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मीडिया और बाज़ारीकरण

प्रभात चन्द्र झा।

आज हर जगह बाजार की घुसपैठ हो चुकी है चाहे वह मीडिया हो राजनीति या कुछ और। ऐसे में यह मीडिया चिंतकों और नीति निर्माताओं पर निर्भर करता है कि वे इसकी हद तय करें। जिससे एक सामंजस्य मीडिया और विज्ञापन, दोनों के बीच बना रहे और मीडिया की साख का और अधिक नुकसान न हो।

आज के युग की सबसे बड़ी सच्चाई वैश्वीकरण है। इसी तरह वैश्विक मीडिया की पहुँच को नकारा नहीं जा सकता। राजनीतिक अर्थशास्त्र के विद्वान फ्रांसिस फुकुयामा का कथन है कि आज कोई भी देश वास्तव में कभी भी अपने आप को वैश्विक मीडिया से कटकर नहीं रह सकता। एक तरफ जहाँ वैश्वीकरण के फायदे हैं वहीँ कुछ नुकसान भी। आज इंटरनेट ने वैश्विक मीडिया की पहुंच को आसान कर दिया है। मीडिया, बाजार और विज्ञापन तीनों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। हिंदी मीडिया भी वैश्वीकरण के परिणामस्वरुप उभरे बाज़ार का भरपूर फायदा ले रहा है।

वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप बढ़ते बाजारीकरण और भारत जैसे बड़ी आबादी वाले उपभोक्ता बाजार में हर किसी को कमाई की सम्भावना दिखती है। इतने बड़े बाजार का दोहन करने के लिए विज्ञापन जैसे माध्यम का सहारा लिया जाता है। इस विज्ञापन की वजह से मीडिया इंडस्ट्री में धनवर्षा हो रही है। तभी तो 45 नए समाचार और मनोरंजन के चैनलों की मंज़ूरी सरकार से ली गयी है। मौजूदा समय में कुल 350 ब्रॉडकास्टर हैं जो कुल 780 चैनलों को संचालित करते हैं।

जहाँ तक प्रश्न मीडिया में मार्केटिंग या बाज़ार के बढ़ते प्रभाव का है तो यह आज के जमाने की हकीकत है। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने भारतीय मीडिया और इंटरटेनमेंट क्षेत्र को बहुत गतिशील बना दिया है जिसके परिणामस्वरुप भारतीय मीडिया का बाज़ार एक लाख करोड़ से अधिक का हो गया है। सी. आई. आई. – पी. डब्ल्यू. सी. की 2015 में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2018 तक यह लगभग 2 लाख 27 हज़ार करोड़ तक पहुँच जायेगा। टेलीविज़न और प्रिंट अभी भी विज्ञापन के सबसे बड़े हिस्सेदार हैं और ये आने वाले कुछ सालों तक बने रहेंगे।

अगर हम प्रिंट की बात करें तो 2014 में कुल 99,360 प्रकाशन थे जिसमें से 40 फीसदी हिंदी में और 47 फीसदी क्षेत्रीय भाषाओँ में प्रकाशित हुए। इनमें दैनिक प्रकाशन की संख्या 13,530 है। अगर विज्ञापन की बात करें तो अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले भाषाई और हिन्दी अख़बारों की स्थिति में बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। फिक्की – के. पी. एम. जी. की रिपोर्ट के अनुसार 2014 में भारत में प्रिंट मीडिया का बाजार 26,300 करोड़ का था जिसमें से 17,600 करोड़ विज्ञापन से मिले थे।

इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि पत्रकारों और मैनेजमेंट दोनों में ऊपर वाले तो खूब फल-फूल रहे हैं लेकिन नीचे के पायदान पर रहने वालों को उनका हिस्सा कितना मिल पाता है। यह शोध का विषय हो सकता है कि वैश्वीकरण से भारतीय पत्रकारों की आर्थिक स्थिति में कितना परिवर्तन आया है। अंग्रेजी, हिंदी और दूसरे भाषाई पत्रकार कितना संपन्न हुए हैं या फिर सम्पन्नता केवल मीडिया मालिकों, मैनेजमेंट के बड़े ओहदेवालों और ऊपर के कुछ चुनिंदा पत्रकारों तक सीमित रह गया है।

अगर अंग्रेजी प्रिंट माध्यम की बात करें तो वहां हर इंडस्ट्री और सेगमेंट के लिए अलग-अलग मैगज़ीन प्रकाशित हो रहीं हैं जैसे गैजेट, कार, यात्रा, घर के इंटीरियर सम्बंधित आदि। लेकिन हिंदी और दूसरी भाषाओँ में खास पाठक वर्ग वाली स्थिति अभी नहीं बन पायी है। ऐसे प्रकाशन के लिए पाठकों के साथ ही विज्ञापनदाताओं की उपलब्धता भी अहम भूमिका निभाती है। अभी हाल में ही केवल रियल एस्टेट और प्रॉपर्टी से सम्बंधित एक चैनल की शुरुआत हुई है। यह चैनल भी भारत के उसी सबसे बड़े मीडिया कॉर्पोरेट घराने का है जिसने विवादास्पद लवासा टाउनशिप के ब्रांड प्रमोशन का डील किया था। आप देख सकते हैं कि अधिकतर टेलीविज़न समाचार जो प्रायोजित होते हैं वो रियल एस्टेट या प्रॉपर्टी से सम्बंधित होते हैं , ऐसे में इसका बाजार बहुत बड़ा है और ऐसे मीडिया ब्रांड को विज्ञापन की भी कोई कमी नहीं रहती।

हिंदी मीडिया को अपना हिस्सा मिलना अभी बाकि है। हिंदी मीडिया खासकर अख़बारों की बात करें तो उन्हें केवल बी और सी ग्रेड के विज्ञापन ही मिल पाते हैं जबकि उसकी पहुँच और पाठक संख्या से हर कोई वाकिफ है। हालांकि इन अखबारों की हिस्सेदारी विज्ञापन में बढ़ी है। लेकिन मर्सिडीज़, बी। एम। डब्ल्यू, ऑडी जैसे ब्रांड हिंदी माध्यमों में कम दिखते हैं, इस पर भी गौर किया जाना चाहिए। शायद मीडिया प्लानर यही सोचते हैं कि अंग्रेजीबोलने वालों को छोड़कर हिंदी या अन्य भाषा वालों की क्रय शक्ति समता कम है। इस भाग (सेगमेंट) में हिंदी और दूसरी भाषाओँ के अख़बारों को उनकी हिस्सेदारी मिलना बाकी है।

मुद्दे की बात यह भी है कि आज जब साक्षरता दर बढ़ी है और विश्व एक वैश्विक गांव बन चुका है तो फिर भारत माता ग्रामवासिनी को मुख्य धारा की मीडिया में सकारात्मक जगह कब मिलेगी। क्योंकि आज ग्रामीण भारत भी बड़े बाज़ार के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। कई बड़े और स्थापित कंपनियां अपने सामान की पैकेजिंग और मार्केटिंग उनको ध्यान में रखकर कर रही हैं।

ज़माना जब इंटरनेट का हो रहा है तो ऐसे में मोबाइल इंटरनेट उपयोग करनेवालों की संख्या में भी काफी इज़ाफ़ा देखा जा सकता है। डिजिटल विज्ञापन के चक्रवृद्धि का दर सबसे अधिक है जो 27.7 फीसदी है। मोबाइल पर हिंदी या अन्य भाषा वाले उपभोगताओं की संख्या का श्रेणीकरण करना अभी बाकी है। आने वाला समय दिलचस्प और भी इसलिए होगा क्योंकि अब ज़माना एप्प का आ चुका है। हिंदी और अन्य भाषा वाले समाचार परोसने के कैसे – कैसे एप्प का विकास करते हैं यह देखना होगा क्योंकि गूगल भी कई भाषाओँ में अपनी सेवा पहले से दे रहा है। आने वाले समय में यह सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरने वाला है। विज्ञापन भी उसी अनुपात में वितरित होंगें।

बात अब ब्रांडेड पत्रकारिता से आगे बढ़ गयी है। भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों में से अधिकतर का मीडिया कंपनी में प्रत्यक्ष या परोक्ष दखलंदाजी है ऐसे में उनके लिए अपने ब्रांड का प्रमोशन कोई बड़ी बात नहीं है। जो छोटे- मोटे कॉर्पोरेट समाचार हम देखते हैं वे सब कृतज्ञता ज्ञापन के होते हैं। कुछ समाचार ऐसे भी होते हैं जो पत्रकारों के विशेष आय से जुड़े होते हैं। अखबारों में इधर क्लासिफाइड विज्ञापन बहुत बढ़ गया है। अब तो आपको मुख पृष्ठ तक आने के लिए कई बार विज्ञापन वाले अच्छे और चमकीले तीन-चार पन्नों से होकर गुज़रना पड़ता है। हम टेलीविज़न समाचारों की सुर्खियां देखें या मुख्य समाचार सभी प्रायोजित होती हैं। यहाँ तक कि मौसम समाचार भी प्रायोजित होते हैं। बस ब्रेकिंग न्यूज़ बचा हुआ है। उसी तरह अखबार में सम्पादकीय पन्ने बचे हुए हैं। यह भी देखना होगा कि वे कब तक बचे रहेंगें।

एफ। एम। ने रेडियो को एक अलग राह दिखाई और युवाओं को रेडियो से जोड़ने में कामयाब रही। इससे रेडियो के भविष्य पर उठ रहे सवालिया निशान मिटते गए। सी. आई. आई. –पी. डब्ल्यू. सी. की 2015 में जारी रिपोर्ट के अनुसार इसकी चक्रवृद्धि विकास दर 18.2 है। स्थानीय मुद्दों को लेकर कम्युनिटी रेडियो का चलन भी जोर पकड़ता जा रहा है। एक और चलन जो इधर कुछ सालों से देखने में आ रहा है वह है इंटरनेट रेडियो का। इस तरह के रेडियो के बाजार का लेखा-जोखा होना अभी बाकी है।

अब हम मीडिया कॉर्पोरेटीकरण की ओर नज़र दौड़ाएं तो कुछ-एक को छोड़ कर पाएंगें कि हिंदी के अधिकतर अखबारों के संपादक अपनी विशेष सम्पादकत्व के लिए उस पद पर बिठाए गए हैं जिसका सीधा ताल्लुक बाज़ार और विज्ञापन और ब्योंतेपन की निपुणता से जुड़ा हुआ है। ऐसे कलमकार और पन्नों पर स्याही से आग लगाने वाले संपादक होंगे भी तो अख़बारों के मैनेजमेंट उन्हें विलुप्तप्राय करने में लगे हैं। अब आदर्श पत्रकार या सम्पादक की नई परिभाषा और व्याख्या होने लगी है। ये सब समय के साथ हमारे मूल्यों और बदलते नज़रिये से जुड़ा हुआ मामला है। शायद आने वाले समय में बड़े मीडिया घराने के मालिकान का संपादक नामक पद से कुछ- ख़ास लेना- देना न हो और वे पूरी तरह सी.ई.ओ. नामक पद से अपने ताल्लुकात अधिक बढ़ाएं। कई जगह ऐसा हो भी रहा है कि दोनों ही पद को मिला दिया गया है। जैसे-जैसे समय बदल रहा है संस्थानों का ढांचा और कार्य पद्धति भी बदल रही है। यह बेहतर है या बदतर इसका फैसला आने वाला समय करेगा।

आज हर जगह बाजार की घुसपैठ हो चुकी है चाहे वह मीडिया हो राजनीति या कुछ और। ऐसे में यह मीडिया चिंतकों और नीति निर्माताओं पर निर्भर करता है कि वे इसकी हद तय करें। जिससे एक सामंजस्य मीडिया और विज्ञापन, दोनों के बीच बना रहे और मीडिया की साख का और अधिक नुकसान न हो। जैसे अच्छे काम पीढ़ियों तक याद किये जाते हैं वैसे ही बुरे की भी चर्चा कई दशकों तक होती है। मीडिया में भी अच्छे और बुरे, दोनों के ‘गेम चेंजर’ हुए हैं जिससे पत्रकारिता की धारा बदली। चाहे बात खोजी पत्रकारिता की हो, पीत पत्रकारिता की या अखबारों के ‘प्रोडक्ट’ बनने की या कुछ और। इसने प्रिंट पत्रकारिता की दिशा बदली। शुरू में प्रतियोगी अखबार घरानों ने अगर प्रतिरोध जताया भी तो बाद में वे उसी दौड़ में शामिल हुए। कुछ उनकी मजबूरी रही होगी और कुछ समय की मांग।

प्रभात चन्द्र झा : मीडिया प्रेमी। प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से विकास के मुद्दों पर प्रकाशित पत्र ‘ग्रासरूट’ और मीडिया सरोकार और मुद्दों की पत्रिका ‘विदुर’ में बतौर उप संपादक कार्य अनुभव। विभिन्न समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के लिए संस्कृति, साहित्य और इवेंट्स की रिपोर्टिंग के अलावा आलेख प्रकाशित। विपणन और अंतर्राष्ट्रीय व्यापर में प्रबंधन का अध्ययन। तत्पश्चात विज्ञापन और विपणन में कार्यानुभव। फिलवक़्त ट्राइफेक्टा इंटरटेनमेंट से जुड़े हुए।

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