Home / पत्रकारिता / समाचार : अवधारणा और मूल्य

समाचार : अवधारणा और मूल्य

सुभाष धूलिया |

आधुनिक समाज में सूचना और संचार का महत्व बहुत बढ़ गया है। देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसकी अधिकांश जानकारियां हमें समाचार माध्यमों से मिलती हैं। यह भी कह सकते हैं कि हमारे प्रत्यक्ष अनुभव से बाहर की दुनिया के बारे में हमे अधिकांश जानकारियां समाचार माध्यमों द्वारा दिए जाने वाले समाचारों से ही मिलती है। इसलिए प्रश्न पैदा होता है- समाचार क्या हैï? पत्रकारिता के उद्भव और विकास के पूरे दौर में इस प्रश्न का सर्वमान्य उत्तर कभी किसी के पास नहीं रहा। आज पत्रकारिता और संपूर्ण मीडिया जगत की तेजी से बदलती तस्वीर से इस प्रश्न का उत्तर और भी जटिल होता जा रहा है। लेकिन हर खास परिस्थिति और वातावरण में चंद घटनाएं ऐसी होती हैं जो समाचार बनने की कसौटी पर खरी उतरती हैं और उससे कहीं अधिक बड़ी संख्या ऐसी घटनाओं की होती है जो समाचार नहीं बन पाती। यहां समाचार से आशय समाचार माध्यमों में प्रकाशित- प्रसारित किए जाने वाले ‘‘समाचारों’’ से है।

लेकिन क्या हर घटना, समाचार है? क्या वह हर बात समाचार है जिसके बारे में पहले जानकारी नहीं थी? क्या वह सब समाचार है जिसके बारे लोग जानना चाहते हैं या जिसके बारे में लोगों को जानना चाहिए? क्या समाचार वही है जिसे एक पत्रकार समाचार मानता है? क्या वही सब समाचार हैं जिन्हें मीडिया के मालिक और संचालक समाचार मानते हैं और जिनके बारे में वे अपने ही तरह के अनुसंधान के आधार पर यह मान लेते हैं कि लोग यही चाहते हैं इसलिए यही समाचार है? समाचार निश्चय ही अपने समय के विचार, तथ्य और समस्याओं के बारे में ही लिखे जाते हैं। अनेक विद्वानों ने अपने ही ढंग से समाचार की विशेषताओं का उल्लेख किया है। हर प्रेरक और उत्तेजित कर देने वाली सूचना समाचार है। समय पर दी जाने वाली हर सूचना समाचार का रूप अख्तियार कर लेती है। किसी घटना की रिपोर्ट ही समाचार है। समाचार जल्दी में लिखा गया है। वह सब समाचार है जो आने वाले कल का इतिहास है।

समाचार निश्चय ही कोई किस्सा-कथानक वृत्तांत और रिपोर्ट है। इसके संप्रेषण के अनेक रूप हो सकते हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को समाचार का संप्रेषण कर सकता है। इसके अलावा समाचार अनेक तरह के समाचार माध्यमों से भी प्रकाशित और प्रसारित किए जाते हैं,

एक पत्रकार के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि क्या उसने समाचार को इस तरह लिखा और प्रस्तुत किया कि वह वही अर्थ और संदर्भ अपने पाठक/दर्शक/श्रोता को प्रेषित कर पाया जो वह चाहता था। अक्सर ऐसा नहीं होता और इन दिनों तो अधिकधिक ऐसा नहीं हो रहा है। समाचार में संभावित सूचनाओं या तथ्यों के स्रोत क्या हैं इससे भी भारी अंतर पैदा होता है। सूचना स्रोत के भी सूचना देने के पीछे कुछ मकसद हो सकते हैं और होते हैं। इन मकसदों का चरित्र और स्वरूप क्या है- इस पर भी समाचार की सत्यता निर्भर करती है। अनेक मौकों पर स्रोत गलत सूचनाएं भी देते हैं जिससे समाचार निहित स्वार्थों की पूर्ति में ही अधिक सहायक होते हैं और सच्ची तस्वीर लोगों तक नहीं आ पाती।

एक पत्रकार ही किसी भी समाचार के आकार और उसकी प्रस्तुति का निर्धारण करता है। इसी तरह रेडियो और टेलीविजन में प्रस्तुतकर्ता समाचार में अपनी आवाज और हाव-भाव से भी बहुत कुछ कह सकता है। एक समाचारपत्र में एक समाचार मुख्य समाचार (लीड स्टोरी) हो सकता है और किसी अन्य समाचारपत्र में वही समाचार भीतर के पृष्ठï पर कहीं एक कॉलम का समाचार भी हो सकता है। एक टेलीविजन चैनल के लिए अमिताभ बच्चन के जन्मदिन का समाचार पहला मुख्य समाचार हो सकता है तो संभव है कि कोई अन्य चैनल इराक में युद्ध को अपनी मुख्य खबर बनाने को प्राथमिकता दे। इस तरह के अनेक कारण और कारक हैं जो समाचार रूपी संदेश के प्राप्तकर्ता को इसकी स्वीकार्यता का स्तर तय करते हैं। किसी भी पाठक/दर्शक/श्रोता की अपनी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठïभूमि होती है जिनसे उसके अपने मूल्य उपजते हैं। इसलिए हर समाचार को वह अपने ही ढंग से स्वीकार या अस्वीकार करता है। सच्चाई का उसका अपना ही एक पैमाना होता है जिस पर वह हर समाचार/संदेश की माप-तौल करता है।

समाचार के उपभोक्ता अपने मूल्यों, रुचियों और दृष्टिïकोणों में बहुत विविधताएं और भिन्नताएं लिए होते हैं। इन्ही के अनुरूप उनकी प्राथमिकताएं भी निर्धारित होती हैं। हाल ही के वर्षों में समाचारों का भी एक बाजार तैयार हुआ है और एक खास बाजार के लिए एक खास समाचार होता है। एक आदर्श स्थिति में एक पत्रकार के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती होती है कि किस तरह वह अपने ‘उपभोक्ता’ समूह (ऑडिएंस) के व्यापकतम तबके को संतुष्टï कर सके।

समाचार की एक सर्वमान्य विशेषता यह है कि यह किसी विचार, घटना या समस्या का विवरण है। लोग सोचते हैं और विचार उपजते हैं। विभिन्न संचार माध्यमों के जरिए जब विचारों का आदान-प्रदान होता है तो हलचल पैदा होती है। इनसे नए उत्पाद पैदा हो सकते हैं। कोई नई सेवा अस्तित्व में आ सकती है। लोगों को कोई नया मकसद मिल सकता है। इसे अमन-शांति और टकराव की नई सीमाओं का निर्धारण हो सकता है। इनसे शांति और युद्ध के रास्ते बदल सकते हैं।

समाचार की परिभाषा

लोग आमतौर पर अनेक काम मिलजुल कर ही करते हैं। सुख-दु:ख की घड़ी में वे साथ होते हैं। मेलों और उत्सवों में वे साथ होते हैं। दुर्घटनाओं और विपदाओं के समय वे साथ ही होते हैं। इन सबको हम घटनाओं की श्रेणी में रख सकते हैं। फिर लोगों को अनेक छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गांव, कस्बे या शहरी की कॉलोनी में बिजली-पानी के न होने से लेकर बेरोजगारी और आर्थिक मंदी जैसी समस्याओं से उन्हें जूझना होता है। विचार, घटनाएं और समस्याओं से ही समाचार का आधार तैयार होता है। लोग अपने समय की घटनाओं, रुझानों और प्रक्रियाओं पर सोचते हैं। उन पर विचार करते हैं और इन सब को लेकर कुछ करते हैं या कर सकते हैं। इस तरह की विचार मंथन की प्रक्रिया के केंद्र में इनके कारणों, प्रभाव और परिणामों का संदर्भ भी रहता है। समाचार के रूप में इनका महत्त्व इन्हीं कारकों से निर्धारित होना चाहिए। किसी भी चीज का किसी अन्य पर पडऩे वाले प्रभाव और इसके बारे में पैदा होने वाली सोच से ही समाचार की अवधारणा का विकास होता है।  किसी भी घटना, विचार और समस्या से जब काफी लोगों का सरोकार हो तो यह कह सकते हैं कि यह समाचार बनने के योग्य है।

समाचार बनने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू इसकी तथ्यात्मकता है। किसी की कल्पना की उड़ान कोई समाचार नहीं है। समाचार एक वास्तविक घटना है और एक पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती या दायित्व यह है कि कैसे वह ऐसे तथ्यों का चयन करे, जिससे वह घटना उसी रूप में पाठक या उपभोक्ता के  सामने पेश की जा सके जिस तरह वह घटी। इस तरह के तथ्यों यानि वे तथ्य जो इस घटना के समूचे यथार्थ का प्रतिनिधित्च करते हैं, का चयन करने के लिए एक खास तरह का बौद्धिक कौशल चाहिए। इस तरह का बौद्धिक कौशल होने पर ही हम किसी को प्रोफेशनल पत्रकार कह सकते हैं।

किसी भी घटना, विचार या समस्या का समाचार बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि वह नया हो। कहा भी जाता है ‘न्यू’ है इसलिए ‘न्यूज’ है। समाचार वही है जो ताजी घटना के बारे में जानकारी देता है। समाचार का नया होना आवश्यक है। वह अपने ऑडिएंस के लिए नया है होना चाहिए। एक दैनिक समाचारपत्र के लिए आम तौर पर पिछले 24 घंटों की घटनाएं ही समाचार होते हैं। एक चौबीस घंटे के टेलीविजन और रेडियो चैनल के लिए तो समाचार जिस तेजी से आते हैं उसी तेजी से अनेक समाचार बासी भी होते चले जाते हैं। लेकिन अगर मान लिया जाए द्वितीय विश्व युद्ध जैसी ऐतिहासिक घटना के बारे में आज भी कोई नई जानकारी मिलती है जिसके बारे में हमारे पाठक को पहले जानकारी नहीं थो तो निश्चय ही यह उनके लिए समाचार है। दुनिया के अनेक स्थानों पर अनेक ऐसी चीजें होती हैं जो वर्षों से विद्यमान हैं लेकिन यह किसी अन्य देश के लिए कोई नई ताजी बात हो सकती है और निश्चय ही समाचार बन सकती है। अगर कोई समाचार माध्यम स्थानों और लोगों के बारे में भी अपने आडिएंस की जानकारी और समझ का स्तर उठाना चाहता है और पाठक भी इस तरह के समाचार उत्पाद में रुचि रखते हैं तो इस तरह की घटनाएं भी समाचार हैं। कुछ ऐसी घटनाएं भी होती हैं जो रातोंरात घटित नहीं होती बल्कि जिन्हें घटने में दसियों-बीसियों वर्ष लग सकते हैं। एकाध सदी भी लग सकती है। इस तरह की अधिकांश घटनाएं इतिहास के क्षेत्र में पाई जाती हैं।

मसलन किसी गांव में  पिछले 20 वर्षों में लोगों की जीवन-शैली में क्या-क्या परिवर्तन आए और इन परिवर्तनों के क्या कारण थे- यह जानकारी निश्चय ही एक समाचार है। लेकिन यह एक ऐसी समाचारीय घटना है, जिसे घटने में 20 वर्ष लगे। इस तरह की सूचनाएं या जानकारियां समाचार माध्यमों के लिए अच्छे समाचार बन सकती हैं, लेकिन अभी इस क्षेत्र का बहुत विकास नहीं हो पाया है। मसलन दिल्ली के चंादनी चौक की संस्कृति, जिंदगी, मानवीय संबंधों आदि में पिछले 50 वर्षों में क्या परिवर्तन आए यह एक दिलचस्प समाचार हो सकता है। इस पर एक आकर्षक टेलीविजन समाचार कार्यक्रम बन सकता है। स्वभावत: समाचार बनाने के लिए इसे आज के संदर्भ में ही गहराई से झांककर देखना होगा। चांदनी चौक का पचास साल का इतिहास पचास लोगों ने पचास तरह से देखा होगा। अगर ऐसे दस लोग चिन्हिïत कर लिए जाएं जो 70 वर्ष के आस-पास के हों और लगातार चांदनी चौक में रहे हों उनसे यही जाना जाए कि उन्होंने अपनी आंखों से क्या घटते देखा, उन्होंने इसे किस रूप में देखा, कैसा महसूस किया और इसके कारणों और परिणामों के बारे में उनके क्या विचार हैं तो निश्चय ही यह एक समाचार बन सकता है।

देश के हर गली-मोहल्ले में घटने वाली ऐसी अनेक घटनाओं पर इस तरह के समाचार बन सकते हैं लेकिन इस तरह के समाचारों को पठनीय और रुचिकर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए भी एक खास तरह के बौद्धिक कौशल और प्रोफेशनलिज्म की जरूरत होती है। ऐसे लोगों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव कायम किए बिना इस तरह की सृजनात्मक पत्रकारिता नहीं की जा सकती। बहरहाल, यहां कहने का आशय यही है कि ऐसी अनेक घटनाएं या प्रक्रियाएं भी जो ‘ताजी’ न हों, ‘ताजी’ होकर समाचार बन सकती हैं।  निष्कर्ष के तौर पर समाचार वही है जो नया है ताजा है और लोगों को नई घटनाओं के बारे में जानकारी देता है जिनके बारे में उन्हें पहले से जानकारी नहीं थी।

किसी विचार, घटना और समस्या के समाचार बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि लोगों की उसमें दिलचस्पी है। वे इसके बारे में जानना चाहते हों। कोई भी घटना समाचार तभी  बन सकती है, जब लोगों का एक बड़ा तबका इसके बारे में जानने में रुचि रखता हो। स्वभावत: हर समाचार संगठन अपने लक्ष्य समूह (टार्गेट ऑडिएंस) के संदर्भ में ही लोगों की रुचियों का मूल्यांकन करता है। लेकिन हाल के वर्षों में लोगों की रुचियों और प्राथमिकताओं में भी तोड़-मरोड़ की प्रक्रिया काफी तेज हुई है और लोगों की मीडिया आदतों में भी परिवर्तन आ रहे हैं। इसलिए यह भी कह सकते हैं कि रुचियां कोई स्थिर चीज नहीं हैं, गतिशील हैं। कई बार इनमें परिवर्तन आते हैं तो मीडिया में भी परिवर्तन आता है। लेकिन आज मीडिया लोगों की रुचियों में परिवर्तन लाने में अधिकाधिक भूमिका अदा कर रहा है। इसलिए ऐसे अनेक समाचार आज उनके लिए रुचिकर हो सकते हैं जिनसे कल तक वे अपने आपको नहीं जोड़ते थे। संक्षेप में किसी घटना, तथ्य, विचार या समस्या समाचार में लोगों की रुचि का होना उसके समाचार बनने के लिए आवश्यक शर्त है।

इस विवेचन के उपरांत अब हम समाचार को इस तरह परिभाषित कर सकते हैं :

समाचार किसी भी ताजी घटना, विचार या समस्या का विवरण या रिपोर्ट है जिसमें अधिक से अधिक लोगों की रुचि है।

समाचार की इस परिभाषा में शायद कोई विवाद न हो। इसे एक तरह से समाचार की सर्वमान्य परिभाषा कहा जा सकता है। लेकिन लोगों की रुचि किन घटनाओं, विचारों या समस्याओं (आगे इसके लिए केवल घटनाओं शब्द का प्रयोग किया गया है) में है? यह रुचि क्यों होती है और इसमें परिवर्तन कैसे और क्यों आते हैं? लोगों की रुचियों और प्राथमिकताएं ही समाचार जगत और मीडिया पर होने वाले तमाम विचार-विमर्श और अनुसंधान के केंद्र में होती है। इस दृष्टिïकोण से समाचार की परिभाषा में विस्तार करना आवश्यक हो जाता है।

समाचार किसी भी ताजी घटना, विचार या समस्या की रिपोर्ट है जिसमें लोगों की रुचि हो लेकिन विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल में समाचार की अवधारणाएं और अर्थ भी भिन्न हो जाते हैं।

स्वभावत: रोज एक ही तरह की खबर को प्रमुखता देना संभव नहीं है। हां इतनी उम्मीद जरूर की जाती है कि कभी-कभार समाचारपत्र इस तरह की घटनाओं के कारणों पर भी प्रकाश डालें ताकि इस तरह के मसलों पर जागरूक जनमत तैयार किया जा सके। अगर समाचारपत्र इस तरह की घटनाओं को ‘घटना’ तक सीमित कर देंगे और इसकी प्रक्रिया की पड़ताल नहीं करते तो वे लोगों में समझ और जागरूकता पैदा नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस तरह की घटनाओं के प्रति उन्हें असंवेदनशील और नासमझ बना रहे हैं। गंभीर मसलों का सतहीकरण कर रहे हैं। लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि जब एक ही तरह की घटना घटना आम बात हो जाए तो यह रोजमर्रा की घटना बन जाती है और उसके समाचार मूल्य का ह्रïास होता है।

समाज के प्रभावशाली तबकों को प्रभावित करने  वाली घटनाओं का बड़ा समाचार बनने का रुझान हमेशा से ही प्रबल रहा है।  घटनाओं का विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल में समाचार बनने की प्रक्रिया विविध और जटिल है। यह विभिन्न वर्गों और सत्ता तथा व्यवस्था के साथ उनके अंतर्संबंधों का परिणाम हैं। न्यूयार्क, लंदन, पेरिस, काहिरा, तेहरान, नई दिल्ली, बीजिंग और टोकियो तक जिस माहौल में समाचारों का उत्पादन होता है वह अलग है और अलग तरह की घटनाएं समाचारों का रूप अख्तियार करती हैं। कुछ घटनाएं होती हैं जो पूरे विश्व में समान रूप से समाचार होती हैं लेकिन ऐसी असाधारण घटनाएं कभी-कभार ही होती हैं। एक सामान्य दिन में हर माहौल में समाचारों में विविधता और भिन्नता होती है।

समाचारीय महत्व

इन तमाम विविधताओं और भिन्नताओं के बावजूद किसी घटना का अपना एक समाचारीय महत्व होता है और जिसे अनेक कारक प्रभावित करते हैं। एक घटना को एक समाचार के रूप में किसी समाचार संगठन में स्थान पाने के लिए इसका समय पर सही स्थान यानि समाचार कक्ष में पहुंचना आवश्यक है। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि उसका समायानुकूल होना जरूरी है। आज की तारीख के एक दैनिक समाचारपत्र के लिए वे घटनाएं समय पर हैं जो कल घटित हुई हैं। आमतौर पर एक दैनिक समाचारपत्र के हर संस्करण की अपनी एक डेडलाइन (समय सीमा) होती है जब तक के समाचारों को वह कवर कर पाता है। मसलन अगर एक प्रात:कालीन दैनिक समाचारपत्र कल रात 12 बजे तक के समाचार कवर करता है तो अगले दिन के संस्करण के लिए 12 बजे रात से पहले के चौबीस घंटे के समाचार समयानुकूल होंगे। इसी तरह 24 घंटे के एक टेलीविजन समाचार चैनल के लिए तो हर पल ही डेडलाइन है और समाचार को सबसे पहले टेलीकास्ट करना ही उसके लिए दौड़ में आगे निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है।

इस तरह एक चौबीस घंटे के टेलीविजन समाचार चैनल, एक दैनिक समाचारपत्र, एक साप्ताहिक और एक मासिक के लिए किसी समाचार की समय सीमा का अलग-अलग मानदंड होना स्वाभाविक है, कहीं समाचार तात्कालिक है कहीं सामयिक तो कहीं समकालीन भी हो सकता है। इन तथ्यों के महत्व का निर्धारण समाचार माध्यम और पत्रकारिता लेखन के स्वभाव से होता है। यह भी कहा जा सकता है कि 24 3 7 टेलीविजन माध्यम तात्कालिक अधिक होता है तो एक समाचारपत्र का लेख सामयिक या समकालीन अधिक हो सकता है।

किसी भी समाचार संगठन के लिए किसी समाचार के महत्व का मूल्यांकन उस आधार पर भी किया जाता है कि वह घटना उसके कवरेज क्षेत्र और पाठक/दर्शक/श्रोता समूह के कितने करीब हुई। हर घटना का समाचारीय महत्व उसकी स्थानीयता से भी निर्धारित होता है। सबसे करीब वाला ही सबसे प्यारा भी होता है। यह मानव स्वभाव है और स्वाभाविक भी है कि लोग उन घटनाओं के बारे में जानने के लिए अधिक उत्सुक होते हैं जो उनके करीब होती हैं। इसका एक कारण तो करीब होना है और दूसरा कारण यह भी है कि इसका असर भी करीब वालों पर ही अधिक पड़ता है। मसलन किसी एक खास कॉलोनी में चोरी-डकैती की घटना के बारे में यहां के लोगों की रुचि होना स्वाभाविक है। रुचि इसलिए कि घटना उनके करीब हुई है और इसलिए भी कि इसका संबंध स्वयं उनकी अपनी सुरक्षा से है। अपने आस-पास होने वाली घटनाओं के प्रति लोगों की अधिक रुचि से हम सब वाकिफ हैं और समाचारों और समाचार संगठनों का अधिकाधिक स्थानीयकरण इसी रुचि को भुनाने का परिणाम है।

इसके अलावा किसी घटना के आकार से भी इसका समाचारीय महत्व निर्धारित होता है। किस कारण कोई समाचार महत्त्वपूर्ण है किसके कारण कोई अन्य समाचार महत्वपूर्ण है। अनेक मौकों पर किसी घटना से जुड़े लोगों के महत्त्वपूर्ण होने से भी इसका समाचारीय महत्त्व भी बढ़ जाता है। स्वभावत: प्रख्यात और कुख्यात अधिक स्थान पाते हैं। प्रधानमंत्री को जुखाम भी हो तो समाचार है और अन्य कोई कितने ही बुखार से ग्रसित क्यों न हों शायद समाचार नहीं बन पाए। प्रसिद्ध लोगों की छोटी-मोटी गतिविधियां भी समाचार बन जाती हैं। याद कीजिए सलमान खान पर विवेक ओबराय का गुस्सा फूटना कितनी बड़ी खबर बनी थी।

इसके अलावा घटना के आकार से आशय यही है कि इससे कितने सारे लोग प्रभावित हो रहे हैं या कितने बड़े भू भाग में पहुंचा है आदि। किसी घटना का ‘प्रभाव’ भी इसके महत्त्व को निर्धारित करता है। सरकार के किसी निर्णय से अगर दस लोगों को लाभ हो रहा हो तो यह इतनी बड़ा समाचार नहीं जितना कि अगर इससे लाभान्वित होने वाले लोगों की संख्या एक लाख हो। सरकार अनेक नीतिगत फैसले लेती हैं जिनका प्रभाव तात्कालिक नहीं होता लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं और इसी दृष्टिï से इसके समाचारीय महत्त्व को आंका जाना चाहिए।

उपभोक्ता वर्ग

आमतौर पर हर समाचार का एक खास पाठक/दर्शक/श्रोता वर्ग होता है। किसी समाचारीय घटना के इस वर्ग से भी इसका महत्त्व तय होता है। किसी खास समाचार का ऑडिएंस कौन हैं और इसका आकार कितना बड़ा है। इन दिनों ऑडिएंस का समाचारों के महत्त्व पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है। अतिरिक्त क्रय शक्ति वाले सामाजिक तबकों, जो विज्ञापन उद्योग के लिए बाजार होते हैं, में अधिक पढ़े जाने वाले समाचारों को अधिक महत्त्व मिलता है।

हर समाचारीय घटना का महत्त्व आंकने के लिए इसके संदर्भ का विशेष महत्त्व होता है। खास तौर से महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा दिए गए बयानों और कथनों का महत्त्व उनके संदर्भ से ही तय किया जा सकता है।

अनेक अन्य मौकों पर महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के बयान किसी संदर्भ में ही होते हैं और इस संदर्भ को जाने-समझे बिना कोई पत्रकार इस बयान के समाचारीय महत्त्व को नहीं आंक सकता। संदर्भ को समझने के लिए विषय की समझ जरूरी है। उदाहरण के लिए दुनिया के लगभग सभी देश आतंकवाद की भत्र्सना करते हैं। लेकिन जब भारत, इस्राइल, फिलिस्तीनी, अमेरिका या पाकिस्तान आतंकवाद की भत्र्सना करते है तो इनका अर्थ भिन्न होता है और इसे इसके संदर्भ में समझना होता है।

इन बयानों को इनके संदर्भ से काटकर कभी भी उचित समाचारीय महत्त्व नहीं दिया जा सकता। भारत की सबसे बड़ी चिंता कश्मीरी आतंकवाद है जो समय-समय पर देश के अन्य हिस्सों में भी वारदातें करता है मसलन संसद पर हमला। कश्मीर आतंकवाद को जिंदा रखने में पाकिस्तान की अहम भूमिका है। पाकिस्तान के समर्थन के बिना कश्मीर में आतंकवाद चलाया ही नहीं जा सकता। फिलिस्तीनीयों के लिए इस्राइल एक आतंकवादी राज्य और वहां की सरकार आतंकवादी हमले करती है। इस्राइल का मानना है कि वह फिलीस्तीनी आतंकवाद का शिकार है और उसकी हर सैनिक कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ होती है। अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है और इस युद्ध में पाकिस्तान अमेरिका का सामरिक सहयोगी है। समूचे इस्लामी और अरब राज्यों में अमेरिकी रणनीति में पाकिस्तान की अहम भूमिका है। रूस को उस आतंकवाद की चिंता है जो चेचन्या में इसे परेशान किए हुए है। नेपाल की चिंता शायद माओवादी आतंकवादी हैं।

इन तमाम संदर्भों में ही उपरोक्त संयुक्त बयानों के समाचारीय महत्त्व, उनमें लेखन, संपादन, शीर्षक आदि का चयन किया जा सकता है। जो पत्रकार इन संदर्भों से वाकिफ नहीं हैं वे इन घटनाओं के समाचार लिखने, संपादित करने और इनके महत्त्व को आंकने में विफल होने के लिए ही बाध्य है।

नीतिगत ढांचा

किसी समाचार संगठन की कोई नीति होने का मतलब लेखन की स्वतंत्रता पर अंकुश है। अगर किसी मसले पर समाचार संगठन की कोई नीति है, तो इसका मतलब वह इस नीति के अनुसार ही समाचार प्रकाशित करेगा और विचारों की अभिव्यक्ति करेगा। इसलिए कोई भी समाचार संगठन कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि व्यापक राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर उसकी कोई नीति है। लेकिन भले ही किसी सुगठित रूप में नीति न हो लेकिन हर समाचार संगठन मोटे तौर पर हर मुद्दे पर किसी नीति पर तो चलता ही है और अनेक कारक इस नीति का निर्धारण करते हैं। अनेक संपादक इसे ‘संपादकीय लाइन’ कहते हैं। मसलन समाचारपत्रों में संपादकीय होते हैं जिन्हें संपादक और उनके सहायक संपादक लिखते हैं। संपादकीय बैठक में तय किया जाता है कि किसी विशेष दिन कौन-कौन सी ऐसी घटनाएं हैं जो संपादकीय हस्तक्षेप के योग्य हैं। इन विषयों के चयन में काफी विचार-विमर्श होता है।  फिर उनके निर्धारण के बाद क्या संपादकीय स्टैंड हो क्या लाइन ली जाए यह भी तय किया जाता है और विचार-विमर्श के बाद संपादक तय करते हैं क्या रुख होगा या  क्या लाइन होगी। यही स्टैंड और लाइन एक समाचारपत्र की नीति भी होती है।

वैसे तो एक समाचारपत्र में अनेक तरह के लेख और समाचार छपते हैं और आवश्यक नहीं है कि वे संपादकीय नीति के अनुकूल हों। समाचारपत्र में विविधता और बहुलता का होना अनिवार्य है। संपादकीय एक समाचारपत्र की विभिन्न मुद्दों पर नीति को प्रतिबिंबित करते हैं। निश्चय ही समाचार कवरेज और लेखों-विश्लेषणों में संपादकीय की नीति का पूरा का पूरा अनुसरण नहीं होता लेकिन कुल मिलाकर संपादकीय नीति का प्रभाव किसी भी समाचारपत्र के समूचे व्यक्तित्व पर पड़ता है। अगर कोई समाचारपत्र भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का कट्टïर समर्थक है तो वह उन तमाम समाचारों को अधिक महत्त्व देने की कोशिश करेगा जो उसके पक्ष में जाती हैं। समाचारों का चयन और डिस्पले भी समाचारपत्र की नीतियों को प्रतिबिंबित करते हैं। अक्सर ऐसा देखने में आता है कि संपादकीय में कोई समाचारपत्र किसी खास राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक पार्टी या गठजोड़ के करीब हो तो समाचारों के चयन और प्रस्तुतीकरण में भी यह इन्ही के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।

समाचार संगठन की नीतियों से किसी भी समाचार संगठन की समाचार की अवधारणाएं निर्धारित होती हैं। इसी से उसकी संपादकीय-समाचारीय सामग्री का चरित्र और स्वरूप तय होता है। इसके बाद स्थान और पत्रकारीय महत्त्व के आधार पर किसी समाचार संगठन में समाचार अपना स्थान पाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि सैद्धांतिक रूप से किसी समाचारपत्र के संपादकीय ही इसकी स्टैंड, लाइन या नीति को दर्शाते हैं और बाकी लेख, विश्लेषण और बाइलाइन वाले समाचारों में वैचारिक विविधता होती है। एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में तमाम विविधताओं को प्रतिबिंबित करने के बावजूद समाचार संगठन अपनी संपादकीय नीति के अनुसार ही समाचारों को भी छापता है।

निश्चय ही समाचार संगठन किसी व्यवस्था के तहत या इसके भीतर ही काम करते हैं। एक दृष्टि से मुख्यधारा के समाचार संगठन किसी भी व्यवस्था की प्रभुत्वकारी और शासक विचारधारा के ही प्रवक्ता होते हैं और इस दायरे के भीतर ही राजनीतिक विविधता का सृजन होता है। इसके अलावा समाचार संगठन के स्वामित्व से भी इसकी नीतियां तय होती हैं। पिछले कुछ समय से दुनिया भर में समाचार संगठनों के स्वामित्व के संकेंद्रीकरण के प्रभावों पर काफी चर्चा हो रही है। समाचार सामग्री और प्रस्तुतीकरण पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। यह तो तय है कि कोई भी समाचार संगठन अपने मालिक और उसके विचारों के खिलाफ नहीं जा सकता।

उसके बाद पिछले कुछ वर्षों में विज्ञापन उद्योग का दबाव भी काफी बढ़ गया है। मुक्त बाजार व्यवस्था के तेज विस्तार तथा उपभोक्तावाद के फैलाव के साथ विज्ञापन उद्योग का जबर्दस्त विस्तार हुआ है। समाचार संगठन अब कारोबार और उद्योग हो गए हैं और विज्ञापन उद्योग पर उनकी निर्भरता बहुत बढ़ चुकी है। इसका भी संपादकीय/समाचारीय सामग्री पर गहरा असर पड़ रहा है। समाचार संगठन पर अन्य आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव भी होते हैं। किसी छोटे स्थान से छपने वाला कोई समाचारपत्र वहां के स्थानीय माफिया के खिलाफ कुछ नहीं छाप सकता। इसी तरह के कई अन्य दबाव भी इसकी नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बाद जो स्पेस या स्थान बचता है वह पत्रकारिता और पत्रकारों की स्वतंत्रता का है। यह उनके प्रोफेशनलिज्म पर निर्भर करता है कि वे इस स्पेस का किस तरह सबसे प्रभावशाली ढंग से उपयोग कर पाते हैं। इस पत्रकारीय स्पेस पर भी निरंतर हमले होते रहते हैं और इसे छोटा करने का प्रयास होता रहता है।

पत्रकार और उसके प्रोफेशनलिज्म के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस स्पेस की हिफाजत करे और इसका अधिकतम इस्तेमाल से इसके विस्तार का निरंतर प्रयास करता रहे। कई बार किन्हीं खास परिस्थितियों में भी यह स्पेस कम-ज्यादा होता रहता है। उन्माद की परिस्थितियों में पत्रकारीय स्वतंत्रता का जबर्दस्त ह्रïास होता है चाहे वह किसी भी तरह का उन्माद क्यों न हो। 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका का उदाहरण सबसे सामने है जहां उग्र राष्टï्रवाद इस कदर हावी हो गया था कि मीडिया में असहमति का स्थान बहुत छोटा हो गया था। अनेक अवसरों पर सामाजिक वातावरण भी संपादकीय सामग्री को प्रभावित करता है। सामाजिक तनाव की स्थिति में यह प्रभाव अधिक गहरा हो जाता है।

महत्वपूर्ण जानकारियां

अनेक ऐसी सूचनाएं भी समाचारीय होती हैं जिनका समाज के किसी विशेष तबके के लिए कोई महत्त्व हो सकता है। ये लोगों की तात्कालिक सूचना आवश्यकताएं भी हो सकती हैं। मसलन स्कूल कब खुलेंगे, किसी खास कॉलोनी में बिजली कब बंद रहेगी, पानी का दबाव कैसा रहेगा आदि। इस संदर्भ में कुड क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनमें सूचनाएं देने के अपने ही खतरे हैं। कम से कम चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अनेक बार कुछ तरह की सूचनाएं गलतफहमियां पैदा करती हैं। यह सर्वविदित है कि अनुसंधान अनेक तरह की अवधारणाओं पर आधारित होते हैं और वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर अधकचरे ज्ञान को इसमें निष्कर्ष के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा दुर्घटनाओं के मामले में भी हताहतों के नाम की जानकारी देने का अपना ही महत्त्व है। हालांकि अधिकांश मौकों पर नाम पता करना मुश्किल काम होता है।

आशय यह है कि दुर्घटना में वास्तविक रूप से हताहतों और उनसे प्रभावित होने वाले लोगों को जितनी जल्दी पहचान और सूचित किया जा सके उतना ही बड़ी संख्या में लोगों की चिंता का निदान किया जा सकता है। मसलन अगर किसी विमान की दुर्घटना में पायलट की मौत हो जाती है तो पायलट का नाम दे देने से उन तमाम परिजनों को राहत मिलेगी जिनके परिजन उस सेक्टर में पायलट के पद पर तैनात हैं,जहां यह दुर्घटना हुई।

एक पुरानी कहावत है कि कुत्ता आदमी को काट दे तो खबर नहीं लेकिन अगर आदमी कुत्ते को काट ले तो यह खबर है यानी जो कुछ स्वाभाविक नहीं है या किसी रूप से असाधारण है वही समाचार भी है। सौ नौकरशाहों का ईमानदार होना समाचार नहीं क्योंकि इनसे तो ईमानदार रहने की अपेक्षा की जाती है लेकिन एक नौकरशाह अगर बेईमान और भ्रष्टï है तो यह बड़ा समाचार है। सौ घरों का निर्माण समाचार नहीं है। यह तो एक सामान्य निर्माण प्रक्रिया है लेकिन दो घरों का जल जाना समाचार है।

निश्चय ही अनहोनी घटनाएं समाचार होती हैं। लोग इनके बारे में जानना चाहते हैं। लेकिन समाचार मीडिया को भी इस तरह की घटनाओं के संदर्भ में काफी सजगता बरतनी चाहिए अन्यथा कई मौकों पर यह देखा गया है कि इस तरह के समाचारों ने लोगों में अवैज्ञानिक सोच और अंधविश्वास को जन्म दिया है। कई बार यह देखा गया है कि किसी विचित्र बच्चे के पैदा होने की घटना का समाचार चिकित्सा विज्ञान के संदर्भ से काटकर किसी अंधविश्वासी संदर्भ में प्रस्तुत कर दिया जाता है। भूत-प्रेत के किस्से-कहानी समाचार नहीं हो सकते। किसी इंसान को भगवान बनाने के मिथ गढऩे से भी समाचार मीडिया को बचना चाहिए।

छवियों के बनने-बिगडऩे की प्रक्रिया

जैसा कि इस अध्याय के प्रारंभ में बताया गया है हम अपने प्रत्यक्ष अनुभव के बाहर की दुनिया के बारे में तमाम जानकारियां समाचार माध्यमों से प्राप्त करते हैं। इस तरह हम देश-दुनिया के बारे में जो भी जानते हैं वह एक छवि होती है जिसका गठन हम उन तमाम सूचनाओं के आधार पर करते हैं जो हमे समाचार माध्यमों से मिलती है। इस दृष्टिïकोण से हम एक तरह से सूचना छवियों की दुनिया में रहते हैं। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि जो भी छवियां हमारे मस्तिस्क में अंकित है वे वास्विकता के कितने करीब है। अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि आधुनिक सूचनातंत्र एक ओर तो हमे ढेर सारी जानकारियां देते है और हमारे ज्ञान में अत्यधिक वृद्धि करते हैं। लेकिन साथ ही कई विषयों की जो छवियां वे बनाते हैं वे यर्थात को प्रतिबिंबित नहीं करती हैं। सूचना छवियों, इन छवियों के बनने-बिगडऩे की प्रक्रिया और भ्रमों के इस मायाजाल को सूचना के तथाकथित विस्फोट ने और भी जटिल बना दिया है। सूचना क्रांति के उपरोक्त संदेशों की बमबारी अत्यंत तेज हो गई है जिसका स्वरूप और दिशा एकतरफा है। आधुनिक सूचनातंत्र आज छवियों को बनाने-बिगाडऩे पर ही केंद्रित हैं और काफी हद तक इसमें सफल भी हो रहे हैं। आधुनिक सूचनातंत्र लोगों के दिमाग में एक ऐसी छवि का निर्माण कर रहे हैं जिनसे अनेक तरह के उत्पादों का बाजार तैयार किया जा सके और इनमें सबसे ऊपर वैचारिक उत्पाद ही होते हैं।

समाचारों के चयन की प्रक्रिया के कारण सूचना और जानकारियों का यह प्रवाह किसी भी विषय की संपूर्ण तस्वीर या पूर्ण यथार्थ को प्रस्तुत नहीं करता। यह किसी भी विषय के किसी खास पहलू के बारे में सूचनाएं और जानकारियां देता है और इसके कई अन्य पहलुओं की अनदेखी करता है। इस प्रक्रिया से किसी भी विषय या घटना की खंडित तस्वीर ही प्रस्तुत की जाती है जो अक्सर इसके संपूर्ण यथार्थ का प्रतिनिधित्व करने वाली सूचनाओं और जानकारियों से विहीन होती है। सूचना छवियों के निर्माण-पुनर्निर्माण की इस प्रक्रिया में आज विकृत और विखंडित छवियों का व्यापार ही अधिक हावी है।

परंपरागत रूप से सूचना और संचार प्रक्रिया ही सामाजिक संगठन का आधार रही है। इसमें आदान-प्रदान का तत्त्व अहम भूमिका अदा करता था। इस आदान-प्रदान से समाज और संस्कृतियों के स्वस्थ विकास का मार्ग प्रशस्त होता रहा है क्योंकि इसमें किसी तरह की ‘जोर जबर्दस्ती’ के तत्त्व नहीं थे। इसमें छवियों के निर्माण-पुनर्निर्माण की प्रक्रिया एकतरफा नहीं थी। लेकिन सूचना युग में संवाद की परंपरागत शैली का लगभग अंत सा हो गया है। आधुनिक सूचना और संचारतंत्रों ने इसे संवाद के बजाए एक बमबारी का रूप दे डाला है जिसमें ‘जोर-जबर्दस्ती’ के तत्त्व मौजूद हैं और यह संवाद न होकर एकतरफा प्रवाह तक सीमित होकर रह गई है।

इस प्रक्रिया के माध्यम से लोगों को खास तरह की जानकारी मुहैया कर एक खास तरह की छवि का निर्माण किया जा रहा है। छवियों का यह निर्माण हाल के वर्षों में मीडिया पर अधिकाधिक निर्भर होता जा रहा है। शहरी तबकों में आज टेलीविजन देखने में लोग काफी समय व्यतीत करते हैं। कुछ दशक पहले तक देशों, लोगों, जगहों आदि के बारे में छवियों के निर्माण की प्रक्रिया काफी हद तक सामाजिक माहौल पर निर्भर होती थी जिसमें परिवार से लेकर स्कूल तक का संपूर्ण माहौल शामिल है। इस माहौल से भी अनेक गलत छवियां बनती थीं लेकिन इनकी जड़ें बहुत गहरी नहीं होती थीं और लोगों की सोच में एक खुलापन दिखता था। वे किसी भी विषय पर नई सूचनाओं और जानकारियों को प्राप्त करने के लिए तत्पर रहते थे। आज के मीडिया ने लोगों को उनके अपने इस माहौल से ही काट दिया है। लोगों के जीवन में मीडिया का हस्तक्षेप इस कदर बढ़ता जा रहा है कि सामाजिक माहौल को भी यही नियंत्रित करने लगा है।

मीडिया के वैश्वीकरण और खास तौर से उपग्रह टेलीविजन के हाल के वर्षों में हुए तेजतर विकास से सूचना छवियों के निर्माण-पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में इस माध्यम की भूमिका अहम हो गई है। आज पश्चिमी वर्चस्व वाले टेलीविजन चैनल विश्व भर में छा गए हैं और विकासशील देशों के शहरी क्षेत्रों में इनकी खासी पहुंच कायम हो चुकी है। जाहिर है कि इनके तमाम प्रोग्राम पश्चिमी चश्मे से ही विश्व को देखते हैं और इसी के अनुसार अनेकानेक विषयों के बारे में सूचनाएं और जानकारियां देते हैं। आज के मीडिया बाजार में पश्चिमी उत्पादों की ही बहुलता है। टेलीविजन माध्यम का काफी स्थानीयकरण भी हुआ है लेकिन सूचना छवियों के निर्धारण में पश्चिमी मूल्यों का वर्चस्व और प्रतिमानों का नियंत्रण इन पर भी स्पष्टï रूप से देखा जा सकता है।

सूचनाओं की प्रोसेसिंग

अनेक विषयों के बारे में सूचनाओं और जानकारियों के लिए लोग मीडिया पर ही मुख्य रूप से निर्भर होते हैं। ये सूचनाएं और जानकारियां कई स्तरों पर वैचारिक प्रोसेसिंग के बाद ही उपभोक्ताओं तक पहुंचती हैं। लोगों के पास अन्य तरह की सूचनाएं और जानकारियां हासिल करने का कोई वैकल्पिक साधन नहीं होता। फिर उनके पास वैकल्पिक जानकारियां हासिल करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने का कोई कारण भी नहीं होता। इस तरह विश्व के बारे में सूचनाओं और जानकारियों के साधनों पर एकाधिकार के कारण यथार्थ की छवि को अधिकाधिक क्षत-विक्षत करना आसान हो जाता है। इस तरह मीडिया यथार्थ की जो छवि प्रस्तुत करता है वह अधिकाधिक कृत्रिम यथार्थ की ओर उन्मुख होता है। इस प्रक्रिया में मीडिया के यथार्थ और वास्तविक यथार्थ के बीच की दूरी का विस्तार होता चला जाता है।

विश्वीकृत मीडिया हजारों घटनाओं की अनदेखी कर चंद घटनाओं की ही जानकारी देता है और फिर इन घटनाओं के बारे में भी सूचनाओं और जानकारियों के भंडार में से एक छोटे से अंश का ही प्रयोग करता है जिसका विश्व भर में व्यापक पैमाने पर वितरण कर ‘अनुकूल’ छवियां प्रस्तुत की जाती हैं। मीडिया का प्रभाव इस कारण भी अधिक हो जाता है क्योंकि उपभोक्ताओं के पास वैकल्पिक सूचना स्रोत नहीं होते हैं। इस तरह लोग मीडिया के यथार्थ को ही वास्तविक यथार्थ के रूप में स्वीकार करने को मजबूर होते हैं। इस मामले में टेलीविजन अन्य माध्यमों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावशाली साबित होता है क्योंकि इसके पास अपने यथार्थ को पुख्ता करने के लिए ‘जीवंत तस्वीरों’ के रूप में ‘ठोस सबूत’ होते हैं।

मीडिया द्वारा परोसी गई सामग्री के आधार पर ही किसी देश, संस्कृति या किसी भी अन्य विषय की प्रभुत्वकारी छवि का निर्माण होता है। इन छवियों के आधार पर ही इनको विषयों से संबंधित कर कार्रवाई का परिप्रेक्ष्य निर्धारित होता है। विश्व पटल पर किसी भी तरह की राजनीतिक, आर्थिक या सैनिक कार्रवाई को लोग अंतर्राष्टï्रीय यथार्थ से संबद्ध न कर इस यथार्थ की बनी अपनी छवि के माध्यम से देखते हैं और इसी के अनुरूप इस पर अपनी सहमति या असहमति की मोहर लगाते हैं। इस तरह मीडिया एक अंतर्राष्टï्रीय छवि निर्माता की भूमिका अदा करता है।

मीडिया संगठन बाजार प्रतियोगिता में प्रतिद्वंद्वी होते हैं लेकिन व्यवस्था की विचारधारा और मूलभूत अवधारणाओं को लेकर उनके बीच पूरी सहमति होती है। स्वयं का उनका अस्तित्व इस व्यवस्था से संबद्ध होता है। इस कारण वे बाजार व्यवस्था से बाहर का  कोई विकल्प पेश नहीं करते बल्कि इसके मातहत ही विविधता का बखान करते हंै। इस तरह समकालीन विश्व के अहम और टकराववादी मसलों पर विश्वीकृत मीडिया की सोच और समझ में कोई मूलभूत अंतर नहीं होता और बाजार प्रतियोगिता अधिकाधिक सनसनीखेज और अतिरंजित होने की ओर ही अधिक उन्मुख होती हैं।

समाचारों के संदर्भ में यह प्रतियोगिता सनसनीखेज अधिक होती है जबकि अन्य मीडिया प्रोग्रामिंग में सस्ते मनोरंजन की ओर ही अधिक उन्मुख होती हैं। विश्व राजनीति और सत्ता संघर्ष आज इन्हीं सूचना छवियों पर टिकी है। किसी देश के खिलाफ अगर किसी महाशक्ति को कोई सैनिक कार्रवाई करनी हो तो पहले इस देश की ऐसी छवि का निर्माण आवश्यक हो जाता है जिससे लोगों को यह सैनिक कार्रवाई वाजिब प्रतीत हो।

सूचना छवियां और समाचारों का महत्त्व

विश्व की किसी भी घटना की जानकारी सबसे पहले समाचारों से ही मिलती है। समाचार किसी भी घटना के बारे में जिन तथ्यों को प्राथमिकता और प्रमुखता देते हैं उसी के अनुसार उस घटना के बारे में लोगों के मस्तिष्क पर छवियों का निर्माण होता है। समाचार के संदर्भ में ‘घटना’ का उल्लेख इसके समाचारीय होने के आधार पर किया गया है। समाचारीय घटना सचमुच में कोई घटना भी हो सकती है और विचार तथा कोई समस्या भी हो सकती है। अनेक तरह के रुझानों और प्रक्रियाओं को भी समाचारीय घटना के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। ये समाचारीय घटनाएं वे घटनाएं होती हैं जो अचानक आज ही घटित नहीं होतीं। मसलन राजनीतिक सोच, सामाजिक परिवर्तन, लोगों के दृष्टिïकोण और जीवन शैली में आने वाले बदलाव भी समाचारीय घटनाएं बनते हैं हालांकि ऐसा रातोंरात घटित नहीं होता बल्कि उन्हें घटित होने में वर्षों लगते हैं।

सैद्धांतिक रूप से यह माना जाता है कि समाचार किसी भी घटना का प्रतिबिंब हैं। यह उस घटना को उसकी संपूर्ण सत्यता और वस्तुपरकता के आधार पर ही प्रस्तुत करता है। लेकिन दशकों से यह बहस चल रही है कि समाचार माध्यमों  से विश्व भर के अनेक विषयों की कैसी छवि का निर्माण हो रहा है? मानव समाज में संचार की प्रक्रिया के माध्यम से निर्मित छवियां ही से एक व्यक्ति के लिए प्रमुख यथार्थ होती हैं। जिस विषय के बारे में जो सूचना छवि निर्मित कर दी जाती है उस विषय पर उसका यथार्थ वही होता है। अब सवाल पैदा होता है कि क्या यथार्थ और समाचार माध्यमों द्वारा निर्मित उसकी छवियों के बीच अंतर होता है? फिर समाचार माध्यमों से मिलने वाली सूचनाओं के प्रेषक भी तो किसी विषय की स्वयं अपनी ही छवि के आधार पर उसका मूल्यांकन और विश्लेषण करते हैं।

व्यापारीकृत मीडिया ने बाजार की तथाकथित आवश्यकताओं तथा लोगों की रुचियों को जिस रूप में निर्धारित किया है उसी पैमाने पर कुछ घटनाएं समाचार बनती हैं और इस समाचार में भी घटना के बारे में चंद जानकारियों का ही चयन होता है जो उपरोक्त कसौटी पर खरे उतरते हों। किसी भी समाचारीय घटना के बारे में बहुतायत जानकारियां नदारद होती हैं।

समाचार उत्पादन की प्रक्रिया

एक पत्रकार उन जानकारियों को ही समाचार में शामिल करता है जो उसकी स्वयं की समाचार अवधारणाओं और मूल्यों पर खरी उतरती हैं। फिर उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते अनेक चरणों में इस समाचार रूपी सूचना पैकेज की रीपैकेजिंग और प्रोसेसिंग होती है। इससे यथार्थ और छवि के बीच अंतर बढ़ता चला जाता है और संभव है कि उपभोक्ता तक पहुंचने वाली सूचनाएं संपूर्ण यथार्थ की प्रतिनिधित्व न करती हों और इस तरह इसकी एक विकृत छवि पैदा करती हों। समाचारों की दुनिया वास्तव में सूचना छवियों की ही दुनिया है। इसकी संचार प्रक्रिया में शामिल सभी कडिय़ां अपने-अपने दृष्टिïकोण से यथार्थ को देखती हैं और इसका विश्लेषण और व्याख्या करती हैं।

किसी भी समाचार माध्यम का यह दावा खोखला होता है कि उसने किसी घटना या विषय के केंद्रीय तत्त्वों और प्रतिनिधित्वपूर्ण सूचनाओं के जरिए यथार्थ की सही छवि प्रस्तुत की है क्योंकि कोई समाचार माध्यम समाचारों और इनसे निर्मित होने वाले छवियों के बारे में पहले से निर्धारित मूल्यों का पालन करता है और हर घटना को एक खास वैचारिक स्थिति से देखता है। इन जटिल प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद अधिकांशत: समाचार यथार्थ की एक खंडित और भ्रमपूर्ण छवि का ही निर्माण करते हैं और इस यथार्थ के एक खास हिस्से को प्रोजेक्ट करते हंै और शेष हिस्सों के बारे में कोई जानकारी न देकर सूचना छवि को यथार्थ से और भी दूर ले जाते हंै।

एक दृष्टिïकोण से किसी विषय के बारे में एक तरह की जानकारियां अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं तो दूसरे दृष्टिïकोण से संभव है महत्त्वपूर्ण जानकारियां इससे एकदम भिन्न हों या फिर चंद ही समानताएं हों और विषमताएं अधिक।  मूल प्रश्न यही है कि किसी घटना या विषय के बारे में किस तरह के तथ्यों का चयन समाचार के लिए  किया जाता है और किस आधार पर इससे कहीं अधिक तथ्यों को समाचार में शामिल करने योग्य नहीं माना जाता।

मीडिया द्वारा निर्मित किसी घटना की विखंडित छवि ही उपभोक्ता के लिए संपूर्ण यथार्थ होती है। इस दृष्टिï से किसी भी विषय पर प्राप्त किया गया ज्ञान अनेक सीमाओं में बंधा होता है। समाचारों के माध्यम से किसी विषय की वस्तुपरक छवि प्रेषित करने का दावा किया जाता है। आदर्श रूप से समाचार में विचार नहीं होते। समाचार तथ्यपरक होते हैं। इससे इन्हें विश्वसनीयता और एक तरह की वैज्ञानिकता का दर्जा प्राप्त हो जाता है। समाचार किसी भी विषय की जैसी छवि पैदा करते हैं वह इस विषय पर अन्य तमाम तरह की मीडिया प्रोग्रामिंग को निर्धारित करती हैं। समाचारों से उत्पन्न छवियां ही अनेक रूपों में इसके नाटकीय रूपांतरण की दिशा तय करती हैं। इस तरह वस्तुपरक और तथ्यपरक रूप से प्रस्तुत कोई भी विषय इसी छवि के अनुसार कल्पित मीडिया प्रोग्रामिंग – चाहे वह कोई सीरियल हो या फीचर फिल्म- को भी निर्धारित करता है।

सूचना छवियां यथार्थ को प्रतिबिंबित करने के बजाए इसकी आभासी प्रतिबिंब मात्र होती हैं। आज समाचारों को लेकर सर्वत्र यह स्वीकार कर लिया गया है कि इनका ऐसा कोई प्रस्तुतीकरण हो ही नहीं सकता जो समान रूप से सबको वस्तुपरक लगे। इसलिए समाचारों की दुनिया में आज इस तथ्य को  स्वीकार कर लिया गया है कि समाचारों का चयन और उनका प्रस्तुतीकरण ऐसा होना चाहिए कि अधिक से अधिक लोगों को यह वस्तुपरक प्रतीत हो। स्वभावत: कोई भी समाचार संगठन अपने उपभोक्ताओं के वस्तुबोध (परसेप्शन) के संदर्भ में ही वस्तुपरकता का अधिकतम स्तर हासिल करने का प्रयास करता है। इस सिद्धांत के पालन और उल्लंघन से ही किसी भी समाचार संगठन की साख बनती या बिगड़ती है। लेकिन समाचार उत्पादन से संबद्ध लोग भली-भांति जानते हैं कि लोगों के सामने जो पेश किया जा रहा है वह संपूर्ण घटना का एक अंश मात्र ही है।

टेलीविजन माध्यम की आंख कैमरा होता है। एक समय टेलीविजन माध्यम की संपूर्णता के बारे में यह दावा किया जाता था कि ‘ घटना को सीधे घटते देखिए।’ आज सर्वविदित है कि टेलीविजन के परदे पर प्रस्तुत की जाने वाली तस्वीरें एक बड़े घटनाक्रम की चंद ‘आकर्षक तस्वीरों और बाइट’ से बढक़र कुछ नहीं हैं। एक कैमरामैन किसी भी सामान्य घटना की पांच से पंद्रह मिनट तक की वीडियो टेप लाता है लेकिन एक आधे घंटे के समाचार बुलेटिन में आम तौर पर इसका 50-60 सेकेंड से अधिक उपयोग नहीं होता। आज  प्रतियोगिता के कारण हर टेलीविजन चैनल इस वीडियो टेप की उस क्लिपिंग को ही प्रस्तुत करने की ओर उन्मुख होता है जिसमें सनसनीखेज और एक्शन का तत्त्व सर्वाधिक हो। घटना की संपूर्णता के संदर्भ में वीडियो क्लिपिंग का चयन नहीं के बराबर होता है।

फिर आज नई-नई तरह की वीडियो प्रौद्योगिकियां उपलब्ध हैं जिनसे कैमरे के एक खास तरह के इस्तेमाल से यथार्थ की छवि में तोड़-मरोड़ की जा सकती है। ‘घटना’ से कैमरे की दूरी, उसकी किसी खास कोणीय स्थिति से ‘यथार्थ’ से अलग छवि का निर्माण किया जा सकता है।

सैद्धांतिक रूप से यह मान्यता है कि किसी भी समाचार को निष्पक्ष ढंग से प्रस्तुत किया जाए। निष्पक्षता का पैमाना यही है कि इससे संबद्ध हर पक्ष को समाचार में उसके महत्त्व के अनुसार स्थान मिले। लेकिन व्यवहार में इस सिद्धांत का पालन लगभग नामुमकिन है। खास तौर पर जब किसी समाचार के अनेक पक्ष हों। मुख्य रूप से एकपक्षीय समाचारों में निष्पक्षता का सिद्धांत लागू किया जा सकता है।

समाचारों के संकलन, जांच-पड़ताल, तथ्यों का विश्लेषण, इनके प्रस्तुतीकरण की पूरी प्रक्रिया इतनी जटिल है और राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मूल्यों से इस कदर जकड़ी हुई है कि वस्तुपरकता और निष्पक्षता किताबी शब्द बनकर रह जाते हैं। हर मीडिया संगठन अपने परिवेश के अनुसार ही वस्तुपरकता और निष्पक्षता के मानदंड निर्धारित करता है ताकि अपने उपभोक्ताओं के संदर्भ में वह वस्तुपरक हो बल्कि वस्तुपरक प्रतीत हो और उसकी साख बनी रहे।

क्या कोई पत्रकार अपने आपको किसी घटना के प्रति निरपेक्ष रख सकता है? उत्तर निश्चय ही नकारात्मक है। ऐसी कोई स्थिति हो ही नहीं हो सकती जहां से किसी भी समाचारीय घटना को निरपेक्ष भाव से देखा जा सकता हो। जाहिर है कि अगर समान सामाजिक माहौल में वस्तुपरकता की इतनी अवधारणाएं हों तो वस्तुपरकता वास्तव में एक मिथक ही है। संतुलन का संबंध घटना से संबद्ध सभी पक्षों के दृष्टिïकोण को देना भर है जबकि वस्तुपरकता का सरोकार एक पत्रकार की सोच, उसके दृष्टिïकोण, उसके विचार से है जिन्हें उसने रातोंरात विकसित नहीं किया बल्कि जो बचपन से ही घर, स्कूल और समाज के माहौल में विकसित हुए। भारत के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे की वह रिपोर्ट वस्तुपरक है जिसे पढऩे वाले को यह पता न चल पाए कि रिपोर्ट लिखने वाला हिंदू है या मुसलमान।

आशय यह है कि सैद्धांतिक रूप से वस्तुपरकता को परिभाषित नहीं किया जा सकता लेकिन इसका मतलब यह भी है कि इसकी एक कार्यात्मक (फंक्शनल) परिभाषा संभव है जो हर संदर्भ में उसी के अनुरूप निर्धारित होती हैं। इसका आशय यह भी है कि वस्तुपरकता न होते हुए भी महसूस की जा सकती है लेकिन इसकी अवधारणा एक सामाजिक दायरे के भीतर ही तय होती है जो पहले से ही निर्धारित और सीमित होता है। इन्हीं सीमाओं के भीतर पत्रकार वस्तुपरकता की अपनी अवधारणा को निर्धारित और परिभाषित करता है और किसी भी समाचार संगठन से जुड़े तमाम पत्रकार एक ‘कामन फ्रेम ऑफ रेफरेंस’ में काम करते हैं। पहले से ही तयशुदा वैचारिक स्थिति से ये वस्तुपरकता की एक समान अवधारणा विकसित कर लेते हैं जो स्वभावत: संपूर्ण यथार्थ के अनेक संदर्भों से कटी होती है।

वस्तुपरकता का सबसे विकृत रूप उन अंतर्राष्टï्रीय घटनाओं की रिपोर्टों में बहुत स्पष्टï रूप से झलकता है जो विकासशील देशों के बारे में पश्चिमी देशों के पत्रकारों द्वारा तैयार की जाती हैं। विकासशील देशों की घटनाओं को वे पश्चिमी समाज के नजरिए और स्वयं अपने ‘कंडिशंड’ मस्तिष्क से परखते हैं। यही कारण है कि पश्चिम नियंत्रित अंतर्राष्टï्रीय मीडिया विकासशील देशों की खंडित और विकृत छवियों का निर्माण करता है और घटनाओं के घटने के समाजशास्त्र को नजरअंदाज करता है।

समाचार संकलन की प्रक्रिया में पत्रकारों और समाचार स्रोतों का संबंध इस वैचारिक पेशे का एक अहम क्षेत्र है। समाचार संकलन के लिए स्रोतों की जरूरत पड़ती है। पश्चिमी तर्ज पर ढली पत्रकारिता की मान्यता है कि स्रोत अच्छे हों तो समाचार भी अच्छा होगा। लेकिन साथ ही स्रोतों का यह खेल इस व्यवसाय से संबद्ध जोखिमों से भरा है। परंपरागत रूप से पश्चिमी पत्रकारिता यही दावा करती है कि सूचना का स्रोत देना आवश्यक है। स्रोत भी ऐसा हो जो इस सूचना के देने की योग्यता रखता हो। स्रोत के बिना समाचार की प्रामाणिकता को धक्का पहुंचता है। साख पर आंच आती है। लेकिन स्रोतों के इस जटिल तंत्र में आज पत्रकारिता में अनेक विकृतियां भी पैदा हुई हैं। दुर्घटना जैसी घटनाओं पर तो स्रोतों की पहचान करना कोई कठिन नहीं है। प्रशासन, राहत कार्य में लगी एजेंसियां, अस्पताल, घायल लोग, मौके पर उपस्थित लोग जैसे अनेक स्रोतों को स्पष्टï रूप से प्रामाणिक स्रोत माना जा सकता है।

लेकिन जब मामला राजनीतिक और आर्थिक जीवन के जटिल और विवादास्पद क्षेत्रों तक जाता है तो पत्रकार के उत्पाद के स्वरूप का निर्धारण स्रोतों के चयन से तय हो जाता है। भारत में भी भूमंडलीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था उन्मुख परिवर्तनों की रिपोर्टिंग का स्वरूप सूत्रों के चयन से ही तय हो जाता है। आज किसी भी समाचारपत्र का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि अधिकांश सूचनाएं ऐसी हैं जिनके स्रोत गुमनाम ही रहना चाहते हैं। इन परिस्थितियों में पत्रकार ‘जानकार सूत्रों’, ‘उच्च पदस्थ सूत्रों’, ‘राजनीतिक सूत्रों’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। अधिकांश जानकारियों के मूल में इसी तरह के स्रोत होते हैं। एक पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने स्रोत की रक्षा करे और अगर वह इसमें विफल होता है तो स्वयं अपनी साख खोने का जोखिम मोल लेता है। इस तरह के बेनामी सूत्रों से निश्चय ही किसी भी व्यवस्था में बचा नहीं जा सकता लेकिन यह भी सच है कि तमाम तरह की गलत जानकारियां और किसी खास उद्देश्य से प्लांट किए गए समाचार भी इन्हीं स्रोतों की देन होते हैं।

आखिर कोई स्रोत पत्रकार को सूचना क्यों देना चाहता है? आदर्श रूप से हर व्यवस्था में ईमानदार लोग होते हैं जो गलत चीजों का भंडाफोड़ करने के लिए मीडिया का सहारा लेते हैं। लेकिन समाचार ‘बूम’ के इस युग में ऐसे अवसर अधिक आते हैं जब सूचना देने वाले स्रोत के मकसद कुछ और ही होते हैं। जब कभी कोई ‘स्रोत’ पत्रकार को ‘समाचार’ देेता है जो अधिकांशत: उसके पीछे उसका अपना कोई उद्देश्य होता है जिसे वह मीडिया का इस्तेमाल कर पूरा करना चाहता है।

ऐसा नहीं है कि पत्रकार इस पहलू से वाकिफ नहीं होते हैं। एक तो स्थिति यह हो सकती है कि कोई पत्रकार अनचाहे ही इस तरह के ‘समाचार स्रोत’ द्वारा इस्तेमाल कर लिया जाए। दूसरा यह भी है कि तथाकथित बाजार प्रतिस्पर्धा में वह आगे रहना चाहता है और सब कुछ जानते हुए भी इस तरह के ‘समाचारों’ को लोगों तक पहुंचाने के अपने व्यावसायिक ‘आकर्षण’ से मुक्त नहीं हो पाता। लेकिन आज मुख्य रूप से ये दोनों ही परिस्थितियां कम ही देखने को मिलती हैं। एक व्यवस्था द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर रहते हुए पत्रकार स्वयं ही उन मर्यादाओं का पालन नहीं कर पाते जो इस व्यवस्था ने स्वयं ही तय की है।

व्यवस्था के भीतर भी वस्तुपरक और संतुलित रिपोर्टिंग के लिए आवश्यक है कि सत्ता और पत्रकार के बीच एक ‘सम्मानजक दूरी’ बनाए रखी जाए। लेकिन आज जो रुझान सामने आ रहे हैं उसमें यह दूरी लगातार कम होती जा रही है और मीडिया पर सत्ता के प्रभाव में अधिकाधिक वृद्धि होती जा रही है और इस व्यवसाय में जनोन्मुखी तत्त्वों का ह्रïास होता जा रहा है। आज मीडिया और सत्ता के बीच हेलमेल के संबंध ही अधिक विकसित होते जा रहे हैं। मीडिया संगठनों के स्वामित्व, उनके मालिकों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं, एक पत्रकार के अपने संकीर्ण हित जैसे तमाम कारण गिनाए जा सकते हैं तो सत्ता और मीडिया के इन करीबी नकारात्मक संबंधों को उजागर करते हैं। यहां सवाल सत्ता और मीडिया के संबंधों को नकारने का नहीं है बल्कि किसी भी लोकतंत्र में इन संबंधों का होना पहली शर्त है। सवाल इन संबंधों के नकारात्मक स्वरूप का है। इतना ही नहीं इन नकारात्मक संबंधों को बाकायदा कानूनी और संस्थागत रूप दे दिया गया है।

इस तरह के अनेक रुझान समकालीन पत्रकारिता में देखे जा सकते हैं। पत्रकारिता पर इस तरह के रुझानों से ‘सरकारी सूत्र’ (व्यापक रूप से सत्ता सूत्र) हावी होते चले जाते हैं। सरकारी सूत्र निस्संदेह समाचारों के सबसे अहम सूत्र हैं लेकिन इनसे मिलने वाली हर जानकारी का पत्रकारिता के मानदंडों के आधार पर मूल्यांकन जरूरी है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वैचारिक संदेश

समाचारों के माध्यम से संदेश दो तरह से प्रेषित किए जाते हैं। पहली श्रेणी के संदेश तो वे होते हैं जो ऊपरी तौर पर समाचार पढऩे या देखने से ही सामने आ जाते हैं। लेकिन समाचारों में अनेक ऐसे निहित संदेश होते हैं जिनका अर्थ समाचार के वैज्ञानिक विश्लेषण से ही निकाला जा सकता है। प्रच्छन्न रूप से समाचार जो संदेश देते हैं, उन्हीं में विचारों का तत्त्व अहम होता है तथा वस्तुपरकता और तथ्यात्मकता के सिद्धांत का संबंध समाचार के प्रत्यक्ष रूप से ज्यादा है।

पत्रकारिता की पाठ्यपुस्तकों में यह बताया जाता है कि हर समाचार में ‘कौन’, ‘क्या’, ‘कब’, ‘कहां’, ‘क्यों,’ और ‘कैसे’- का उत्तर होना आवश्यक है तभी ही समाचार पूर्ण हो पाता है। जब कभी किसी समाचार में ‘क्यों’ और ‘कैसे’ का उत्तर दिया जाता है तो तथ्यों के विश्लेषण और व्याख्या की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पहले चार प्रश्नों का उत्तर तैयार करने की समाचार उत्पादन की प्रक्रिया में एक खास तरह के तथ्यों के चयन से इसमें वैचारिक तत्त्वों का प्रवेश हो जाता है और आखिरी दो प्रश्नों के उत्तर से समाचार की वैचारिक स्थिति स्पष्टï रूप से सामने आ जाती है।

यह वैचारिक स्थिति पहले तो उस व्यवस्था से ही निर्धारित हो जाती है जिसमें कोई मीडिया संगठन काम करता है। इसके अलावा मीडिया संगठन के स्वामित्व और पत्रकार की अपनी सोच और दृष्टिïकोण भी समाचार के वस्तुविषय (कंटेंट) को निर्धारित करते हैं। समाचार में छिपे संदेशों और अर्थों को समझने के लिए विषय, इस विषय के चयन की प्रक्रिया, इसकी शब्दावली और प्रस्तुतीकरण का विश्लेषण आवश्यक हो जाता है। इस तरह के विश्लेषण से यह सवाल बार-बार उठता है कि समाचारों के उत्पादन और प्रवाह की प्रक्रिया के हर चरण में घटनाओं की व्याख्या प्रभुत्वकारी फ्रेमवर्क को ही अपने उपभोक्ताओं के मस्तिष्क में सुदृढ़ करती चली जाती है और हर बदलती स्थिति के साथ इस फ्रेमवर्क में भी परिवर्तन आता रहता है ताकि इसके स्थायित्व पर कोई आंच न आए।

इस तरह लोगों की सोच को प्रभुत्वकारी विचारधारा के मुताबिक ढाला जाता है और इस प्रक्रिया में लोगों की कोई वैकल्पिक सोच विकसित करने की क्षमता का ह्रïास होता चला जाता है। साथ ही वैकल्पिक मीडिया और विचारधारा के पनपने का सामाजिक आधार भी संकुचित होता चला जाता है। इस तरह किसी भी व्यवस्था में काम करने वाला मीडिया अपने स्वभाव से ही यथा स्थितिवादी होता है।

किसी घटना के समाचार बनने की प्रक्रिया को करीब से देखा जाए तो साफ हो जाता है कि समाचार प्रवाह की पूरी प्रक्रिया एक वैचारिक कार्रवाई है। समाचार अपने उत्पादन प्रक्रिया और तंत्र से ही निर्धारित होते हैं। इसलिए यह एक ऐसी अंतर्निहित, अनुत्तरित और निरंतर जारी प्रक्रिया है जिससे सूचनाओं के अंबार को पत्रकारीय ढांचे में तरह-तरह की तोड़-मरोड़ के साथ प्रस्तुत किया जाता है जिससे यथार्थ की यथास्थितिवादी आधिकारिक अवधारणा को ही प्रोजेक्ट किया जा सके।

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि हर पत्रकार कोई जानबूझकर यथार्थ की विकृत तस्वीर पेश करता है लेकिन उसकी समाचार की अवधारणाएं और मूल्यों की रचना की पूरी प्रक्रिया उसे यथार्थ को एक खास वैचारिक दृष्टिïकोण से देखने के प्रति अनुकूलित कर देती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस अनुकूलन के कारण एक पत्रकार अपने दृष्टिïकोण के अनुसार घटनाओं की वस्तुपरक रिपोर्टिंग और प्रस्तुतीकरण कर रहा होता है लेकिन अपने अंतिम निष्कर्ष में वह समाज के एक विशेष वर्ग के हितों और मूल्यों की ही पूर्ति कर रहा होता है।

इस आधार पर स्वभावत: यह सवाल उठता है कि क्या समाचारों के प्रस्तुतीकरण के वैचारिक चरित्र को तब तक नहीं बदला जा सकता जब तक मूलभूत सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन न किए जाएं? निश्चय ही अगर ऐसा होता भी है तो भी नई व्यवस्था की शासक विचारधारा और मूल्यों को ही मीडिया प्रोजेक्ट करेगा और सच्चाई की तलाश यहीं खत्म नहीं हो जाएगी। मीडिया के संदर्भ में यथार्थ और सच्चाई का संबंध व्यवस्था के लोकतांत्रिक चरित्र से है। मीडिया का वस्तुपरक होना भी उतना ही बड़ा मिथक है कि जितना किसी भी व्यवस्था के संपूर्ण रूप से लोकतांत्रिक होने का मिथक है।

लेखक उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपति हैं. वे इग्नू और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन में जर्नलिज्म के प्रोफेसर रह चुके हैं. एकेडमिक्स में आने  से पहले वे दस वर्ष पत्रकार भी रहे हैं .

 

Check Also

cameras

पपराज़ी पत्रकारिता की सीमाएं

गोविन्‍द सिंह। ‘पपराज़ी’ (फ्रेंच में इसे पापारात्सो उच्चारित किया जाता है) यह एक ऐसा स्वतंत्र ...

One comment

  1. Sajjan Chhillar

    Very valuable for new Reserchers n journalists sir. Great work. N being so busy u derives n devotes ur time for such works. Its really appreciable.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *