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इंटरनेट संचार, पब्लिक स्फ़ीयर और आभासी लोकतंत्र

शिवप्रसाद जोशी …

अमेरिकी शिक्षाविद् और समाजशास्त्री जॉन फ़िस्के ने 1989 में प्रकाशित अपनी किताब “अंडरस्टैंडिंग पॉप्यूलर कल्चर” में मार्केट ताक़तों और उत्पादों की टकराहटों के जो नज़ारे खींचे थे वे कमोबेश बने हुए हैं और फ़िस्के ने उत्पादों के प्रति “मास” के रवैये के बारे में जो दृष्टिकोण बनाया था वो सही साबित हो रहा है. इंटरनेट और न्यू मीडिया नवउपनिवेशवाद का एक औजार ही बनकर रह जाता अगर उसे “यूज़” करने वाला तबका अपने मनमुताबिक उसे ढालना शुरू न कर देता. “यूज़र तक आते आते उत्पाद कई ढंग से परिवर्तित होता चला जाता है. ये परिवर्तन या रूपांतरण कंपनी की स्ट्रेटजी से नहीं उपभोक्ता के दबाव से होते हैं. फ़िस्के ने अपनी किताब में जींस के हवाले से इसे समझाया था. आज इसे इंटरनेट के विभिन्न सरदारों की टकराहटों और प्रतिद्वंद्विता और न्यू मीडिया इस्तेमाल करने वाले लोगों समुदायों की प्रतिक्रिया में देखा पढ़ा समझा जा सकता है. जैसा कि ब्लू जीन्स और रॉक संगीत स्वतंत्रता, स्वच्छंदता और लोकतंत्र का प्रतीक बने वैसे ही शायद सूचना तकनीकी का ये भी अपना जैज़ है.

आभासी और विरोधाभासी न्यू मीडिया

फ़रवरी 2004 में इंटरनेट पर प्रकट हुआ फ़ेसबुक आज 50 अरब डॉलर से ज़्यादा की कंपनी है. उसके यूज़र्स की संख्या भी 50 करोड़ को पार कर गई है. सोशल नेटवर्किग की वेबसाइट फ़ेसबुक की अभूतपूर्व उपलब्धियां ऐसे समय में आई जब दुनिया में सबसे ज़्यादा देखी जाने वाली पांचवी वेबसाइट और 13-14 साल पुरानी और स्टाफ़, बुनियादी ढांचे और बजट के लिहाज़ से टॉप टेन वेबसाइट्स की खरोंच सरीखी विकीपीडिया जैसी वेबसाइट के संचालक जिमी वेल्स को यूज़र्स से साइट को चलाए रखने के लिए आर्थिक मदद की अपील करते रहनी पड़ी.(उसके नतीजे भी निकले और विकीपीडिया को बड़ा डोनेशन मिला है अपने मुरीदों से.)

2014 में दस साल पूरे करने वाले फ़ेसबुक ने भावना और रोमान और संबंधों का एक रहस्य भरा कुछ असली कुछ नकली और भावावेग से संचालित नेटवर्क खड़ा किया. वहां कोई हंस गा सकता है आंसू बहा सकता है रिश्ते तोड़ या बना सकता है, नौकरी पा सकता है नौकरी खो सकता है, चोरी कर सकता है और एक ऐसी दुनिया में डूबा रह सकता है जहां तैर कर किनारे लगने की गुंजायशें कम ही रखी गई हैं. अब तो फ़ेसबुक के अवसान की बातें भी उठने लगी हैं. हालांकि 2014 में उसने स्मार्ट फ़ोन पर उपलब्ध व्हॉट्सएप नाम की अति लोकप्रिय एप्लीकेशन को भी 19 अरब डॉलर में ख़रीद कर नये मीडिया बाज़ार में सनसनी फैला दी. फ़ेसबुक के मालिक ज़ुकरबर्ग का कहना था, “ऐसा सौदा पहले कभी नहीं हुआ.”

फ़ेसबुक की वाणिज़्यिक और सामाजिक लोकप्रियता ऐसे समय में आई थी जब विकीलीक्स नाम की वेबसाइट के प्रमुख जुलियन असांज ने अमेरिकी दूतावासों के लाखों गोपनीय केबल्स को सार्वजनिक कर दिये थे. करोड़ों की संख्या में लोगों ने उन केबल्स को देख पढ़ा. अमेरका के लिए काटो तो खून नहीं के हालात बने. विकीलीक्स को आर्थिक समर्थन दे रही ई-बैकिंग कंपनियों ने एक एक कर हाथ खींच लिए. जिस सर्वर पर विकीलीक्स चल रही थी उस सर्वर कंपनी ने अपने दरवाज़े बंद कर दिए. असांज के पास दफ़्तर नहीं था, उन्हें संसाधनों के लिए भागमभाग करनी पड़ी. स्वीडन की सरकार ने यौन शोषण के विवादास्पद आरोपों को लेकर असांज के खिलाफ यूरोपीय गिरफ़्तारी का वॉरंट निकाला और अंतत: असांज ने ब्रिटिश पुलिस के समक्ष समर्पण किया लेकिन उन्होंने दुनिया से अपने काम को गैरक़ानूनी और अनैतिक हमलों से बचाने की अपील भी की. असांज को जेल तो हुई लेकिन टाइम पत्रिका ने जब सबसे महत्त्वपूर्ण और चर्चित व्यक्ति के लिये ऑनलाइन वोटिंग कराई तो जूलियन असांज के पक्ष में सबसे ज्यादा मत पड़े. उन्होंने लोकप्रियता में पॉप स्टार लेडी गागा और बराक ओबामा को काफ़ी पीछे छोड़ दिया. बाद के घटनाक्रम में ब्रिटेन असांज को स्वीडन प्रत्यार्पित करने का मन बना ही चुका था कि उन्हें लंदन स्थित इक्वाडोर के दूतावास में शरण मिल गई.

पूरी दुनिया में वेब पत्रकारिता का ये अपने किस्म का पहला उदाहरण था जिसने सूचना की सत्ता के सारे स्तंभ छिन्न-भिन्न कर दिये. दूसरे शब्दों में कहें तो असांज ने वेब और ऑनलाइन न्यूज़ की अलग ही परिभाषा गढ़ दी. असांज का काम इसलिए विकट और अभूतपूर्व और प्रभावित करने वाला था कि वहां गोपनीय सूचनाओं को जारी करने का जोखिम उठाया गया ये नज़रअंदाज़ करते हुए कि ये सूचनाएं दुनिया के सबसे बड़ी दबंग अमेरिकी सत्ता से जुड़ी हैं. अमेरिका ने विकीलीक्स के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई के लिए कोशिशें की. जनवरी 2011 में अमेरिका ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट ट्विटर को आदेश दिया है कि वो विकीलीक्स से जुड़े कई लोगों की निजी जानकारियां उपलब्ध कराए. जब अमेरिकी एजेंट एड़ी चोटी का ज़ोर लगाकर विकीलीक्स को वेब की दुनिया से धकेलने की तैयारी कर रहे थे, उन्हीं ख़तरनाक कगारों से मिरर वेबसाइट्स प्रकट हो गईं. विकीलीक्स को गिरने नहीं दिया गया. दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त के ख़िलाफ़ ये अघोषित अदृश्य “युद्ध” था. इंटरनेट के ये मानो छापामार दस्ते थे. वे तकनीकी के जानकार “गुरिल्ले” जो समूह भी थे और एक व्यक्ति भी. प्रतिरोध की ये प्रणाली “नेशन-स्टेट”(राष्ट्र-राज्य) के लिए ख़तरे की घंटी बन गई. चे ग्वेरा की कही बात को हम न्यू मीडिया के संदर्भ में रखकर देख सकते हैं कि “आई एम नॉट अ लिबरेटर, लिबरेटर्स डू नॉट एक्सिस्ट, पीपल लिबरेट देमसेल्व्ज़.”( मैं मुक्तिदाता नहीं हूं. मुक्तिदाताओं का कोई अस्तित्व नहीं, लोग अपने दम पर ख़ुद को मुक्त करते हैं.)

न्यू मीडिया ऐसे ही भीषण दुस्साहस की मांग कर रहा है. आने वाले वक़्तों में वो न जाने क्या मांग कर गुज़रेगा. प्रतिरोध और अराजकता के आसपास अलग क़िस्म के युद्ध तो उसने छेड़ ही दिए हैं. यूरोप से लेकर अमेरिका चीन और लातिन अमेरिका तक सूचनाओं की हैकिंग और वेबसाइटें ठप करने के आरोप हाल के वर्षों में खूब लगाए जाते रहे हैं. साइबर स्पेस अपने साथ अगर एक मनमोहक आज़ादी, लोकतंत्र की चहलक़दमी, मानवीयता, साहस और बराबरी लेकर आया है तो साइबर वॉर भी लेकर आया है. साइंस फ़िक्शन के नज़ारे वास्तविक होते जा रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय संचार में एक प्रमुख बिंदु बन गए न्यू मीडिया आखिर कितना लोकतांत्रिक है. क्या “साइबर नागरिक” हमारे “आधिकारिक” लोकतंत्रों के नागरिकों से ज़्यादा अधिकारसंपन्न और आवाज़संपन्न है? क्या उसके पास ज़्यादा सहूलियतें और बेफ़्रिकियां हैं? एक इससे भी ज़्यादा मौजूं सवाल ये है कि “साइबर नागरिक” क्या अस्तित्व में आ गया है. क्या “ऑनलाइन समुदाय” वास्तव में एक समांतर समुदाय है? क्या वो कोई “देश” है जिसका किसी राष्ट्र की संप्रभुता से लेना देना नहीं?  भारत जैसे देशों में जहां आधी से ज़्यादा आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं वहां इस न्यू मीडिया क्रांति के क्या माने हैं? क्या ऑनलाइन “देश” में इन वंचितों की जगह भी है?

वर्ल्ड वाइड वेब के आने से जो इंटरनेट सिस्टम कुछेक कम्प्यूटर दिग्गजों और बुलेटिन बोर्डो का इस्तेमाल करने वाले जानकारों तक सीमित था, जिसका इस्तेमाल अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान को और ताक़तवर और खुफ़िया और किलेबंदी में सुरक्षित रखने के लिए किया गया था वो इंटरनेट आम जनता के बीच चला गया. आम जन के बीच जाने के बाद फिर क्या था. 21वीं सदी की शुरुआत में करोड़ों वेबसाइटें और अरबों वेबपेज अस्तित्व में आ गए. व्यक्ति, सरकार, संगठन, संस्थान, बैंक कंपनियां और विचार का प्रतिनिधित्व करने वाली लाखों करोड़ों वेबसाइटें अब हैं. एक ऐसी दुनिया कम्प्यूटर के इर्दगिर्द जमा हो गई है जिसे वर्चुअल(आभासी) दुनिया कहा जाता है लेकिन वास्तविक दुनिया और ये दुनिया इतनी एकमेक और परस्पर निर्भर है कि आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि कम्प्यूटर मशीन है या आदमी मशीन. साइंस फ़िक्शन में जैसे बीता हुआ भविष्य संभव है, वर्ल्ड वाइड वेब की दुनिया ने दिक् काल का ऐसा ही सनसनीखेज़ रुपातंरण कर दिया है.

वर्चुअल डेमोक्रेसी की सच्चाई

वेब ने सूचना और समाचार के अभिजात्यवाद को दरकिनार कर उसे सार्वजनिक और आम गलियारा बना दिया है. वेब की इन विशेषताओं ने उसे एक वर्गविहीन स्वरूप भी दिया है. वो एक वर्ग से संचालित और नियंत्रित नहीं रहता, उस पर एक तरह से सबका अधिकार हो जाता है. यहीं पर वो बहस आती है कि क्या ये डिजिटल डेमोक्रेसी है. क्या न्यू मीडिया में ये संभव है कि लोकतंत्र की प्रतिष्ठा की जा सके.

उसके मुरीदों का एक ऐसा वर्ग उभर आया है जो मानता है कि न्यू मीडिया एक अनूठे लोकतंत्र का सर्जक भी है और उसकी ज़मीन भी. तकनीकी के इस नियतिवाद(टेक्नोलजिकल डिटरमिनिज़्म) के प्रति “श्रद्धा” इतनी अगाध है कि इसे राष्ट्र-राज्य के विलीन होते जाने के वाहक के रूप में देखा जाने लगा है. लेकिन ठेठ वामपंथी दायरे में नहीं बल्कि न्यू मीडिया की ही तरह आगे बढ़कर एक एनकारकिस्ट डेमोक्रेटिक अंदाज़ में. अमेरिकी कवि, निबंधकार और प्रमुख अराजकतावादी चिंतक जॉन पैरी बारलो ने अपने निबंध ‘साइबरस्पेस के लिए आज़ादी का घोषणापत्र’ में कहा है कि राष्ट्रीय सरकारों का ऑनलाइन समुदायों पर कोई अधिकार नहीं है. वे लिखते हैः “औद्योगिक विश्व की सरकारों, इस्पात और मांस के तुम निढाल दानवों, मैं साइरबरस्पेस से आता हूं, बुद्धि का नया घर…जहां हम जमा होतें हैं वहां तुम्हारी कोई संप्रभुता नहीं चलेगी…… मैं घोषणा करता हूं कि जो वैश्विक सामाजिक स्पेस हम निर्मित कर रहे हैं वो स्वाभाविक रूप से तुम्हारी थोपी हुई दमनकारी सत्ताओं से मुक्त है. हम पर शासन का तुम्हारा नैतिक अधिकार नहीं है. हम तुम्हारे ज़ोर आज़माइश के तरीक़ों से नहीं घबराते…..साइबरस्पेस तुम्हारी सीमाओं में नहीं आता. मत सोचो कि तुम इसे निर्मित कर सकते हो, कि ये कोई सार्वजनिक निर्माण परियोजना है. तुम ऐसा नहीं कर पाओगे. ये कुदरत का एक काम है और हमारे सामूहिक प्रयासों से ये ख़ुद ही पनपता रहता है.” इस तरह बारलो अपने इस मैनिफ़ेस्टो सरीखे उद्गार में न्यू मीडिया को एक मुक्तिदायिनी राह मानते हैं. उनकी नज़र में युद्ध जीता जा चुका है और नतीजा तय हो चुका है. न्यू मीडिया के ज़रिए एक समांतर लोकतंत्र एक समांतर दुनिया, एक वर्गविहीन समाज का निर्माण, “बुद्धि” की एक नई “प्रजाति” का उदय. 1996 में लिखे इस चर्चित आलेख में बारलो कहते हैं कि “हम साइबरस्पेस पर बुद्धि की सभ्यता की रचना करेंगे. उम्मीद है कि वो उस विश्व से ज़्यादा मानवीय, ज़्यादा ईमानदार होगी जो तुम्हारी सरकारों ने बनाया है.” उनका ये लेख इलेक्ट्रॉनिक फ़्रंटियर फ़ाउंडेशन नाम के संगठन की वेबसाइट में प्रकाशित है जिसका दावा है कि वो डिजिटल दुनिया में अधिकारों की रक्षा के लिए काम करती है. उद्बोधन का लिंक देखें- Click here

लेकिन इस अवश्यंभाविता की मान्यता का विरोध किया है न्यू-लेफ़्ट(नव-वाम) आंदोलन के पुरोधाओं में एक ब्रिटिश उपन्यासकार, समाजशास्त्री और मीडिया चिंतक रेमंड विलियम्स ने. उनका कहना है कि न्यू मीडिया दुनिया के तमाम अन्यायों, अत्याचारों, नाइंसाफ़ियों ज़्यादतियों और सत्ता निरंकुशताओं को ठिकाने लगा कर एक समांतर समानता आधारित दुनिया कायम कर देगा या एक स्वस्थ और मज़बूत और टिकाऊ लोकतंत्र बना देगा, ऐसा मानना एक रेटरिक के हवाले ख़ुद को करना है. क्या नेट पर आने वाले लोगों को यूज़र्स न कहकर पब्लिक कहा जाएगा. क्या न्यू मीडिया तक आम आदमी की पहुंच बन गई है. क्या वो मीडिया समाज और देश के हाशिए पर रहने वाले लोगों तक चला गया है. क्या वो कभी जा पाएगा. क्या ऐसे में साइबर सिटीज़न संभव है या जिन ज़्यादातर हाथों में न्यू मीडिया का संचालन हैं, जो न्यू मीडिया की कंपनियां हैं वे सिटीज़न चाहेंगी. या उन्हें यूजर्स या कन्ज़्यूमर्स ही चाहिए होंगे. रेमंड विलियम्स ने लिखा है कि विभिन्न संस्कृतियां और विभिन्न राजनैतिक सत्ताएं अपने अपने ढंग से नवजात टेक्नोलज़ीस का इस्तेमाल करती हैं. उन्होंने इसके लिए ब्रिटेन, अमेरिका और नात्सी जर्मनी में टीवी के प्रारंभिक इतिहास का ज़िक्र भी किया. विलियम्स के मुताबिक नई टेक्नोलज़ीस का उभार सामाजिक सांस्कृतिक राजनैतिक क़ानूनी और आर्थिक ताक़तों के जटिल अंतर्संबंधों से पैदा होता है. विलियम्स के मॉडल में न्यू मीडिया का इम्पैक्ट इवोल्युश्नरी है रिवोल्युश्नरी नहीं. (विलियम्स की किताब टेलीविज़नः टेक्नोलजी एंड कल्चरल फ़ॉर्म के गूगल बुक्स पर प्रकाशित अंशों से)

न्यू मीडिया में लोकतंत्र की अवश्यंभाविता के पक्षधरों से इतर फ़्रांसीसी मीडिया विशेषज्ञ और साइबर कल्चर अवधारणा के अग्रणी चिंतक पियरे लेवी जैसे लेखकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो संयमित होकर ये मानता है कि न्यू मीडिया की सूचना संस्कृति एक “सामूहिक बौद्धिकता” की संस्कृति का उभार है.(सामूहिक बौद्धिकता का कंसेप्ट सबसे पहले लेवी ने ही 1994 में पेश किया था.) विचार विनिमय और भागीदारी की ये संस्कृति सत्ता के स्थापित ढांचों, बहुराष्ट्रीय निगमों और राष्ट्र-राज्यों के बगल में ही खड़ी रहती है, उसके कभी गले मिलती हुई कभी उससे टकराती हुई. ये एक म्यूचवल(पारस्परिक) स्थिति की सूचना संस्कृति है. इंटरनेट तकनीकी के बारीक अध्ययन से पियरे लेवी ने पाया कि “सामूहिक बौद्धिकता” का ये हासिल किया जा सकने वाला युटोपिया तो है लेकिन पहले से हासिल कर ली गई स्थिति ये नहीं है. क्योंकि जिस दुनिया में हम रह रहे हैं ये वो दुनिया नहीं है जहां आज़ादी सुनिश्चित है. क्योंकि नियंत्रण और नियमन के तरीके साइबरस्पेस में हमारे इंटरेक्शन(अंतःक्रिया) को निर्धारित करने वाले ऑपरेश्नल कोड्स में अंतर्गुंफित हैं. ये साइबरस्पेस का लोकतंत्र विरोधी रवैया है. हम आज़ादी की नींद में गोते लगाते हुए नियंत्रण के बाड़े में जा फंस सकते हैं. (हेनरी जेनकिंस और डेविड थोरबर्न की किताब डेमोक्रेसी एंड न्यू मीडिया की प्रस्तावना से)

 इंटरनेट क्या हमें मुक्त कर सकता है. इस सवाल से जूझते हुए अमेरिकी चिंतक रॉबर्ट मैकचैस्नी ने अपनी किताब रिच मीडिया, पुअर डेमोक्रेसी में लिखा है कि इंटरनेट और वेब के संसार में निश्चित रूप से कंटेंट के कुछ नए खिलाड़ियों का उदय होगा लेकिन डिजिटल संचार की सामग्री कुल कमोबेश वैसी ही रहेगी जैसे डिजीटल संचार के पहले के मीडिया विश्व की सामग्री. मैकचेस्नी के मुताबिक वेब में गैर व्यवसायिक नागरिक आवाज़ें भी हैं लेकिन इन आवाज़ों की वेब संचालन मशीनरी में कोई केंद्रीय जगह नहीं बन पाई है. समूचे वेब संसार में ये आवाज़ें और लोकतंत्रकारी शक्तियां हाशिए पर ही हैं. तो सिर्फ़ ये कहना कि तकनीक के सहारे लोगों की ज़िंदगियां बदली जा सकती हैं, या वेब-तकनीकी लोगों की ज़िंदगियों में बदलाव ले आएगी और एक जीवंत और ठोस लोकतांत्रिक पब्लिक स्फ़ेयर इंटरनेट पर उपलब्ध होगा, ये कहना जल्दबाज़ी है. नीतियां विफल हो जाएं तो ऐसे में इंटरनेट से ये उम्मीद पालना ख़ुद को बहलाने जैसा है.

इस सिलसिले में मैक्चैस्नी, अमेरिकी अख़बार द न्यू यॉर्क टाइम्स में छपी एक टिप्पणी का भी ज़िक्र करते हैं कि, जो बड़ा है वो ज़्यादा हासिल कर लेता है और जो छोटा है वो ग़ायब ही हो जाता है. इस तरह इंटरनेट में एक प्रतिस्पर्धी आग्रह नहीं बन पाता. इसके बदले वो एकाधिकार(मोनोपली) और अल्पाधिकार(आलिगापली) के लिए ही उकसाता है. मैक्चैस्नी की किताब 1999 में आई थी आज क़रीब डेढ़ दशक बाद हम एक भरीपूरी, समृद्ध और अपार गहमागहमी से भरी इंटरनेट की दुनिया को देखते हैं तो पाते हैं कि वहां उन्हीं मीडिया समूहों, कंपनियों का बोलबाला है जिनका पूरी दुनिया के मीडिया बाज़ार पर पहले से क़ब्ज़ा है. इंटरनेट को मुनाफ़े की मशीन न बनाकर इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के विस्तार में उतारने की पहल के लिए जगहें कम हैं और मीडिया समूहों की कोशिश रहती है कि इंटरनेट को मुक्ति का टूल हरग़िज़ न बनने दिया जाए, इसे बस एक कमोडिटी एक उत्पाद के रूप में ही विकसित किया जाए.

लेकिन ये भी मानना ही चाहिए कि इंटरनेट को लाख कंपनियां और सरकारें अंकुश में रखना चाहें, उसे अपने ढंग से संचालित करें फिर भी कुछ कोने इस वर्चुअल दुनिया के ऐसे हैं जो लाख कोशिशों के बाद भी सत्तावादी आग्रहों और सरकारी नियंत्रणों को धता बताकर अपनी प्रतिरोधी कार्रवाइयों में लगे हैं. विकीलीक्स का उदाहरण हमारे सामने हैं. 2012-13 में एडवर्ड स्नोडेन का मामला भी हमारे सामने आ चुका है. अमेरिका के खुफ़िया तंत्र के इस सिपाही ने अंतरराष्ट्रीय नागरिक जवाबदेही के आधार पर जो खुलासे वेब पर लीक किए उसने पूरी दुनिया में अमेरिका बनाम अन्यों के बीच संबंधों के संतुलन को डगमगा दिया.

न्यू मीडिया की बहसें और भारत

इसीलिए ये समय न्यू मीडिया के राजनैतिक और सामाजिक इम्पैक्ट पर एक बड़ी व्यापक बहस छे़ड़ने का भी है. अभी आम जनता की इस तकनीकी प्रवीण समाज में कोई जगह नहीं है, उनके लिए जगह कैसे बनेगी कैसे उन्हें सिर्फ़ सुनाया या दिखाया या पढ़ाया जाता रहेगा और प्रतिक्रिया के लिए “आमंत्रित” या भावनात्मक रूप से “विवश” किया जाता रहेगा जैसा कि मीडिया के पारंपरिक स्वरूपों के ज़रिए होता ही रहा है. न्यू मीडिया तभी वास्तविक अर्थो में नया कहलाएगा जब वहां भागीदारी जन जन की हो उसके सृजन में भी और उसके वास्तविक उपयोग और उपयोग के निर्धारण में भी.

भारत में अभी भी ज़्यादातर समाचार वेबसाइट्स स्थापित मीडिया घरानों द्वारा चलाई जा रही हैं और अधिकांशत उनके प्रिंट संस्करण का ही डिजिटल रूप हैं. न्यू मीडिया ने मुख्यधारा के मीडिया के किले में सेंध ज़रूर लगाई है लेकिन अभी भी ये मीडिया उन्हीं अभिजात तबकों उन्हीं रईस घरानों उद्योगपतियों और दबदबे वाले गणमान्यों के पास है जो मुख्यधारा के मीडिया को भी चलाते हैं.

सोशल नेटवर्किंग साइट्स से इतर एक यू ट्यूब कल्चर भी न्यू मीडिया में पैठ बना चुका है. यू ट्यूब का नारा ही है “ब्रॉडकास्ट यॉरसेल्फ़.” यानी ख़ुद को प्रसारित करो. यू ट्यूब में आज करोड़ों की तादाद में वीडियो अपलोड किए जाते हैं. हर तरह के वीडियो हैं. नाच गाने से लेकर भाषण मनोरंजन और विचार तक. यू ट्यूब की संगीत और फ़िल्मों की ऋखंलाएं बड़ी लोकप्रिय हैं. यू ट्यूब भले ही मासमीडिया का एक उत्पाद है, लेकिन इस सांस्कृतिक उत्पाद और मास कल्चर के वाहक को लोगों ने पॉप्युलर कल्चर के रूप में तब्दील कर दिया है. वहां बुश पर भी मज़ाक है, ओबामा पर भी और शख़्सियतों के, अपरिचितों के अजीबोग़रीब वीडियो लम्हे अपलोड किए गए हैं. भारत में भी अब मुख्यधारा का टीवी मीडिया यू ट्यूब की मदद लेता है. रिपोर्टर अपनी रिपोर्ट यू ट्यूब पर अपलोड कर रहे हैं. अपनी इच्छा को अपलोड करने की लालसा को यू ट्यूब ने कुछ ऐसा सुलगाया है कि मोबाइल फ़ोन से वीडियो बनाकर धड़ल्ले से वहां भेजे जा रहे हैं. ज़ाहिर है इसमें कुछ नियंत्रण भी यू ट्यूब संचालकों ने रखा है.

लोगों के लिहाज से देखें तो अध्ययन यही बताते हैं कि अभी तक कुछ मु्ठ्ठी भर लोग ही समाचार और विचार के लिये इंटरनेट पर बैठते हैं और अधिक आबादी इंटरनेट का उपयोग ईमेल,चैटिंग,विशेष जानकारी हासिल करने और शोध-अध्ययन के लिये ही करती है. समाचार के लिये वो कंप्यूटर पर बैठने की बजाय टेलीविज़न का स्विच ऑन करना या अख़बार उठाना बेहतर समझती है. शहरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय किशोर और युवा पीढ़ी के नुमायंदे दोस्तों से ऑनलाइन चैटिंग कर लेते हैं लेकिन अपने आसपास के समाज और समुदाय जिसमें वे रहते हैं उससे कटे हुए हैं. भारत का एक फ़ेसबुक समुदाय वहां न जाने कितने किस्म के इज़हार में व्यस्त है लेकिन वास्तविक जीवन में उसके सरोकार और चिंताएं बदल जाती हैं. जितना हड़बड़ी में वो अपने वास्तविक जीवन में सुबह शाम दिखता है. फ़ेसबुक पर या गूगल पर या ट्विटर पर वो ख़ुद को एक मस्तमौला बेफ़िक्र और बिंदास अंदाज़ में पेश करता है.

इसलिए न्यू मीडिया से सूचना की डेमोक्रेसी बन जाने की बात हजम नहीं होती. उसके लिए भी निरंतर एक हाशिये का मीडिया बनाते बनते रहने होगा. जैसे न्यू मीडिया की मुख्यधारा के किनारों पर हाशिए का न्यू मीडिया आ गया है. असांज का न्यू मीडिया ऐसा ही है. भारत में विभिन्न भाषाओं में सक्रिय कई ब्लॉग ऐसे ही हैं. कई वेबसाइटें ऐसी हैं जो सत्ता की परवाह नहीं करती और किसी भी क़िस्म की सत्ताओं के दमन से टकराने के लिए तैयार रहती हैं.

ब्लॉगोस्फ़ियर

न्यूज़मेकिंग और इंफ़ोर्मेशन की मुख्यधारा का ऐसा ही हाशिया है वेबलॉग जिसमें से स्वतःस्फूर्त ढंग से ‘ब’ निकलकर ‘लॉग’ के साथ लग गया और ब्लॉग बन गया. 1997 में जॉन बार्जर ने ये शब्द गढ़ा था. 1999 में पीटर मेरहोल्ज़ ने इसका संक्षिप्त रूप दिया- ब्लॉग.

ब्लॉग अब एक नए क़िस्म की पत्रकारिता और नए क़िस्म के सूचना प्रवाह की झंडाबरदार विधा बन गई है. जो कहीं न कहा जा सके, ब्लॉग में कहिए, अपने मन की कहिए और पक्ष विपक्ष में बेशुमार राय जुटाइए. लोग आपके ब्लॉग की धज्जियां उड़ा सकते हैं लेकिन वे उसे सिर आंखों पर भी रख सकते हैं. दोनों ही सूरतों में आप हिट हैं, आपकी वेबसाइट पर हिट्स आ रहे हैं और क्लिक्स बढ़ रहे हैं और आप ख़ुद चर्चा में आ रहे हैं. आप अपना हर नया ब्लॉग तीक्ष्ण, चटपटा और रोमांचक रखना चाहते हैं. वेबसाइट और इंटरनेट की दुनिया ने इस ब्लॉग शैली को वेब इंफ़ो का एक कमांडर बना दिया है. उसकी अपनी छावनी, अपना जंगल, अपना असला है. ब्लॉग अभिव्यक्ति की वर्जनाओं से छिटक कर अलग हुआ एक पत्रकारीय और सूचना संस्कार बन गया है.

वेबलॉग या ब्लॉग, वेब की इंटरेक्टिव ख़ूबियों का एक शक्तिशाली निरुपण है. कई जानकारों का मानना है कि ये इंटरएक्टिवटी, वेब की ये हलचल पत्रकारिता में एक नाटकीय बदलाव लाने में समर्थ रही है.

1997-98 में वेबलॉग का प्रचलन शुरू हुआ था. जैसे जैसे मुख्यधारा की ख़बरों के ट्रीटमेंट, उनकी पैकेजिंग और वेब मे उनकी लेयरिंग ने जगह बनाई, धीरे धीरे ब्लॉगिंग ने भी ज़ोर पकड़ा था. अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जुड़वा इमारतों पर हुए हमलों के बाद ब्लॉगिंग में अचानक तेज़ी आ गई. 21वीं सदी के पहले दस साल में तो ब्लॉग का एक ब्रहमांड ही वेब पर उतर आया है. लाखों करोड़ों की संख्या में ब्लॉग हैं. कुछ समाचार वेबसाइट्स का हिस्सा हैं, कुछ संगठन अपने अलग ब्लॉग निकालते हैं, व्यक्तिगत और सामूहिक ब्लॉगों की बाढ़ आई हुई है और इंटरनेट का संसार ब्लॉगों से भर रहा है, फिर भी खाली का खाली है. ये वर्चुअल स्पेस है ही ऐसी. अपनी संरचना में ब्लॉग एक निजी वक्तव्य या निजी अनुभव या निजी विचार सरीख़ा है लेकिन ये जितना निजी लिखने में हैं, प्रतिक्रिया और पारस्परिकता में उतना ही सार्वजनिक है.

प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक हाबरमास के “पब्लिक स्फ़ेयर” के विचार के साथ इस बहस को बढ़ाया जा सकता है. आधुनिक मास मीडिया पर निशाना साधते हुए हाबरमास कह चुके हैं कि वो नागरिक जीवन को प्राइवेटाइज़ कर रहा है और नागरिक को उपभोक्ताओं में बदल रहा है. लेकिन एक सच्चा पब्लिक स्फ़ेयर तभी निर्मित किया जा सकता है जब तकनीकी, आर्थिक और सांस्कृतिक बाड़े गिर जाएं यानी एक डिजिटल विभाजन विलुप्त हो जाए. (हेनरी जेनकिंस और डेविड थोरबर्न की किताब डेमोक्रेसी एंड न्यू मीडिया से)

अपनी बनावट और कार्यप्रणाली में न्यू मीडिया भले ही खुला उदार लिबरल लोकतंत्रवादी व्यवहार करता हुआ जान पड़ता है लेकिन ये आभासी है. इतना आभासी कि इसे आभासी लोकतंत्र कहना भी जल्दबाज़ी होगा. वर्चुअलिटी कई गफ़लतें भी लाती हैं. न्यू मीडिया से जुड़ी सबसे ताज़ा गफ़लत यही है कि ये जनतंत्र का पोषक वाहक माने जाने लगा है.

विख्यात अमेरिकी चिंतक नॉम चॉमस्की ने समाचार मीडिया के हवाले से इंटरनेट की भूमिका पर कुछ बातें कहीं हैं. उनके मुताबिक इंटरनेट में आकर सूचना का जनतंत्रीकरण हो जाएगा, ये हड़बड़ी नहीं दिखानी चाहिए. सवाल बौद्धिक ईमानदारी का है. कुल मिलाकर मीडिया ख़ासकर न्यू मीडिया का माहौल लिबरल(उदार) जैसा दिखता है. चॉमस्की कहते हैं कि अगर ये लिबरल न्यूज़ है तो इसका लिबरलिज़्म सत्ता व्यवस्था और अभिजात के इर्दगिर्द ही घूमता रहता है. वो आम लोगों के हकों से जुड़ा नहीं होता.(आउटलुक एनीवरसरी स्पेशल अंकः 1 नवंबर 2010)

इंटरनेट में विलासिता और महत्वाकांक्षा और मालामाल होने के ख़्वाबों का बोलबाला है. इंटरनेट और न्यू मीडिया पर हर किस्म की आवाज़ गूंज रही है, नाना दृश्य आ जा रहे हैं. एक विराट वर्चुअल कोलाहल है. उसी के बीच ये भी मानना होगा कि इंटरनेट पर आम आदमी के लिए आवाज़ें और जगहें भी बनी हैं. लेकिन वो ख़ुद उसे ऑपरेट करने की स्थिति में नहीं आया है. लेकिन उसकी पक्षधर सामुदायिक चिंताएं इंटरनेट पर एक ठोस विपक्ष अपलोड तो कर ही रही हैं. वेब का ये संसार खुला हुआ है और अपने में मगन है. इसमें अपार विलक्षणताएं और संभावनाएं हैं, लिहाज़ा जिन ख़ूबियों कमियों की चर्चा की गई है उनके बारे में कोई घोषणापरक या कौतूहल भरी बात कहने के बजाय ये कहना ज़्यादा तर्कसंगत होगा कि भविष्य का मीडिया तो बदलेगा ही, वेब इस मीडिया के केंद्र में रहेगा और उन हलचलों का गवाह बनेगा जिसके छिटपुट नज़ारे इसकी बीस वर्ष की युवा उम्र में हम देख चुके हैं या देख रहे हैं.

न्यू मीडिया और आएगा वो आधुनिक से आधुनिकतर होता जाएगा. कुछ वैसा आधुनिक भी उसके होने की आशंका है जैसा त्रुफ़ो की फ़िल्म फ़ॉरेनहाइट 451 में दिखाया गया विशाल हाईफ़ाई टीवी है जहां प्रेज़ेंटर्स एक सपाट भयानकता में देखने वालों से मुख़ातिब रहते हैं और उनसे न सुनी जाने वाली राय मांगते हैं. उनके सवाल ऐसे आते हैं जैसे कटार भोंकी जा रही हो. और जवाब भी वो खुद ही दर्शक के मुंह से छीनकर खुद ही बता देते हैं. समाज टेक्नोलजी की रचना करता है लेकिन टेक्नोलजी भी समाज बनाती जाती है. अमेरिकी समाजशास्त्री डेनियल बेल ने अपनी किताब “सोशल साइंसः एन इम्परफ़ेक्ट आर्ट” में मार्क्स के हवाले से लिखा है कि तकनीकी दुनिया को बदलते हुए आदमी अपनी प्रकृति(अपना स्वभाव) भी बदलता है. न्यू मीडिया के सामाजिक सांस्कृतिक  राजनैतिक आर्थिक और सामरिक अध्ययनों में हमें मार्क्स की कही ये बात भी ध्यान रखनी होगी.  नया मीडिया भूमंडलीकरण के ज़खीरे ही न ढोता चला जाए, उम्मीद से ज़्यादा इसे चुनौती की तरह देखना चाहिए.

इस अध्याय के कुछ हिस्से समयांतर पत्रिका के मीडिया बाजार और लोकतंत्र विशेषांक (पुस्तक रूप में भी शिल्पायन से उपलब्ध) में लेखक के ही एक निबंध से लिए गए हैं..

 

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