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महिला विकास और सशक्तिकरण एवं जनमाध्यम

निभा सिन्हा।

समकालीन संदर्भ में जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में विज्ञापनों ने महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में लगातार प्रस्तुत कर नकारात्मकता पैदा करने का काम किया है। विज्ञापनों को देखे तो उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए महिलाओं के शरीर का उपयोग किया जा रहा है

आजादी के 69 वर्षों के बाद आज भी भारत जैसे देश में समय की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बनी हुई है महिलाओं विकास और उनके सशक्तिकरण की। कई ऐसी समस्याएं जो देश के विकास में बाधक है उनका समाधान महिला सशक्तिकरण किए बिना असंभव है। अर्थव्यवस्था और राजनीति हो या शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता में सुधार की बात हो, महिलाओं की भूमिका के बगैर ये काम संभव नहीं है। लेकिन जहां लगभग अस्सी प्रतिशत महिलाएं ग्रामीण निरक्षर हैं, उनसे इन सभी भूमिकाओं को निभाने की उम्मीद तभी की जा सकेगी जब उन्हें अपनी इन क्षमताओं एवं अहमियत का पता हो।

संविधान ने महिलाओं को सभी तरह के अधिकार दे दिए, इन अधिकारों को लागू करने के लिए कानून भी बना दिए लेकिन इनका लाभ तो तब होगा जब महिलाओं को इनकी जानकारी होगी और यहां पर महत्वपूर्ण हो जाती है मीडिया की भूमिका। मीडिया की भूमिका के बगैर ये काम मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है। जनसंचार के विभिन्न माध्यम महिलाओं में जागरूकता लाकर, उन्हें अपने अधिकारों एवं भूमिकाओं के बारे में सजग बनाकर उनका सशक्तिकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं लेकिन महिलाओं की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि अभी इस मुद्दे पर काफी कुछ किया जाना बाकी है।

वर्तमान में महिलाओं की स्थिति
स्विट्जरलैंड के ठिकाने से काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था के 136 देशों के अध्ययन के मुताबिक स्त्री पुरूष के बीच अंतर की वैश्विक सूची में भारत एक सौ एकवें स्थान पर है। महिलाओं के स्वास्थ्य एवं जन्म के बाद उनके जीवित रहने के मामले में भारत एक सौ पैंतीसवें यानि नीचे से दूसरे स्थान पर है। आर्थिक भागीदारी में एक सौ चौबीसवें और शैक्षणिक उपलब्धियों के लिहाज से एक सौ बीसवें नंबर पर है।

हम प्रगति तब तक नहीं कर सकते जब तक राजनीति से लेकर अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त नहीं बना देते। शासन और नीतियों के स्तर पर कई बार प्रगति के तत्व देखने को मिल जाने के बावजूद हकीकत तो यह है कि महिलाएं आज भी व्यावहारिकता में हर तरह की समस्याओं से जूझ रही हैं। संसद में आज महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग ग्यारह प्रतिशत है। माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा तक केवल साढे़ छब्बीस प्रतिशत महिलाओं की पहुंच है और दुनिया भर में कुपोषण से मरने वाले बच्चों की तादाद भारत में ही सबसे ज्यादा है जिसमें अधिकतर संख्या बच्चियों की है।

जन्म से लेकर शिक्षा हासिल करने की बात हो या फिर कैरियर बनाकर शादी करने और बच्चा पैदा करने जैसे सवाल हो, आज भी महिलाओं को रूढ़िवादी सोच और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच वाले लोगों से कदम कदम पर जूझना पडता है। हमें इन बातों को समझना पडेगा कि कोई परिवार, समाज या देश महिलाओं को शिक्षित, स्वस्थ एवं वित्तीय रूप से सशक्त बनाए बगैर देश के विकास करने की सिर्फ कोरी कल्पना ही कर सकता है।

जनमाध्यमों की भूमिका
हांलाकि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में लगातार महिलाओं से संबंधित कार्यक्रमों के प्रसारण हो रहे हैं। प्रिंट मीडिया से लेकर रेडियो और दूरदर्शन इस विषय पर काम करता रहा है, प्राइवेट चैनलों ने भी महिलाओं से संबंधित कार्यक्रमों का प्रसारण आरंभ किया और इस दिशा में काफी बदलाव हुए भी हैं । लेकिन इन सबके बावजूद आखिर क्या वजह है कि इस क्षेत्र में अब तक कोई सार्थक सफलता नहीं मिली। यहां यह विश्‍लेषण करना अनिवार्य हो जाता है कि आखिर विभिन्न जनसंचार माध्यमों में महिलाओं को किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है और उनसे संबंधित कार्यक्रमों के विषय वस्तु किस तरह के हैं।

समकालीन संदर्भ में जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में विज्ञापनों ने महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में लगातार प्रस्तुत कर नकारात्मकता पैदा करने का काम किया है। विज्ञापनों को देखे तो उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए महिलाओं के शरीर का उपयोग किया जा रहा है।

यदि समाचार पत्रों से लेकर विभिन्न इलेक्‍ट्रोनिक माध्यमों के विज्ञापनों पर नजर डालें तो ऐसे विज्ञापन गिने चुने ही मिलते हैं जहां उसे उपभोग की वस्तु और बहुत ही पारंपरिक रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता है। विज्ञापन कंपनियां औरतों के सशक्तिकरण के लिए विज्ञापन नहीं बनाती बल्कि उनका उद्देश्‍य अपने सामानों की बिक्री बढ़ाना होता है और विभिन्न जनमाध्यमों को चलाने का काफी खर्च इन विज्ञापनों के माध्यम से आता है इसलिए बगैर किसी रोक टोक के यह व्यवसाय फल फूल रहा है। देखा जाय तो महिला विकास और सशक्तिकरण के प्रयासों पर विभिन्न जनमाध्यमों के इन विज्ञापनों का बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। आज हम अपने समाज को महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने की चाहे जितनी भी बातें कर लें लेकिन सच्चाई तो यह है कि एक बच्चा से लेकर वयस्क तक इन विज्ञापनों के माध्यम से जाने अनजाने महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में ही देखने लगता है। इतना ही नहीं, कहीं न कहीं ये विज्ञापन दर्शकों के मष्तिस्‍क पर ऐसा गहरा असर डालते हैं कि एक लड़की भी जाने अनजाने अपने आप को उसी रूप में देखना शुरू कर देती है और ये उसके दिमाग में इतना गहरा बैठ जाता है कि फिर उन्हें इनमें कुछ गलत भी नहीं लगता है और वे अपने आप को उसी रूप में आसानी से स्वीकार भी लेती है।

यदि समाचार पत्रों की बात करें तो लगभग सभी अंग्रेजी समाचार पत्रों से लेकर हिंदी समाचार पत्रों तक का पाठक वर्ग मुख्यतया शिक्षित पुरूष वर्ग होता है। इन पत्रों का मुख्य उद्देश्‍य समाचारों को लोगों तक पहुंचाना होता हैं। हांलाकि ये बहुत आसानी से महिला सशक्तिकरण जैसे सामाजिक परिवर्तन करने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं लेकिन ज्यादातर पत्र यथास्थिति बनाए रखने का काम कर रहे हैं। दुखद यह है कि इन पत्रों के तीसरे पन्नों में महिलाओं से संबंधित हिंसक और पैशाचिक घटनाएं खबर जरूर बन जाती है लेकिन तुलना की जाए तो उनके उत्थान और विकास की खबरों को कम तवज्जो दी जाती है। हिमालय पर चढ़ने और किसी राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय प्रतियोगिता में जीत हासिल करने जैसे समाचारों को पत्रों में जगह देते है लेकिन इन पर विशेष कवरेज बहुत कम ही समाचार पत्र या चैनल करते हैं ताकि लोगों को यह पता चल पाए कि उस सफलता के पीछे की कहानी क्या है।

कुछ समाचार पत्रों में महिलाओं के लिए अलग से पन्ने हैं लेकिन जिस तरीके से उनके विकास संबंधित मुद्दों पर लेखन की आवयकता है उसकी कमी यहां आसानी से देखी जा सकती है। इसकी एक वजह यह है कि अधिकतर समाचार पत्रों में अब भी निर्णायक स्तर तक पुरूषों की ही पहुंच है और इस विषय पर उनका रवैया उदासीनता का है। कुछ समाचार पत्रों एवं मैगजीन में यदि इस तरह के कुछ पहल हुए भी हैं तो वे समस्या की गंभीरता को देखते हुए काफी नहीं लगते। हांलाकि पहले के मुकाबले मीडिया उद्योग में महिलाओं की संख्या बढ़ी है और उनके द्वारा भी महिला सशक्तिकरण जैसे विषय पर काम करने की पहल हुई है लेकिन अधिकतर जगहों पर उनसे उम्मीद की जाती है कि वे फैशन, खान पान, सौंदर्य जैसे विषयों तक ही स्वयं को सीमित रखें। उन्हें उन निर्णायक पदों तक पहुंचने के लिए एक बार फिर उसी पुरूष प्रधान सोच से लड़ाई करनी होती है।

महिला विशेष मैगजीन की बात की जाय तो वहां भी वैसे लेखों और खबरों की संख्या ज्यादा है जो महिलाओं को अपने शारीरिक सौंदर्य, घरेलू कामों एवं पारंपरिक भूमिका में ज्यादा प्रस्तुत करता है। जबकि महिलाओं की आंकड़ेवार स्थिति को देखा जाय तो महिला सशक्तिकरण पर एक आंदोलन की आवश्‍यकता है। अधिकतर महिलाएं तो इन बातों से वाकिफ भी नहीं है कि उनकी स्थिति कितनी दयनीय है। अश्‍लील साहित्य तो महिलाओं की बिलकुल घिनौनी तसवीर प्रस्तुत करने में लगा है जिस पर कोई रोक टोक नहीं है और वह भी धड़ल्ले से पाठकों के लिए उपलब्ध है।

दूसरी तरफ, समाचार पत्रों एवं मैगजीन के साथ एक समस्या यह भी है कि महिलाओं तक इसकी सीधी पहुंच काफी सीमित हैं क्यों कि भारत जैसे देश में निरक्षर महिलाओं की संख्या लगभग अस्सी प्रतिशत है।

आज की तारीख में शहरों के साथ गांवों में भी रेडियो एवं टेलीविजन की जितनी व्यापक पहुंच हो गई है, इनका इस्तेमाल महिलाओं के विकास के लिए बहुत आसानी से किया जा सकता है। हांलाकि रेडियो और दूरदर्शन काफी समय से लोगों को महिलाओं से संबंधित विषयों पर कार्यक्रम प्रसारित कर रहा है लकिन वाकई इन कार्यक्रमों को उन पर क्या प्रभाव है और कहां चूक हो रही है, कितने लोगों को इनका फायदा पहुंच रहा है, इन सबके विश्‍लेषण के बाद उनमें परिवर्तन की आवश्‍यकता है। इसके लिए व्यापक स्तर पर रिसर्च एवं फीडबैक की जरूरत है। गांवों तक डीटीएच सुविधा को देखते हुए उन्हें सशक्त करने के लिए कार्यक्रमों को महिलाओं तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है। 24 घंटे चल रहे मनोरंजन चैनेलों पर महिलाओं को सिर्फ पारंपरिक रूप में न दिखाकर उनकी सशक्त छवि प्रस्तुत करना अनिवार्य है। उनके लिए विभिन्न प्रकार के शिक्षण एवं कला कौशल विकसित करने वाले कार्यक्रमों के प्रसारण के साथ स्वरोजगार संबंधित जानकारियां उपलब्ध कराने की जरूरत है। सफल महिलाओं के संघर्ष की कहानियों को वृत्तचित्र के रूप में दिखाने का काफी प्रेरणादायक असर हो सकता है। महिलाओं में सारी क्षमताएं है, जनमाध्यमों को जरूरत है उसे प्रेरित करके बाहर निकालने की।

महिलाओं को सशक्त करने के लिए उन्हें सिर्फ साक्षर नहीं बल्कि शिक्षित करना होगा। यदि एक महिला शिक्षित होती है तो एक कई लोगों को शिक्षित करने की ताकत पैदा होती है। वह अपना, अपने परिवार और अपने समाज में प्रेरणास्त्रोत बन जाती है। इसके लिए टेलीविजन पर नियमित रूप से कुछ कार्यक्रमों को प्रसारित किए जाने की जरूरत है। इन माध्यमों से एक बार उन्हें रास्ता दिखा जाए जाए तो आज इतने संसाधन मौजूद हैं कि वो अपने आप को काफी आगे तक ले जाने में सक्षम होंगी। उनकी शिक्षा के लिए सरकार के लिए समय समय पर कई तरह के स्कीम लाए जाते हैं लेकिन दुखद है कि उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। हमें यह समझना होगा कि बगैर शिक्षा के किसी भी तरह के कार्यक्रम को सफलता नहीं मिल सकेगी । शिक्षित नहीं होने के कारण ही वे धर्म के कट्टर निर्वहन एवं अंधविश्‍वासों में लगी रहती हैं और इसे अपने बच्चों में भी पोषित करती जा रही है, जिसका परिणाम यह है कि हमारा समाज विकास के पथ पर अग्रसर नहीं हो पा रहा है। रेडियो और टेलीविजन समाज की कुरीतियों, अंधविश्‍वासों के खिलाफ अभियान चलाकर उन्हें जागरूक कर सकता है। गांवों एवं कस्‍बों में महिलाओं की सफलता एवं संघर्ष संबंधी वृत्तचित्र आदि महिलाओं के प्रेरणास्त्रोत बन सकते है।

एक महिला सशक्त तभी होगी जब वह स्वस्थ होगी । एक स्वस्थ महिला ही अपने बच्चों एवं परिवार के स्वास्थ्य का ख्याल रख सकती है। स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता के लिए रेडियो और टेलीविजन पर कार्यक्रमों को दिखाए जाने की जरूरत है। सरकारी कार्यक्रमों के बारे में भी उन्हें जागरूक बनाना होगा। हांलाकि रेडियो एवं दूरदर्शन पर इस तरह के काय्रक्रमों का लगातार प्रसारण होता है, प्राइवेट चैनलों की भी देश के हर कोने में पहुंच को देखते हुए यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि कम से कम कुछ नियमित घंटों का प्रसारण महिलाओं के शिक्षा एवं स्वास्थ्य से संबंधित हो। भारत जैसे देश में पल्स पोलियो अभियान की सफलता यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए भी यदि हर स्तर पर अभियान चलाया जाए तो परिवर्तन की दर काफी तेज हो जाएगी।

महिलाओं को सशक्त करने के लिए यह अनिवार्य है कि जनमाध्यम उन्हें वित्तीय रूप से सशक्त बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के व्यवसाय कौशलों को सीखने, ऋण लेने आदि के बारे में जानकारियां उपलब्ध कराए। इस क्षे़त्र में सफल महिलाओं के अनुभवों को सा़क्षात्कार एवं वृत्त्चित्रों के माध्यम से दिखाकर दूसरी और महिलाओं को प्रेरित करे। स्वसहायता ग्रुप आदि के गठन के बारे में उन्हें विस्तार से जानकारी देकर लाभ पहुंचाया जा सकता है जिसका आरंभिक उद्देश्‍य महिलाओं को आर्थिक मदद देना, लघु बचत को बढावा देना और महिलाओं में रोजगार को बढ़ावा देकर आर्थिक रूप से सशक्त करना है।

इन सबके अलावा महिला सशक्तिकरण के लिए एक सबसे महत्वपूर्ण पहल करना होगा, वह है स्त्रियों के प्रति पुरूषों की मानसिकता में बदलाव का पहल। उनकी मानसिकता में बदलाव लाना होगा कि महिलाएं उनसे कम नहीं है और वे भी उनकी तरह हर तरीके का काम कर सकती है। उन्हें यह भी बताना होगा कि जहां भी संसाधन की कमी होती हैं स्त्रियां उन्हें अपने श्रम से किस तरह पूरा कर लेती हैं। पुरूषों को जागरूक करना होगा कि स्त्रियां यदि घरेलू है तो भी उनका श्रम एक परिवार की जिंदगी में कैसे मायने रखता है। यहां पर जनमाध्यमों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण करें जो न सिर्फ महिलाओं को सशक्त करने और उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए हो बल्कि पुरूषों को भी इनके बारे में जागरूक बनाए कि एक सशक्त महिला की उनकी जिंदगी में क्या अहमियत है। उनमें भी इस बात की समझ विकसित की जाए कि यदि महिलाएं पिछड़ी है तो उनमें पुरूष प्रधान समाज की सामंती सोच का भी दोष है और उनमें बदलाव लाना कितना अनिवार्य है।

महिलाओं के सशक्तिकरण अभियान में समाचार पत्रों, रेडियो एवं टेलीविजन के अलावा सिनेमा में भी कम ही महिलाओं को सषक्त रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। हांलाकि हाल के कुछ सिनेमा में महिलाओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत करने की पहल हुई है लेकिन दूसरी तरफ इन सिनेमा में धड़ल्ले से महिलाओं को आइटम नंबर के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है। जबकि इसके विपरीत उन्हें काफी सशक्त रूप में प्रस्तुत कर समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है।

महिलाओं को सशक्त करने के लिए उपरोक्त माध्यमों के अलावा पारंपरिक माध्यमों जैसे नुक्कड़ नाटक आदि का भी इस्तेमाल किया जा सकता है क्यों कि हमें यह नहीं भूलना होगा कि आज भी अस्सी प्रतिशत ग्रामीण निरक्षर महिलाओं तक पहुंचने की चुनौती है जहां हमें पारंपरिक जनमाध्यमों का इस्तेमाल करना ही होगा। पारंपरिक माध्यमों की खासियत यह है कि इससे लोग अपने आप को जुड़ा हुआ पाते हैं और अपना प्रतिबिंब उसमें देख पाते हैं।

महिलाओं के लिए इस तरह के कार्यक्रमों को प्रसारित करना होगा जिनमें वे मानसिक रूप से काफी सशक्त हैं और यह आत्म विश्‍वास लाना होगा कि कुछ भी काम ऐसा नहीं है जो वे नहीं कर सकती है। महिलाओं के सशक्त होने की एक अनिवार्य शर्त है कि लिंग भेद समाप्त हो। हर व्यक्ति यह समझे कि लड़के और लड़कियां दोनों बराबर है। सब को यह बताने की जरूरत है कि जो औरत पूरी सृष्टि की रचयिता है वह कमजोर नहीं हो सकती है। जरूरत है सोच में बदलाव की। जनमाध्यमों के द्वारा महिलाओं में इस सोच को पुख्ता करना होगा के यदि वे मनोभावनाओं की संकीर्णता से स्वयं को उपर उठाकर अपने आपको उत्पादक एवं व्यापक बना लें तो समाज की मुख्यधारा में शामिल होने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता। लेकिन जनमाध्यमों की जिम्मेदार भूमिका के बगैर इस सपने को सच करना नामुमकिन है।

निभा सिन्हा : स्वतंत्र पत्रकार एवं अतिथि व्याख्याता, समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में काम करने एवं पत्रकारिता संस्थानों में शिक्षण का लगभग पंद्रह वर्षों का अनुभव। ई-मेल – sinha_nibha@yahoo.com

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