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टीवी रिपोर्टर : लगन के अलावा इमेजिनेशन भी जरूरी

शैलेश और डॉ. ब्रजमोहन।

न्‍यूज को घटनास्‍थल से इकट्ठा करने का काम संवाददाता (रिपोर्टर) करता है। हर न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में रिपोर्टरों की फौज होती है और अनुभव के आधार पर उनके पद और काम तय होते हैं। टेलीविजन न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में भी सीनियरिटी के आधार पर रिपोर्टर के कई पद होते है।

ट्रेनी रिपोर्टर- जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी न्‍यूज चैनल में ट्रेनी रिपोर्टर के तौर पर अपना कैरियर शुरू करता है। ट्रेनी रिपोर्टर को आमतौर पर कोई बड़ा काम नहीं सौंपा जाता, उसे जनरल विजुअल शूट कराने, किसी की बाइट लाने य सीनियर रिपोर्टरों की स्‍टोरी एडिट कराने जैसी जिम्‍मेदारी दी जाती है, जिसके माध्‍यम से वो धीरे-धीरे अपने काम में माहिर होता जाता है। यहां पर गौर करने वाली बात ये है कि तेज-तर्रार व्‍यक्तित्‍व वाला ट्रेनी रिपोर्टर मेहनत, लगन और बढि़या काम से इसी दौर में अपनी खस छवि बनाता है और ऐसे रिपोर्टरों के लिए जल्‍द ही तरक्‍की के रास्‍ते खुल जाते हैं। इस दौरान उसकी मेहनत, काम के प्रति लगन, उसका भविष्‍य तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ट्रेनी के पद पर किसी भी रिपोर्टर को करीब एक साल तक काम करना पड़ता है और सीनियर इस दौरान उसके काम का मूल्‍यांकन करते है।

रिपोर्टर- अच्‍छे काम के आधार पर ट्रेनी को रिपोर्टर के पद पर तरक्‍की दी जाती है और रिपोर्टर को अपनी असली पहचान बनाने का यही सही वक्‍त भी होता है। इस दौरान न्यूज़ कवर करने के लिए लोकल या शहर के स्‍तर पर उसे अलग-अलग विभाग (बीट) सौंपे जाते हैं। इसकी वजह से एक तरफ जहां हर क्षेत्र में उसकी जानकारी बढ़ती है, वहीं अलग-अलग क्षेत्र के लोगों से मिलने और उनसे परिचय बढ़ाने का मौका भी मिलता है। साथ ही खबरों के जरिए दर्शकों में भी उसकी पैठ बनती है।

टेलीविजन स्‍क्रीन पर बार-बार रिपोर्टर का चेहरा देख दर्शक भी उसे पहचानने लगता है। इस दौरान ईमानदारी से की गई मेहनत, दर्शकों में रिपोर्टर की विश्‍वसनीयता बढ़ाती है और यही वो दौर है, जब एक रिपोर्टर अपने फील्‍ड के सैकड़ों लोगों के साथ-साथ टीवी के जरिए लाखों दर्शकों से भी दोस्‍ताना रिश्‍ते बनाता है। आमतौर पर यही वक्‍त होता है, जब एक रिपोर्टर किसी खास विषय या विभाग में दक्षता हासिल करता है और अनुभव के आधार पर उसकी अगली पदोन्‍नति संवाददाता के पद पर होती है।

संवाददाता – संवाददाता का काम रिपोर्टर से ज्‍यादा अलग नहीं होता। रिपोर्टर की तरह ही को भी फील्‍ड में जाना पड़ता है और रोज-रोज खबरें खोजने की जद्दोजहद करनी पड़ती है। लेकिन किसी भी न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में संवाददाता की अहमियत एक रिपोर्टर से ज्‍यादा होती है काम के मूल्‍यांकन के आधार पर संवाददाता को तरक्‍की देकर सीनियर संवाददाता के काम एक ही तरह के होते हैं, लेकिन सीनियर संवाददाता बनने के बाद रिपोर्टर की सिनियरिटी और वेतन में इजाफा हो जाता है। सीनियर संवाददाता बना दिए जाने के बाद एक रिपोर्टर के तौर पर, काम का दायित्‍व और बढ़ जाता है।

प्रमुख संवाददाता – टीवी न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में प्रमुख संवाददाता के तौर पर एक रिपोर्टर को खबरें तो खोजनी पड़ती है, लेकिन रूटिन (लोकल) खबरों से उसका नाता करीब-करीब खत्‍म हो जाता है और अपेक्षा की जाती है कि वो अपने बीट की खास खबरों पर ही ज्‍यादा ध्‍यान दे और दर्शकों को चौंकाने वाली खबरें पेश करे। प्रिंसिपल संवाददाता बनने के बाद रिपोर्टर की प्रतिष्‍ठा में काफी इजाफा हो जाता हैफ नयूज ऑर्गेनाइजेशन में तो उसका कद ऊंचा होता ही है, फील्‍ड में भी उसकी अहमियत बढ़ जाती है। प्रिंसिपल संवाददाता ही अखबारों में चीफ रिपोर्टर बनाए जाते हैं। चीफ रिपोर्टर अपने नीचे रिपोर्टरों की एक फौज की कमान संभालता है। बो रिपोर्टर को रोज-रोज का काम बांटता है और उनके काम की निगरानी करता है। टीवी न्‍यूज में चीफ रिपोर्टर का पद नहीं होता।

विशेष संवाददाता- विशेष संवाददाता, किसी भी टीवी न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में खास-खास खबरें ही कवर करता है। दरअसल पत्रकारिता के करियर में ये वो पद है, जहां पहुंचने की हर पत्रकार की तमन्‍ना रखता है। विशेष संवाददाता होता है तो एक रिपोर्टर ही है, लेकिन वो सिर्फ बड़ी खबरें ही कवर करता है। इस पद पर आने के बाद उसे विशेष जिम्‍मेदारी ही सौंपी जाती है। न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन में उसका इस्‍तेमाल एक्‍सपर्ट के तौर पर होने लगता है और गम्‍भीर मुद्दों पर उसकी राय का चैनल विशेषतौर पर पेश करने लगताहै। राष्‍ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्‍यमंत्री और सरकार के विभिन्‍न विभागों को विशेष संवाददाता ही कवर करता है।

सामान्‍य रिपोर्टर की तुलना में विशेष संवाददाता का काम बहुत ज्‍यादा कठिन है। उसकी जिम्‍मेदारियां भी ज्‍यादा हैं। विशेष संवाददाता के तौर पर काम करने वाले पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि उसे ईमानदार होना चाहिए और साहसी भी, ताकि कोई दबाव देकर उससे गलत काम नहीं करा पाए। उसे बातचीत की कला में माहिर होना चाहिए और अलग-अलग-अलग क्षेत्र के लोगों से भी उसका व्‍यापक संपर्क होना चाहिए। सरकारी अफसरों, सत्‍ता और विरोधी दल के नेताओं में उसकी खासी पैठ होनी चाहिए और इनके माध्‍यम से वो भीतर की खबरें निकालने की क्षमता भी रखता है। उसका व्‍यक्तित्‍व दूसरों को प्रभावित करने वाला होना चाहिए। उसे दूसरों के व्‍यक्तित्‍व से प्रभावित नहीं होना चाहिए और न ही उसके कामकाज पर दूसरे के व्‍यक्तित्‍व का प्रभाव दिखना चाहिए। विशेष संवाददाता के व्‍यवहार में गंभीरता झलकनी चाहिए, ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ कही गई बातें बड़बोलेपन में कभी सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए। अंग्रजी भाषा पर भी उसकी पकड़ मजबूत होनी चाहिए, भले ही वो काम किसी भी दूसरी भाषा के चैनल के लिए कर रहा हो।

विशेष प्रतिनिधि- स्‍पेशल कॉरसपॉन्‍डेंट स्‍तर के रिपोर्टर कहीं-कहीं विशेष प्रतिनिधि के तौर पर भी काम करते हैं। विशेष प्रतिनिधि, मुख्‍यालय से दूर राजधानी में नियुक्‍त किए जाते हैं। टेलीविजन में विशेष प्रतिनिधि रखने का चलन नहीं है, लेकिन बड़ अखबारों में ये पद आज भी बरकरार हैं।

फॉरेन कॉरसपॉन्‍डेंन्‍ट- स्‍पेशल कॉरसपॉन्‍डेंट ही आम तौर पर फॉरेन कॉरसपॉन्‍डेंट के तौर पर काम करते हैं। न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन खास-खास देशों में अपने प्रतिनिधि रखते हैं। इनका काम उस देश की राजनीतिक, सांस्‍कृतिक गतिविधियों पर नजर रखना है। फॉरेन कॉरसपॉडेन्‍ट उस देश में रहने वाले अपने मूल के लोगों की समस्‍याओं पर भी नजर रखता है और खबरों के जरिए उनका संपर्क अपने देश से बनाए रखता है।

वॉर रिपोर्टर- युद्ध के समय स्‍पेशल कॉरसपॉन्‍डेंट, वॉर रिपोर्टर के तौर पर भी काम करताहै। प्रबल प्रताप सिंह ने अफगानिस्‍तान युद्ध के समय और बरखा दत्‍त ने कारगिल युद्ध के दौरान जिस हिम्‍मत और जज्‍बे के साथ लड़ाई के मोर्चे से दर्शकों तक लाइव खबरें पहुंचाई, वो भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक मिसाल है।

स्ट्रिंगर- इन सब के अलावा रिपोर्टर के एक और पद का यहां जिक्र कर देना जरूरी है, वो है स्ट्रिंगर। स्ट्रिंगर छाटे शहरों और कस्‍बों के वो रिपोर्टर हैं, जिन्‍हें कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जाता है। यानी काम के लिए इन्‍हें वेतन नहीं दिया जाता, बल्कि खबरों के एवज में इन्‍हें एकमुश्‍त पैसे दिए जाते हैं।ये न्‍यूज ऑर्गेनाइजेशन के कर्मचारी नहीं होते। सूचना तकनीकी यानी इन्‍फॉर्मेशन टेक्‍नोलॉजी की क्रान्ति ने डि‍जिटल कैमरे उपलब्‍ध हैं और ब्रॉडबैंड का जाल गांव-गांव तक पहुंच रहा है। ऐसे में दूरदराज क्षेत्र के पत्रकार बड़ी आसानी से विजुअल शूट कर उसे एफटीपी के जरिए न्‍यूज सेंटर को भेज सकते हैं। चूंकि छोटे शहरों में नियमित रिपोर्टर नहीं रखे जा सकते, इसलिए न्‍यूज चैनल ऐसी जगहों पर स्ट्रिंगर ही रखते हैं और बड़े न्‍यूज चैनलों के स्ट्रिंगर हर महीने पचास हजार रूपये तक कमा लेते हैं। कुछ न्‍यूज चैनल तो नियमित रिपोर्टर की जगह सिट्रंगर पर ही निर्भर हैं।

जाहिर है स्ट्रिगंर के रूप में पत्रकारों के लिए एक नई दुनिया खुल गई है। ऐसे पत्रकार जो अपने पारिवारिक दायित्‍वों की वजह से अपने जिले से बाहर नहीं जाना चाहते या फिर नियमित नौकरी में नहीं फंसना चाहते, उनके लिए स्ट्रिंगर का काम आदर्श है। वो किसी न्‍यूज चैनल के साथ-साथ अखबार के लिए भी काम कर सकते हैं। आने वाले दिनों में स्ट्रिंगर का महत्‍व और बढ़ेगा।

अच्‍छे रिपोर्टर के गुण
टीवी जर्नलिज्‍म का हर विद्यार्थी चाहता है कि वो टेलीविजन की चमक- धमक का हिस्‍सा बने और देश-दुनिया के लागों में उसकी व्‍यक्तिगत तौर पर पहचान बने। ऐसी इच्‍छा रखने में काई बुराई नहीं है, लेकिन खबरों की दुनिया का स्‍टार बनने के लिए सबसे पहली शर्त है लगन और लगातार कठिन मेहनत। ये दो ऐसे सच हैं, जिन पर जीत हासिल कर ही काई विद्यार्थी कामयाबी की मंजिल पर पहुंच सकता है। टीवी रिपोर्टिंग ऐसा काम है, जिसमें लगन के अलावा इमेजिनेशन भी जरूरी है और ये गुण लगातार अभ्‍यास से ही विकसित हो सकते हैं। कुछ मूलमंत्र हैं जिन पर गौर कर काई भी विद्यार्थी कामयाब टीवी रिपोर्टर बन सकता है।

आशुतोष कहते हैं कि जो रिपोर्टर अपना दिमाग खुला रखेगा और खबर की तह में जाने की इच्‍छा रखेगा, वही अच्‍छा रिपोर्टर बन सकता है।

परवेज अहमद के मुताबिक एक अच्‍छे रिपोर्टर को अपने फील्‍ड के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। अपने बीट से जुड़े लोगों से उसका रोजमर्रा का संपर्क होना चाहिए। उसे अपने आप पर इतना नियंत्रण होना चहिए कि वो भावनाओं में बहे और खबरों को तथ्‍यों की छननी से छाने। परवेज कहते हैं कि जब रिपोर्टर समझ जाता है कि उसे क्‍या नहीं लिखना चाहिए और क्‍या नहीं बोलना चाहिए तो वो अच्‍छा रिपोर्टर बन जाता है।

प्रबल प्रताप सिंह के मुताबिक अपनी बीट पर लगातार घूमना, उससे जुड़ी जानकारियां हासिल करते रहना, अच्‍छे रिपोर्टर की पहली ड्यूटी है। अच्‍छा रिपोर्टर सबसे पहले जो कुछ करेगा, वो अपने दर्शकों के लिए ही करेगा। उसका दर्शक जो चाहता है, रिपोर्टर के प्रयास भी उसी दिशा में होने चाहिए। अच्‍छा रिपोर्टर वो है, जो इस बात का ध्‍यान रखता है कि उसने अब तक जो कुछ किया है, वो कम है और वो आगे ज्‍यादा हासिल करने की कोशिश जारी रखता है।

अच्‍छा रिपोर्टर बनने के लिए रिपोर्टर को, खबरों को लेकर सहारात्‍मक होना चाहिए सच्‍चाई और निष्‍पक्षता से उसे समझौता नहीं करना चाहिए। रिपोर्टर को तार्किक होना चाहिए और उसे खबरों का विश्‍लेषण, भावनाओं के आधार पर कभी नहीं करना चाहिए। रिपोर्टर में हर चीज को जानने की इच्‍छा होनी चाहिए। उसे हर चीज का मूल्‍यांकन व्‍यावहारिक तरीके से करना चाहिए। रिपोर्टर को कोई भी खबर तब तक अपने दर्शकों तक नहीं पहुंचाना चाहिए, जब तक खबरों से जुड़े नकारात्‍मक (निगेटिव) सवालों का पूरी तरह जवाब नहीं मिल जाए। रिपोर्टर को हर घटना पर शक करना चाहिए। इसका मतलब ये है कि जो कुछ सामने दिखाई दे रहा हो, उसे ही अंतिम सत्‍य नहीं मान लेना चाहिए। उसे सवाल उठाने चाहिए-

– जो भी घटना है, वो क्‍यों घटी?
– उसके पीछे किसका हाथ हो सकता है?
– उसका मकसद क्‍या हो सकता है?

ऐसे सवाल बहुत जरूरी हैं और घटनास्‍थल पर ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों से बात कर और पुलिस या अधिकारियों के सामने सवाल रख कर रिपोर्टर घटना की गहराई तक पहुंच सकता है और सच्‍चाई को सामने ला सकता है। किसी भी रिपोर्टर को खबरों की सच्‍चाई के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए। खबर देने से पहले उसकी सच्‍चाई की पुष्टि जरूर कर लेनी चाहिए। रिपोर्टर को निष्‍पक्ष होना चाहिए। अपनी खबरों में उसे सभी पक्षों को जगह देनी चाहिए।

रिपोर्टर को सही समाचार, तुरन्‍त इकट्ठा करने में माहिर होना चाहिए, उसे न्‍यूज खोज निकालने के गुण खुद में विकसित करना चाहिए। किसी घटना में न्‍यूज है या नहीं, रिपोर्टर को इसकी समझा होनी चाहिए। उसे किसी बात की छानबीन से परहेज नहीं करना चाहिए और हर स्‍तर के लोगों से खुलकर पूछताछ करनी चाहिए। रिपोर्टर जिन लोगों के बीच काम करता हो, उनके प्रति दायित्‍व का पूरा ज्ञान भी उसके लिए जरूरी है। हर खबर लिखने से पहले उसे ये जरूर ख्‍याल रखना चाहिए कि वो, जो कुछ बताने जा रहा है, उसका समाज या लोगों पर क्‍या असर होगा। उस खबर को लेकर क्‍या कोई विवाद हो सकता है और किस तरह के कानूनी पचड़े झेलने पड़ सकते हैं।

अच्‍छे रिपोर्टर का तेज-तर्रार होना भी जरूरी है। आसपास जो घटनाएं हो रही हों, उसे पकड़ने की क्षमता रिपोर्टर में होनी चाहिए। टेलीविजन का अच्‍छा रिपोर्टर वही बन सकता है, जिसे अपने टारगेट दर्शकों के बारे में पूरी तरह जानकारी हो। रिपोर्टर को पता होना चाहिए कि वो जिस स्‍टोरी को कवर कर रहा है, उसे देखने में समाज के किस तबके की रूचि ज्‍यादा हो सकती है।

रिपोर्टर को मूक दर्शक बनकार भी नहीं रहना चाहिए। उसे किसी ऐसी बात का पता चलता है, जिससे समाज का नुकसान हो सकता है, तो तुरन्‍त ऐसी साजिश या भ्रष्‍टाचार का भंडाफोड़ करना चाहिए। सामाजिक जागरूकता, लोगों के बीच पैठ और हर खबर से जुड़े इतिहास की जानकारी रखना, रिपोर्टर के लिए जरूरी है।

अच्‍छे रिपोर्टर को हर दिन नियमित रूप से अखबार जरूर पढ़ना चाहिए। अखबार आज भी न्‍यूज का सबसे बड़ा स्रोत है और इसमें छपी छोटी खबर बड़े स्‍कूप का स्रोत बन सकती है। रिपोर्टर की पीटीआई, भाषा या दूसरी समाचार एजेंसियों से मिलने वाली छोटी-छोटी खबरों पर भी नजर रखनी चाहिए।

इसके अलावा भाषा पर रिपोर्टर की पकड़ मजबूत होनी चाहिए। उसकी भाषा सरल और संयमित होनी चाहिए। शब्‍द ऐसे हों, जिसे ज्‍यादातर लोग समझ सकें। स्‍टोरी की भाषा ओर उसे कहने का अंदाज भी ऐसा होना चाहिए कि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग न केवल खबर समझ सकें, बल्कि खबर देने वाले रिपोर्टर पर भरोसा भी कर सकें। उसकी भाषा भड़काऊ और सनसनी फैलाने वाली नहीं होनी चाहिए। उसे इस बात का ख्‍याल रखन चाहिए। उसे इस बात का ख्‍याल रखना चाहिए कि स्क्रिप्‍ट को काई बार दोहराई न गई हो। उसकी लिखी स्क्रिपट सटीक (टाइट) होनी चाहिए। हर विषय का सही ज्ञान रिपोर्टर को उसके प्रोफेशन में काफी मदद करता है। रिपोर्टर का सामान्‍य ज्ञान अपडेट रहना चाहिए।

रिपोर्टर में हर दिन लम्‍बे समय तक काम करने ताकत होनी चाहिए। सरकारी दफ्तर के बाबू की तरह टीवी रिपोर्टर का काम निर्धारित समय के लिए नहीं होता। उसे हर दिन अमूमन सुबह दस बजे दफ्तर आना होता है और उसका कम तब तक खत्‍म नहीं होता,जब तक उसकी स्‍टोरी एयर न हो जाए यानी दर्शकों तक पहुंच न जाए। कई बार महत्‍वपूर्ण घटना देर रात घटे, तो मुमकिन है कि रातभर रिपोर्टर को सड़क पर ही खड़ा रहना पड़े।

टीवी रिपोर्टर को कम्‍प्‍यूटर पर टाइपिंग की जानकारी जरूर होनी चाहिए और वो भी तेज गति से। टेलीविजन में कागज पर स्क्रिप्‍ट लिखने का चलन नहीं है। उसे अपनी खबरें कम्‍प्‍यूटर पर ही टाइप कर देनी होती है। उसके अलावा टीवी न्‍यूज का हर काम कम्‍प्‍यूटर से जुड़ा होता है, उसलिए कम्‍प्‍यूटर चलाने का भी ज्ञान जरूरी है।

हंसमुख स्‍वभाव, अच्‍छा आचरण और आत्‍मविश्‍वास जैसे गुण भी एक रिपोर्टर को उसके प्रोफेशन में काफी आगे बढ़ा सकते हैं। अन्‍त में कह सकते हैं कि अच्‍छा रिपोर्टर वहीं है, जो अपनी खबरों को दर्शकों तक पहुंचाने से पहले, उसके हर पहलुओं की सावधानी से जांच करता है, निष्‍पक्ष होकर खबरें पेश करता है।

शैलेश: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान दैनिक जागरण के लिए रिपोर्टिंग। अमृत प्रभात (लखनऊ, दिल्ली) में करीब 14 साल तक काम। रविवार पत्रिका में प्रधान संवाददाता के तौर पर दो साल रिपोर्टिंग। 1994 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में। टीवीआई (बी.आई.टीवी) आजतक में विशेष संवाददाता। जी न्यूज में एडिटर और डिस्कवरी चैनल में क्रिएटिव कंसलटेंट। आजतक न्यूज चैनल में एग्जीक्यूटिव एडिटर रहे । प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 35 साल का अनुभव। अभी जल्द एयर होने वाले चैनल न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया का दायित्व संभाला है।

डॉ. ब्रजमोहन: नवभारत टाइम्स से पत्रकारिता की शुरूआत। दिल्ली में दैनिक जागरण से जुड़े। 1995 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में। टीवीआई (बी.आई.टीवी), सहारा न्यूज, आजतक, स्टार न्यूज, IBN7 जैसे टीवी न्यूज चैनलों और ए.एन.आई, आकृति, कबीर कम्युनिकेशन जैसे प्रोडक्शन हाउस में काम करने का अनुभव। IBN7 न्यूकज चैनल में एसोसिएट एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर रहे । प्रिंट और इलेक्ट्रॉंनिक मीडिया में 19 साल का अनुभव।

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फोटो साभार: openmedia.ca

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