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नया मीडिया : नुकसान और निहितार्थ

शिवप्रसाद जोशी।

न्यू यॉर्कर में 1993 में एक कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमें एक कुत्ता कम्प्यूटर के सामने बैठा है और साथ बैठे अपने सहयोगी को समझाते हुए कह रहा है, “इंटरनेट में, कोई नहीं जानता कि तुम कुत्ते हो।” (जेन बी सिंगर, ऑनलाइन जर्नलिज़्म ऐंड एथिक्स, अध्याय एथिक्स एंड द लॉ, पृ 90)।

यहां आशय ये है कि इंटरनेट में आपकी पहचान गुप्त रहती है। जब तक आप न चाहें आपको कोई नहीं जान सकता। ये स्वनिर्मित गुमनामी ही एक अदृश्यता की ओर ले जाती है। एक ऐसी अवस्था जहां आपको भौतिक उपस्थिति की ज़रूरत नहीं है। आपको सदेह कहीं किसी के समक्ष पेश नहीं होना है। इस तरह आप इंटरनेट पर एक तरह की “देहमुक्ति” के साथ विचरण करते रह सकते हैं। ऑपरेट आप उसे सदेह ही कर रहे होते हैं। इंटरनेट की विद्वान शेरी टर्कल ने अपनी किताब, “लाइफ़ ऑन स्क्रीनः आईडेंटिटी इन द एज ऑफ द इंटरनेट” (1995) में बताया है कि कम्प्यूटर जनित संचार (कम्प्यटूर मीडिएटड कम्यूनिकेशन-सीएमसी) के ज़रिए लोगों के पास अपनी “पुनर्खोज” कर सकने की प्रचुर संभावनाएं रहती हैं।

लेकिन सवाल यही है कि क्या ख़ुद को नए सिरे से ढूंढने की वास्तव में क्या कोई ज़रूरत है भी या ये जुनून या चाहत है। अगर थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि एक व्यक्ति नये मीडिया में अपनी पहचान बिना उद्घाटित किए आवाजाही कर रहा है तो क्या वो गलत है। क्या उसे अदृश्य रहने की ज़रूरत है। नया मीडिया वैयक्तिक आज़ादी को तब तक नहीं छीनता जब तक कि आप ख़ुद ऐसा न चाहें। ये उसका एक गुण है। यूज़र के तौर पर चुनौती यही है कि वो इस आज़ादी को किस रूप में समझता है, कैसे इसे एन्ज्वॉय करता है। चिंता की बात ये है कि नये मीडिया की इस सौगात का इस्तेमाल कई यूज़र फ़र्ज़ी एकाउंट बनाने, किसी को गुमराह करने या भावनात्मक शोषण या आर्थिक फ़ायदा उठाने के लिए करते पाये गये हैं। इस मामले में नये मीडिया से जुड़े क़ानून भी एक सीमा के बाद लाचार ही नज़र आते हैं।

नये मीडिया से जुड़ा एक जोखिम सामाजिक क़िस्म का भी है। मिसाल के लिए फ़ेसबुक को ही लें। इस लोकप्रिय सोशल नेटवर्किग वेबसाइट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या करोड़ों में है। करोड़ो फॉलोअर हैं। एक अत्यंत विस्तृत वर्चुअल समाज बन जाता है। वर्चुअल दोस्तियां बेशुमार होती हैं। अनंत रूप से संचार में मगन दुनिया फैली हुई है, लेकिन वास्तविक जीवन में, ऑफ़लाइन हो जाने पर यही यूज़र एकदम अलगथलग और समाज से कटे हुए नज़र आते हैं। संचार की प्रक्रिया सिकुड़ जाती है।

शहरी जीवन की आपाधापी, बढ़ते उपभोक्तावाद और जीवन शैलियों में आए बदलावों ने लोगों को एक दूसरे से संवादहीनता की स्थिति में ला दिया है। लेकिन ताज्जुब है कि लोगों की वास्तविक जीवन की यही प्रवृत्ति सोशल मीडिया पर आते ही हिरन हो जाती है। वहां वो एकदम बेलौस, बेतकल्लुफ़ और संवादप्रिय बन जाता है। इस तरह नये मीडिया पर ये तोहमत भी लगाई जाती है कि वो यूज़र को समाजविमुख या असामाजिक भी बनाता है। लेकिन यहां पर ये बात फिर से ग़ौरतलब है कि नये मीडिया ने जो सुविधा और आज़ादी उपलब्ध कराई है उसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने की ज़िम्मेदारी यूज़र पर ही है। नये मीडिया ने अवरोधों से आज़ादी हासिल कराई है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि ज़िम्मेदारियों से भी मुक्त हो जाएं।

नये मीडिया संवाद के लाभ
सूचना प्रौद्योगिकी के विकास ने नये मीडिया के ज़रिए संचार की प्रक्रिया में अभूतपूर्व बदलाव किए हैं। पहले से ज़्यादा त्वरित, द्रुतगामी और सघन सूचना प्रवाह नये मीडिया के ज़रिए संभव हुआ है। वैश्विक कनेक्टिविटी, लोकतांत्रीकरण और मनुष्य अनुभव और संबंधों की दिशा में नये मीडिया और इंटरनेट ने नये दरवाजे खोल दिए हैं।

इंटरनेट एकाकीपन का एक लाभदायक उपचार माना जाने लगा है। आमने सामने के संवाद यानी फ़ेसटूफ़ेस संवाद में शर्मीले और असहज लोग वर्चुअल संसार में दोस्तियां बनाने और संवाद करने में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं। फ़ेसबुक जैसे माध्यम न सिर्फ़ व्यक्तिकेंद्रित भावनाओं को प्रश्रय देते हैं बल्कि उसक ज़रिए कई सामाजिक दायित्व भी पूर किये जा सकते हैं। फ़ेसबुक पर बने कई पेज सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना जगाने के लिए प्रयासरत हैं। वर्चुअल समुदाय का एक हिस्सा सोशल मीडिया को वास्तविक जीवन के संघर्षों और ख़ुशियों से जोड़े रखता है।

ऑनलाइन उपलब्ध अधिकांश सामग्री बुरी नहीं है। वो ज़रूरत में काम आती है और लाभप्रद रहती है। एडिक्शन या लत से आगे इंटरनेट ने अब आम उपभोक्ताओं की ज़िंदगी में स्वाभाविक जगह बना ली है।

ऑनलाइन व्यवहार भी एक तरह की सामाजिकता है। इंटरनेट ये अवसर मुहैया कराता है कि चाहे आप ईमेल के ज़रिये या सोशल मीडिया के ज़रिए किसी व्यक्ति या समूह से संवादरत हैं तो लिखने सोचने कहने में आपकी भाषा शैली और रवैया कैसा होना चाहिए। किस तरह से सभ्य तरीके से ऑनलाइन बिरादरी के सामने पेश आना चाहिए, इंटरनेट ये भी बताता है।

नये मीडिया संवाद के नुक़सान
इंटरनेट की सबसे प्रत्यक्ष और बहसपरक कमी तो यही है कि ये लोगों को एडिक्ट यानी लती बना देता है। ख़ासकर बच्चे और किशोर इंटरनेट की दुनिया में मगन रहते हैं। शहरी सामाजिक परिवेश और एकल परिवारों ने कम्प्यूटर को मनुष्य का नज़दीकी दोस्त बना दिया है, इसलिए बच्चों और किशोंरों पर उसका ज़्यादा असर देखा गया है। कम्प्यूटर में वे कई अवैध और हानिकारक सामग्री देखने पढ़ने की ओर मुड़ जाते हैं।

इंटरनेट का अत्यधिक इस्तेमाल व्यग्रता को जन्म देता है। साइबरस्पेस में क्या हो रहा है, इसे लेकर एक ऑब्शेसन बन जाता है। इंटरनेट के बारे में रोमानी ख़्याल आते रहते हैं और अँगुलियां जाने अनजाने टाइपिंग के लिए छटपटाने लगती हैं, इस तरह की अतिशयता को इंटरनेट ऐडिक्शन डिसऑर्डर कहा जाता है। इसका संबंध व्यक्ति की अन्य कमज़ोरियों से भी जोड़ा जाता है जिनका संबंध किसी न किसी तरह की लत से है।

लोग अलगथलग पड़ जाते हैं। सामाजिक और मनोरंजन की सहज मानवीय गतिविधियों से दूर हो जाते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा समय कम्प्यूटर या मोबाइल फ़ोन की स्क्रीन के सामने बिताते हैं।

इंटरनेट से जुड़े ऐसे नुकसान भी हैं जो सीधे क़ानूनी दायरे में आते हैं। हैकिंग, फ़र्जीवाड़ा, वित्तीय घपला, साइबरसेक्स, साइबरपोर्न, अवांछित शब्दावली और क्रियाकलाप, संवाद में अश्लीलता का प्रदर्शन और किसी की गरिमा का हनन- ये मुद्दे इंटरनेट को एक नाज़ुक जगह बनाते हैं और इस्तेमाल करने वालों से विवेक का मांग करते हैं।

इंटरनेट ने भले ही कई वर्गों और समुदायों को अभिव्यक्ति की आज़ादी हासिल कराई है। संचार प्रणालियों के विकास में स्त्री मुक्ति के विकास को भी कुछ हद तक देखा जा सकता है। लेकिन ये प्रक्रिया और विकसित होने के बजाय सुस्त ही पड़ी नज़र आती है। बेशक आज महिला केंद्रित विषयों और विचारों पर इंटरनेट में एक सुव्यवस्थित, सुदृढ़ और बेबाक स्पेस है लेकिन अधिकांश मौक़ो पर हम देखते हैं कि कम्प्यूटर कल्चर लिंग आधारित ही रह जाता है। मिसाल के लिए कम्प्यूटर गेम्स को लें। वहां पौरोषिक और पुरुषोचित छवियों की भरमार है। ये एक क़िस्म की “हाइपर मैस्कुलिनिटी” है जिसे हम “सूपर माचो” यानी मर्दाना छवि के रूप में भी पहचानते हैं। यहां पुरुष विचार का बोलबाला है। सेक्स और पोर्न का ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं वे भी स्त्रियों के अधिकार और गरिमा का खुला अपमान ही है।

इंटरनेट के सामाजिक निहितार्थ

1. समाचार का नया मॉडल : मास मीडिया के पारंपरिक निगरानी कार्य को इंटरनेट आगे बढ़ाता है। अख़बार और टीवी की रिपोर्टिंग में भले ही कितनी गहराई हो इंटरनेट में उस रिपोर्ट को और बेहतर बनाने की गुंजायश रहती है। इंटरनेट उन हाशियों की पड़ताल भी करता चलता है जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया या तो भूल जाता है या समय और स्पेस के अभाव में छोड़ देता है। इसके अलावा समाचार अब सिर्फ़ एक अकेले स्रोत पर निर्भर नहीं है। वो एक ही घटना के विभिन्न पहलुओं को सामने ला सकता है। और हर पहलू पर किसी न किसी की दिलचस्पी और फ़ीडबैक उपलब्ध है। जानकारों का कहना है कि पारंपरिक समाचार एक लेक्चर की तरह था, अब ये एक संवाद है।

समाचार की इस नई प्रस्तुति को विस्तार दिया है ब्लॉग लेखन ने। रिपोर्टिंग की कई कमज़ोरियों को न सिर्फ़ ब्लॉग लेखक रेखांकित करते हैं बल्कि वो उस स्पेस को भी भरते हैं जो रिपोर्टिंग की कमी या अनुपस्थिति से सूचना-रिक्त रह जाती है। इंटरनेट एक तरह से पारंपरिक समाचार मीडिया के समक्ष चैक्स और बैलेंस का एक बड़ा दायरा खींच दिया है। अभी भारत में राजनैतिक या दूसरे क्षेत्र की शख़्सियतों के छिटपुट ब्लॉग प्रकाशित होते हैं। और उन पर ख़बरें भी बनती हैं लेकिन स्वतंत्र ब्लॉग लेखकों के विचार किसी राजनैतिक और सामाजिक घटनाक्रम को प्रभावित करें, ऐसी पहल इंटरनेट में अभी यहां नहीं आई हैं। फ़ेसबुक मे अलबत्ता लीक से अलग विचारों को लेकर बहसें होती हैं लेकिन ये मुख्यधारा की राजनीति और संस्कृति को प्रभावित नहीं करती है। वो इस एक्शन से अछूती ही रहती है।

2. गेटकीपर्स की कमी : पारंपरिक मास मीडिया में एक नहीं कई गेटकीपर की व्यवस्था है। पूरा एक ऑर्डर है लेकिन इंटरनेट पर एक भी नहीं है। इसके गंभीर नतीजे होते हैं। पहला तो यही कि इंटरनेट पर अनावश्यक, अवांछित, दोयम और घटिया संदेशों की भरमार हो जाती है। सिस्टम ऐसे संदेशों से ओवरलोड का शिकार हो सकता है।

दूसरा गेटकीपर का काम होता है सूचना को जांचना परखना और उसका वस्तुगत आकलन करना। हर सूचना या ख़बर की विश्वसनीयता या प्रामाणिकता की जांच के लिए पारंपरिक मीडिया में संपादक हैं लेकिन इंटरनेट में तो हर व्यक्ति लेखक और प्रकाशक है और वहां सूचना का प्रवाह निर्बाध है। उसकी गुणवत्ता, वस्तुनिष्ठता और सत्यता की परख करने वाले साधन, उपक्रम और व्यक्ति अनुपस्थित हैं। हालांकि ये भी सही है कि गेटकीपर होने के बावजूद अख़बार और टीवी जैसे माध्यमों में गल्तियां चली जाती हैं और कभी कभी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ जाती है फिर भी अगर सिस्टम सही ढंग से काम करता है तो ग़लत और फ़र्जी सूचना समय पर निकाल दी जा सकती है। इंटरनेट मे सूचना विश्वसनीय सूचना से ही आए, ये अनिवार्य नहीं है।

तीसरी बात ये कि गेटकीपर न होने का मतलब सेंसरशिप का न होना है। क्या दिखना चाहिए क्या नहीं इसे लेकर नीतियां और नियम और कानून तो हैं लेकिन ये एक ऐसा संसार है जो जितना प्रकाशित है उतने ही अंधेरे कोने भी है। हर जगह हर कोई जा सके, ये न वांछित है न उपयुक्त लेकिन क्योंकि सेंसर जैसी कोई चीज़ नहीं है लिहाज़ा हर कोई हर कहीं विचरण कर सकता है। पोर्न वेबसाइटों का मामला ऐसा ही है। कितना ही कोई सरकार अंकुश लगा ले लेकिन इन वेबसाइटों पर पूरी तरह से रोक लगा पाना या किसी को इन्हें देख से रोक पाना संभव नहीं है। कानून अभी इस बात के लिए कि आप कोई अवांछित, अश्लील सामग्री या प्रचार प्रसार या वितरण या उसे सर्कुलेट नहीं कर सकते हैं।

(इस बारे में आप नये मीडिया के उसूल, आचार और क़ानून से जुड़े अध्याय में विस्तार से पढ़ सकते हैं।)

गेटकीपर का न होना इंटरनेट का अभिशाप ही नहीं, कई मौक़ों पर वरदान भी है। मिसाल के लिए ब्लॉग को लीजिए। पारंपरिक मीडिया जिन विषयों को छूने से संकोच करता है या वहां के गेटकीपर सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक वजहों से जिस सूचना का प्रकाशन नहीं होने देते हैं, वो ज़रूरी सूचना ब्लॉग के रूप में इंटरनेट पर अपनी जगह पा सकती है। इस तरह भले ही कष्टकारी हो लेकिन सच्चाई सामने आ सकती है। ब्लॉग किसी नियम या आदेश से नहीं बंधे हैं, उनके पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने की संभावना कम है, कई मौकों पर नगण्य है, और वे पारदर्शी हो सकते हैं। उनमें स्पष्टता दिखती है और उसका अंदाज़ बेलौस और बेबाकी का रहता है। हालांकि ये बात सही है कि इधर ब्लॉग को लेकर कानूनी मामले भी देखने आए हैं। मसलन, किसी ने अपने ब्लॉग में किसी व्यक्ति पर कोई टिप्पणी की और वो उस व्यक्ति को नागवार लगी तो वो ब्लॉग लेखक पर मानहानि का मुक़दमा कर सकता है।

इंटरनेट में मानहानि के मामले गाहेबगाहे सामने आते रहते हैं। इस लिहाज़ से लोग ब्लॉग में अब सावधानी भी बरतने लगे हैं। ख़ासकर ऐसे ब्लॉग में जिनमें समाज, राजनीति, संस्कृति, मनोरंजन और मीडिया से जुड़ी शख़्सियतों के बारे में कोई टिप्पणी की जाती है। इसे आप इंटरनेट पर इधर आ रहे एक संकट के रूप में भी देख सकते हैं कि कैसे पारंपरिक मीडिया की कमज़ोरियां इंटरनेट में अभिव्यक्ति की आज़ादी के गुण को अपनी चपेट में ले रही हैं। इसका अर्थ ये भी है कि इंटरनेट अभी भी एक पूर्ण रूप से स्वतंत्र संस्था नहीं बना है। इंटरनेट के संचालन में वहीं मीडिया कंपनियां जुड़ी हैं जिनके व्यवसायिक हित पारंपरिक मीडिया में भी हैं। इंटरनेट की स्वतंतत्रता एक रूप में नज़र आती है लेकिन जब आप इंटरनेट पर मीडिया संस्थानों की वेबसाइटें देखते हैं तो अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वहां इंटरनेट की गेटकीपिंग वैसी ही कड़ी है जैसी पारंपरिक मीडिया में।

3. अतिशय सूचना यानी सूचना का ओवरलोड : इंटरनेट सूचना का अजस्र भंडार है। वहां इतने बड़े पैमाने पर अपार विविधता वाली सामग्री है कि आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते। सूचना की इस अति ने इंटरनेट को प्रामाणिक और विश्वसनीय स्रोत के रूप में सवालों के घेरे में रखा है। ये बात सही है कि किसी भी विषय पर सूचना को आप सर्च इंजनों के माध्यम से निकाल सकते हैं लेकिन ये तय करना मुश्किल है कि आपको हासिल सूचना में से कितनी स्तरीय और सही है। इस बात को जांचने के इंटरनेट पर विकल्प सीमित हैं। किसी गंभीर विषय के कुछ शब्दों को आप सर्च इंजन पर डालकर अपने मतलब की सामग्री निकालना चाहें तो कई बार ये भी संभव है कि आपके मतलब की जानकारी के साथ साथ कई ऐसी सूचनाएं भी आ जाती हैं जो अवांछित और अनुपयुक्त हैं।

4. निजता से जुड़ी चिंताएं : इंटरनेट कई तरह की निजता और सुरक्षा चिंताओं को भी जन्म देता है। इलेक्ट्रॉनिक युग में अपनी निजता बचाए रखना किसी व्यक्ति के लिए समस्या रही है। इंटरनेट के आने के बाद, आज जब ज़्यादातर लोग ऑनलाइन हैं, तो उनकी निजी सूचनाएं भी इंटरनेट पर हैं, उन्हें आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है। किसी भी इंटरनेट सैवी व्यक्ति के बारे में कई तरह की सूचनाएं मिनटों में निकाली जा सकती हैं। और तो और हैकर, लोगों की वित्तीय गुप्त सूचनाएं भी निकाल लेते हैं।
इस तरह के इंटरनेट धोखाधड़ी के कई मामले प्रकाश में आते रहे हैं। कई कंपनियों का इंटरनेट कारोबार अपने उपभोक्ताओं की पहचान सार्वजनिक न करने का दावा करता है लेकिन जिस तरह से इस मामले में शिकायतें आने लगी हैं उससे साफ़ है कि इंटरनेट पर पहचान की ख़रीदफ़रोख़्त का धंधा भी ज़ोरों पर चल पड़ा है। फ़ेसबुक और गूगल पर भी इस तरह के आरोप लग चुके हैं। अमेरिका में तो निजता का हनन धड़ल्ले से होता रहा है। और इसे लेकर अमेरिकी कांग्रेस में भी चिंताएं जताई जा चुकी हैं। लेकिन ये मुद्दा अभिव्यक्ति, इंटरनेट की आज़ादी और सही और ग़लत के द्वंद्व में अटका हुआ है।

5. पलायनवाद और अकेलापन : इंटरनेट के बारे में आम धारणा है कि वो लोगों को एक दूसरे से अलगाता है। लोग इंटरनेट युग में छिटके हुए हैं और वर्चुअल रिश्ता ही उल्लेखनीय रिश्ता रह गया है। अधिकांश लोग ईमेल, मैसेजिंग, ऑनलाइन चैट, गेम, शॉपिंग, फ़ेसबुक और ट्विटर और यहां तक कि साइबर सेक्स आदि मे ही अपना समय व्यतीत करते हैं। ऑनलाइन आकर्षण इतनी तीव्र और सघन और बाध्यकारी हो जाता है कि कम्प्यूटर या मोबाइल फ़ोन से हटने का कोई नाम नहीं लेता। इंटरनेट की इस लालसा के बारे में अध्ययन और शोध किये जा चुके हैं और इनमें पाया गया है कि इंटरनेट के लती लोगों में अकेलेपन और अवसाद के निशान पाए जाते हैं।

हालांकि ये अभी प्रामाणिक तौर पर कहना मुश्किल है कि क्या इंटरनेट ही उन्हें ऐसा बनाता है या उनकी वास्तविक ज़िंदगी का कोई पहलू या कोई घटना इसके लिए ज़िम्मेदार रही होगी, फिर भी ये तो माना ही जाता है कि इंटरनेट पर जो समय बिताया जाता है वो हमेशा कारगर और सार्थक तो नहीं ही कहा जा सकता है। इंटरनेट के ज़रिए व्यक्ति जिन चीज़ों का आदी बन सकता है, उस बारे में भी अध्ययन हुए हैं लेकिन इतना तय है कि अत्यधिक इंटरनेट इस्तेमाल से मस्तिष्क और शारीरिक गतिविधि पर असर तो पड़ता ही है। शहरी इलाक़ो में उपभोक्ताओं के बीच थकान, अनिद्रा, अनिच्छा, भटकाव, चिड़चिड़ापन, ऊब, रक्तचाप और डायबिटीज़ की बढ़ती समस्याओं के पीछे एक बड़ी वजह इंटरनेट को भी माना जाता है।

ऑनलाइन संचार की सबसे बड़ी चुनौती है एक ऐसी अर्थपूर्ण भाषा का विकास जो जटिल, गहरे और टिकाऊ संचारपरक या अभिव्यक्तिपरक रूपों को जन्म दे सके। ऑनलाइन संचार का पैमाना और परिक्षेत्र बहुत व्यापक है। इस लिहाज से जो छोटी अवधि के लिए सबसे बड़ा चैलेंज है- वो है एक ऐसे मनुष्य-कम्प्यूटर इंटरफ़ेस का निर्माण जो अपने सेलेक्टिव परिचालन सिद्धांतों को छिपाने के बजाय उन्हें उद्घाटित करे और उस खुलेपन में और विस्तार करे जो नये मीडिया का बुनियादी लक्षण है। दूसरा बड़ा चैलेंज कम्प्यूटर का इस्तेमाल करने वालों के सामने हैं कि वे उसके लाभों को अधिकतम बनाने की कोशिश करें और उसके जोखिनों को न्यूनतम करें। नये मीडिया का तीसरा और आख़िरी चैलेंज ये है कि वो एक खुले और लोकतांत्रिक माध्यम के तौर पर विकसित हो और ऐसा होने के लिए, विश्व सरकारों को कुछ अत्यंत आक्रामक और एकाधिकारवादी कमर्शियल प्रवृत्तियों को क़ाबू में करना होगा ताकि हम नये मीडिया की विशिष्ट शैक्षिक और सृजनात्मक सामर्थ्य का विस्तार करते रह सकें। (एंड्रयु ड्युडने ऐंड पीटर राइड, द न्यू मीडिया हैंडबुक, पृ 306।)

संदर्भ/स्रोत
सेसेलिया फ़्रेंड एंड जेन बी सिंगर, ऑनलाइन जर्नलिज़्म एथिक्स, इंडियन रिप्रिंट, 2007, पीएचआई लर्निंग प्रा. लि.
द डायनेमिक्स ऑफ़ मास कम्यूनिकेशन, जोसेफ़ आर डोमिनिक, इंटरनेशनल एडीशन मैकग्रॉ हिल, 2011
न्यू मीडिया एंड द लैंग्वेज, आनंदिता पैन, मीडिया वॉच 23-28, वॉल्यूम 3, जुलाई-दिसंबर 2012
द न्यू मीडिया हैंडबुक, एंड्रयु ड्युडने ऐंड पीटर राइड, रूटलेज, 2006.

उपरोक्त आलेख पेंग्विन इंडिया (मई 2015) से प्रकाशित, लेखक द्वय शालिनी जोशी और शिवप्रसाद जोशी लिखित किताब, “नया मीडियाः अध्ययन और अभ्यास” में भी बतौर अध्याय शामिल किया गया है। शिव प्रसाद जोशी का ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म में लम्बा अनुभव है। वे बीबीसी, जर्मनी के रेडियो डॉयचे वैल्ली में काम कर चुके हैं। ज़ी टीवी में भी उन्होंने काफी समय काम किया। इसके आलावा कई अन्य टीवी चैनलों से भी जुड़े रहे हैं।

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