देखा जा सकता है। चाय या पान की दूकान हो या ढाबा अशिक्षित या कम शिक्षित यहाँ रखे अखकार को उलट-पुलट कर पढ़ने की कोशिश करते है। टो-टो कर पढ़ते हैं और फिर खबर पर चर्चा भी करते हैं। इन सब के बीच क्षेत्रीय बोलियों का भी समावेश हुआ है। राष्ट्रीय से राजकीय और जिला यानी क्षेत्रीय स्तर पर अखबारों के प्रकाशन से भाषा में बदलाव आया है। क्षेत्रीय और जिले तक सिमटे मीडिया में वहां की बोलियों को स्थान मिल रहा है ताकि पाठक अपने आपको जुड़ा महसूस करें।

वहीं, यह भी सच है कि मीडिया खुद अपनी भाषा गढ़ रहा है। इसमें अंग्रेजी से आये संपादक और अंगे्रजीदां मालिक की भूमिका अहम रही है। नयी पीढ़ी तक अखबार को पहुंचाने के आड़ में हिन्दी में अंग्रेजी को प्रवेश करा दिया गया है। दिल्ली से प्रकाशित ज्यादातर हिन्दी अखबार की खबरें हिंगलीश हो गयी वहीं, र्शीषक आधा हिन्दी आधा अंग्रेजी में दिया जाता है। इसमें हिन्दी के चर्चित अखबार भी शामिल हुए जो हिन्दी भाषा के लिए जाने जाते थे। वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर की माने तो, ’नवभारत टाइम्स के दिल्ली संस्करण से विद्यानिवास मिश्र विदा हुए ही थे। वे अंग्रेजी के भी विद्वान थे, पर हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बिलकुल नहीं करते थे। विष्णु खरे भी जा चुके थे। उनकी भाषा अद्भुत है। उन्हें भी हिंदी लिखते समय अंग्रेजी का प्रयोग आम तौर पर बिलकुल पसंद नहीं। स्थानीय संपादक का पद सूर्यकांत बाली सँभाल रहे थे। अखबार के मालिक समीर जैन को पत्रकारिता तथा अन्य विषयों पर व्याख्यान देने का शौक है। उस दिनों भी था। वे राजेंद्र माथुर को भी उपदेश देते रहते थे, सुरेंद्र प्रताप सिंह से बदलते हुए समय की चर्चा करते थे, विष्णु खरे को बताते थे कि पत्रकारिता क्या है और हम लोगों को भी कभी-कभी अपने नवाचारी विचारों से उपकृत कर देते थे। आडवाणी ने इमरजेंसी में पत्रकारों के आचरण पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही कहा था कि उन्हें झुकने को कहा गया था, पर वे रेंगने लगे। मैं उस समय के स्थानीय संपादक को रेंगने से कुछ ज्यादा करते हुए देखता था और अपने दिन गिनता था। समीर जैन की चिंता यह थी कि नवभारत टाइम्स युवा पीढ़ी तक कैसे पहुँचे(देखें-‘हिंदी पत्रकारिता की भाषा’, हिन्दी समय में प्रकाशित)।

वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर जी की टिप्पणी देखें तो हिन्दी पत्रकारिता की भ्रष्ट होती भाषा के पीछे मालिकों की सोच जिम्मेदार है। अंग्रेजी भाषा में विद्वान होने के बावजूद हिन्दी के प्रति संपादकों का समपंर्ण दर्शाता है कि वे भाषा के प्रति सजग थे चाहे वह कोई भी भाषा हो, साथ ही उस भाषा से समझौता नहीं करते थे। हिन्दी पत्रकारिता की भ्रष्ट भाषा को खबरिया चैनलों ने भी खूब बढ़ावा दिया है। समाचार हो या बहस हिन्दी भाषा की टांग तोड़ा जाता है। व्याकरण का गड़बड़ झाला और हिन्दी में अंग्रेजी का तड़का अजीब हालात पैदा कर जाता है। हालांकि अभी भी कुछ मीडिया हाउस व्याकरण के गड़बड़ झाला और हिन्दी में अंग्रेजी के तड़के से परहेज करते है। कोशिश करते हैं कि भाषा भ्रष्ट न हो। लेकिन बाजारवाद के झांझेवाद में फंसा हिन्दी पत्रकारिता कंशमंश की स्थिति में है। बाजारवाद को भले ही दोषी ठहरा दें, यह भी वजह है कि आज पत्रकारिता में वह तेवर नहीं या फिर वह पुरानी बात नहीं जहंा आने वाला शक्स भाषा विद्वान हुआ करता था। भाषा पर पकड़ होती थी। अंग्रेजी हो या हिन्दी उसकी विद्ववता साफ झलकती थी। बदलाव के काल में हिन्दी पत्रकारिता की भाषा बदली तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन सवाल इसके भ्रष्ट होने का है। जो भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।

संजय कुमार दूरदर्शन केन्द्र, पटना में समाचार संपादक हैं.
संपर्क: 09934293148 ईमेल: sanju3feb@gmail.com

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