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कैसे चलता है सिनेमा का कारोबार?

सुशील यति

बंबई फिल्म उद्योग को लेकर बहुत सी छवियां हमारे मन-मष्तिष्क में बनी हुई है. मुंबई (बंबई) शहर और फिल्म उद्योग को लेकर एक धारणा यह भी है कि यह आपकी इच्छाओं और सपनों को पूरा करने वाला शहर है. ये शहर अपनी चमक-दमक के साथ ऐसे बहुत से बिंब रचता है जिसमे अकूत धन-दौलत और संपन्नता झलकती है. फिल्म उद्योग को लेकर बहुत से किस्से आपने और हमने सुन ही रखे है जिनका सारांश ये होता है कि किस प्रकार किसी के सपने इस शहर ने पूरे किए और आज वो सितारा हैसियत रखत है. फिल्म उद्योग में संघर्ष कर रहे लोगो से बातचीत मे पता चलता है कि कि यह शहर सभी को एक बार मौका जरुर देता है, और शायद इसी मौके की तलाश में लोग अपनी किस्मत आजमाते है. फिल्म उद्योग में कलाकारों को काम दिलाने वाले एक एजेंट से जब मैंने पूछा कि अपनी तमाम परेशानियों और दुखों के बावजूद ऐसा क्या है इस शहर में की लोग भरोसा रखते है कि एक दिन उनकी किस्मत जरुर चमकेगी? जवाब मिला, “दरअसल, बंबई एक अलग ही दुनिया है. हाँ, यह जरुर है कि यह एक जुंए की तरह है जहाँ लोग ऐसा समझते है कि एक दिन उनकी किस्मत जरुर चमकेगी. और यहीं, उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित भी करता है. साथ ही साथ, अपने इस संघर्ष मे उन्होने अपनी सारी उर्जा और समय झोंक दिया होता है जिस कारण वे कुछ और काम करने का नहीं सोच पाते.” फिल्म उद्योग मे रंक से राजा बनने की कहानियां भी है और ऐसे कलाकार भी है जो फिल्म अभिनेता बनने के लिए बंबई आए तो थे लेकिन आज ‘जूनियर आर्टीस्ट’ और ‘कोरस डान्सर’ के बतौर काम कर रहे है. पिछले कुछ सालों मे इस शहर मे एक्टींग तथा डान्स सिखाने के संस्थान मे तेजी से वृद्धी हुई है. तथा इस काम से बहुत से स्थापित अभिनेता और कोरियोग्राफरों भी जुड़े हुए है.

बंबई फिल्म उद्योग यूं तो अपने सितारों के लिए जाना जाता है लेकिन फिल्म निर्माण की प्रक्रिया मे ऐसे बहुत से कलाकार जुड़े रहते है जो अपना जीवन फिल्म उद्योग व समाज के हाशिए पर तलाश रहे है. ये कलाकार बड़ी संख्या मे फिल्म उद्योग मे काम करते है और सिनेमा को एक अलग नज़र से देखने के लिए प्रेरित करते है. आइए इन कलाकारों की नजर से ही फिल्म निर्माण की प्रक्रिया और आर्थिक संरचना को समझने की कोशिश की जाए.

 

फिल्म बनने की कहानी

बंबई फिल्म उद्योग के बारे मे ऐसा कहना कोई अतिशयोक्ति नही होगी की बंबई फिल्म उद्योग पूरे शहर मे फैला हुआ है. दूसरे शब्दों मे कहे तो फिल्म उद्योग की आर्थिक संरचना जिसमे फिल्म निर्माण से सीधे तौर पर जुड़ी हुई इकाइयाँ तथा विभिन्न प्रकार से सहयोग करने वाले प्रतिष्ठान शामिल है, जो शहर के अलग अलग हिस्सो मे है. इसका कोई एक केन्द्र नही है बल्कि बहुत से केंन्द्र है जहाँ पर फिल्म निर्माण से संबधित विभिन्न कार्य किए जाते है और जो अन्ततः फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को मिलकर पूरा करते है.

फिल्म निर्माण की प्रक्रिया मुख्य रुप से तीन चरणों से मिलकर पूरी होती है – ‘प्री –प्रॉडक्शन’, ‘प्रॉडक्शन’ और ‘पोस्ट-प्रॉडक्शन’. ‘प्री-प्रॉडक्शन’ मे फिल्म शूटींग की प्रक्रिया शुरु होने पहले की तैयारियां की जाती है जैसे कि फिल्म का बजट, लोकेशन की रैकी, स्क्रीप्ट को अंतिम रुप देने संबधित कार्य , कलाकारो के ऑडीशन, फिल्म निर्माण से संबधित विभिन्न उपकरण जैसे की कैमरा, ध्वनि (साउण्ड), लाइट इत्यादी की रुपरेखा तैयार करना शामिल है.

फिल्म निर्माण (प्रॉडक्शन) की दूसरी महत्वपूर्ण स्टेज/प्रक्रिया प्रॉडक्शन, इसके अंतर्गत स्क्रीप्ट के अनुसार विभिन्न दृश्यों का फिल्मांकन (रिकॉर्डिंग) किया जाता है जिससे कि दृश्य कैमरे मे कैद हो जाता है. यह प्रक्रिया बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योकि अगर फिल्मांकन मे गलती हो गई तो इस बात की बहुत कम गुंजाइश है कि उसे ठीक किया जा सके. आप दुबारा शूटींग/रिकॉर्डिंग करके ही इसे दुरुस्त कर सकते है.

इसके पश्चात फिल्म निर्माण की तीसरी महत्वपूर्ण प्रक्रिया शुरु होती है, जिसे फिल्म निर्माण की भाषा मे ‘पोस्ट-प्रॉडक्शन’ कहा जाता है. इस चरण मे फिल्म अपने अंतिम रुप मे बनकर हमारे सामने आती है. दूसरे शब्दों मे कहे तो यह वो चरण है जब फिल्म ‘एडीटींग टेबल’ पर अपने वास्तविक (अंतिम) रुप मे बनकर हमारे सामने आती है. इस दौरान फिल्म का संपादन (एडीटींग) किया जाता है जिसमे फिल्माए गए दृशयों को सही क्रम में जोड़ना, कलर करेक्शन, वॉइस सिंक्रोनाइजेशन (विभिन्न ध्वनियों को लयबद्ध करना), आदी आदी कार्य किए जाते है, जिससे फिल्म पूरी होती है.

मौजुदा दौर मे, निर्माताओ के लिए फिल्म बना कर पूरा कर लेना ही फिल्म निर्माण का अंतिम चरण नही होता बल्कि इसके बाद फिल्म एक जटिल प्रक्रिया से गुजरते हुए विभिन्न सिनेमाघरों तथा मल्टीप्लैक्स मे प्रदर्शित हो पाती है. फिल्म बन जाने के बाद भी उसके प्रदर्शन को लेकर कशमकश़ की स्थिति बनी रहती है. फिल्म किन-किन महानगरों, शहरों तथा कस्बों मे प्रदर्शित होगी इसे लेकर योजना बनाई जाती है. अगर किसी फिल्म के साथ किसी बड़े सितारे की फिल्म प्रदर्शित होने जा रही है तो यह माना जाता है कि इससे दूसरी फिल्म को नुकसान हो सकता है. प्रत्येक निर्माता यही चाहता है कि उसकी फिल्म को ओपनिंग अच्छी मिले जिससे फिल्म का प्रचार हो, और फिल्म लंबे समय तक सिनेमा घरो में चल सके.

कैसे काम करता है फिल्म उद्योग?

मुंबई शहर की भौगोलिक स्थिति विभिन्न व्यवसायिक गतिविधियो के लिए काफी महत्वपूर्ण है. बंबई (मुंबई) एक ऐसा शहर है जहाँ बंदरगाह है, जिससे अपनी शुरुआत से ही इस शहर ने व्यवसायिक हितो के कारण औद्योगिक संगठनो का ध्यान अपनी और खींचा है. यह शहर रिजर्व बैंक तथा स्टॉक एक्सचेंज की उपस्थिति के साथ एक वित्तिय केंद्र के रुप मे विख्यात है, जिस वजह से इसे देश की व्यावसायिक राजधानी होने का गौरव भी हासिल है.

बात करते है बंबई फिल्म उद्योग की. बंबई शहर शुरु से ही फिल्म निर्माण का केंद्र रहा है. पिछले कुछ सालों मे क्षेत्रिय सिनेमा के विकास के साथ देश के कुछ राज्यों मे क्षेत्रिय सिनेमा को लेकर फिल्म-निर्माण का काम शुरु हो चुका है. बावजूद इसके, बंबई शहर आज भी हिंदी तथा कुछ क्षेत्रिय भाषाओं के सिनेमा के लिए मुख्य केंद्र की भूमिका मे है.

इन वर्षो मे इस उद्योग ने एक ऐसा तंत्र बनाने मे कामयाबी हासिल की है जिससे फिल्म निर्माण व्यवसाय से जुड़े लोग एक साथ मिलकर काम कर सके और संसाधनो तथा कलाकारो को इस निर्माण प्रक्रिया संगठीत रुप से शामिल किया जा सके. इस उद्देश्य से यह समझना आवश्यक हो जाता है कि फिल्म उद्योग काम कैसे करता है और उसकी आंतरिक संरचना क्या है, और यह किस प्रकार की अर्थव्यवस्था से नियंत्रित और संचालित होता है. साथ ही श्रम का निर्धारण व नियंत्रण किस प्रकार होता है?

जैसा की पहले भी कहा गया कि बंबई फिल्म उद्योग पूरे शहर मे फैला हुआ है, फिल्म निर्माण से जुड़े बहुत से कार्य शहर के विभिन्न भागो/स्थानों मे होते है. और फिल्म निर्माण से संबधित छोटी-बड़ी बहुत सी गतिविधियां संचालित होती है, साथ ही इन स्थानो पर ऐसे बहुत से छोटे व्यवसाय भी पनपते है जो फिल्म निर्माण मे सहयोग करते है. फिल्म निर्माण की प्रक्रिया के दौरान ये स्थान आपस मे जुड़कर एक ‘जाल’ या ‘सर्किट’ बनाते है, और सिनेमा का निर्माण (प्रॉडक्शन) करते है. इन सभी स्थानों का अपना एक स्वतंत्र आर्थिक मॉडल होता है जो दूसरे स्थानो के आर्थिक मॉडल से काफी भिन्न होता है.

बंबई फिल्म उद्योग ‘असेम्बली लाइन प्रॉडक्शन’ की अवधारणा पर कार्य करते हुए बड़ी संख्या मे कलाकारो तथा असंगठित क्षेत्र के विभिन्न श्रमिको को रोजगार उपलब्ध कराता है. इसमे सिनेमा क्षेत्र के बड़े कलाकारो के साथ साथ चरित्र अभिनेता, जुनियर आर्टीस्ट और विभिन्न तकनीकी और गैर-तकनीकी क्षेत्रों में मदद करने वाले सहायक तकनीशियन शामिल है. फिल्म निर्माण प्रक्रिया के दौरान विभिन्न पेशेवर (प्रोफेशनल्स) तथा असंगठीत तौर पर कार्य करने वाले श्रमिक मिलकर एक सामुहीक ताकत के साथ काम करते है जिससे “फिल्म उद्योग” का निर्माण होता है. इस प्रकार फिल्म निर्माण छोटे-छोटे समूहों मे संचालित होते हुए अलग अलग क्षेत्रों मे, विभिन्न स्थानो पर कार्य करता है – जिसे अतिंम रुप ‘एडीटींग टेबल’ पर दिया जाता है, जहाँ फिल्म निर्माण की सभी प्रक्रियाओ का समन्वय होता है और फिल्म बनकर तैयार होती है.

बंबई फिल्म उद्योग इस बात के लिए विशिष्ट है कि यह औपचारिक(फॉर्मल) तथा गैर-औपचारिक (इनफॉर्मल) क्षैत्र के श्रम को फिल्म निर्माण की प्रक्रिया मे एक स्थान पर एकत्रित करते हुए सभी को शामिल करता है. हालांकि, यह गौर करने वाली बात है कि इस पूरी प्रक्रिया मे ये कलाकार और मुंबई शहर एक दूसरे के पूरक बन जाते है. जहाँ, एक के बिना दूसरे की कल्पना करना मुश्किल है. इस क्रम मे ये एक दूसरे को सहयोग करते है और एक दूसरे से ही अपनी पहचान हासिल करते है. बंबई फिल्म उद्योग और बंबई (मुंबई) शहर, दोनो की कल्पना एक दूसरे के बिना नहीं की जा सकती. जो अपनी इस यात्रा मे एक दूसरे को एक पहचान भी देते है.

नेटवर्क, संचार व कॉर्डिनेशन

मौजुदा दौर मे नेटवर्क किसी भी व्यवसाय तथा उसके पेशेवरो (प्रोफेशनल्स) के लिए बहुत ही जरुरी होता है. फिल्म उद्योग के लिए भी यह बात उतनी ही अहम है जितनी किसी और व्यवसाय के लिए हो सकती है. ऐसे मे यह ध्यान देने वाली बात है कि फिल्म उद्योग की भी बहुत सी परते है जिसका विश्लेषण इस उद्योग की निर्माण (प्रॉडक्शन) की जटिल प्रक्रिया को समझने के लिए काफी आवश्यक है.   इस उद्योग से पेशेवर कलाकार तो जुड़े ही है साथ ही साथ छोटे कलाकार, श्रमिक, तथा विभिन्न सेवा प्रदाता तथा उद्मी भी जुड़े हुए है जो फिल्म निर्माण के काम को आसान बनाते है जैसे केटरिंग सर्विस, ड्रेस मेकर्स, एनिमल सप्पालायर्स, एण्टिक सप्पालायर्स, विस्फोटक सप्पालायर्स इत्यादी. इन छोटी छोटी इकाइयों की अपने काम को लेकर विशेषज्ञता है, जिस कारण ये फिल्म निर्माण की प्रक्रिया मे सहयोग कर पाते है. बंबई फिल्म उद्योग फ्रि-लान्सर, अल्पकालीक (टेम्परेरी) तथा दिहाड़ी मजदूरों के रुप मे एक बड़ी संख्या मे लोगो को रोजगार देता है, तथा फिल्म उद्योग की यह विशिष्ट संरचना ही बहुत से लोगो के लिए एक वरदान साबित होती है.

और इस कारण बहुत से पेशेवर कलाकार तथा टेक्नीशियन एक से अधिक स्थानो व अलग अलग प्रॉडक्शन हाउस के साथ जुड़कर काम कर पाते है. इस पूरी व्यवस्था मे निर्माता केवल यह चाहता है उसके साथ काम करते हुए वे कलाकार अपना 100 प्रतिशत योगदान दे. विभिन्न कलाकारो के साथ बातचीत मे यह बात निकल कर सामने आई है कि इस व्यवस्था को निर्माता कंपनिया तथा कलाकार तथा तकनीशियन दोनो ही पसंद करते है व यह दोनों के लिए ही लाभकारी है. क्योकि इस व्यवस्था के तहत फिल्म इंडस्ट्री उन्हे एक ही समय मे बहुत सारे रोजगार के अवसर उपलब्ध करवा देता है जिसका वे उपयोग कर पाते है.

लेकिन, साथ ही विभिन्न कलाकारों तथा तकनीशियनों का एक वर्ग ऐसा भी है जिनके पास इस पूरी व्यवस्था मे कम अवसर है तथा जिनका तकनीकी ज्ञान फिल्म संपादक (एडीटर), साउण्ड रिकॉर्डिस्ट, कैमरामैन तथा दूसरे पेशेवर तकनीशियनो से कम है. दूसरे शब्दों मे कहे तो कलाकारों तथा तकनीकी सहायकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसके पास इतने अवसर तथा रचनात्मक स्वतंत्रता नही है. इन कलाकारों मे जूनियर आर्टिस्ट, स्टण्ट मैन, कोरस डान्सर शामिल है. इन कलाकारों को फिल्म निर्माण की प्रक्रिया मे शामिल करने को लेकर फिल्म निर्माता या प्रॉडक्शन हाउस कभी भी सीधे तौर पर शामिल नही होते, इन कलाकारों का चयन विभिन्न एजेन्टों के माध्यम से किया जाता है जिस वजह से निर्माता इन कलाकारों के लिए अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होता है. मेरा मानना है कि फिल्म उद्योग को यही फ्रि-लान्सर्स, जूनियर आर्टीस्ट, स्टण्ट मैन, कोरस डान्सर, लेखक तथा तकनीशियन तथा ऐसे बहुत से कलाकार जिन्हें ‘ बिलो द लाइन आर्टिस्ट’ कहा जाता है के सहयोग से ही चलाया जाता है. इन कलाकारों के काम का आधार इनकी “यूज वैल्यू” ही है. इन कलाकारों के साथ मुश्किल से ही कोई ‘कॉन्ट्रेक्ट’ या ‘एग्रीमेण्ट’ किया जाता है, तथा इनकी नियुक्ति एजेण्ट (थर्ड पार्टी) के माध्यम से होती है.

आमतौर पर यह पाया गया है कि फिल्म उद्योग मे काम को लेकर एक-दूसरे पर विश्वास की स्थिति है, इसलिए बहुत से कलाकारों के साथ ‘एग्रीमेण्ट’ कई बार फिल्म पूरी हो जाने के बाद ही किए जाते है, और यह केवल एक औपचारिकता मात्र ही होती है फिल्म निर्माण की प्रक्रिया का यह केवल एक छोटा सा तकनीकी भाग ही होता है. बंबई फिल्म उद्योग के कलाकारो के लिए नीजी संपर्क और नेटवर्किंग बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है. परिणामस्वरुप कुछ कलाकारों को निरंतर काम मिलता है और कुछ कलाकार लंबे समय तक बेरोजगार बने रहते है. फिल्म निर्माण उद्योग की यह खास/विशिष्ट संरचना फिल्म निर्माताओ के लिए आर्थिक रुप से बहुत ही लाभकारी साबित होती है. क्योकि इससे निर्माता अपनी जिम्मेदारियों से बच निकलते है, और हाशिए के कलाकार तथा तकनीशियन बोनस तथा अन्य किसी तरह के लाभ से वंचित रह जाते है. फिल्म के लाभांश/मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा फिल्म निर्माताओ तथा बड़े सितारो तक ही सिमट कर ही रह जाता है. हाल ही में कुछ ऐसे ट्रेंड भी देखने को मिले है जिसमे सितारे फिल्म के अपने मेहनताने के अलावा भी मुनाफे मे हिस्सा लेते है और कई बार सितारे भी सह-निर्माता की भूमिका निभाते है. फिल्म उद्योग मे इस तरह के बदलाव आ रहे है जिससे पता चलता है कि किस प्रकार बड़ी कॉरपोरेट कंपनियो की रुचि इस क्षेत्र मे बढ़ रही है और वो पैसा लगाने के लिए आगे आ रही है.

खास है इसका आर्थिक मॉडल

वर्ष 1998 में फिल्म निर्माण को उद्योग का दर्जा मिला, बावजूद इसके विभिन्न फिल्म निर्माता पहले की ही भाँति अनौपचारिक तौर पर ही काम करना ज्यादा श्रेयस्कर समझते है. पिछले दशक मे फिल्म व टेलीविजन निर्माण के क्षेत्र मे तेजी से प्रगति हुई है. इस कारण फिल्म उद्योग के कलाकारों तथा तकनीशियों के लिए रोजगार के अवसर तो बढ़े ही है लेकिन काम को एक निश्चित समय मे पूरा करने की कश्मकश तथा दबाव भी बढ़ा है. ऐसे मे काम करने को लेकर हाल फिलहाल फिल्म और टेलिविजन निर्माण के सेट पर तकनीशियनों और प्रॉडक्शन टीम के बीच झड़प की भी खबरें आई है.

बंबई फिल्म उद्योग का उदाहरण एक विशिष्ट प्रकार के आर्थिक मॉडल को समझने के लिए काफी खास बन जाता है जहाँ पर विभिन्न छोटे-बड़े उपक्रम (उद्योग), आंतरिक तथा बाहरी अर्थतंत्र के साथ मिलकर काम करते हुए एक खास तरह का समन्वय बनाते है. फिल्म-निर्माण प्रक्रिया मे शहर के विभिन्न स्थानों पर इससे संबधित कार्य होता है. लेकिन अपने आर्थिक क्रियाकलाप की विभिन्नताओं के साथ मुद्रा का विनिमय (एक्सचेंज) एक खास दिशा मे करते हुए एक-दूसरे के साथ विभिन्न आर्थिक गतिविधियों मे शामिल होते है. इसमे बहुत से छोटे उपक्रम तथा सेवा प्रदाता कंपनिया शामिल रहती है. एक तरह से ये छोटे उपक्रम फिल्म निर्माण उद्योग पर निर्भर है लेकिन साथ ही एक स्वतंत्र  अस्तित्व के साथ समन्वय की स्थिति बनाए हुए है.

सिनेमा की तकनीक के विकास के साथ फिल्म उद्योग मे भी बहुत से बदलाव आए है. बड़े-बड़े स्टूडियों की जगर छोटे-छोटे प्रॉडक्शन हाउस ने ले ली है. इन स्थानों पर फ्री-लान्स तकनीशियन काम करते है.

फिल्म उद्योग का सांगठनिक ढ़ाँचा व असुरक्षा का भाव

बंबई फिल्म उद्योग औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनो तरिके से कार्य करता है. फिल्म निर्माण प्रक्रिया में सैकड़ो कलाकार शामिल होते है जिनमें जूनियर आर्टीस्ट, स्टंट आर्टिस्ट, कोरस डान्सर, बॉडी डबल आदी कलाकार हिस्सा लेते है. इन कलाकारों के बहुत से एसोसिएशन/ यूनियन भी है जिनका मुख्य कार्य कलाकारों और निर्माताओं के बीच के किसी भी विवाद का निपटारा कराना है. साथ ही, ये एसोसिएशन विभिन्न प्रॉडक्शन कंपनियों तथा ‘कास्टींग’ निर्देशकों के साथ एक संपर्क व तालमेल बना कर रखना शामिल है और जरुरत की स्थिति मे कलाकारों को उपलब्ध कराना शामिल है.

1930 के दशक मे फिल्म उद्योग के अनुभवी कलाकारों ने यह महसूस किया की फिल्म निर्माण के क्षेत्र मे काम करने वाले कलाकारों को संगठित होना चाहिए. साथ ही इस बात के प्रयास किए गए की कलाकारों के लिए एसोसिएशन का गठन हो. वर्ष 1938 में फिल्म पत्रिका ‘सिने हेराल्ड’ मे निर्माता बी.आर.चोपड़ा ने एक संपादकीय लिखा, जिसमे उन्होनें कलाकारों के साथ फिल्म के सेट पर होने वाली दुर्घटनाओं की और ध्यान देने तथा इन कलाकारों की सुरक्षा तथा जीवन बीमा से जुड़े मुद्दों को उठाया और चिंता जताई. 19 मार्च 1956 को फिल्म उद्योग की सात विभिन्न क्राफ्ट यूनियन एक साथ आई और ‘फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न सिने एम्प्लॉइज’ की स्थापना हुई. वर्तमान मे फिल्म उद्योग मे फिल्म निर्माण से जुड़े सभी क्राफ्ट जिसमें निर्माता, निर्देशक, लेखक, डान्सर, स्टंट आर्टीस्ट, जूनियर आर्टीस्ट आदी शामिल है.

बंबई फिल्म उद्योग आर्थिक तौर पर सबसे असुरक्षित माने जाने वाले स्थानों मे से एक है. यहाँ काम करने का तरिका एक ऐसे चक्र को जन्म देता है जिससे असुरक्षा पनपती है. फिल्म उद्योग का एक बड़ा वर्ग दिहाड़ी मजदूरी तथा बहुत कम वेतन पर काम करता है. महिने मे तीस दिन के रोजगार की संभावना ना के बराबर है. इस स्थिति मे कलाकार तथा सहायक तकनीशियन ज्यादा से ज्यादा काम करने की कोशिश करते है ओर एक से अधिक शिफ्ट मे एक साथ काम करते है.

उद्योग का दर्जा मिल जाने के बावजूद, यहाँ पर अनौपचारिक तौर पर ही काम ज्यादा होता है. जिसमे सुरक्षा मानदण्डों को भी कई बार दरकिनार कर दिया जाता है जिससे दुर्घटनाएं घटती है. इस क्रम मे देखे तो ‘मुंबई सेण्ट्रल’ फिल्म की शूटींग के दौरान नाड़िया खान की रेल दुर्घटना मे मृत्यु हो गई, इसी प्रकार ‘शूटआउट एट लोखण्डवाला’ की शूटींग के दौरान एक स्टण्ट मैन की दुर्घटना मे मृत्यु हो गई. फिल्म ‘राजधानी एक्सप्रेस’ की शूटींग के दौरान एक जूनियर आर्टीस्ट की हृदय घात से मृत्यु हो गई. इन सभी समस्याओं के बावजूद फिल्म उद्योग को कभी भी कलाकारों तथा तकनीशियनों को लेकर कभी कमी का सामना नहीं करना पड़ता है. जिसकी वजह बड़ी मात्रा मे काम की तलाश करते कलाकार है.

इस शहर के कई रंग है. जिसमे फिल्मों का रंग, राजनीति का रंग, वित्तिय संस्थानो की चमक का रंग, लोकल ट्रेनों की भीड़-भाड़ का रंग शामिल है. इस शहर मे एक तरफ चकाचौंध है, तो दूसरी तरफ घुप्प अंधेरा भी. इस शहर ने सपनें देखने का हुनर सीखा है – और शायद वही इसकी जीवन को गति भी दे रहा है.

(लेखक स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स, जेएनयू में सिनेमा के शोधार्थी है. इनसे sushil.yati@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)

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3 comments

  1. आशुतोष प्रसाद

    आपके द्वारा दी गई जानकारी बेहद महत्वपूर्ण है।शुक्रिया….फ़िल्म निर्माण के बाद उसके प्रदर्शन तक की निर्माता निर्देशकों की मेहनत और प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी यदि दी जाये तो और भी अच्छा हो जाता।

  2. Bhoot achha aap ne film ke baar
    e me jaankaari di

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