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जयपुर साहित्य उत्सव: मीडिया में बिकता है, एंटरटेनमेन्ट, एंटरटेनमेन्ट, एंटरटेनमेन्ट

आशीष कुमार ‘अंशु’ |

जयपुर साहित्य उत्सव अपने ग्लैमर और विवादों की वजह से कई सालों से मीडिया में चर्चित रहा है। कभी सलमान रश्दी के आने की खबर की वजह से और कभी आशीष नंदी के बयान की वजह से। इस बार शोभा डे के एक सवाल पर करण जोहर के जवाब का एक हिस्सा दिखाकर मीडिया ने फिर जयपुर साहित्य उत्सव के साथ एक और विवाद जोड़ने का असफल प्रयास किया। जयपुर साहित्य उत्सव यदि जनवरी की जगह नवम्बर-दिसम्बर 2015 में हो पाता तो जरूर करण जोहर के बयान को राष्ट्रीय आपदा साबित करने में सोशल मीडिया से लेकर टीवी और अखबार कोई कमी नहीं छोड़ते। लेकिन पिछले कई महीनों से असहिष्णुता पर बात करते हुए भारतीय दर्शक और श्रोता अब थक गए हैं। अब विवादप्रिय मीडिया के विवादप्रिय दर्शक श्रोताओं को कुछ नया मसाला चाहिए।

जयपुर साहित्य उत्सव में सिर्फ विवाद होता है, ऐसा नहीं है। ऐसा दिखता है इलेक्ट्रानिक मीडिया की नजर से उत्सव को देखने से। वहां कई ऐसे परिसवंाद आयोजित किए जाते हैं, जो समाज और देश के सबसे अंतिम आदमी से जुड़ा होता है लेकिन वे मुद्दे हम सबसे जुड़े हुए होने के बावजूद मीडिया का ध्यान अपनी तरफ नहीं खींच पाते। समाज से जुड़े इन मुद्दों की परवाह हम सबको भी कम ही रह गई है? वर्ना उत्सव में मौजूद पत्रकार मित्रों की रूचि इन सत्रों में कम क्यों होती?

उत्सव में ऐसे आयोजनों की बात करें तो 21 जनवरी को मुगल टेन्ट में आयोजित रेड सिग्नल ग्रीन होप विषय पर बात करते जयराम रमेश, अलेक्स, वाल्मिक थापर और अजय माथुर ने कई महत्वपूर्ण सवालों को रेखांकित किया। वाल्मिक थापर ने यह किस्सा सुनाया कि किस प्रकार प्रधानमंत्री और मंत्री की सहमति के बावजूद कोई काम देश की सरकारी व्यवस्था में कमिटी ऑफ सेक्रेटरिज की पहल पर रूक सकती है। पिछले दिनों गंगा नदी का मंत्रालय संभाल रही उमा भारती ने एक साक्षात्कार में कहा कि एक आंदोलनकर्मी के तौर पर लगता था कि गंगा सफाई का काम कुछ महीनों में पूरा कर लूंगी लेकिन जब मंत्रालय संभाला तो समझ में आया कि मंत्री होकर व्यवस्था के अंदर काम करना और आंदोलनकर्मी होकर मांग रखने में जमीन आसमान का अंतर है।

भारतीय राजनीति से अधिक भारत की लाल फिताशाही नए विचारों के खिलाफ है। वह नहीं चाहती कि आम आदमी की भागीदारी भारतीय शासन में बढ़े। वास्तव में यह हम सबके लिए चिन्ता की बात होनी चाहिए।

बल्लाड ऑफ बंत सिंह। चार बाग में आयोजित बंत सिंह को सुनने के लिए इकट्ठे हुए अधिक लोगों को उस व्यक्ति का संघर्ष नहीं पता था। हम जैसों के लिए बंत सिंह इस साहित्य उत्सव के हीरो थे। पहली बार बंत सिंह का नाम पूणे के सामाजिक कार्यकर्ता बाबा आढ़व ने बताया था। उसके बाद बंत सिंह के संबंध में काफी कुछ पढ़ा। उनके संघर्ष को जाना। साहित्य उत्सव में अपने इस हीरो से मिलने का अवसर मिला। बंत सिंह एक अच्छे कवि और गायक हैं। वे आंदोलनकर्मी हैं। पंजाब के मानसा में मजदूरों के शोषण के खिलाफ वे जमीन्दारों के सामने एक चुनौती बनते जा रहे थे। उन्होंने स्थानीय मजदूरों को एक करना शुरू कर दिया। अपनी जमीन पैरों के नीचे खिसकते देख कर स्थानीय जमीन्दारों ने नफरत से भरकर बंत सिंह के दोनों हाथ काट दिए और एक पैर काट दिया। उन्हांेने सोचा था कि इस तरह वे जीत जाएंगे और बंत सिंह का हौसला टूट जाएगा। बंत सिंह ने उन्हें गलत साबित किया। बताया जाता है कि बंत सिंह पर हमला करने वालों का गहरा संबंध कांग्रेस पार्टी से था। बंत सिंह ने उस दिन साहित्य उत्सव में पंजाबी गीत से शुरूआत करते हुए अपनी कहानी से वहां मौजूद लोगों को भावूक कर दिया।

सुमन सहाय और स्टेफन अल्टर के बीच ‘आर वी ट्रीटिंग आवर प्लानेट राइट’ का सत्र हो या फिर ‘भाषा फ्रिइंग द वर्ड’ में के सचिदानंद को सुनना हो। ये सभी महत्वपूर्ण सत्र अपने अपने विषय पर लम्बी बहस की मांग करते हैं। भाषा का ही मुद्दा लें तो यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है। इससे जुड़े कई सवाल हैं जिस पर भाषा के विद्वान एक मत नहीं हो पाएं हैं। मसलन भाषा और लिपी का संबंध। भाषा और बोली के बीच का अंतर। इन सवालों से भाषा के सत्र में मौजूद विद्वानों को भी टकराना पड़ा। स्वच्छ भारत से लेकर मेक इन इंडिया जैसे बहस भी महत्वपूर्ण थे मगर राष्ट्रीय मीडिया की नजर से दूर रहे।

वैसे डर्टी पिक्चर का एक संवाद का सहारा लेकर जयपुर साहित्य उत्सव को परिभाषित करने का कोई प्रयास करेगा तो यही लिखेगा कि जयपुर साहित्य उत्सव पूरी दुनिया में एक सफल साहित्यिक उत्सव तीन वजहांे से बन गया है। यह तीन वजह हैं, एंटरटेनमेन्ट, एंटरटेनमेन्ट और एंटरटेनमेन्ट।

क्योंकि जिन गम्भीर चर्चाओं की वजह से इसकी पहचान बननी चाहिए थी। वह पहचान मीडिया रिपोर्ट से नहीं बन पा रही है।

यूं तो जयपुर साहित्य उत्सव सबके लिए खुला है। लेकिन आम लोगों का यह उत्सव अपने तेवर में बेहद खास किस्म के आम लोगों का उत्सव बनता जा रहा है। जिसका इंतजार अब भारत और भारत के बाहर के साहित्य प्रेमियों को भी पूरे साल रहने लगा है

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