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चुनाव-सर्वेक्षणों की होड़ में पिचकती पत्रकारिता

उर्मिलेश |

राजनीतिक दलों या नेताओं के जीतने-हारने या उनकी सीटों के पूर्वानुमान लगाने वाले ओपिनियन-पोल राजनीति और राजनेताओं के लिए कितने फायदेमंद या नुकसानदेह हैं, इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं अपने अनुभव की रोशनी में बेहिचक कह सकता हूं कि चुनाव-अधिसूचना जारी होने के बाद भी सीटों और नेताओं की लोकप्रियता-रेटिंग बताने वाले ओपनियन पोल्स के प्रकाशन-प्रसारण से हमारी पत्रकारिता को जरूर नुकसान पहुंचा है। फिलहाल, यहां हम आंकड़ों की इस बहस में नहीं जाएंगे कि हमारे देश में इस तरह के चुनावी सर्वेक्षण कितना सही और कितना गलत साबित हुए हैं। पूरा देश जानता है कि बीते दो दशकों के दौरान कराए ज्यादातर चुनावी सर्वेक्षण गलत ही साबित हुए। सबसे दिलचस्प बात है कि हमारे देश में ज्यादातर सर्वेक्षण जीत-हार और सीटों की संख्या आदि पर केंद्रित होते हैं, जनता की समस्याओं और मुद्दों पर कम होते हैं। अगर कुछ सर्वे एजेंसियां चुनाव के दौर में मुद्दा और सीटों के आकलन पर केंद्रित सर्वेक्षण कराती भी हैं तो चैनलों और अखबारों में मुद्दों के मुकाबले सीटों की संख्या या किसी नेता की लोकप्रियता वाले सर्वे-नतीजों को ही ज्यादा महत्व मिलता है।

जब से भारतीय मीडिया-बाजार में इस तरह के सर्वेक्षणों की दुकानें सजी हैं, हमारी चुनाव-रिपोर्टिंग चौपट हो गई है। सबसे ज्यादा चिंताजनक है कि इस तरह के सर्वेक्षण आम लोगों के रूझान के अलावा पत्रकारों की राय, उनके सोच की दिशा को भी प्रभावित करते हैं। एक तरह से वे किसी दल या नेता की स्थिति के बारे में एक खास राय या समझ का निर्माण करते नजर आते हैं। अंततः यह पत्रकारिता और जम्हूरियत, दोनों का नुकसान है।

अपने यहां टीवी न्यूज चैनलों मे चुनाव रिपोर्टिंग की कोई महान परम्परा नहीं है लेकिन पत्र-पत्रिकाओं में वह निश्चय ही समृद्ध रही है। लगभग सभी प्रमुख अखबारों में लंबे समय से चुनाव रिपोर्टिंग पर काफी जोर दिया जाता रहा है। चुनाव अगर मतदाताओं के लिए जम्हूरियत के त्योहार की तरह आते रहे हैं तो प्रिन्ट मीडिया के लिए भी वे खास अवसर बनते रहे हैं। इस दौरान अखबारों के रिपोर्टर-फोटोग्राफर दूर-दराज के इलाकों में जनमत को जानने-समझने, स्थानीय समस्याओं और मसलों का जायजा लेने जाते रहे हैं।

इससे जीवंत संवाद की दो समानांतर प्रक्रियाएं चलती रही हैं-आम जन और मीडिया के बीच एवं मीडिया के जरिए आम जन और राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच। जमीनी स्तर की खबरों के जरिए जनता के सवाल, सरोकार और मसले चुनाव के दौर में प्रभावी ढंग से उभरते रहे हैं। नेताओं को इन पर अपनी-अपनी सफाई देनी पड़ती रही है। राजनीतिक दल इन खबरों के आधार पर अपनी रणनीति, नारों और कार्यक्रमों में भी बदलाव के लिए विवश होते रहे हैं। जिन अखबारों की चुनाव रिपोर्टिंग में जन सरोकार और जमीनी सच्चाइयां ज्यादा असरदार ढंग से व्यक्त होती रहीं, उन्हें हाथों-हाथ लिया जाता रहा। लेकिन चुनाव सर्वेक्षणों के नए दौर में यह सिलसिला अचानक ठप्प सा हो गया। इसके अलावा पेड न्यूज ने भी इस सिलसिले को बुरी तरह प्रभावित किया। कई बार तो रंग-बिरंगे चुनाव सर्वेक्षणों की भीड़ मे पता ही नहीं चलता कि इनमें कौन प्रोफेशनल ढंग से कराया प्रामाणिक सर्वेक्षण है और कौन पेड न्यूज है! इसका मतलब यह नहीं है कि प्रामाणिक और प्रोफेशनल ढंग से सर्वेक्षण कराए ही नहीं जाते। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं। देश में कुछेक संस्थानों-संस्थाओं ने प्रोफेशनल ढंग से सर्वेक्षण कराए हैं और अब भी करा रहे हैं। लेकिन इनकी संख्या बेहद कम है। आम तौर पर चैनलों-अखबारों में उनके सर्वेक्षण से कुछ सीमित आकड़े ही लिए जाते हैं। सिर्फ जीतने-हारने वाली सीटों या नेताओं की लोकप्रियता-रेटिंग वाले आंकड़े ही चैनलों-अखबारों को ज्यादा उपयोगी लगते हैं।

बीते कुछ वर्षों का जायजा लें तो पाएंगे कि इस तरह के सर्वेक्षणों के अंदाजिया आकड़ों के प्रकाशन-प्रसारण के बाद चैनलों-अखबारों का पूरा चुनाव-कवरेज सीटों की संख्या और नेताओं की लोकप्रियता रेटिंग के इर्दगिर्द केंद्रित हो जाता है। स्टूडियो की बहसों के केंद्र में यह रेटिंग और सीटों के अंदाजिया आकड़े ही आ जाते हैं। चुनाव की जमीनी रिपोर्टिंग पीछे छूट जाती है।

अखबारों पर भी इन सर्वेक्षणों का असर पड़ता है। कई बार तो चैनलों के साथ वह स्वयं भी प्रायोजक होते हैं। तब अखबार दूर-दराज के इलाकों मे अपने रिपोर्टरों को चुनाव रिपोर्टिंग के लिए भेजने से बचते हैं। उनके प्रबंधकों और ज्यादातर संपादकों को यह फिजूल का खर्च नजर आता है।

सर्वेक्षण आधारित चुनाव कवरेज पर जोर देने वाले ज्यादातर मीडिया समूहों के पास एक तर्क यह भी होता है कि चुनाव सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों पर वे लाखों की रकम पहले ही खर्च कर चुके हैं, ऐसे में फिर अपने रिपोर्टरों के यात्रा-व्यय आदि पर खर्च करने का कोई तुक नहीं है!

आमतौर पर ज्यादातर मीडिया समूहों के रिपोर्टर और पत्रकार इन दिनों चुनावों के समय अपने प्रकाशन या प्रसारण केंद्रों या राज्यों की राजधानियों में रहकर नेताओं की ब्रीफिंग-काउंटर ब्रीफिंग या फिर इन चुनाव-सर्वेक्षणों पर आधारित खबरें बनाते रहते हैं। बहुत हुआ तो वे यदा-कदा नेताओं के साथ कुछ इलाकों का दौरा कर आते हैं। कुछेक अपवाद हो सकते हैं, जहां रिपोर्टरों को अब भी चुनाव-क्षेत्रों में जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग के लिए बाहर भेजा जाता हो। जिन टीवी चैनलों की तरफ से बाहर की रिपोर्टिंग कराई जा रही है, उनका भी ज्यादा जोर ‘कौन बनेगा सांसद-विधायक’ या ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री’ नुमा कार्यक्रमों पर है। ऐसे कार्यक्रमों से पत्रकार और आम मतदाता के बीच मुद्दों पर न तो कोई संवाद हो पाता है और न ही क्षेत्रीय समस्याओं, विशिष्टताओं, स्थानीय समाज, संस्कृति, रंग और जीवन से पत्रकार का साक्षात्कार हो पाता है, जो एक बेहतर पत्रकार और अच्छी पत्रकारिता के विकास के लिए जरूरी है।

लंबे समय से जनतंत्र में जीने वाले अमेरिका या ब्रिटेन के पैमाने से हमारी जम्हूरियत या मीडिया की आचार संहिताएं नहीं बनाई जानी चाहिए। अपनी जमीनी स्थिति और जरुरतों का भी ख्याल रखना होगा। इस संदर्भ में चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद ओपिनियन पोल पर पाबंदी की निर्वाचन आयोग की सिफारिश असलियत के ज्यादा करीब है।

इसमें शायद कोई दो राय होगी कि हमारे जैसे विकासशील जनतंत्र में, जहां राजनीतिक-सामाजिक चेतना के अलग-अलग स्तर हैं, बाजारू ढंग से कराए ज्यादातर पोल सर्वे मतदाताओं के एक हिस्से के मानस को भी प्रभावित करते हैं। जिस तरह से उन्हें परोसा जाता है, उसमें वे किसी खास प्रत्याशी या पार्टी के लिए समर्थन का दायरा भी निर्मित करने लगते हैं। मुद्दों से ज्यादा नेता, कार्यक्रम से ज्यादा कथित लोकप्रियता-रेटिंग को वे ऊपर करते हैं। ऐसे में आयोग की सिफारिश से असहमति रखने वालों के पास सर्वेक्षणों के पक्ष में ज्यादा तर्क नहीं हैं। इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी के संवैधानिक प्रावधान से जोड़ना तो बिल्कुल फिजूल है।

फिर ‘पेड न्यूज’ को भी कोई अभिव्यिक्त की आजादी से जोड़ सकता है। अप्रैल, सन 2004 में राजनीतिक दलों के बीच ऐसे सर्वेक्षणों पर पाबंदी के पक्ष में आम सहमति बनी थी। पर बात सर्वदलीय बैठक से आगे नहीं बढ़ी। निर्वाचन आयोग की इच्छा के बावजूद सन 2009 या 2014 के संसदीय चुनाव में इसे अमलीजामा नहीं पहुंचाया जा सका। ऐसा  लगता है कि चुनाव सुधार की ठोस योजना पर जब तक राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं बनती और अंततः इस बारे में संसदीय-पहल नहीं होती चुनाव के दौरान ओपिनियन पोल कराने-न-कराने का मामला यूं ही लटका रहेगा।

(लेखक राज्यसभा टीवी के कार्यकारी संपादक रहे हैं)

सम्पर्क : urmilesh218@gmail.com

 

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