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समाचार, सिद्धांत और अवधारणा: समाचार क्‍या है?

सुभाष धूलिया

समाचार क्‍या है? पत्रकारिता के उदभव और विकास के पूरे दौर में इस प्रश्‍न का सर्वमान्‍य उत्‍तर कभी किसी के पास नहीं रहा। आज प‍त्रकारिता और संपूर्ण और संपूर्ण मीडिया जगत की तेजी से बदलती तस्‍वीर से इस प्रश्‍न का उत्‍तर और भी जटिल होता जा रहा है। लेकिन हर खास परिस्थिति और वातावरण में चंद घटनाएं ऐसी होती हैं जो समाचार बनने की कसौटी पर खरी उतरती हैं और उससे कहीं अधिक बडी संख्‍या ऐसी घटनाओं की होती हे जो समाचार नहीं बन पातीं। यहां समाचार से आशय समाचार माध्‍यमों में प्रकाशित प्रसारित किये जाने वाले समाचारों से हैं।

लेकिन क्‍या हर घटना, समाचार है क्‍या वह हर बात समाचार है जिसके बारेमें पहले जानकारी नहीं थी क्‍या वह सब समाचार है जिसके बारे में लोग जानना चाहते हैं या जिसके बारे में लोगों को जानना चाहिए क्‍या समाचार वही जिसे एक पत्रकार समाचार मानता है क्‍या वही सब समाचार हैं जिन्‍हें मीडिया के मालिक और संचालक समाचार मानते हैं और जिनके बारे में वे अपने ही तरह के अनुसंधान के आधार पर यह मान लेते हैं कि लोग यही चाहते हैं इसलिए यही समाचार है समाचार निश्‍चय ही अपने समय के विचार, तथ्‍य और समस्‍याओं के बारे में ही लिखे जाते हैं। अनेक विद्वानेां ने अपने ही ढंग से समाचार की विशेषताओं का उल्‍लेख किया है। हर प्रेरक और उत्‍तेजित कर देने वाली सूचना समाचार है। समय पर दी जाने वाली हर सूचना समाचार का रूप अख्तियार कर लेती है। किसी घटना की रिपोर्ट ही समाचार है। समाचार जल्‍दी में लिखा गया साहित्‍य है। वह सब समाचार है जो आने वाले कल का इतिहास है। सिडनी कोर्ब का कहना है कि हमें समाचार के परमाणु को विखंडित करने की जरूरत है। आज के संदर्भ में जब समाचार नामक परमाणु को अनेकों रूप में विखंडित किया जा रहा है तो निश्‍चय ही कहीं न कहीं यह वैज्ञानिकता या इससे उपजी सोच से परे होता भी नजर आ सकता है। समाचार पर विचार एक अहम मसला है। यह इस संदर्भ में और भी अहम हो जाता है कि आज मीडिया जीवन के हर क्ष्‍ेात्र में अहम भूमिकाएं अदा कर रहा है। इसलिए समाचार का नियोजित और वैज्ञानिक ढंग से विश्‍लेषण करना आवश्‍यक हो जाता है।

समाचार निश्‍चय ही कोई किस्‍सा-कथानक व़तांत और रिपोर्ट है। इसके संपेषण के अनेक रूप हो सकते हैं। एक व्‍यक्ति दूसरे व्‍यक्ति को समाचार का संप्रेषण कर सकता है। इसके अलावा समाचार अनेक तरह के समाचार माध्‍यमों से भी प्रकाशित और प्रसारित किए जाते हैं, जिन पर यह चर्चा केंद्रित है। किसी भी घटना का व़तांत वाचिक, लिखित और दर्शनीय हो सकता है। संचार प्रक्रिया के संदर्भ में समाचार एक संदेश है जिसे कोई प्रेषित करता है और कोई प्राप्‍त करता है। प्रेषक और प्राप्‍तकर्ता के बीच संदेशों का आदान-प्रदान ही संचार प्रक्रिया है। प्रेषक सबसे पहले संदेश की इन्‍कोडिंग करता है ताकि उसका और प्राप्‍तकर्ता का कोड एक ही हो। उदाहरण के लिए भाषा एक आयाम यह भी है कि यह एक कोड है। इस कोड में किसी एक खास वस्‍तु को एक नाम दे दिया गया है और प्राप्‍तकर्ता भी इसी नाम से इसी वस्‍तु की पहचान करता है। दो लोग अगर एक ही भाषा नहीं जानते तो वे भाषा के माध्‍यम से संवाद नहीं कर सकत। मसलन अगर कोई अंग्रेंजी जानने वाला किसी भारतीय ग्रामीण से ‘फन’ या ‘फूल’ शब्‍दों का प्रयोग करेगा तो हिंदी भाषी ग्रामीण फन को हास्‍य नहीं सांप के संदर्भ में और फूल को मूर्ख नहीं फूल के रूप में समझेगा।

इसके पश्‍चात संदेश के संप्रेषण के लिए चैनल या माध्‍यम की जरूरत होती है। संवाद आमने-सामने भी हो सकता है और समाचारपत्र, रेडियो और टेलीविजन जैसे जन संचार माध्‍यमों से भी किया जा सकता है। फिर प्राप्‍तकर्ता संदेश को ही कोड करता है और इसका अर्थ समझता है। इस पूरी प्रक्रिया में संप्रेषण के दौरान अनेक तरह की बाधाएं पैदा होती हैं, जिनकी वजह से प्रेषक जिस अर्थ में संदेश का प्रेषण करता है प्राप्‍तकर्ता उसका वही अर्थ नहीं समझता। संचार प्रक्रिया में इन बाधाओं को ‘शोर’ कहा जाता है। यह शोर तकनीकी भी हो सकता है मसलन संप्रेषण प्रणाली में कोई खराबी हो और इससे कहीं अधिक महत्‍वपूर्ण इसके सामाजिक-सांस्‍क्रतिक आयाम होत हैं। एक धुर शहरी प्रेषण का संदेश इन्‍हीं कारणों से एक धुर ग्रामीण शायद उसी अर्थ में नहीं समझ पाए जिस अर्थ में इसका संप्रेषण किया गया। आदर्श स्थिति लेकिन वास्‍तविक रूप में ‘शोर’ इतना अधिक होता है जो मीडिया के जबर्दस्‍त प्रचार-प्रसार के उपरांत बढता ही जा रहा है कि हर संदेश (समाचार) के अनेक लोग अनेक अर्थ निकाल सकते हैं। प्रेषक संदेश पाने वाले से फीडबैक प्राप्‍त करता है और इसका मूल्‍यांकन कर ही पता करता है कि संदेश किसी हद तक कामयाबी से प्राप्‍तकर्ता तक पहुंचा।

एक पत्रकार के सामने भी सबसे बडी चुनौती यही होती है कि क्‍या उसने समाचार को इस तरह लिखा और प्रस्‍तुत किया कि वह वही अर्थ और संदर्भ अपने पाठक/दर्शक/श्रोता को प्रेषित कर पाया जो वह चाहता था। अक्‍सर ऐसा नहीं होता और इन दिनों तो अधिकाधिक ऐसा नहीं हो रहा है। समाचार में संभावित सूचनाओं या तथ्‍यों के स्रोत क्‍या हैं इससे भी भारी अंतर पैदा होता है। सूचना स्रोत के भी सूचना देने के पीछे कुछ मकसद हो सकते हैं और होते हैं। इन मकसदों का चरित्र और स्‍वरूप क्‍या है- इस पर भी समाचार की सत्‍यता निर्भर करतीहै।अनेक मौकोंपर स्रोत गलत सूचनाएं भी देते हैं जिससे समाचार निहित स्‍वार्थों की पूर्ति में ही अधिक सहायक होते हैं और सच्‍ची तस्‍वीर लोगों तक नहीं आ पाती। समाचार के इस पहलू में हम बाद में विस्‍तार से चर्चा करेंगे।

एक पत्रकार ही किसी भी समाचार के आकार और उसकी प्रस्‍तुति का निर्धारण करता है। इसी तरह रेडियों और टेलीविजन में प्रस्‍तुतकर्ता समाचार में अपनी आवाज और हाव-भाव से भी बहुत कुछ कह सकता है। एक समाचारपत्र में एक समाचार मुख्‍य समाचार (लीड स्‍टोरी) हो सकता है और किसी अन्‍य समाचारपत्र में वही समाचार भीतर के पृष्‍ठ पर कहीं एक कॉलम का समाचार भी हो सकता है। एक टेलीविजन चैनल के लिए अमिताभ बच्‍च्‍ान के जन्‍मदिन का समाचार पहला मुख्‍य समाचार हो सकता है तो संभव है कि कोई अन्‍य चैनल इराक के युद्ध को अपनी मुख्‍य खबर बनाने को प्राथमिकता दे। इस तरह के अनेक कारण और कारक हैं जो समाचार रूपी संदेश के प्राप्‍तकर्ता को इसकी स्‍वीकार्यता का स्‍तर तय करते हैं। किसी भी पाठक/दर्शक/श्रोता की अपनी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि होती है जिनसे उसके अपने मूल्‍य उपजते हैं। इसलिए हर समाचार को वह अपने ही ढंग से स्‍वीकार या अस्‍वीकार करता है। सच्‍चाई का उसका अपना ही एक पैमाना होता है जिस पर वह हर समाचार/संदेश की माप-तौल करता है।

समाचार के उपभोक्‍ता अपने मूल्‍यों, रूचियों और दृष्टिकोणों में बहुत विविधताएं और भिन्‍नताएं लिए होते हैं। इन्‍हीं के अनुरूप उनकी प्राथमिकताएं भी निर्धारित होती हैं। हाल ही के वर्षों में समाचारों का भी एक बाजार तैयार हुआ है और एक खास बाजार के लिए एक खास समाचार होता है। एक आदर्श स्थिति में एक पत्रकार के सामने यही सबसे बडी चुनौती होती है कि किस तरह वह अपने ‘उपभोक्‍ता’ समूह (ऑडिएंस) के व्‍यापकतम तबके को संतुष्‍ट कर सके।

समाचार की परिभाषा

लोग आमतौर पर अनेक काम मिलजुल कर ही करते हैं। सुख-दु:ख की घडी में वे साथ होते हैं। इन सबको हम घटनाओं की श्रेणी में रख सकते हैं। फिर लोगों को अनेक छोटी-बडी समस्‍याओं का सामना करना पडता है। गांव, कस्‍बे या शहर की कॉलोनी में बिजली-पानी के न होने से लेकर बेरोजगारी और आर्थिक मंदी जैसी समसयाओं से उन्‍हें जूझना होता है। विचार, घटनाएं और समस्‍याओं से ही समाचार का आधार तैयार होता है। लोग अपने समय की घटनाओं, रूझानों और प्रक्रियाओं पर सोचते हैं। उन पर विचार करते हैं और इन सब को लेकर कुछ करते हैं या कर सकते हैं। इस तरह की विचार मंथन की प्रक्रिया के केंद्र में इसके कारणों, प्रभाव और परिणामों का सन्‍दर्भ भी रहता है। समाचार के रूप में इनका महत्‍व इन्‍हीं कारकों से निर्धारित होना चाहिए। किसी भी चीज या किसी अन्‍य पर पडने वाले प्रभाव और इसके बारे में पैदा होने वाली सोचे से ही समाचार की अवधारण का विकास होता है। किसी भी घटना, विचार और समस्‍या से जब काफी लोगों का सरोकारहो तो यह कह सकते हैं कि यह समाचार बनने के योग्‍य है।

घटना

समाचार बनने की प्रक्रिया का अगला चरण इसकी तथ्‍यात्‍मकता है। किसी की कल्‍पना की उडान कोई समाचार नहीं है। समाचार एक वा‍स्‍तविक घटना है और एक पत्रकार के सामने सबसे बडी चुनौती या दायित्‍व यही है कि कैसे वह ऐसे तथ्‍यों का चयन करे, जिससे वह घटना उसी रूप में पाठक या उपभोक्‍ता के सामने पेश की जा सके जिस तरह वह घटी। इस तरह के तथ्‍यों यानि वे तथ्‍य जो इस घटना के समूचेयथार्थ का प्रतिनिधित्‍व करते हैं, का चयन करने के लिए एक खास तरह का बौद्धिक कौशल चाहिए। इस तरह का बौद्धिक कौशल होने पर ही हम किसी को प्रोफेशनल पत्रकार कह सकते हैं।

नवीनता

किसी भी घटना, विचार या समस्‍या का समाचार बनने के लिए यह भी आवश्‍यक है कि वह नया हो। कहा भी जाता है ‘न्‍यू’ है इसलिए ‘न्‍यूज’ है। समाचार वही है जो ताजी घटना के बारे में जानकारी देता है। समाचार का नया होना आवश्‍यक है। वह अपने ऑडिएंस के लिए नया होना चाहिए।एक दैनिक समाचारपत्र के लिए आम तौर पर पिछले २४ घंटों की घटनाएं ही समाचार होते हैं। एक चौ‍बीस घंटे के टेलीविजन और रेडियों चैनल के लिए तो समाचार जिस तेजी से आते हैं उसी तेजी से अनेक समाचार बासी भी होते चले जाते हैं। लेकिन अगर मान लिया जाए द्वितीय विश्‍व युद्ध जैसी ऐतिहासिक घटना के बारे में आज भी कोई नई जानकारी मिलती है जिसके बारे में हमारे पाठक को पहले जानकारी नहीं थी तो निश्‍चय ही यह उनके लिए समाचार है। दुनिया के अनेक स्‍थानों पर अनेक ऐसी चीजें होती हैं जो वर्षों से विद्यमान हैं लेकिन यह किसी अन्‍य देश के लिए कोई ताजी बात हो सकती है और निश्‍चय ही समाचार बन सकती है। इस दौर में ऐसे समाचारों की उपेक्षा होती है। लेकिन लेकिन अगर कोई समाचार माध्‍यम स्‍थानों और लोगों के बारे में भी आडिएंस की जानकारी और समझ का स्‍तर उठाना चाहता है और पाठक भी इस तरह के समाचार उत्‍पाद में रूचि रखते हैं जो रातोंरात घटित नहीं होती बल्कि जिन्‍हें घटने में दसियों-बीसियों वर्ष लग सकते हैं। एकाध सदी भी लग सकती है। इस तरह की अधिकांश घटनाएं इतिहास के क्षेत्र में पाई जाती हैं।

मसलन किसी गांव में पिछले २० वर्षों में लोगों की जीवन-शैली में क्‍या-क्‍या परिवर्तन आए और इन परिवर्तनों के क्‍या कारण थे- यह जानकारी निश्‍चय ही एक समाचार है। लेकिन यह एक ऐसी समाचारीय घटना है, जिसे घटने में २० वर्ष लगे। इस तरह की सूचनाएं या जानकारियां समाचार माध्‍यमों के लिए अच्‍छे समाचार बन सकती हैं, लेकिन अभी इस क्षेत्र का बहुत विकास नहीं हो पाया है। मसलन, दिल्‍ली के चांदनी चौक की संस्‍कति, जिदंगी, मानवीय संबंधों आदि में पिछले ५० वर्षों में कया परिवर्तन आए यह एक दिलचस्‍प समाचार हो सकता है। इस पर एक आ‍कर्षक टेलीविजन समाचार कार्यक्रम बन सकता है। स्‍वभावत समाचार बनाने के लिए इसे आज के संदर्भ में ही गहराई से झांकर देखना होगा। चांदनी चौक का पचास साल का इतिहास पचास लोगों ने पचास तरह से देखा होगा। अगर ऐसे दस लोग चिन्हित कर लिए जाएं जो ७० वर्ष के आस-पास के हों और लगातार चांदनी चौक में रहे हों उनसे यही जाना जाए कि उन्‍होंने अपनी आंखों से क्‍या घटते देखा, उन्‍होंने इसे किस रूप में देखा, कैसा महसूस किया और इसके कारणों और परिणामों के बारे में उनके क्‍या विचार हैं तो निश्‍चय ही यह एक समाचार बन सकता है।

देश के हर गली-मोहल्‍ले में घटने वाली ऐसी अनेक घटनाओं पर इस तरह के समाचार बन सकते हैं लेकिन इस तरह के समाचारों को पठनीय और रूचिकर ढंग से प्रस्‍तुत करने के लिए भी एक खास तरह के बौद्धिक कौशल और प्रोफेसनलिज्‍म की जरूरत होती है। ऐसे लोगों के साथ एक भावनात्‍मक जुडाव कायम किए बिना इस तरह की सजनात्‍मक पत्रकारिता नहीं की जा सकती। बहरहाल, यहां कहने का आशय यही है कि ऐसी अनेक घटनाएं या प्रक्रियाएं भी जो ‘ताजी’ न हों, ‘ताजी’ होकर समाचार बन सकती है। निष्‍कर्ष के तौर पर समाचार वही है जो नया है ताजा है-और लोगों को नई घटनाओं के बारे में जानकारी देता है जिनके बारे में उन्‍हें पहले से जानकारी नहीं थी।

जनरूचि

किसी विचार, घटना और समस्‍या के समाचार बनने के‍ लिए यह भी आवश्‍यक है कि लोगों की उसमें दिलचस्‍पी है। वे इसके बारे में जानना चाहते हों। कोई भी घटना समाचार तभी बन सकती है, जब लोगों का एक बडा तबका इसके बारे में जानने में रूचि रखता हो। स्‍वभावत: हर समाचार संगठन अपने लक्ष्‍य समूह (टार्गेट ऑडिएंस) के संदर्भ में ही लोगों की रूचियों का मूल्‍यांकन करता है। लेकिन हाल के वर्षों में लोगों की रूचियों और प्राथमिकताओं में भी तोड-मरोड की प्रक्रिया काफी तेज हुई है और लोगों की मीडिया आदतों में भी परिवर्तन आ रहे हैं। इसलिए यह भी कह सकते हैं कि रूचियां कोई स्थि‍र चीज नहीं है, गतिशील हैं। कई बार इनमें परिवर्तन आते हैं तो मीडिया में भी परिवर्तन आता है। लेकिन आज मीडिया लोगों की रूचियों में परिवर्तन लाने में अधिकाधिक भूमिका अदा कर रहा है। इसलिए ऐसे अनेक समाचार आज उनके लिए रूचिकर हो सकते हैं जिनसे कल तक वे अपने आपको नही जोडते थे। संक्षेप में किसी घटना, तथ्‍य, विचार या समस्‍या समाचार में लोगों की रूचि का होना उसके समाचार बनने के‍ लिए आवश्‍यक शर्त है।इस विवेचन के उपरांत अब हम समाचार को इस तरह परिभाषित कर सकते हैं:

समाचार किसी भी ताजी घटना, विचार या समस्‍या का विवरण या रिपोर्ट है जिसमें अधिक से अधिक लोगों की रूचि है।

समाचार की इस परिभाषा में शायद कोई विवाद न हो। इसे एक तरह से समाचार की सर्वमान्‍य परिभाषा कहा जा सकता है। लेकिन लोगों की रूचि किन घटनाओं, विचारों या समस्‍याओं (आगे इसके लिए केवल घटनाओं शब्‍द का प्रयोग किया गया है) में है? यह रूचि क्‍यों होती है और इसमें परिवर्तन कैसे और क्‍यों आते हैं? लोगों की रूचियों और प्राथमिकतांए ही समाचार जगत और मीडिया पर होनेवाले तमाम विचार-विमर्श और अनुसंधान के केंद्र में होती है। इस दष्टिकोण से समाचार की परिभाषा में विस्‍तार करना आवश्‍यक हो जाता है।

समाचार किसी भी ताजी घटना, विचार या समस्‍या की रिपोर्ट है जिसमें लोगों की रूचि हो लेकिन विभिन्‍न राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्‍कतिक माहौल में समाचार की अवधारणाएं और अर्थ भी भिन्‍न हो जाते हैं।

अगर किसी समाज में आत्‍महत्‍या और अपराध सामान्‍य घटना नहीं है तो जब भी ये होगी बडी खबर बनेगी। लेकिन अगर किसी अन्‍य माहौल में यह रोजमर्रा की घटना हो तो इनका समाचारीय महत्‍व घट जाता है। इस तरह की घटनाओं को दिल्‍ली में समाचारपत्रों के , महानगर पष्‍ठ पर एक कॉलम या अगर बहुत खबरें न हों तो मुश्किल से दो कॉलम की छोटी सी खबर बना लेंगे। लेकिन दिल्‍ली के समाचारपत्र में प्रकाशित होने के लिए इस तरह की घटनाओं का दिल्‍ली में ही घटना जरूरी है। स्‍वभावत: देश भर में ऐसी घटनाओं की संख्‍या बडी है और फिर जब वे रोज होती हैं तो समाचार नहीं रह जातीं। अब तो एक या दो महिलाओं की आत्‍महत्‍या दिल्‍ली के समाचारपत्रों के महानगर पृष्‍ठों पर छोटी सी सिंगल कॉलम खबर होती है।

स्‍वभावत: रोज एक ही तरह की खबर को प्रमुखता देना संभव नहीं है। हां इतनी उम्‍मीद जरूर की जाती है कि कभी-कभार समाचारपत्र इस तरह की घटनाओं के कारणों पर भी प्रकाश डालें ताकि इस तरह के मसलों पर जाग्‍रूक जनमत तैयार किया जा सके। अगर समाचारपत्र इस तरह की घटनाओं को ‘घटना’ तक सीमित कर देंगे और इसकी प्रक्रिया की पडताल नहीं करते तो वे लोगों की समझ और जागरूकता पैदा नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस तरह की घटनाओं के प्रति उन्‍हें असंवेदनशील और नासमझ बना रहे हैं। गंभीर मसलों का सतहीकरण कर रहे हैं। लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि जब एक ही तरह की घटना आम बात हो जाए तो यह रोजमर्रा की घटना बन जाती है और उसके समाचार मूल्‍य का ह्रास होता है। दिल्‍ली में खास तरह के दो-चार अपराध रोज होते हैं इसलिए अब ये बडी खबर नहीं रह गए हैं।

सत्‍तर के दशक में पुलिस फायरिंग एक बडी समाचारीय घटना होती थी और पुलिस फायरिंग में २-३ लोगों का मारा जाना समाचारपत्रों की पहले पष्‍ठ पर प्रमुख खबर होती थी। लेकिन धीर-धीरे पुलिस फायरिंग में की घटनाएं बढती गईं। इनमें मरने वाले लोगों की संख्‍या में भी इजाफा होता चला गया। बैलाडिला और पंतनगर में पुलिस ने २०० से भी अधिक लोगों को मार डाला। आज देश के किसी कोने में पुलिस फायरिंग में दो-चार लोगों की मौत दिल्‍ली के एक दैनिक समाचारपत्र में किसी खास दिन कोई स्‍थान ही नहीं पाती या अधिकतम भीतर के पष्‍ठ पर संक्षिप्‍त या ‘‍फिलर’ बनकर रह जाती है।

अमेरिका में पिछले वर्ष एक पावर ब्रेक डाउन हुआ चंद घंटों के लिए। हमारे देश के समाचारपत्रों में भी यह प्रथम पष्‍ठ पर प्रमुख खबर थी। प्रमुख खबर तो इसलिए भी है कि अमेरिकी समाज बिजली पर इतना निर्भर है कि बिजली गई तो पूरा जीवन ठप्‍प हो जाता है और फिर वहां ऐसे बिजली जाती ही नहीं। एक राजनीतिक और आर्थिक महाशक्ति का जीवन ठप्‍प पडना सभी के लिए बडा समाचार है। लेकिन दुनिया के कई देशों में भी घंटों के लिए बिजली जाती है, वह इतना बडा समाचार नहीं बनती है। उत्‍तर प्रदेश और बिहार में तो बिजली का जाना समाचार रह ही नहीं गया है। आंध्र प्रदेश सहित देश में सैकडों किसान आत्‍महत्‍या कर चुके हैं। स्‍वयं हमारे समाचारपत्रों ने इसे कितनी प्रमुखता दी और इन घटनाओं की तह मे जाने का कितना प्रयास किया? आंध्र प्रदेश में “हाई टेक ई गर्वनेंस” को समाचारपत्रों में शायद अधिक कवरेज मिला होगा। अगर कृषि क्षेत्र की बदहाली की वजह से किसी अन्‍य राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक माहौल में एक-दो किसान भी आत्‍महत्‍या कर लें तो शायद पूरा देश और सरकार हिल उठे।

निश्‍चय ही प्रभावशाली और शासक तबकों से सरोकार रखने वाली घटनाएं मुख्‍य धारा की मीडिया में समाचार बनती हैं। आम लोग ‘बडे समाचार’ नही होते। घटनाओं का विभिन्‍न राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक माहौल में समाचार बनने की प्रक्रिया विविध और जटिल है। यह विभिन्‍न वर्गों और सत्‍ता तथा व्‍यवस्‍था के साथ उनके अंतर्सबंधों का परिणाम है। न्‍यूयार्क, लंदन, पेरिस, काहिरा, तेहरान, नई दिल्‍ली, बीजिंग और टोकियो तक जिस माहौल में समाचारों का उत्‍पादन होता है वह अलग है और अलग तरह की घटनाएं समाचारों का रूप अख्तियार करती हैं। कुछ घटनाएं होती हैं जो पूरे विश्‍व में समान रूप से समाचार होती हैं लेकिन ऐसी असाधारण घटनाएं कभी-कभार ही होती हैं। एक सामान्‍य दिन में हर माहौल में समाचारों में विविधता और भिन्‍नता होती है।

 

समाचारीय महत्‍व

इन तमाम विविधताओं और भिन्‍नताओं के बावजूद किसी घटना का अपना एक समाचारीय महत्‍व होता है और जिसे अनेक कारक प्रभावितकरते हैं। एक घटना को एक समाचार के रूप में किसी समाचार संगठन में स्‍थान पाने के लिए इसका समय पर सही स्‍थान यानि समाचार कक्ष में पहुंचना आवश्‍यक है। मौटे तौर पर कह सकते हैं कि उसका समायानुकूल होना जरूरी है। आज की तारीख में एक दैनिक समाचारपत्र के हर संस्‍करण की अपनी एक डेडलाइन (समय सीमा ) होती है ज‍ब तक के समाचारों को वह कवर कर पाता है तो अगले दिन के संस्‍करण के लिए १२ बजे रात से पहले के चौबीस घंटे के समाचार समयानुकूल होंगे। इसी तरह २४ घंटे के एक टेलीविजन समाचार चैनल के लिए तो हर पल ही डेडलाइन है और समाचार को सबसे पहले टेलीकास्‍ट करना ही उसके लिए दौड में आगे निकलना ही सबसे बडी चुनौती है।

इस तरह एक चौबीस घंटे के समाचार चैनल, एक दैनिक समाचारपत्र, एक साप्‍ताहिक और एक मासिक के लिए सिकी सामचार की समय सीमा का अलग-अलग मानदंड होना स्‍वाभाविक है, कहीं सामचार तात्‍कालिक है कहीं सामयिक तो कहीं समकालीन भी हो सकता है। इन तत्‍वों के महत्‍व का निर्धारण समाचार माध्‍यम और पत्रकारिता लेखन के स्‍वभाव से होता है। यह भी कहा जा सकता है कि २४ गुणा ७ टेलीविजन माध्‍यम तात्‍कालिक अधिक हो सकता है तो एक समाचारपत्र का लेख सामयिक या समकालीन अधिक हो सकता है। इसलिए समाचार संग्‍ठनों के संदर्भ में कहा जाता है एक खराब ढंग से लिखा गया समाचार जो डेडलाइनपर दे दिया गया हो वह उस बेहतरीन ढंग से लिखे गए समाचार से बेहतर होता है जो डेडलाइन पर प्राप्‍त नहीं होता।

निकटता

किसी भी समाचार संगठन के लिए किसी समाचार के महत्‍व का मूल्‍यांकन उस आधार पर भी किया जाता है कि वह घटना उसके कवरेज क्षेत्र और पाठक/दर्शक/श्रोता समूह के कितने करीब हुई। हर घटना का समाचारीय महत्‍व उसकी स्‍थानीयता से भी निर्धारित होता है। सबसे करीब वाला ही सबसे प्‍यारा होता है। यह मानव स्‍वभाव है और स्‍वाभाविक भी है कि लोग उन घटनाओं के बारे में जानने के लिए उत्‍सुक होते हैं जो उनके करीबी होती हैं। इसका एक कारण तो करीब होना है और दूसरा कारण यह भी है कि इसका असर भी करीब वालों पर ही अधिक पडता है। मसलन किसी एक खास कॉलोनी में चोरी-डकैती की घटना के बारे में वहां के लोगों की रूचि होना स्‍वाभाविक है। रूचि इसलिए कि घटना उनके करीब हुई है और इसलिए भी कि इसका संबंध स्‍वयं उनकी अपनी सुरक्षा से है। अपने आस-पास होने वाली घटनाओं के प्रति लोगों की अधिक रूचि से हम सब वाकिफ हैं और समाचारों और समाचार संगठनों का अधिकाधिक स्‍थानीयकरण इसी रूचि को भुनाने का परिणाम है।

आकार

इसके अलावा किसी घटना के आकार से भी इसका समाचारीय महत्‍व निर्धारित होता है। किस कारण कोई समाचार महत्‍वपूर्ण है किसके कारण कोई अन्‍य समाचार महत्‍वपूर्ण है। अनेक मौकों पर किसी घटना से जुडे लोगों के महत्‍वपूर्ण होने से भी इसका समाचारीय महत्‍व बढ जाता है। स्‍वाभात: प्रख्‍यात और कुख्‍यात  अधिक स्‍थान पाते हैं। प्रधानमंत्री को जुकाम भी हो तो समाचार है और अन्‍य कोई कितेन ही बुखार से ग्रसित क्‍यों न हों शायद समाचार नहीं बन पाए। प्रसिद्ध लोगों की छोटी-मोटी गतिविधियां भी समाचार बन जाती हैं। याद कीजिए सलमान खान पर विवेक ओबराय का गुस्‍सा फूटना कितनी बडी खबर बनी थी। इसके अलावा घटना के आकार से आशय यही है कि इससे कितने सारे लोग प्रभावित हो रहे हैं या कितने बडे भू-भाग में पहुंचा है आदि।

प्रभाव

किसी घटना का ‘प्रभाव’ भी इसके महत्‍व को निर्धारित करता है। सरकार के किसी निर्णय से अगर दस लोगों को लाभ हो रहा हो तो यह इतना बडा समाचार नहीं जितना कि अगर इससे लाभा‍न्वित होने वाले लोगों की संख्‍या एक लाख हो। सरकार अनेक नीतिगत फैसले लेती हैं जिनका प्रभाव तात्‍कालिक नहीं होता लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव महत्‍वपूर्ण हो सकते हैं और इसी दृष्टि से इसके समाचारीय महत्‍व को आंका जाना चाहिए।

उपभोक्‍ता वर्ग

आमतौर पर हर समाचार का एक खास पाठक/दर्शक/श्रोता वर्ग होता है। किसी समाचारीय घटना के इस वर्ग से भी इसका महत्‍व तय होता है। किसी खास समाचार का ऑडिएंस कौन हैं और इसका आकार कितना बडा है। इन दिनों ऑडिएंस का समाचारों के महत्‍व पर प्रभाव बढता जा रहा है। अतिरिक्‍त क्रय शक्ति वाले सामाजिक तबको, जो विज्ञापन उदयोग के लिए बाजार होते हैं, में अधिक पढे जाने वाले समाचारों को अधिक महत्‍व मिलता है।

संदर्भ

हर समाचारीय घटना का महत्‍व आंकने के लिए संदर्भ का विशेष महत्‍व होता है। खास तौर से महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों द्वारा दिए गए बयानों और कथनों का महत्‍व उनके संदर्भ से ही तय किया जा सकता है। मसलन, भारत और अमेरिका के संबंधों पर भारत सरकार समय-समय पर अनेक बातें कहती हैं और इनका भी अपना ही महत्‍व होता है लेकिन अगर अमेरिका के राष्‍ट्रपति भारत यात्रा पर आने वाले हों और इनकी पूर्व संध्‍या पर भारत सरकार कोई बयान दे तो एक खास संदर्भ में इसका महत्‍व बहुत बढ जाता है।

अनेक अन्‍य मौकों पर महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों के बयान किसी संदर्भ में ही होते हैं और इस संदर्भ को जाने-समझे बिना कोई पत्रकार इस बयान के समाचारीय महत्‍व को नहीं आंक सकता। संदर्भ को समझने के लिए विषय की समझ जरूरी है। उदाहरण के लिए भारतीय प्रधानमंत्री और फिलिस्‍तीनी प्राधिकरण के मुखिया यासर अराफात संयुक्‍त बयान में आतंकवाद की भर्त्‍सना करते हैं। किसी अलग समय में इस्राइल के विदेश मंत्री भारत पर आते हैं और तब भी एक संयुक्‍त बयान में आतंकवाद की भर्त्‍सना की जाती है। भारत और अमेरिका भी संयुक्‍त बयान में आतंकवाद की भर्त्‍सना करते हैं। भारत और रूस भी ऐसा ही करते हैं। भारत और नेपाल भी आतंकवाद के खिलाफ एक हैं।

इन बयानों को इनके संदर्भ से काटकर कभी भी उचित समाचारीय महत्‍व नहीं दिया जा सकता। भारत की सबसे बडी चिंता कश्‍मीरी आतंकवाद है जो समय-समय पर देश के अन्‍य हिस्‍सों में भी वारदातें करता है मसलन संसद पर हमला। कश्‍मीर आतंकवादको जिंदा रखन में पाकिस्‍तान की अहम भूमिका है। पाकिस्‍तान के समर्थन के बिना कश्‍मीर में आतंकवाद चलाया हीं नहीं जा सकता। फिलिस्‍तीनीयों के लिए इस्राइल एक आतंकवादी राज्‍य और वहां की सरकार आतंकवादी हमले करती है। इस्राइल का मानना है कि वह फिलीस्‍तीनी आतंकवाद का शिकार है और उसकी हर सैनिक कार्रवाई आंतकवाद के खिलाफ होती है। अमेरिका आंतकवाद के खिलाफ युद्ध लड रहा है और इस युद्ध में पाकिस्‍तान अमेरिका का सामरिक सहयोगी है। समूचे इस्‍लामी और अरब राज्‍यों में अमेरिकी रणनीति में पाकिस्‍तान की अहम भूमिका है। रूस को उस आतंकवाद की चिंता है जो चेचन्‍या में इसे परेशान किए हुए है। नेपाल की चिंता शायद माओवादी आतंकवादी है।

इन तमाम संदर्भों में ही उपरोक्‍त संयुक्‍त बयानों के सामचारीय महत्‍व, उनमें लेखन, संपादन, शीर्षक आदि का चयन किया जा सकता है। जो पत्रकार इन संदर्भों से वाकिफ नहीं हैं वे इन घटनाओं के समाचार लिखने, संपादित करने और इनके महत्‍व को आंकने में विफल होने के लिए ही बाध्‍य है। अगर कोई पत्रकार यह नहीं जानता कि यासर अराफात फिलिस्‍तीनी हैं या यहूदी तो वह केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि पूरे अरब-इस्‍लामी जगत के समाचारों को संपादित करने के योग्‍य नहीं हैं। इन विषयों पर रिपोर्टिंग करना तथा लेख लिखना या विश्‍लेषण करना तो दूर की बात है।

नीतिगत ढांचा

किसी समाचार संगठन की कोई नीति होने का मतलब लेखन की स्‍वतंत्रता पर अंकुश है। अगर किसी मसले पर समाचार संगठन की कोई नीति है, तो इसका मतलब वह इस नीति के अनुसार ही समाचार प्रकाशित करेगा और विचारों की अभिव्‍यक्ति करेगा। इसलिए कोई भी समाचार संगठन कभी यह स्‍वीकार नहीं करेगा कि व्‍यापक राजनीतिक और आर्थिक मुददों पर उसकी कोई नीति है। लेकिन भले ही किसी सुसंगठित रूप में नीति न हो लेकिन हर समाचार संगठन मौटे तौर पर हर मुददे पर किसी नीति पर तो चलता ही है और अनेक कारक इस नीति का निर्धारण करते हैं। अनेक संपादक इसे ‘संपादकीय लाइन’ कहते हैं। मसलन समाचारपत्रों में संपादकीय होते हैं जिन्‍हें संपादक और उनके सहायक संपादक लिखते हैं। संपादकीय बैठक में तय किया जाता है कि किसी विशेष दिन कौन-कौन सी ऐसी घटनाएं हैं जो संपादकीय हस्‍तक्षेप के योग्‍य हैं। इन विषयों के चयन में काफी विचार-विमर्श होता है। फिर उनके निर्धारण के बाद क्‍या संपादकीय स्‍टैंड हो क्‍या लाइन ली जाए यह भी तय किया जाता है और विचार-विमर्श के बाद संपादक तय करते हैं क्‍या रूख होगा या क्‍या लाइन होगी। यही स्‍टैंड और लाइन एक समाचारपत्र की नीति भी होती है।

वैसे तो एक समाचारपत्र में अनेक तरह के लेख और समाचार छपते हैं और आवश्‍यक नहीं है कि वे संपादकीय नीति के अनुकूल हों। समाचापत्र में विविधता और बहुलता हो होना अनिवार्य है। संपादकीय एक समाचारपत्र की विभिन्‍न मुददों पर नीति को प्रतिबिंबित करते हैं। निश्‍चय ही समाचार कवरेज और लेखों-विश्‍लेषणों में संपादकीय की नीतिका पूरा का पूरा अनुसरण नहीं होता लेकिन कुल मिलाकर संपादकीय नीति का प्रभाव किसी भी समाचारपत्र के समूचे व्‍यक्तित्‍व पर पडता है। अगर कोई समाचारपत्र भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का कटटर समर्थक है तो वह उन तमाम समाचारों को अधिक महत्‍व देने की कोशिश करेगा जो उसके पक्ष में जाती हैं। समाचारों का चयन और डिस्‍पले भी समाचारपत्र की नीतियों को प्रतिबिंबित करते हैं। अक्‍सर ऐसा देखने में आता है कि संपादकीय में कोई समाचारपत्र किसी खास राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक पार्टी या गठजोड़ के करीब हो तो समाचारों के चयन और प्रस्‍तुतीकरण में भी यह इन्‍हीं के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। समाचार संगठन की नीतियों से किसी भी समाचार संगठन की समाचार की अवधारणाएं निर्धारित होती हैं। इसी से उसकी संपादकीय-समाचारीय सामग्री का चरित्र और स्‍वरूप तय होता है। इसके बाद स्‍थान और पत्रकारीय महत्‍व के आधार पर किसी समाचार संगठन में समाचार अपना स्‍थान पाता है। इस तरह हम कह सकते है कि सैद्धांतिक रूप से किसी समाचारपत्र के संपादकीय ही इसकी स्‍टैंड, लाइन या नीति को दर्शाते हैं और बाकी लेख, विश्‍लेषण और बाइलाइन वाले समाचारों में वैचारिक विविधता होती है। एक संपूर्ण व्‍यक्तित्‍व के रूप में तमाम विविधताओं को प्रतिबिंबित करने के बावजूद समाचार संगठन अपनी संपादकीय नीति के अनुसार ही समाचारों को भी छापता है। निश्‍चय ही समाचार संगठन किसी व्‍यवस्‍था के तहत या इसके भीतर ही काम करते हैं। एक दृष्टि से मुख्‍यधारा के समाचार संगठन किसी भी व्‍यवस्‍था की प्रभुत्‍वकारी और शासक विचारधारा के ही प्रवक्‍ता होते हैं और इस दायरे के भीतर ही राजनीतिक विविधता का सृजन होता है। इसके अलावा समाचार संगठन के स्‍वामित्‍व से भी इसकी नीतियां तय होती हैं। पिछले कुछ समय से दुनिया भर में समाचार संगठनों के स्‍वामित्‍व के संकेंद्रीकरण के प्रभावों पर काफी चर्चा हो रही है। समाचार सामग्री और प्रस्‍तुतीकरण पर इसका नकारात्‍मक प्रभाव पड़ रहा है। यह तो तय है कि कोई भी समाचार संगठन अपने मालिक और उसके विचारों के खिलाफ नहीं जा सकता।

विज्ञापन उद्योग का दबाव

उसके बाद पिछले कुछ वर्षों में विज्ञापन उद्योग का दबाव भी काफी बढ़ गया है। मुक्‍त बाजार व्‍यवस्‍था के तेज विस्‍तार तथा उपभोक्‍तावाद के फैलाव के साथ विज्ञापन उद्योग का जबर्दस्‍त विस्‍तार हुआ है। समाचार संगठन अब कारोबार और उद्योग हो गए हैं और विज्ञापन उद्योग पर उनकी निर्भरता बहुत बढ़ चुकी है। इसका भी संपादकी/समाचारीय सामग्री पर गहरा असर पड़ रहा है। समाचार संगठन पर अन्‍य आर्थिक सामाजिक और सांस्‍कृतिक दबाव भी होते हैं। किसी छोटे स्‍थान से छपने वाला कोई समाचारपत्र वहां के स्‍थानीय माफिया के खिलाफ कुछ नहीं छाप सकता। इसी तरह के कई अन्‍य दबाव भी इसकी नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बाद जो स्‍पेस या स्‍थान बचता है वह पत्रकारिता और पत्रकारों की स्‍वतंत्रता का है। यह उनके प्रोफेशनलिज्‍म पर निर्भर करता है कि वे इस स्‍पेस का किसी तरह सबसे प्रभावशाली ढंग से उपयोग कर पाते हैं। इस पत्रकारीय स्‍पेस पर भी निरंतर हमले होते रहते हैं और इसे छोटा करने का प्रयास होता रहता है। पत्रकार और उसके प्रोफेशनलिज्‍म के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस स्‍पेस की हिफाजत करे और इसका अधिक‍तम इस्‍तेमाल से इसके विस्‍तार का निरंतर प्रयास करता रहे। कई बार किन्‍हीं खास परिस्थितियों में भी यह स्‍पेस कम-ज्‍यादा होता रहता है। उन्‍माद की परिस्थियों में पत्रकारीय स्‍वतंत्रता का जबर्दस्‍त ह्रास होता है चाहे वह किसी भी तरह का उन्‍माद क्‍यों न हो। ११ सितंबर, २००१ के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका का उदाहरण सबके सामने है जहां उग्र राष्‍ट्रवाद इस कदर हावी हो गया था कि मीडिया में असहमति का स्‍थान बहुत छोटा हो गया था। अनेक अवसरों पर सामाजिक वातावरण भी संपादकीय सामग्री को प्रभावित करता है। समाज तनाव की स्थिति में यह प्रभाव अधिक गहरा हो जाता है।

महत्‍वपूर्ण जानकारियां

अनेक ऐसी सूचनाएं भी समाचारीय होती हैं जिनका समाज के किसी विशेष तबके के लिए कोई महत्‍व हो सकता है। ये लोगों की तात्‍कालिक सूचना आवश्‍यकताएं भी हो सकती हैं। मसलन, स्‍कूल कब खुलेंगे, किसी खास कॉलोनी में बिजली कब बंद रहेगी, पानी का दबाव कैसा रहेगा आदि। इस संदर्भ में कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनमें सूचनाएं देने के अपने ही खतरे हैं। कम से कम चिकित्‍सा विज्ञान के क्षेत्र में अनेक बार कुछ तरह की सूचनाएं गलतफहमियां पैदा करती हैं। यह सर्वविदित है कि अनुसंधान अनेक तरह की अवधारणाओं पर आधारित होते हैं और वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर अ‍धकचरे ज्ञानको इसमें निष्‍कर्ष के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा दुर्घटनाओं के मामले में भी हताहतों के नाम की जानकारी देने का अपना ही महत्‍व है। हालांकि अधिकांश मौकों पर नाम पता करना मुश्किल काम होता है।

आशय यह है कि दुर्घटना में वास्‍तविक रूप से हताहतों और उनसे प्रभावित होने वाले लोगों को जितनी जल्‍दी पहचान और सूचित किया जा सके उतना ही बड़ी संख्‍या में लोगों की चिंता का निदान किया जा सकता है। मसलन, अगर किसी मिग विमान की दुर्घटना में पायलट की मौत हो जाती है तो पायलट नाम दे देने से उन तमाम परिजनों को राहत मिलेगी जिनके परिजन उस सेक्‍टर में पायलट के पद पर तैनात हैं, जहां यह दुघर्टना हुई।

असाधारणता

एक पुरानी कहावत है कि कुत्‍ता आदमी को काट दे तो खबर नहीं लेकिन अगर आदमी कुत्‍ते को काट ले तो यह खबर है यानी जो कुछ स्‍वाभाविक नहीं है या किसी रूप से असाधारण है वही समाचार भी है। सौ नौकरशाहों का ईमानदार होना समाचार नहीं क्‍योंकि इनसे तो ईमानदार रहने की अपेक्षा की जाती है लेकिन एक नौकरशाह अगर अगर बेईमान और भ्रष्‍ट है तो यह बड़ा समाचार है। सौ घरों का निर्माण समाचार नहीं है। यह तो एक सामान्‍य निर्माण प्रक्रिया है लेकिन दो घरों का जल जाना समाचार है।

निश्‍चय ही अनहोनी घटनाएं समाचार होती हैं। लोग इनके बारे में जानना चाहते हैं। लेकिन समाचार मीडिया को भी इस तरह की घटनाओं के संदर्भ में काफी सजगता बरतनी चाहिए अन्‍यथा कई मौकों पर यह देखा गया है कि इस तरह के समाचारों ने लोगों में अवैज्ञानिक सोच और अंधविश्‍वास को जन्म दिया है। कई बार यह देखा गया है कि किसी विचित्र बच्‍चे के पैदा होने की घटना का समाचार चिकित्‍सा विज्ञान के संदर्भ से काटकर किसी अंधविश्‍वासी संदर्भ में प्रस्‍तुत कर दिया जाता है। भूत-प्रेत के किस्‍से-कहानी समाचार नहीं हो सकते। किसी इंसान को भगवान बनाने के मिथ गढ़ने से भी समाचार मीडिया को बचना चाहिए।

साभार: समाचार लेखन अवधारणा और लेखन प्रक्रिया, भारतीय जन संचार संस्‍थान, 2004

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One comment

  1. Good thots

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