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खेल की अवधारणा‚ सिद्धान्त‚ खेल संस्थाएं‚ भारत में खेल पत्रकारिता के विविध चरण एवं भूमण्डलीकरण का प्रभाव

डॉ0 सुमीत द्विवेदी…

पी0एच0डी0‚ पत्रकारिता एवं जनसंचार सम्पादक‚ द जर्नलिस्ट – ए मीडिया रिसर्च जर्नल…

खेल पत्रकारिता के लिए आवश्यक है कि एक खेल पत्रकार को खेल की अवधारणा‚ उसके सिद्धान्तों‚ सम्बन्धित खेल जिसकी वह रिपोर्टिंग या समीक्षा कर रहा है‚ उसके तकनीकी एवं अन्य विविध पक्षों की पूरी जानकारी हो। साथ ही साथ उसे खेलों के विकास एवं उसकी वर्तमान स्थिति की भी जानकारी होनी अति आवश्यक है। अतः इस अध्याय में इन बिन्दुओं पर ही प्रकाश डाला गया है।

अवधारणा –

”खेल सिर्फ एक शारीरिक गतिविधि नहीं है। जैसे योग में शरीर की उच्चतम् उपलब्धि पर आप आत्म-साक्षात्कार के सबसे पास होते हैं‚ वैसे ही खेल के चरम पर पहुंचकर खिलाड़ी समझता है कि वह यश‚ पैसे और निजी सुरक्षा के लिए नहीं‚ किसी ऐसे गौरव के लिए खेल रहा था‚ जो धन या यश से कभी प्राप्त नहीं होता”। –प्रभाष जोशी

 

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो खेल एक ऐसी आन्तरिक इच्छा है जो हमारे व्यवहार को परिवर्तित कर ऐसी शारीरिक क्रियाओं की ओर ले जाती है जिससे हमारी वृद्धि एवं विकास संभव होता है। खेल में किसी व्यक्ति को तैयार करने अथवा प्रोत्साहन देने की आवश्यकता नहीं होती है‚ किन्तु वह अपनी आन्तरिक इच्छानुसार उसमें भाग लेता है। इससे मानव को हर्ष एवं संतोष मिलता है। बच्चों के अन्तर्राष्ट्रीय खेल अधिकार संघ के पूर्व अध्यक्ष श्री निक निलसन के अनुसार – ”कोई भी कार्य जो अतिरिक्त समय में प्रसन्नतापूर्वक किया जाए तथा जो जीवन के प्रति लगाव उत्पन्न करे‚ खेल कहलाता है।” महान दार्शनिक प्लेटो के अनुसार – ”बालक को दण्ड की अपेक्षा खेल के द्वारा नियंत्रित करना कहीं अच्छा है।” खेल कूद से स्वास्थ्य में वृद्धि होती है। खेलने के दौरान शरीर की समस्त मांसपेशिया सक्रिय रहती है। ”स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिक का निवास होता है।

 

आधुनिक विश्व में शिक्षा एवं प्रशिक्षण के रूप में खेलकूद को सर्वप्रथम मान्यता यूनान या ग्रीस ने दी। यूनान ने खेलों के महत्व को समझा और उन्हें प्रोत्साहित किया। यूनानियों के अनुसार -”शरीर के लिए जिमनास्टिक तथा आत्मा के लिए संगीत का विशेष महत्व है।” इस विचारधारा ने खेलकूद को शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया। प्राचीन भारत में भी चौपड़‚ शतरंज‚ कुश्ती‚ खो-खो और कबड्डी आदि खेलों का उल्लेख मिलता है।

 

आरम्भ में खेलों के नियम एवं स्वरूप स्पष्ट नहीं थे‚ यानि स्थान और समय के अनुसार भिन्न-भिन्न थे। किन्तु समय परिवर्तन के साथ इनका रूप संवरता गया और इनमें एकरूपता और निश्चितता आती गई। आज खेल वैज्ञानिक ढंग से खेले जाते हैं और प्रशिक्षित किये जाते हैं। इसका अर्थ है कि खेल हमारी विरासत‚ परम्परा और संस्कृति से जुड़े हुए हैं‚ जिनमें समय के साथ उत्तरोत्तर परिवर्तन एवं सुधार होता आया है। आज खेल न सिर्फ मनोरंजन के साधन और संस्कृति के वाहक हैं‚ वरन ये देश और समाज का भी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं‚ उसकी प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुके हैं।

 

सिद्धान्त –

 

खेलों के सम्बन्ध में प्रचलित कुछ सिद्धान्त इस प्रकार हैं –

  1. अतिरिक्त ऊर्जा का सिद्धान्त (Surplus Energy Theory) प्रसिद्ध दार्शनिक स्पेंसर एवं शिलर के अनुसार समस्त जीव-जन्तुओं में अतिरिक्त ऊर्जा होने के कारण उन्हें खेलने की प्रेरणा मिलती है।
  2. विशुद्धीकरण का सिद्धान्त (Cathartic Theory) – इस सिद्धान्त द्वारा फ्रायड कहने का प्रयास करते हैं कि कुछ दैवीय शक्तियां विद्यमान हैं‚ उनको प्रकट करने हेतु मानव खेलों में भाग लेता है। उसकी क्रोध‚ भय एवं ईर्ष्या जैसी शक्तियां खेलों द्वारा नष्ट हो जाती हैं। वे कुश्ती‚ मुक्केबाजी‚ तैराकी‚ गोताखोरी तथा बाधा दौड़ आदि खेलों में इस सिद्धान्त को पुष्ट करते हैं।
  3. मनोरंजन का सिद्धान्त (Recreation Theory)– लॉर्ड केम्स ने इस सिद्धान्त द्वारा बताया है कि मानव स्वयं को ताजा रखने के लिए खेलों में भाग लेता है और उसकी व्यय की गई शक्ति पुनः इनके द्वारा प्राप्त हो जाती है।
  4. पुनः स्मरण का सिद्धान्त (Recapitulation Theory)– इस सिद्धान्त के में स्टैनले हॉल कहते हैं कि बच्चे अपने पूर्वजों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों का अनुसरण करते हैं‚ इसीलिए शिकार करने‚ एक दूसरे को पकड़ने‚ पत्थर फेंकने और रेत का घर बनाने के खेल खेले जाते हैं।
  5. पूर्वाभ्यास का सिद्धान्त (Anticipation Theory)– कार्लग्रूस ने अपने इस सिद्धान्त में बताया है कि बड़े होकर जो कार्य करेंगे‚ उसकी तैयारी के लिए बच्चे बचपन से ही उसका पूर्वाभ्यास करते हैं।
  6. प्रतिद्वन्दिता का सिद्धान्त (Self Expression Theory) – यह सिद्धान्त इस बात पर आधारित है कि हमारा जीवन एक दौड़‚ होड़ और प्रतिद्वन्दिता का ही प्रतीक है। यह प्रतिद्वन्दिता की भावना खेलों का रूप धारण करके हमारे समक्ष आती है और हम कह सकते हैं कि खेलों द्वारा ही इस भावना का समाधान होता है। खेलों में प्रतिद्वन्दिता दिखाने के अनेक अवसर आते हैं।
  7. स्वयं को व्यक्त करने का सिद्धान्त (Self Expression Theory) – इस सिद्धान्त के अनुसार मानव एक चलता-फिरता गतिशील प्राणी है‚ जिसमें सोचने-समझने की दैवीय शक्तियां तथा विभिन्न प्रकार के संवेग प्रवृत्तियां‚ आंतरिक शक्तियां एवं प्रेरणा विद्यमान हैं‚ जो व्यक्त होना चाहती हैं। मानव इस विशेषता के कारण ही कुछ न कुछ कार्य करता रहता है। वास्तव में गति ही मानव जीवन का रहस्य है और खेल इसका एकमात्र स्वरूप है। इस आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार खेल क्रियाओं द्वारा मानव की आवश्यकताएं भी पूर्ण होती हैं। खेल ही ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मानव अपनी मनोवैज्ञानिक‚ सामाजिक एवं शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

भारत में खेल प्रशासन –

संवैधानिक रूप से शिक्षा की भांति खेल क्रियाएं एक राष्ट्रीय कर्तव्य हैं‚ जो राज्य नीति के निर्देशात्मक सिद्धान्तों का भाग होता है। इसका वर्णन राजकीय कर्तव्यों में किया गया है जिसका अभिप्राय यह है कि खेल क्रियाओं का स्वस्थ सामाजिक स्तर को बढ़ाने के लिए विकास करना राज्यों का कर्तव्य है।

 

सामान्यतयः भारत में खेल प्रशासन के दो वर्गों में विभाजित किया जाता है- शैक्षिक एवं अशैक्षिक। शैक्षिक क्षेत्र में उन शैक्षिक संस्थाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनमें एक बार शारीरिक शिक्षा तथा खेल-क्रियाओं को पाठ्यक्रमेत्तर क्रियाएं समझे जाने के पश्चात् उन्हें सामान्य शैक्षिक प्रणाली का अंग बना लिया जाता है। कुछ राज्यों में यह विद्यालय समाप्त होने के बाद प्रयोग की जाने वाली क्रिया है तथा कई राज्यों में इसे बिल्कुल भी प्रयोग नहीं किया जाता। अशैक्षिक क्षेत्र में खेल संघ‚ खेल परिषद‚ निजी संस्थाएं तथा इस प्रकार के निजी तथा सार्वजनिक संगठनों एवं बड़ी व्यापारिक संस्थाओं का समावेश होता है‚ जो कार्यक्रमों को निर्मित‚ नियंत्रित तथा निर्देशित करते हैं। इन संस्थाओं को ही खेल क्रियाओं का विकास करने वाले धर्म पिता के रूप में जाना जाता है। सरकारी संस्थाएं‚ चाहे वह केन्द्र स्तर पर हों या राज्य स्तर पर‚ वह महत्वपूर्ण समर्थक के रूप में कार्य करती हैं। शैक्षिक क्षेत्र की तुलना में अशैक्षिक क्षेत्र अधिक स्वतन्त्रता से कार्य कर सकता है‚ उनका कार्यक्षेत्र अधिक विस्तृत होता है तथा उनके द्वारा आयोजित की जाने वाली खेल क्रियाओं में अधिक संख्या में व्यक्तियों द्वारा भाग लिया जाता है। कुछ महत्वपूर्ण खेल संस्थाएं इस प्रकार हैं –

 

युवा कार्य तथा खेल विभाग (Department of Youth affairs & Sports)- यह विभाग 1982 में नौवें एशियाई खेलों के समय स्थापित किया गया था। इसके पूर्व खेल तथा शारीरिक शिक्षा को विकसित करने का कार्य शिक्षा विभाग द्वारा किया जाता था। युवा कार्य एवं खेल विभाग द्वारा निम्नलिखित क्रियाएं की जाती हैं-

  1. यह राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा एवं खेल नीति का निर्माण करता है।
  2. यह प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कई संस्थाओं की सहायता से अनेक कार्यक्रम लागू करता है‚ जैसे राष्ट्रीय खेल कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय योग्यता खोज।
  3. यह खेल विकास कार्यों के लिए भारतीय ओलंपिक संघ‚ राष्ट्रीय खेल संघ‚ भारतीय खेल संघ‚ लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन तथा ऐसी अन्य संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करता है।
  4. यह भारतीय खेल संघ तथा लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन‚ ग्वालियर को नियंत्रित करता है।
  5. यह भारतीय ओलंपिक संघ तथा राष्ट्रीय खेल संघ का मार्गदर्शन करता है।
  6. यह खेल सुविधाओं को निर्मित करने‚ खेल उपकरण खरीदने तथा कृत्रिम खेल मैदानों के निर्माण हेतु राज्य सरकारों‚ स्थानीय संवैधानिक संस्थाओं तथा पंजीकृत स्वतन्त्र संस्थाओं‚ ग्रमीण विद्यालयों‚ महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में प्राप्त अनुदेशों को बांटता है।
  7. संबंधित खेल संस्था‚ जैसे राष्ट्रीय खेल संघ‚ भारतीय ओलंपिक संघ‚ भारतीय खेल संघ के परामर्श पर यह खिलाड़ियों तथा प्रशिक्षकों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें अर्जुन पुरस्कार‚ राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार‚ द्रोणाचार्य पुरस्कार आदि प्रदान करता है।
  8. राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के आयोजन हेतु सहायता प्रदान करता है।

 

भारतीय खेल प्राधिकरण (Sports Authority of India)- इसका निर्माण 1984 में भारत सरकार द्वारा पारित एक प्रस्ताव के आधार पर एक पंजीकृत संस्था के रूप में किया गया है। यह प्राधिकरण युवा कार्य एवं खेल विभाग से संबंधित एक स्वतन्त्र संस्था है। इसके उद्देश्यों में खेल सुविधाओं का कुशल प्रयोग तथा खेल-क्रियाओं के स्तर को विकसित करना एवं उनका कुशल प्रबंधन शामिल है। मई 1987 में इस संस्था के राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान के साथ एकीकरण के पश्चात् इसका कार्य और भी बढ़ गया है। भारत सरकार द्वारा निर्मित की जाने वाली खेल सम्बन्धी नीतियों तथा कार्यक्रमों को लागू करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में कार्य करता है। यह राष्ट्रीय संस्थाओं को आवश्यक सुविधाएं प्रदान करता है ताकि राष्ट्रीय टीम का निर्माण एवं चुनाव किया जा सके। यह राष्ट्रीय टीमों तथा खेल संघों को खेल विज्ञान समर्थन प्रदान करता है ताकि राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण सुविधाएं तथा पद्धतियां बेहतर हो सकें। यी लक्ष्मीबाई नेशनल कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन‚ त्रिवेन्द्रम‚ नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्टस पटियाला के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर की शारीरिक शिक्षा एवं खेल अकादमियों पर नियंत्रण रखता है। यह आवश्यकता पड़ने पर खेल उपकरणों‚ खेल प्रयोगशालाओं तथा बेहतर प्रशिक्षण कार्यक्रम निर्मित करने के लिए शैक्षिक तथा अशैक्षिक संस्थओं को परामर्श भी देता है।

 

भारतीय ओलंपिक संघ (Indian Olympic Association)- सन् 1927 में निर्मित यह संघ ओलंपिक आदर्शों के साथ राष्ट्रीय खेलों को विकसित करने की प्रमुख संस्था है। वर्तमान में भारतीय ओलंपिक संघ 52 राष्ट्रीय खेल संघों‚ 30 प्रादेशिक ओलंपिक संघों‚ यूनियन तथा सेवा खेल नियंत्रक बोर्ड जैसे रेलवे‚ रक्षा आदि का प्रतिनिधित्व करता है। कार्यकारी संघ में एक सभापति‚ एक प्रधान सचिव‚ एक कोषाध्यक्ष‚ 9 उपसभापति‚ 6 संयुक्त सचिव तथा 7 कार्यकारी सदस्य जो प्रादेशिक ओलंपिक संघ के प्रतिनिधि होते हैं। साथ ही इसमें राष्ट्रीय खेल समितियों तथा सेवा खेल नियंत्रण बोर्ड के 10 प्रतिनिधि होते हैं। भारतीय ओलंपिक संघ द्वारा किए जाने वाले कार्य हैं –

  1. ओलंपिक आन्दोलन को विकसित करना तथा अन्तर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी द्वारा निर्मित सभी नियमों को लागू करना।
  2. भारतीय ओलंपिक कमेटी‚ राष्ट्रीय खेल समितियों एवं केन्द्र सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका अदा करना‚ साथ ही साथ अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए टीमों को तैयार एवं प्रेरित करना।
  3. राष्ट्रीय खेल समितियों को मान्यता प्रदान करना तथा उनके कार्यकलापों को नियंत्रित करना।
  4. राष्ट्रीय खेलों के आयोजन को सुनिश्चित करना तथा भारतीय ओलंपिक समितियों के संरक्षण में ओलंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों को भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना।
  5. राष्ट्रीय खेल समिति अथवा उसके खिलाड़ियों द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार के विरूद्ध नियमानुसार कार्यवाही करना।

आधुनिक भारत में खेल पत्रकारिता का विकास –

खेल किसी भी सभ्यता और संस्कृति का अहम हिस्सा होते हैं और भारत के सम्बन्ध में भी यह तथ्य सत्य है। यहां खेलों की हजारों वर्षों की परम्परा रही है। किन्तु जब खेल पत्रकारिता की बात की जाती है तो हम पाते हैं कि यह एक नवीन विधा है जिसे भारत में आरम्भ हुए लगभग सवा सौ सालों का समय ही हुआ है। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ समाचार पत्र खेल की खबरों का प्रकाशन करने लगे थे। देश में कुछेक फुटबाल और कुछेक क्रिकेट क्लब स्थापित हो चुके थे जिनके बारे में कभी-कभार खबरें भी स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हो जाया करती थीं। ये खबरें ज्यादातर सूचनात्मक ही हुआ करती थीं।

भारत में खेलों को कुछ हद तक लोकप्रियता तब मिली जब 1928 में भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक स्वर्ण पदक जीत लिया। यह भारतीय खेलों के इतिहास में एक नए युग की शुरूआत थी। 1932 में भारतीय क्रिकेट टीम ने टेस्ट क्रिकेट में भाग लिया। इन खेल घटनाओं से खेलों को नए पाठक वर्ग मिले और खेल पत्रकारिता में विशेषज्ञों की आमद हुई। किन्तु अब तक ज्यादातर खेल खबरें मात्र सूचनात्मक ही थीं। स्वतन्त्रता के बाद पत्रकारिता में आए बदलावों के चलते खेल समाचारों में भी बदलाव आया। संपादक पद की महत्ता बढ़ते जाने के साथ-साथ अनेक अखबारों में खेल समाचारों को महत्व दिया जाने लगा। इसके पीछे के कारण में संपादकों का खेलों के प्रति लगाव था। अंग्रजी के अधिसंख्य अखबारों में खेल की खबरें छपती तो थीं किन्तु अल्प मात्रा में ही। साथ ही साथ इन अखबारों में छपने वाले अधिकतर खेल समाचार विदेशी धरती पर होने वाले खेलों के ही हुआ करते थे। ऐसा इनके स्वामित्व का विदेशियों या अंग्रजों के हाथों में होने के कारण था। भारत में खेल-लेखन (Sports Writing) का सूत्रपात दिल्ली में 1950 में हुए एशियाड से माना जा सकता है‚ जब देश के अनेक अंग्रेजी समाचार पत्रों और एकाध हिन्दी के समाचार पत्रों ने खेल परिशिष्ट निकाले। इसके परिणामस्वरूप इन समाचार पत्रों में हमेशा के लिए खेल का पन्ना नियत हो गया। स्वतन्त्रता के पूर्व तक प्रकाशित होने वाले खेल समाचारों में खेल-तत्वों की कमी थी। ये या तो सूचनात्मक थे‚ या फिर भारतीयता को गौरवान्वित करने वाले हुआ करते थे। लेकिन एशियाड ने इस विचारधारा में परिवर्तन ला दिया। अंग्रेजी के समाचार पत्र इन सबमें सबसे आगे थे‚ लेकिन भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों ने भी खेल समाचारों के प्रति सकारात्मक भाव अपना लिया था।

 

भारतीय भाषाओं हिन्दी‚ तमिल‚ तेलगू‚ बांग्ला‚ मराठी के समाचार पत्रों में खेल समाचारों को जगह मिलनी शुरू हो गई थी। 60 के दशक में वाराणसी से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध अखबार ‘आज’ के संपादक विद्याभास्कर जी के खेलों के प्रति लगाव ने आज पत्र में खेल की खबरों को अधिक स्थान दिला दिया था। इसके पहले इलाहाबाद से प्रकाशित ‘अमृत पत्रिका’ ने खेल की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करना शुरू कर दिया था। इस समय के महत्वपूर्ण पत्रकारों में पुष्पेन बसु‚ शांतिप्रिय बंद्योपाध्याय‚ बाल पंडित‚ एस.एन. चिटनिस‚ विनायक दलवी‚ बी.आर. धुरंधर‚ रवीन्द्र पाटकर‚ शरद कद्रेकर‚ राखाल भट्टाचार्य आदि प्रमुख हैं।

 

हालांकि 50-60 के दशक में नई पीढ़ी‚ जो खेलों के प्रति जागरूक और उत्सुक थी‚ के लिए समाचार पत्रों में प्रकशित होने वाले समाचार अपर्याप्त ही लग रहे थे। संसाधनों से लैस राष्ट्रीय राजधानी से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र भी खेलों को पर्याप्त स्थान नहीं दे पा रहे थे। इस धीमी रफ्तार में खेलों के प्रति आम भारतीय की मानसिकता भी जिम्मेदार थी‚ जो खेलों को बिगड़ जाने की वजह मानता आया है। उत्तर भारत में एक कहावत भी है कि ”पढ़ोगे-लिखोगे तो होगे नवाब‚ खेलोगे-कूदोगे तो होगे खराब।”

 

ऑल इंडिया रेडियो के समाचारों ने भारतीय पत्रकारिता विशेषकर अंग्रजी की पत्रकारिता को विस्तार दिया। इस दौरान खेल पत्रकारों ने एक नई विधा श्रुति लेखन को अपनाया। रेडियो सुनकर उसके समाचारों को अखबारों के समाचारों में ढालने के कार्य ने प्रिंट समाचारों की गति को बढ़ा दिया। प्रथम एशियाई खेलों में श्रुति लेखन ने खेल समाचारों की शक्ल बदल दी। हालांकि इसके पूर्व में भी बीबीसी रेडियो के समाचार सुनकर क्रिकेट समाचार देने का कार्य किया जा चुका था। हिन्दी के सामाचार पत्रों में इन्दौर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र नई दुनिया ने खेल समाचारों को नया आयाम दिया। इसके पीछे का बड़ा कारण इन्दौर के सामन्त प्रभु का खेल प्रेमी होना था। 60 के दशक में प्रभाष जोशी के रूप में पत्रकारिता जगत और पाठकों को एक ऐसा पत्रकार मिला‚ जिसने सम्पूर्ण पत्रकारिता की दशा और दिशा पर गंभीर प्रभाव डाला। प्रभु जोशी ने नई दुनिया के माध्यम से खेल की पठनीय सामग्रियों से लोगों को रूबरू कराने का जो कार्य शुरू किया था वह वर्ष 2010 में उनके निर्वाण तक जारी रहा। प्रभाष जोशी मूलतः खेल पत्रकार नहीं थे‚ लेकिन खेलों‚ विशेषकर क्रिकेट और टेनिस में उनकी विशेष रूचि थी। नई दुनिया के चार पृष्ठ के अखबार में खेल की विस्तृत‚ वर्णनात्मक और विश्लेषणात्मक कवरेज एक नवीन क्रान्तिकारी कदम था।

 

श्रुति लेखन में एक कदम आगे बढ़ाते हुए वाराणसी से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध सांध्य दैनिक ”गांडीव” ने भारत-न्यूजीलैण्ड सिरीज़ के क्रिकेट मैचों के रेडियो से प्रसारित आंखों देखा हाल को न केवल खबर का रूप दिया‚ वरन मैच समाप्त होने के एक घंटे के भीतर ही उसकी वर्णनात्मक समीक्षा भी प्रकाशित कर लोगों व अन्य समाचार पत्रों को अचरज में डाल दिया। इस दौरान अन्य हिन्दी दैनिकों के संचालकों को इस सत्य का बोध नहीं था कि खेल समाचार भी अखबार की बिक्री बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं और विज्ञापन दिला सकते हैं। मुम्बई‚ दिल्ली‚ कोलकाता‚ इलाहाबाद‚ पटना‚ भोपाल‚ जयपुर आदि से प्रकाशित होने वाले हिन्दी के अखबारों में 70 और 80 के दशक में भी अधिकतम चार कॉलम के ही खेल समाचार होते थे। आने वाले वर्षों में टेलेक्स सेवा ने खेल समाचारों को अधिक गति दे दी। बाद के वर्षों में फैक्स एवं उपग्रही संसाधनों ने खेल पत्रकारिता को उन्नत बना दिया। वरिष्ठ पत्रकार पदमपति शर्मा 17 अक्टूबर 1978 का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि ”सवा पांच बजे पाकिस्तान के नगर फैसलाबाद से वाराणसी के कबीरचौरा स्थित ‘आज’ अखबार के टेबिल तक पहुंचा समाचार। समय लगा 15 मिनट। हिन्दी खेल पत्रकारिता ने 45 घंटे की मशक्कत को 15 मिनट में ला खड़ा किया। सपादकीय विभाग और प्रबंध तन्त्र आनंद से उद्वेलित था।” आज समाचार पत्र के इस कार्य ने अन्य हिन्दी अखबारों दैनिक जागरण‚ हिन्दुस्तान स्वतन्त्र भारत‚ नवभारत टाइम्स‚ राजस्थान पत्रिका‚ अमृत प्रभात‚ अमर उजाला में हलचल पैदा कर दी। इस टेलेक्स सेवा ने अगले कुछ वर्षों में खेल पत्रकारिता में अनेक परिवर्तन किए। इसी क्रम में अगले एक दशक तक अभिव्यंजना‚ परिपाटी एवं भाषा में लगातार परिवर्तन और सुधार देखने को मिला। ‘बॉलर’ गोलंदाज से गेंदबाज तक जा पहुंचा और दांव का स्थान पारी ने ले लिया।

 

वरिष्ठ खेल पत्रकार कमलेश थपलियाल लिखते हैं -”छठे दशक में दिल्ली में हिन्दी के केवल दो ही राष्ट्रीय समाचार पत्र हिन्दुस्तान और नवभारत टाइम्स हुआ करते थे। यही राजधानी और देश के अन्य क्षेत्रों के खेल-प्रेमी पाठकों को राष्ट्रीय‚ अन्तर्राष्ट्रीय एवं स्थानीय खेल समाचारों से अवगत कराते रहते थे। ‘नवभारत टाइम्स’ का खेल पृष्ठ छठे से लेकर आठवें दशक तक कुश्ती के समाचारों के लिए अधिक मशहूर रहा। इसके खेल संपादक सुशील जैन थे। उनका स्तम्भ ‘खेल चर्चा’ काफी सराहा जाता रहा। उन्हें ओलंपिक और एशियाई खेलों को विदेशी धरती पर जाकर कवर करने तथा रेडियो पर इनका एवं अन्य अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं का आखों देखा हाल सुनाने का भी गौरव प्राप्त रहा। बाद के वर्षों मे हिन्दी समाचार पत्रों के संपादकों का खेलों के प्रति प्रेम उभरने से खेल विभाग में कार्यरत् दूसरे पत्रकारों को भी दिल्ली से बाहर रिपोर्टिंग के लिए भेजा जाने लगा।” सातवें दशक के बाद खेलों के महाकुम्भ ओलंपिक‚ विश्वकप क्रिकेट‚ हॉकी एवं फुटबाल तथा एशियाई खेलों के लिए समाचार पत्रों में विशेष परिशिष्ट भी निकाले जाने लगे। आठवें दशक में इन बड़े खेल आयोजनों के समय हिन्दी अखबारों में खेल की खबरों के लिए दो पृष्ठ दिए जाने लगे थे। दैनिक हिन्दुस्तान के खेल प्रेमी उपसंपादकों आनंद दीक्षित‚ मदन गोपाल अरोड़ा तथा पदमपति शर्मा की चमकदार खेल रिपोर्टिंग ने पाठकों को खेलों की नई शब्दावली से भी परिचित कराया। यह शब्दावली इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग आपसी बातचीत में इनका प्रयोग करने लगे। यह शब्दावली जैसे – एथलेटिक मीट‚ क्रास कन्ट्री रेस‚ शाटपुट‚ जेबलिन थ्रो‚ पोलवाल्ट‚ हैमर थ्रो‚ स्टीपल चेज‚ डेकाथलन‚ डाउन द लाइन शाट‚ एस‚ टाई ब्रेकर‚ सडन डेथ‚ एक्स्ट्रा टाइम‚ हाफ टाइम‚ स्पिन बॉलिंग‚ मीडियम फास्ट‚ एलबीडब्लू‚ पिच आदि 90 के दशक तक छायी रही।

 

वर्ष 1983 में जनसत्ता 1990 में दैनिक जागरण‚ 1991 में पंजाब केसरी तथा राष्ट्रीय सहारा के राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रकाशन ने खेल पत्रकारिता को विस्तार दिया। जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी की  प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित खेल समीक्षाओं में पाठकों ने वही रूमानियत‚ संवेदना तकनीकी कौशल तथा खेल की बारीकियों के दर्शन किए‚ जो उन्हें कभी अंग्रजी के स्वनामधन्य समालोचकों की लेखनी में मिलते थे। मुम्बई के जनसत्ता संस्करण के रविराज प्रणामी ने अपने प्रधान संपादक से प्रेरणा लेते हुए काव्यात्मक शैली में पाठकों के दिलों में जगह बनाई। शतरंज और कुश्ती पर ब्रजेन्द्र पाण्डेय की समीक्षाओं एवं खबरों में ज्ञान-बोध होता था। छोटी से छोटी शतरंज प्रतियोगिताओं की भी रिपोर्टिंग और बाजियों का विवरण जनसत्ता की थाती हुआ करता था। जहां तक टाइम्स ऑफ इंडिया का सवाल है तो छठे दशक में सुशील जैन के साथ रमण‚ अजय भल्ला‚ श्रीकांत शर्मा‚ शचींद्र त्रिपाठी खेल डेस्क से जुड़े। बाद में मधुरेन्द्र सिन्हा‚ बंसल एवं परवेज ने अच्छी खेल रिपोर्टिंग की। टाइम्स ऑफ इंडिया में खेल के चार पृष्ठ भले ही हों‚ पर उसके हिन्दी संस्करण नवभारत टाइम्स को चार कॉलम भी नसीब नहीं थे। स्थान एवं दिग्गज खिलाड़ियों के स्तम्भों को स्थान देने में दैनिक जागरण अपने प्रतिस्पर्धी हिन्दी अखबारों की तुलना में कहीं आगे है। खेल समीक्षाओं की दृष्टि से देखें तो पंजाब केसरी ने गंभीर जगह बनाई है। उनके समीक्षक प्रवींद्र शारदा और राजेन्द्र सजवान ने बेबाक समीक्षाएं दी हैं। बाद के वर्षों में सुशील जैन राष्ट्रीय सहारा से जुड़ गए। इस सम्बन्ध में कमलेश थपलियाल जी कहते हैं – ”आजकल ऐसे खेल पत्रकार ज्यादा हैं‚ जो एकाध खेलों की कुछ जानकारी तो रखते हैं‚ लेकिन शेष खेलों में उनकी रूचि और ज्ञान न के बराकर है। उनमें गहराई का अभाव नजर आता है। उनकी कवरेज में खेल की बारीकियों के स्थान पर प्रशिक्षकों और अधिकारियों की बयानबाजी का समावेश अधिक जगह पता है। जबकि मैच संकलन करने वाले रिपोर्टर द्वारा खेल में हुए प्रदर्शन के विवरण से पाठक परिचित होना चाहता है‚ न कि टीमों के प्रशिक्षकों का मैच के बारे में आकलन।

 

भारत में स्तम्भ लेखन की शुरूआत छठे दशक से मानी जा सकती है। अंग्रजी और कुछ भारतीय भाषाओं जिनमें बंगाली‚ तमिल एवं मरीठी प्रमुख हैं के समाचार पत्रों में विशेषज्ञों के स्तम्भ नजर आने लगे। हिन्दी सामाचार पत्रों में स्तम्भ लेखन की परंपरा अस्सी के दशक में शुरू हुई। किन्तु हिन्दी भाषी लोगों में जहां फुटबाल की लोकप्रियता कम थी‚ वहीं हॉकी की लोकप्रियता का फायदा समाचार पत्रों ने नहीं उठाया और इस खेल के विशेषज्ञों से लिखवाने की जहमत नहीं उठाई। हालांकि अनेक संपादकों ने अपनी खेल रूचि के चलते कुछ विशेषज्ञों से लिखवाने में कामयाबी पायी लेकिन पाठकों में खेल विशेष के अल्पज्ञान के कारण यह प्रयास निरर्थक ही सिद्ध हुए। स्तम्भ लेखन में गंभीर पहल की प्रसिद्ध क्रिकेटर सुनील गावस्कर ने। उन्होंने प्रोफेशनल मैनेजमेंट नाम की एक कम्पनी खोली‚ देखादेखी कपिल देव ने भी देव फीचर्स नामक कम्पनी की स्थापना की। ये दोनों कम्पनियां आज भी चल रही हैं। आज हरेक खेल के प्रसिद्ध एवं बड़े खिलाड़ी स्तम्भ लेखन कर रहे हैं‚ इनके अलावा अनेक खेल विशेषज्ञ‚ खेल प्रशिक्षक तथा वरिष्ठ खेल पत्रकार भी स्तम्भ लेखन का कार्य कर रहे हैं। स्तम्भ लेखन की बाढ़ सी आ गई है। आज देश में अनेक विपणन कम्पनियां हैं जो खिलाड़ियों के व्यावासयिक हितों के अलावा उनके स्तम्भ लेखन का काम भी देखती हैं। हालांकि अधिक विश्लेषणात्मक स्तम्भ लेख कम ही पढ़ने को मिलते हैं।

 

प्रभाष जोशी कहते हैं कि हिन्दी खेल पत्रकारिता के उत्थान की कहानी पत्रकारों के एकल प्रयत्नों का ही परिणाम है। अखबारों के प्रबंधन का अंशदान सिर्फ उनके सकारात्मक रूख तक ही सीमित रहा था। जुनूनी खेल पत्रकारों के समर्पण का ही प्रतिफल आज की हिन्दी खेल पत्रकारिता है। सत्तर-अस्सी और नब्बे के दशक के प्रमुख हिन्दी खेल पत्रकार हैं- शुभाकर दुबे‚ कृष्णदेव नारायण‚ पदमपति शर्मा‚ कमर वहीद नकवी‚ आर0 मोहन‚ देवाशीष दत्त‚ योगेश गुप्त‚ रतन सिंह गहरवार‚ अनिल सक्सेना‚ कनिष्क देव गोरावाला‚ शैलेश चतुर्वेदी‚ यशपाल सिंह प्रमुख हैं। ‘आज’‚ ‘दैनिक जागरण’‚ ‘अमर उजाला’‚ ‘हिन्दुस्तान’‚ ‘नवभारत टाइम्स’ आदि समाचार पत्रों के खेल पृष्ठ को अपार सफलता मिल रही थी। पूरा का पूरा खेल पेज प्रायोजित होने लगा था। विज्ञापनदाताओं की कतार लगने लगी। उन्नीस सौ चौरासी के ओलंपिक खेलों के समय जागरण का पूरा खेल पृष्ठ प्रायोजित था। छियानबे के क्रिकेट विश्वकप के समय विज्ञापनदाताओं के लिए हाउस फुल का बोर्ड तक लगाना पड़ा।

 

70 के दशक में कुछ पूर्णकालिक खेल पत्र-पत्रिकाओं का जन्म हुआ। बेनेट कोलमैन एण्ड कं0 तथा हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रिकाओं धर्मयुग‚ साप्ताहिक हिन्दुस्तान के अलावा इंडियन एक्सप्रेस समूह की प्रजानीति‚ आनन्द बाजार पत्रिका का रविवार‚ ज्ञानमण्डल समूह का अवकाश‚ इसके अलावा इंडिया टुडे‚ आउटलुक‚ ब्लिट्ज‚ द वीक‚ फ्रंटलाइन तथा समय-समय पर जन्मीं अन्य साप्ताहिक एवं पाक्षिक पत्र-पत्रिकाओं ने खेल समाचारों को उचित स्थान एवं महत्व दिया। इसके अलावा अनेक पूर्णकालिक खेल साप्ताहिकों क्रिकेट सम्राट‚ खेल खिलाड़ी‚ नई दुनिया प्रकाशन की खेल हलचल‚ टाइम्स समूह की खेल भारती तथा क्रिकेट टुडे‚ स्पोट्स स्टार‚ द स्पोर्ट्स आदि ने खेल पत्रकारिता को नया आयाम दिया। हालांकि इन पत्रिकाओं में खेल की खबरों एवं विश्लेषणों को काफी जगह मिलती थी‚ लेकिन खेल प्रशिक्षण और शैक्षिक लेख कम ही रहे। शुरूआती दिनों में जहां खेल सांख्यिकी रचनाओं में अधिक दिखाई पड़ती थी‚ वहीं बाद के दशकों में खेल सत्ता के गलियारों की राजनीति के समाचारों को प्रमुखता मिली। दिनमान ने अपने प्रथम अंक से ही अपने संस्थापक संपादक अज्ञेय जी के नेतृत्व में नियमित खेल स्तम्भ निकाला। यह कार्य योगराज थानी को दिया गया। थानी जी ही दिनमान के बंद हो जाने पर टाइम्स समूह की खेल पत्रिका ‘खेल भारती’ के संपादक नियुक्त हुएधर्मयुग एवं साप्ताहिक हिन्दुस्तान के बीच खेल विशेषांकों को लेकर मची होड़ ने खेल पत्रकारिता का नया अध्याय लिखा। इन दोनों पत्रिकाओं के संपादक धर्मवीर भारती एवं मनोहर श्याम जोशी मूलतः साहित्यकार थे‚ लेकिन खेल प्रेमी भी थे। इन दोनों को बाजार की गहरी समझ भी थी। यही कारण है कि दोनों साप्ताहिकों के खेल विशेषांकों‚ विशेषकर क्रिकेट से सम्बन्धित विशेषांकों ने पाठकों को आकर्षित किया। ‘धर्मयुग’ में ऐसे विशेषांकों की प्रसार संख्या कई बार असाधारण रूप से 5 लाख के आंकड़े तक पहुंच जाती थी। धर्मयुग तकनीकि एवं लेखकों के बेहतर समूह के कारण बाजी मार ले जाता था। धर्मयुग के प्रमुख खेल लेखक थे- राजन गांधी‚ प्रमोद शंकर भट्ट‚ केशव झा‚ अरविन्द लवकरे‚ पीवीजे कार‚ योगराज थानी‚ सुशील दोषी‚ जसदेव सिंह‚ सूर्य प्रकाश चतुर्वेदी‚ भुवेन्द्र त्यागी‚ अनिल वत्स आदि। ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ दिल्ली से छपता था। उसके पास देवेन्द्र भारद्वाज एवं चरणपाल सिंह सोबती जैसे लोग थे। ‘रविवार’ के उदयन शर्मा हिन्दी के कुछ चुनिन्दा खेल समीक्षकों में थे। उदयन जी की समीक्षाओं में वह चिन्तन झलकता था जो पाठक की सोच का हिस्सा होता था। रविवार के खेल विशेषांकों में पठनीय एवं समसामयिक सामग्री की प्रचुरता रहती थी। यह साप्ताहिक खेल पक्ष को लेकर अधिक गंभीर था।

वर्तमान में इण्डिया टुडे आउटलुक द वीक तहलका आदि पत्रिकाओं का बोलबाला है। इन पत्रिकाओं के हिन्दी संस्करणों में खेल कहीं से भी प्राथमिकता सूची में नहीं हैं‚ लेकिन मेगा खेल आयोजनों‚ विशेषकर भारत की अन्तर्राष्ट्रीय श्रंखलाओं एवं वैश्विक आयोजनों के समय ये पत्रिकाएं रूचिकर‚ पठनीय‚ आकर्षक विशेषांक प्रकाशित करती हैं। यानि कि इन पत्रिकाओं को खेल के बाजार भाव का अंदाजा है‚ लेकिन इनमें खेल सामग्री अधिकांशतः अनुवादित ही होती है और हिन्दी के मौलिक खेल लेखकों की कमी नजर आती है। देश के प्रथम पूर्ण आकारीय साप्ताहिक समाचार-पत्र ‘चौथी दुनिया’ ने राजीव कटारा के नेतृत्व में खेल सामग्रियों को समृद्ध करने का कार्य किया है। कटारा मूलतः खेल पत्रकार नहीं‚ लेकिन वे देश के अच्छे खेल व्यंग्यकार हैं। चौथी दुनिया में ही उनके वरिष्ठ सहयोगी रहे कमर वहीद नकवी भी अच्छी खेल समीक्षाएं लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं। हालांकि देश की प्रथम खेल साप्ताहिक पत्रिका स्पोर्ट्स वीक थी‚ लेकिन वह अंग्रेजी संस्करण का हिन्दी रूपांतर ही थी। मूल रूप में विशुद्ध प्रथम साप्ताहिक खेल पत्रिका टाइम्स समूह की खेल भारती ही थी‚ फिर ‘खेल हलचल’ का प्रकाशन नई दुनिया समूह ने किया। खेल भारती देखने में आकर्षक थी‚ लेकिन सामग्री की दृष्टि से उसे श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता। इसके संस्थापक संपादक योगराज थानी थे। वाराणसी से प्रकाशित ज्ञानमंडल प्रकाशन की पाक्षिक पत्रिका अवकाश की शुरूआत जोरदार रही। खेल से सम्बन्धित सामग्री इसमें नियमित स्थान पाती थी। कुछ अच्छे विशेषांक भी प्रकाशित हुए‚ किन्तु सन् 1988 में इसका प्रकाशन बंद हो गया। इन्दौर से प्रकाशित नई दुनिया समूह की पत्रिका खेल हलचल ने शुरूआत में काफी हलचल मचाई। सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी के अलावा सुजीत मोहंती की समीक्षाएं पाठकों को प्रभावित करती थीं। लेकिन साधनहीनता एवं समुचित विपणन के अभाव में इस पत्रिका का बाजार समाप्त हो गया।

 

इनकलाब प्रकाशन समूह की ‘स्पोर्ट्स वीक’ का कार्यकाल मात्र दो वर्ष ही रहा‚ किन्तु इसने प्रकाश स्तम्भ का कार्य किया। श्री हरिमोहन शर्मा जो पूर्व में धर्मयुग से जुड़े थे‚ इस पत्रिका के संपादक बने। कुछ ही समय में यह पत्रिका अपनी समीक्षाओं‚ पठनीय लेखों‚ विशेषज्ञों के लेखों एवं स्तम्भों के कारण अधिक लोकप्रिय हो गई थी। किन्तु संचालकों के आपसी विवाद में यह पत्रिका बंद हो गई। अन्य स्वदेशी खेलों से अलग क्रिकेट से दीवानगी न केवल भारतीयों में अधिक रही‚ वरन् पत्र-पत्रिकाओं में भी। इसका फायदा क्रिकेट सम्राट और क्रिकेट भारती‘‚ क्रिकेट टुडे सरीखी पत्रिकाओं ने उठाया। किन्तु इन पत्रिकाओं ने निराश किया। इन पत्रिकाओं में कुछेक नियमित स्तम्भों को छोड़ दिया जाए तो खिलाड़ियों के गॉसिप्स‚ रंगीन चित्र एवं कम्पनियों के प्रयोजित समाचार-लेख ही अधिक छपते हैं।

 

आकाशवाणी में खेल पत्रकरिता की विधिवत् शुरूआत कोलकाता से मानी जाती है‚ जब 1952-53 में कोलकाता आकाशवाणी ने बांग्ला भाषा में फुटबाल मैचों की कमेन्ट्री प्रसारित की थी। हालांकि आकाशवाणी में कमेन्ट्री आजादी के पहले से ही चल रही थी। हिन्दी में कमेन्ट्री की शुरूआत आकाशवाणी के डायरेक्टर-प्रोग्राम रहे गोपालदास जी ने की थी। आकाशवाणी के प्रमुख कमेन्ट्रेटर्स में सबसे चर्चित थे ‘ए0एफ0एस0 तल्यार खां’। इनके अलावा विजी‚ वेरी सर्वाधिकारी‚ पियर्सन सुरेटा‚ चक्रपाणि आदि प्रमुख कमेन्ट्रेटर रहे। आजादी के बाद देशज भाषा गौरव का प्रतीक बन गई और हिन्दी में कमेन्ट्री की मांग उठी। कमेन्ट्री के लिए दो सिद्धान्त निश्चित किए गए- पहला यह कि खेलों की जो अपनी शब्दावली है उसे अछूता रहने दिया जाए‚ जैसे क्रिकेट के ओवर‚ पिच‚ स्टम्प‚ बोल्ड‚ रन आउट‚ कैच आदि। लेकिन समाज में प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग किया जाने लगा‚ जैसे चौका‚ छक्का‚ बल्ला‚ गेंद‚ गिल्ली आदि। दूसरा यह कि कमेन्ट्रेटर्स के सीमित हिन्दी ज्ञान को देखते हुए‚ जहां कठिनाई हो अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग की छूट दी गई। कमोबेश यही स्थिति आज भी जारी है। 1964 में हुए टोक्यो ओलंपिक में आकाशवाणी ने अपने भाष्यकारों की टीम भेजी। यह जिम्मेदारी सौंपी गई प्रसिद्ध कमेन्ट्रेटर मेल्विल डिमेलो और जसदेव सिंह को। लेकिन कमेन्ट्री अंग्रेजी में ही हुई। 1962 में बम्बई के साथ दिल्ली का रणजी फाइनल मैच वह पहला अवसर था जब हिन्दी में क्रिकेट कमेन्ट्री की गई और लोगों ने आखों देखा हाल सुना। विदेश से पहली बार 6 जून 1974 को जसदेव सिंह की आवाज में ब्रिटेन से हिन्दी में क्रिकेट कमेन्ट्री की गई। इस कमेन्ट्री ने आकाशवाणी की लोकप्रियता को काफी हद तक बढ़ा दिया। हिन्दी कमेन्ट्री के शुरूआती दिनों में आकाशवाणी इलाहाबाद‚ गोरखपुर‚ पटना‚ कानपुर‚ जयपुर‚ जबलपुर‚ लखनऊ केन्द्रों के अतिउत्साही निदेशकों ने अनेक अन्तर्राष्ट्रीय‚ राष्ट्रीय‚ क्षेत्रीय‚ एवं घरेलू हॉकी एवं क्रिकेट मैचों का प्रसारण किया। हिन्दी कमेन्ट्रेटर्स ने खेलों के अनेक तकनीकी शब्दों का हिन्दीकरण करना शुरू कर दिया। यह परिवर्तन अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। कमेन्ट्रेटर्स ने अनेक तकियाकलाम भी प्रचलित कर दिए जिनमें मनोवैज्ञानिक दबाव‚ कुल्हाड़ा कट शॉट‚ कलाई का उपयोग करते हुए‚ कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना आदि लोकप्रिय शब्द हैं।

दूरदर्शन की शुरूआत सर्वप्रथम दिल्ली में हुई इसके बाद यह अन्य महानगरों में पहुंचा। 60-70 के दशक तक दूरदर्शन के खेल प्रसारणों में फुटबाल‚ हॉकी और टेनिस प्रमुख थे‚ इनके बाद क्रिकेट का नम्बर आता था। बैडमिन्टर‚ टेबल टेनिस और गोल्फ के शुरूआती प्रसारण तीन फिक्स कैमरों से होते थे। 1982 के एशियाई खेलों भारत में दूरदर्शन के नए युग की शुरूआत लेकर आया। दूरदर्शन की एकमात्र श्वेत-श्याम ओबी वैन के स्थान पर रंगीन ओबी वैनों ने ले ली। इसी के साथ देश में रंगीन प्रसारण की शुरूआत हुई। आरम्भ के दिनों में खेलों के प्रसारण के लिए किसी तरह की धनराशि नहीं देनी पड़ती थी। खेल आयोजकों की आय का स्रोत इन्ट्री चार्ज या टिकट एवं मैदान पर लगने वाली होर्र्डिंग्स ही हुआ करती थीं। दूरदर्शन पर कुश्ती‚ कबड्डी एवं खो-खो खेल की कवरेज खूब होती थी। 82 के एशियाई खेलों के सुचारू रंगीन प्रसारण हेतु सरकार ने अरब सैटेलाइट एवं अन्य व्यावसायिक इंटेलसेट किराए पर लिए। बाद के वर्षों में यानि कि 1984-85 और 1989-90 में प्रतिदिन एक ट्रांसमीटर देश में लगा‚ जो एक विश्व रिकार्ड है। 1972 तक दूरदर्शन के पास केवल दो ही कमेन्ट्रेटर्स थे- जोगाराव और रवि चतुर्वेदी‚ विशेषज्ञों के रूप में अमरनाथ‚ अब्बास अली बेग और नवाब मंसूर अली खां पटौदी की सेवाएं ली गईं। इसमें कोई दो राय नहीं कि दूरदर्शन ने अपना फैलाव काफी तेजी से किया और वह हमेशा यह ढिंढोरा भी पीटता रहा कि उसे सबसे ज्यादा आय क्रिकेट मैचों के प्रसारण से होती है‚ लेकिन गुणवत्ता के लिहाज से उसकी कवरेज औसत रही। चंद अपवादों को छोड़ दे तो दूरदर्शन के अधिकतर खेल कार्यक्रम और खेल चैनल सरकारी मानसिकता के शिकार लगते हैं।

 

खेल एवं खेल पत्रकारिता पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव –

भारत में खेल पत्रकारिता अपने विकास पथ पर अग्रसर थी। समाचार पत्रों‚ आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के माध्यम से लगभग सभी खेलों की रिपोर्टिंग‚ समीक्षाएं एवं स्तम्भ लिखे‚ सुनाए व दिखाए जा रहे थे। ऐसे में 1990-91 में भारत ने वैश्विक खुली अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने की ओर कदम बढ़ा दिए। अब देश का हरेक क्षेत्र सरकारी नियंत्रण से मुक्त होकर एक वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनने लगा। पत्रकारिता और खेल पत्रकारिता पर भी इस मुक्त अर्थव्यवस्था जिसे दूसरे शब्दों में भूमण्डलीकरण या वैश्वीकरण भी कहा जाता है का असर पड़ना अवश्यंभावी था। भूमण्डलीकरण के चलते सूचना क्रांति का श्रीगणेश हुआ और भारत ने कम्प्यूटर एवं मोबाइल के युग में प्रवेश किया। यही वह समय था जब भारत में निजी टेलीविजन चैनलों एवं रेडियो चैनलों का शुभारम्भ हुआ। हालांकि प्रेस में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत ही थी लेकिन देशी-विदेशी कम्पनियों के पत्रकारिता या कह लें मीडिया के क्षेत्र में दखल के लिये यह पर्याप्त था।

 

दुनिया भर के प्रकाशन एवं प्रसारण व्यवसाय ज्यादातर पूंजीवाद के आरम्भिक उपक्रमों में से एक रहे हैं। पूंजीवाद के प्रसार के लिए अखबारों का शुरू से ही इस्तेमाल होता रहा है और अखबार अपने प्रसार और मुनाफे के लिए पूंजी का सहारा लेते रहे हैं। भूमण्डलीकरण के साथ जन्में नव-पूंजीवाद भारत सरकार की उदारीकरण की नीतियों तथा इसके साथ आयी संचार क्रांति ने हिन्दी अखबारों की रूपरेखा और विषयवस्तु में अमूलचूल परिवर्तन लाया। यही हाल अन्य जनसंचार साधनों का भी है। भूमण्डलीकरण के बाद अखबारों को मिली नई तकनीक की सुलभता‚ टेलीविजन चैनलों का प्रसार‚ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों से जुड़े क्रिकेट के खिलाड़ियों की छवि का इस्तेमाल और खिलाड़ियों की एक ब्रांड के रूप में बाजार और जन-सामान्य में पहचान को पत्रकारिता ने खूब भुनाया है। अब अखबारों के लिए खेल विशेषरूप से क्रिकेट ‘खेल की बात’ नहीं रही‚ वह भारतीय अस्मिता और संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है और इसे बनाने में भूमण्डलीकरण के बाद उभरी टेलीविजन और भाषाई प्रिंट मीडिया तथा हाल-फिलहाल में सोशल मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।

 

व्यापार के तौर-तरीकों और लाभ की प्रवृत्ति भूमण्डलीकरण के बाद हिन्दी अखबारों एवं चैनलों में तेजी से फैली है। विज्ञापनों पर अखबारों एवं चैनलों की निर्भरता बढ़ी है फलतः उनकी नीतियों मे भी बदलाव आया है। वर्तमान में विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने की मुहिम में हिन्दी के अखबार और चैनल ‘खबर’ और ‘मनोरंजन’ के बीच फर्क नहीं करते। हालांकि 70-80 के दशक में भी मनोरंजन और खेल की खबरों के लिए अलग से पृष्ठ हुआ करते थे‚ लेकिन वर्तमान की तरह खेल को प्रथम पृष्ठ की प्रमुख खबर के रूप में प्रकाशित और प्रसारित करने के बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा।

 

आज क्रिकेट की खबरें धड़ल्ले से सुर्खियां बनती हैं क्योंकि क्रिकेट में ग्लैमर पैसा और मनोरंजन तीनों का मेल है। अब खेल कार्यक्रमों में खेल संवाददाता नहीं बल्कि स्वयं खिलाड़ी ही अपना मूल्यांकन करते रहते हैं‚ खिलाड़ी खिलाड़ी के बारे में बाता रहा है‚ इससे खेल पत्रकारिता का चरित्र बदला है। जब खिलाड़ी ही मूल्यांकन करने लगेंगे‚ वहीं व्याव्याकार हो जाएंगे तो ऐसा मूल्यांकन विश्लेषण और वस्तुगतता से रहित होगा। इस तरह की प्रस्तुतियों में आत्मगत तत्व हावी रहेगा। कह सकते हैं कि समाचारों में सुन्दरता और आत्मगत भाव की परेड हो रही है।

 

हालांकि उदारीकरण के बाद तकनीकी विकास ने खेल पत्रकारिता को ग्लैमरस और तीव्र कर दिया है। आज उपग्रह आधारित 24 घंटे के खेल चैनलों में प्रसारित होने वाले खेल कार्यक्रम‚ समाचार‚ विचार-विमर्श‚ परिचर्चा और सीधा प्रसारण सेकेण्ड्स में दूर देश में बैठे दर्शक तक पहुंच रहे हैं। देश-विदेश में बैठे लाखों खेल प्रेमी इन कार्यक्रमों के जरिए खेलों की बारीकियों का साक्षात कर रहे हैं और विशेषज्ञों के कमेन्टस् और सही खेल खेलने की राय का लाभ उठा रहे हैं। आज प्रमुख खेल चैनलों इएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स नियो स्पोर्ट्स टेन स्पोर्ट्स डीडी स्पोर्ट्स आदि ने अनेक ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू किया है जो दर्शकों को खेल खेलने की बारीकियां सिखाते हैं। यानि कि घर बैठे बिना किसी शुल्क के आप खेल खेलना सीख सकते हैं। लेकिन क्या ये चैनल ऐसा जन सरोकार के लिए कर रहे हैं। इसका उत्तर कम प्रतिशत में हां हो सकता है‚ लेकिन ज्यादातर प्रतिशत से यह कहा जा सकता है कि ऐसा ये चैनल इन कार्यक्रमों के बदले मिलने वाले विज्ञापनों के दम पर और इन विज्ञापनों की ललक से ऐसा कर रहे हैं। इसके अलावा देश के लगभग सभी समाचार चैनलों ने खेलों के लिए नियमित समय निर्धारित किया हुआ है‚ जिसमें वे खेल और खेल से जुड़ी खबरें‚ परिचर्चा‚ साक्षात्कार इत्यादि दिखाते रहते हैं। यही नहीं तकनीकि विकास ने खेलों में भी प्रभाव डाला है‚ खेलों की शैली और अंदाज दोनों में परिवर्तन आया है।

 

संचार क्रान्ति ने भी खेल एवं खेल पत्रकारिता में अमूलचूल बदलाव किए हैं। देश और विदेशों से संचालित होने वाली सैकड़ों खेल वेबसाइटों‚ ब्लाग्स‚ सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने जहां खेलों की चर्चा-परिचर्चा को दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाने का कार्य किया है‚ वहीं इन वेब माध्यमों पर स्वतन्त्र अभिव्यक्ति की आजादी ने खेलों के प्रति प्रदर्शित होने वाले मतों को बढ़ाया है। आज खेलों और खेल पत्रकारिता से जुड़ी अनेक सकारात्मक एवं नकारात्मक बातें इन न्यू-मीडिया माध्यमों के जरिए सामने आ रही हैं। जहां तक खेल पत्रकारिता का सवाल है तो इन माध्यमों ने लाखों की संख्या में खेल पत्रकारों‚ विश्लेषकों‚ प्रस्तोताओं‚ समीक्षकों एवं स्तम्भकारों की फौज तैयार की है‚ जो संचार के परम्परागत माध्यमों द्वारा संभव नहीं था। हालांकि भूमण्डलीकरण के तुरन्त बाद के वर्षों में देखें तो  विभिन्न खेल चैनलों ने ही आगे बढ़ते हुए नए खेल पत्रकारों की एक ऐसी बड़ी लम्बी लाइन तैयार की जो पहले से पत्रकारिता नहीं कर रहे थे। इन चैनलों ने प्रतियोगिताएं एवं साक्षात्कार कर सैकड़ों युवाओं का चुनाव किया‚ जिनको ट्रेनिंग देकर उन्होंने उन्हें खेल पत्रकार‚ साक्षात्कारकार्ता‚ विश्लेषक‚ प्रस्तोता बनाया। आज ये युवा वर्तमान खेल पत्रकारिता की रीढ़ बने हुए हैं। इनमें हर्ष भोगले का नाम सबसे ऊपर आता है। हालांकि इन चैनलों एवं वेब माध्यमों ने विभिन्न खेलों के बड़े एवं छोटे खिलाड़ियों को भी विशेषज्ञ के तौर पर नियुक्तियां दीं जो दशकों से खेल पत्रकारिता का आधार रहे हैं।

 

आज खेल ने एक उद्योग का दर्जा हासिल कर लिया है। भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने अपने खेल मंत्रालय बना रखे हैं जो खेल की गतिविधियों को संचालित करते हैं। खेल ने आज हजारों करोड़ रूपयों का कारोबार खड़ा कर लिया है। फिक्की की 2014-15 की खेल रिपोर्ट के अनुसार आज वैश्विक खेल का कारोबार 480 से 620 बिलियन डालर का हो चुका है‚ वहीं भारत में एक अनुमान के अनुसार लगभग 20 हजार करोड़ का खेल कारोबार चल रहा है। फिक्की की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 तक स्पोट्स इंडस्ट्री को लगभग 4.3 मिलियन लोगों की आवश्यकता होगी‚ जिनमें खेल पत्रकार और खेल विशेषज्ञ भी शामिल हैं। आज भारत में खेल का क्षेत्र निवेश आकर्षित करने के मामले में सरकारी एवं निजी क्षेत्रों के लिए सर्वाधिक तेजी से बढ़ते हुए क्षेत्रों में से एक है। पिछले कुछ वर्षों मे भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की अनेक स्पर्धाओं का आयोजन किया है जिनमें कॉमनवेल्थ गेम्स 2010‚ ग्रैंड प्रिक्स 2011‚ क्रिकेट वर्ल्डकप 2011‚ आईपीएल 2008 से लगातार वर्ल्ड सिरीज़ हॉकी 2011‚ सुपर फाइट लीग हॉकी इंडियन लीग 2013‚ 2014‚ इंडियन बैडमिन्टन लीग 2013‚ 2014‚ प्रो-कबड्डी लीग 2014‚ इंडियन सुपर लीग 2014‚ इंडियन टेनिस प्रीमियर लीग 2014 प्रमुख हैं। सरकार ने खेलों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए 2007-2012 की पंचवर्षीय योजना में इसके लिए 950.82 मिलियन डालर का प्रस्ताव रखा था।

 

खेलों में कारपोरेट सेक्टर और पैसे का प्रवाह तो दो-तीन दशक पहले ही शुरू हो चुका था‚ लेकिन उसका फायदा खेल जगत में सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने वाले मुट्ठीभर खिलाड़ियों तक ही सीमित था। उदाहरण के लिए 1990 के दशक के अंतिम सालों तक अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी जहां लाखों कमा रहे थेवहीं घरेलू सर्किट में खेल रहे बढ़िया से बढ़िया क्रिकेटर की आय कुछ हजार की रकम तक सीमित होकर रह जाती थी। लेकिन प्रोफेशनल लीगों के प्रादुर्भाव के बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। आज आईपीएल से जुड़कर घरेलू क्रिकेटर भी लाखों-करोड़ों कमा रहे हैं। इनमें से अनेक ऐसे खिलाड़ी भी हैं जिनका प्रथम श्रेणी कॅरियर भी अभी ठीक ढंग से शुरू नहीं हुआ है। 2008 से 2014 के बीच भारत में इस तर्ज पर कई खेलों से जुड़ी लीगों के प्रस्ताव तैयार हुए। इनमें से कुछ कार्यरूप ले पायीं तो कुछ सिर्फ प्रस्ताव बनकर ही रह गए। कुछ प्रस्तावों पर सक्रिय रूप से कार्य चल रहा है और आने वाले दिनों में इनका क्रियान्वयन होता दिखेगा।

 

यदि किसी खेल को प्रोफेशनलिज्म का जामा पहना दिया जाए तो उसके रूप व स्वास्थ्य में रातों रात कैसा अभूतपूर्व परिवर्तन आ सकता है यह पिछले दिनों हम सबने देखा प्रो-कबड्डी लीग के दौरान। खांटी देशी खेल मानी जाने वाली कबड्डी का ग्लैमरस अवतार हर किसी को चौंका गया। क्या आप मानेंगे कि स्टार स्पोर्ट्स चैनल पर प्रो-कबड्डी के लाइव टेलीकास्ट की टीआरपी कई बार बेहद लोकप्रिय माने जाने वाले कई सीरियलों की टीआरपी को पीछे छोड़ गई और इस लाइव टेलीकास्ट के दर्शकों में 40 प्रतिशत से ज्यादा युवा थे जिनमें लड़कियों की तादाद भी अच्छी खासी थी।

 

दूसरे शब्दों में कहें तो भारत इस वक्त प्रोफेशनल खेल लीगों का एक बड़ा ‘हब’ बनता जा रहा है। खेल प्रेमियों के लिए दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों का खेल अपनी आखों के सामने देखने का जो मौका ये लीगें मुहैया करा रही हैं‚ कुछ वर्षों पहले इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। लेकिन इससे भी बड़ा फायदा जो इन लीगों से मिलता दिख रहा है‚ वह है कि इससे पूरे देश में खेलों के प्रति एक सकारात्मक माहौल बन रहा है। युवाओं के साथ-साथ उनके पालकों को भी अब यह विश्वास होने लगा है कि पढ़ाई के साथ-साथ खेलों को भी अब कॅरियर बनाया जा सकता है और इस कॅरियर में कमाई भी अधिक है। जिस परम्परा की नींव पिछले 4-5 सालों में पड़ी है‚ उसके सही और पूरे परिणाम देखने के लिए हमें शायद अभी 10 या 15 वर्ष इंतजार करना होगा। लेकिन यदि चीजें सही दिशा में आगे बढ़ती रहीं तो ये प्रोफेशन लीगें भारत को खेलों की दुनिया में एक महाशक्ति बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

 

भारतीय खेल जगत के इस बदलाव भरे युग में जो एक बात खास और उत्साहित करने वाली रही वह है खेलों की सरपरस्ती के लिए कॉरपोरेट जगत और बॉलीवुड की बड़ी-बडी हस्तियों का बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना। क्रिकेट के लिए तो भारत में स्पांसरों की कभी कमी नहीं थी लेकिन अब हॉकी कबड्डी कुश्ती और बैडमिंटन के लिए भी बड़ी कम्पनियों का रूचि दिखाना खेल जगत के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। रिलायंस‚ फ्यूचर ग्रुप‚ आईएमजी‚ हीरो मोटोकॉर्प‚ ब्रिजस्टोन‚ वेव समूह‚ सहारा‚ सोनालिका इंटरनेशनल और सोनी टीवी सरीखे बड़े कॉरपोरेट भारतीय खेलों के इन नए युग के सक्रिय सहयोगी बन रहे हैं। यही हाल बॉलीवुड सितारों का भी है। आईपीएल से तो शाहरूख खान‚ जूही चावला‚ प्रीति जिंटा व शिल्पा शेट्टी जैसे नाम शुरूआत से ही जुड़े रहे हैं‚ लेकिन अब फिल्मी दुनिया के बड़े स्टार्स कबड्डी व कुश्ती सरीखे देशी खेलों से जुड़ रहे हैं। ‘प्रो-कबड्डी’ के पहले सीजन की चैम्पियन बनने वाली जयपुर पिंक पैंथर्स टीम का स्वामित्व अभिषेक बच्चन के पास है। इस कबड्डी लीग की प्रतिस्पर्द्धा में शुरू होने वाली ‘वर्ल्ड कबड्डी लीग’ के साथ अक्षय कुमार सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। संजय दत्त अपने मित्र राज कुन्द्रा के साथ मिलकर ‘सुपर फाइट लीग’ चला रहे हैं। जॉन अब्राहम‚ सलमान खान और अभिषेक बच्चन ‘इंडियन सुपर लीग’ के टीम मालिकों में शामिल हैं। इधर कई दिग्गज क्रिकेटर भी इन लीगों से जुड़ रहे हैं। सुनील गावस्कर ‘आईबीएल’ की मुम्बई फ्रेंचाइजी के को-ओनर हैं तो सचिन तेन्दुलकर और सौरव गांगुली ने इंडियन सुपर लीग की टीमें खरीद रखी हैं।

 

भूमण्डलीकरण के बाद खेल और खेल पत्रकारिता में अमूलचूल बदलाव देखने को मिला है। यह बदलाव डोपिंग‚ कॉरपोरेट भ्रष्टाचार और मैच फिक्सिंग के रूप में खेलों में जहां नकारात्मक छवि बनाता दिखता है‚ वहीं खेलों में तकनीकी सुधार‚ खिलाड़ियों‚ प्रशिक्षकों और खेल संसाधनों के विकास के रूप में सकारात्मक छवि बनाता है। कुल मिलाकर देखें तो भूमण्डलीकरण खेलों के विकास के लिए एक वरदान सरीखा रहा। जहां तक खेल पत्रकारिता का सवाल है तो भूमण्डलीकरण ने इसे उन्नत और तीव्र करने का कार्य तो किया ही है साथ ही खेल पत्रकार‚ विश्लेषक‚ विशेषज्ञ‚ प्रस्तोता‚ स्तम्भकार‚ आदि के रूप में स्पोर्ट्स मीडिया प्रोफेशनल्स की एक फौज भी तैयार कर दी है जो चौबीसों घंटे सिर्फ खेल के बारे में ही सोचते हैं। आने वाले वर्षों में खेल उद्योग के स्वरूप को देखते हुए इसमें उत्तरोत्तर प्रगति ही होती दिख रही है। हां‚ इन सब में जरूरत इस बात की है कि कॉरपोरेट‚ ग्लैमर और पैसे की इस दखलंदाजी में खेल और पत्रकारिता की मूल भावना न छूटने पाए।

 

बजट 2014-15 में खेलों के लिए प्रस्ताव –

  1. अलग-अलग खेलों के लिए राष्ट्रीय खेल अकादमी की स्थापना।
  2. जम्मू-काश्मीर के इंडोर तथा आउटडोर स्टडियमों के उन्नयन हेतु 200 करोड़ का प्रावधान।
  3. मणिपुर में खेल विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए इस वित्तीय वर्ष में 100 करोड़ का प्रावधान।
  4. आगामी कॉमनवेल्थ गेम्स एवं एशियन गेम्स में महिला एवं पुरूष खिलाड़ियों के प्रशिक्षण हेतु 100 करोड़।
  5. शूटिंग‚ कुश्ती तथा बॉक्सिंग के लिए नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन की स्थापना का प्रस्ताव।
  6. विकलांग खेल केन्द्र बनाने का प्रस्ताव।
  7. शूटिंग‚ तीरंदाजी‚ बॉक्सिंग‚ कुश्ती‚ भारोत्तोलन तथा विभिन्न ट्रैक एण्ड फील्ड प्रतियोगिताओं हेतु देश की सबसे अच्छी प्रतिभाओं को तराशने के लिए जूनियर एवं सब-जूनियर लेबल पर अन्तर्राष्ट्रीय सुविधाओं से युक्त अकादमियों की स्थापना का प्रस्ताव।
  8. हिमालयी क्षेत्रों की विशिष्ट खेल परम्पराओ को देखते हुए वार्षिक खेल प्रतियोगिताओं का प्रस्ताव‚ जिसमें जम्मू-काश्मीर‚ हिमांचल प्रदेश‚ उत्तराखण्ड‚ सिक्किम तथा पूर्वोत्तर राज्यों के साथ भूटान तथा नेपाल के खिलाड़ियों को भी निमंत्रित किये जाने का प्रस्ताव है।
  9. खेलों के विकास हेतु भारतीय खेल प्राधिकरण या साई के लिए 400 करोड़ का प्रस्ताव।
  10. राष्ट्रीय डोप टेस्ट प्रयोगशाला हेतु 9 करोड़ रूपए तथा डोपिंग रोघी कार्यक्रम हेतु 6 करोड़ का प्रस्ताव।

 

संदर्भ ग्रन्थ –

  1. शरीरिक शिक्षा‚ अजय कुमार श्रीवास्तव‚ दानिका पब्लिकेशन‚ नई दिल्ली‚ 2014
  2. खेल पत्रकारिता‚ पदमपति शर्मा‚ प्रभात प्रकाशन‚ दिल्ली‚ 2009
  3. क्रिकेट टुडे पत्रिका
  4. खेल पत्रकारिता‚ सुशील दोषी‚ सुरेश कौशिक‚ राधाकृष्ण प्रकाशन‚ दिल्ली‚ 2010
  5. FICCI Report on sports 2014-15 (Business of Sports- Aiming Higher…Reaching Further)
  6. Avinash Das‚ mohallalive.com
  7. Jagdishwar Chaturvedi‚ deshkaal.com
  8. nayaindia.com
  9. Madhurendra sinha‚ amarujala.com‚ jagran.com

 

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