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Monthly Archives: October 2015

वास्‍तविक खतरे के आभासी औजार

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अभिषेक श्रीवास्‍तव। ”मेरे ख्‍याल से हमारे लिए ट्विटर की कामयाबी इसमें है, जब लोग इसके बारे में बात करना बन्‍द कर दें, जब हम ऐसी परिचर्चाएं करना बन्‍द करें और लोग इसका इस्‍तेमाल सिर्फ एक उपयोगितावादी औजार के रूप में करने लगें, जैसे वे बिजली का उपयोग करते हैं। जब ...

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भूमण्‍डलीकरण, पूंजी और मीडिया

globlization

अकबर रिज़वी। मुख्‍यधारा का मीडिया दरअसल पिछले दो-ढाई दशकों में पॉप मीडिया के रूप में ढल गया है। इसे पॉप म्‍यूजिक और फास्‍ट फूड की तरह ही देखा जाना चाहिए। यह उसी नव-पूँजीवाद की कल्‍चर इंडस्‍ट्री में निर्मित मीडिया है, जिसका उद्देश्‍य लोगों को सूचना देना, शिक्षित करना या स्‍वस्‍थ ...

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लोकतान्‍त्रीकरण की चुनौती

Traditional-Media

पंकज बिष्‍ट। दुनिया भर में बड़े पैमाने पर एक ऐसे मध्‍यवर्ग का विस्‍तार हुआ है जो अपनी दैनंदिन जरूरतों से लेकर निजी और राजनीतिक हर तरह की समझ, दृष्टि और महत्‍वाकांक्षाओं तक के लिए मीडिया पर निर्भर हो गया है। यह निष्क्रिय और तटस्‍थ नागरिक बढ़ते उपभोक्‍तावाद का सबसे अच्‍छा ...

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Evolution of PR in India and its present status

public-relations

Professor Jaishri Jethwaney | The globalization of the Indian economy in the 1990s gave its rightful place to PR in India. The emergence of multi-national corporations on the scene in the early 1990s, the opportunities of foreign direct investment increased especially with the deregulation of industries. The market became suddenly ...

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महिला विकास और सशक्तिकरण एवं जनमाध्यम

Media-and-Women-Empowerment

निभा सिन्हा। समकालीन संदर्भ में जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में विज्ञापनों ने महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में लगातार प्रस्तुत कर नकारात्मकता पैदा करने का काम किया है। विज्ञापनों को देखे तो उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए महिलाओं के शरीर का उपयोग किया जा रहा है आजादी ...

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भाषाई पत्रकारिता: “अंग्रेजी इस देश में सोचने-समझने की भाषा तो हो सकती है लेकिन महसूस करने की नहीं”

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सुरेश नौटियाल। कई साल पहले, ब्रिटिश उच्चायोग के प्रेस एवं संपर्क विभाग ने नई दिल्ली में “भाषाई पत्रकारिता: वर्तमान स्वरूप और संभावनाएं“ विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया था। जनसत्ता के सलाहकार संपादक प्रभाष जोशी ने इस गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा था कि मैंने अपनी जिंदगी के नौ ...

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वीरेन दा का जाना : आएंगे उजले दिन, ज़रूर आएंगे…

viren-dangwal

अतुल सिन्हा। वीरेन डंगवाल उन पत्रकारों में कभी नहीं रहे जो सत्ता और सियासत के इर्द गिर्द अपनी पत्रकारिता को किसी ख़ास ‘मकसद’ से करते हैं। आजकल तो वैसे भी संस्थागत पत्रकारिता के अपने मायने हैं। पहले भी थे, लेकिन अब विशुद्ध रूप से व्यावसायिक हितों से जुड़े हैं। पत्रकार ...

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राजनीतिक-आर्थिक शक्ति और भाषा

Indian-Languages

प्रमोद जोशी। करीब डेढ़ हजार साल पहले यूरोप में उत्तरी और पश्चिम जर्मनी के एंग्लो सैक्सन कबीले और कुछ रोमन फौजियों ने इंग्लैंड और पूर्वी स्कॉटलैंड के आसपास रिहाइश शुरू की तो संवाद की कुछ अनगढ़ और गँवारू बोलियाँ विकसित हुईं। इनमें एक अंग्रेजी भी थी, जो ग्रीक और लैटिन ...

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