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टेलीविज़न प्रोडक्शन: कल्पनाओं को हक़ीकत में बदलने का रास्ता

ओमप्रकाश दास।

टेलीविज़न प्रोडक्शन की पटकथा यानी स्क्रिप्ट ही वह हिस्सा है जो विचारों और किसी कहे जाने वाली कहानी को एक ठोस रूप देता है। लेकिन प्रोडक्शन के लिहाज़ से पटकथा में आधारभूत अंतर उसके विषय को लेकर होता है। उदाहरण के लिए किसी काल्पनिक कहानी की स्थिति में पटकथा का स्वरूप अलग होता है तो किसी सचमुच की घटना को प्रस्तुत करने के लिए पटकथा की रूपरेखा बिल्कुल बदल जाती है।

टेलीविज़न प्रोडक्शन मूल रुप से किसी घटना या कहानी को शुरु से अंत तक पहुंचाने की प्रक्रिया है। किसी कहानी या किसी घटना को आप कैसे कैमरे में रिकॉर्ड करेगें, रिकॉर्ड करने से पहले क्या तैयारी करेगें, कौन-कौन से पहलू या हिस्से को उभारना है, यह सारे टेलीविज़न प्रोडक्शन की प्रक्रिया में ही समाहित है। लेकिन टेलीविज़न प्रोडक्शन सिर्फ कैमरे की रिकॉर्डिंग तक ही सीमित नहीं, बल्कि यह तो पूरे प्रोडक्शन का एक हिस्सा भर होता है। टीवी पर कोई मनोरंजक धारावाहिक, टेली-फिल्म हो या हो कोई समाचार, यह सारे एक जटिल प्रक्रिया से होकर गुज़रते हैं। टेलीविज़न प्रोडक्शन के बारे में कई लोगों का मानना है कि यह काफी हद तक रेडियो प्रोडक्शन की तरह ही होता है, जो खबरें या मनोरंजन कार्यक्रम होता है, लेकिन तस्वीरों के साथ। मोटे तौर पर इसे सही माना जा सकता है, लेकिन यह सिर्फ इतना ही नहीं है।

टेलीविज़न प्रोडक्शनः एक परिचय
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी एक ऐसा माध्यम जो हमारे घरों तक अलग-अलग आवाज़ों यानी ऑडियो के साथ साथ गतिशील तस्वीरें यानी विडियो भी पहुंचाता है। यह विडियो और तस्वीरें हम तक अलग अलग वायु तरंगों के ज़रिए पहुंचती है। वैसे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दायरे में टीवी, रेडियो, फिल्म और अब न्यू मीडिया जैसे माध्यम आते हैं, लेकिन टेलीविज़न आज के दौर में सारे माध्यमों पर हावी दिखता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 80 फीसदी घरों में आज टीवी सेट मौजूद हैं।

इस माध्यम को डीटीएच और केबल टीवी ने काफी बढ़ावा दिया, वह भी काफी कम कीमत पर। टेलीविज़न पर प्रसारण के कई हिस्से और आयाम होते हैं, जिसमें हमारे टीवी सेट के अलावा कई सारे उपकरणों की भूमिका होती है जैसे कि संचार उपग्रह। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऑडियो और विडियो कई बार तो सीधे प्रसारित करता है यानि सजीव प्रसारण, जैसा कि उसी समय किसी और जगह यह घटना घट रही है। लेकिन अगर अलग से टेलीविज़न माध्यम की विशेष बातों की बात करें तो वह इस प्रकार हो सकती हैं।

  • तत्कालिकताः टेलीविज़न वह माध्यम है जो मौजूदा विषयों यानी सामयिक विषयों, समकालीन सामग्री को लोगों तक तुरंत पहुंचा सकता है।
  • नश्वरताः टेलीविज़न जो तस्वीरें और ध्वनियां हम तक पहुंचाता है, वह तुरंत भी हमारे सामने से विलीन भी हो जाता है, यह काफी हद तक हमारा ध्यान मांगता है।
  • विविधताः इस माध्यम के ज़रिए हम अलग अलग विषयों पर काफी सारी सामग्री देख सकते हैं। जो अलग अलग रुचियों वाले लोगों के पसंद के हो सकते हैं।
  • लचीलापनः टेलीविज़न पर प्रसारित संदेश या सामग्री के रूप काफी लचीले होते हैं। यह सामग्री पहले से रिकॉर्डेड हो सकते हैं, जीवंत यानी किसी घटना का सजीव प्रसारण भी हो सकता है। यहां यह भी जोड़ना होगा कि जैसे जैसे इंटरनेट के प्लेटफॉर्म पर टीवी के कार्यक्रम आ रहे हैं, टीवी कार्यक्रम अब घर की बैठक से निकलकर लोगों के हाथों में झूलते मोबाईल में आ गया है।

टेलीविज़न प्रोडक्शन के अलग-अलग चरणः
टेलीविज़न प्रोडक्शन की प्रक्रिया को मूल रूप से तीन चरणों या भागों में बांटा जाता है।
यह तीन चरण इस तरह से हैं-

  • प्री-प्रोडक्शन (टेलीविज़न प्रोडक्शन का शुरुआती तैयारियों का हिस्सा)
  • प्रोडक्शन (तैयारियों के बाद प्रोडक्शन का चरण)
  • पोस्ट-प्रोडक्शन (प्रोडक्शन के बाद, अंतिम रूप देने का चरण)

प्रोडक्शन पूर्व (प्री-प्रोडक्शन):
संकल्पना (The Concept):
संकल्पना, यानी किसी विषय, विचार या घटना को लेकर सोच की रूप रेखा। टेलीविज़न प्रोडक्शन की शुरुआत ही किसी विचार की संकल्पना से होती है। आप टीवी पर किस कहानी को प्रस्तुत करना चाहते हैं, किस तरह रखना चाहते हैं। जब सोच के स्तर पर ये तय हो जाता है कि आप दरअसल में कहना क्या चाहते हैं, उसके बाद उसे लिखने का चरण आता है। विचारों को एक क्रम में सिलसिलेवार ढंग से कागज़ पर उतारना कई मायनों में महत्वपूर्ण होता है, ताकि पटकथा यानी स्क्रिप्ट लेखन अच्छा हो। ये विचार कई बार निर्माता यानी प्रोड्यूसर लेकर आ सकता है तो कई बार निर्देशक भी किसी विचार को लेकर लेखक के पास जा सकता है।

आमतौर पर देखा गया है कि लेखक ही अपने विचार को लेकर किसी निर्माता-निर्देशक के पास जाता है। लेकिन इन सब बातों के मूल में है किसी मज़बूत विचार का जन्म लेना। टीवी न्यूज़ चैनलों में ये कई बार आसान होता है क्योंकि यहां ज्यादातर मौकों पर विषय समाज में हमारे आसपास मौजूद होता है, लेकिन ज़रुरत होती है उसमें छिपी कहानी को पहचानने की। यहां दवाब ये भी रहता है कि जो विचार या विषय है वो लोगों यानी आम दर्शक को कितना रुचिकर यानी मनोरंजक लगेगी।

शोधः
इस चरण में हम तय किए गए विषय पर अलग अलग स्रोतों से जानकारी प्राप्त करते हैं। किसी घटना विशेष के संदर्भ की तलाश करते हैं। यहां तक कि काल्पनिक कथा को भी सच्चा जैसा दिखाने के लिए कई बार शोध करते ऐसे तथ्यों को काल्पनिक कथा से जोड़ा जाता है जिससे कि काल्पनिक कहानी भी सच लगे। उदाहरण के लिए ‘जुरासिक पार्क’ नाम की फिल्म जब हॉलीवुड में बना और भारत में भी ख़ूब लोकप्रिय हुई तो इसके पीछे विज्ञान का यही सिद्धांत था कि किसी एक जीन से किसी प्राणी को फिर से पैदा किया जा सकता है। हम जानते हैं कि इस विषय पर अभी भी शोध चल रहा है।

एक टेलीविज़न कार्यक्रम की संकल्पना का उदाहरण (गंगा नदी की सफाई पर एक टीवी श्रृंखला):
आम चुनाव 2014 के दौरान, भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने ये घोषणा की कि अगर केंद्र में उनके नेतृत्व में सरकार बनी तो पवित्र नदी की सफाई करवाना उसे निर्मल बनाना उनकी प्राथमिकता में होगा।

चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने गंगा सफाई के लिए नए सिरे से एक योजना ‘नमामि गंगे’ की शुरुआत की। लेकिन गंगा को निर्मल बनाने में क्या क्या समस्याएं हैं, ‘नमामि गंगे’ परियोजना कैसे सफल हो सकता है, साथ ही गंगा की शुरुआत से लेकर अंत तक ढ़ाई हज़ार किलोमीटर से भी लंबे सफर के दौरान समस्याएं कैसे अपना रूप बदलती हैं, कैसे गंगा आज भी 40 करोड़ से ज्यादा लोगों के जीवन को गहरे प्रभावित करती है, ये सारे सवाल और मुद्दे थे जिनका जवाब सब जानना चाहते थे। इन्हीं मुद्दों को लेकर एक टीवी कार्यक्रम की संकल्पना की गई जिसका शीर्षक रखा गया ‘ताकि बहती रहे गंगा’।

इस 6 एपिसोड वाले टीवी वृतचित्रों की श्रृंखला का प्रसारण दूरदर्शन समाचार चैनल पर अगस्त-सितंबर 2014 के दौरान हुआ। इस कार्यक्रम की मूल संकल्पना में हरिद्वार से लेकर गंगा सागर तक की यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान गंगा नदी के किनारे प्रदूषण की समस्याओं के कारणों की पड़ताल, समाधान और ‘नमामि गंगे’ के प्रावधानों का आकलन के साथ साथ उन कहानियों को भी कवर करना शामिल था जो ये दिखा सके कि कैसे गंगा आज भी लोगों की संवेदनाओं से गहराई से जुड़ी है।

इस टीवी श्रृंखला के दौरान इस बात की भी पड़ताल करनी थी कि अब तक क्यों तमाम सरकारी प्रयासों के बाद भी गंगा की हालत नहीं सुधर पाईं, सरकारी नीतियों में कहां कमी रह गई थी। चुकी आम लोग आज भी गंगा नदी को मां का दर्जा देते हैं, वहीं गंगा की दशा-दिशा को लेकर भी चिंतित नज़र आते हैं, ऐसे में इस टीवी श्रृंखला में लोगों की रूची काफी रही और इसे काफी संख्या में लोगों ने देखा।

टीवी श्रृंखला का प्रस्तुतिकरण (ट्रीटमेंट):
टीवी श्रृंखला ‘ताकि बहती रहे गंगा’ मूल रूप से एक यात्रा वृतांत है, जिसमें ऐसी कहानियां हैं जो पहले के सरकारी प्रयासों की पड़ताल शहर दर शहर करती है, तो आम लोगों के जीवन में गंगा की महत्ता की खोज भी करती है। इन बातों को टीवी के पर्दे पर उतारने के लिए ज़रुरी था कि ऐसी प्रतिनिधित्व कहानियों और मुद्दों को सामने लाया जाए जो केस स्टडी की तरह हो। इसमें विशेषज्ञों से चर्चा से लेकर ऐसे लोगों के जीवन की भी पड़ताल ज़रुरी थी जो गंगा से जुड़े रहे हैं।

इस यात्रा वृतांत के दौरान ऐसी कहानियां भी समाने लानी थी जो ये दिखा सके कि कैसे गंगा के किनारे का हर शहर समस्या के और उसके समाधान के स्तर पर अलग है, क्योंकि गंगा भारत के पांच शहरों से गुज़रती है। इस तरह समझा जा सकता है कि कैसे कहानी कहने का अंदाज़ और उसका कथ्य यानी ट्रीटमेंट बेहद ज़रूरी तत्व है।

पटकथा (स्क्रिप्ट):
टेलीविज़न प्रोडक्शन की पटकथा यानी स्क्रिप्ट ही वह हिस्सा है जो विचारों और किसी कहे जाने वाली कहानी को एक ठोस रूप देता है। लेकिन प्रोडक्शन के लिहाज़ से पटकथा में आधारभूत अंतर उसके विषय को लेकर होता है। उदाहरण के लिए किसी काल्पनिक कहानी की स्थिति में पटकथा का स्वरूप अलग होता है तो किसी सचमुच की घटना को प्रस्तुत करने के लिए पटकथा की रूपरेखा बिल्कुल बदल जाती है। काल्पनिक कहानी की पटकथा जहां शूटिंग (फिल्मांकन) से पहले सारे तथ्यों, दृश्यों की कल्पना कर लेती है। यहां पटकथा के आधार पर ही सारी शूटिंग होती है और घटनाओं और चरित्रों को गढ़ा जाता है। उदाहरण के लिए भारतीय टीवी संसार का पहला सोप ओपेरा ‘हम लोग था। ‘हम लोग’ के इस टीवी प्रोडक्शन में कितने चरित्र होंगे, कौन कैसे कपड़े पहनेगा, कौन क्या संवाद बोलेगा, कैसे बैठेगा, ये सारी चीजे पहले से तय थीं। ये सारी चीज़ें पटकथा यानी स्क्रिप्ट में मौजूद थीं।

लेकिन कथेतर (गैर काल्पनिक) कहानियां, यानी जो सचमुच में घटित हुए हैं या हो रही हैं ऐसे मुद्दों को लेकर प्रोडक्शन काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यहां कोशिश यही होती है कि यथार्थ की घटनाओं या न्यूज़ चैनलों के संदर्भ में खबर या वृत्तचित्र को उन्हीं व्यक्तियों और पात्रों के साथ कहानी का चित्रण करना होता है जो असल में किसी घटना के साक्षी रहे हैं। उदाहरण के लिए गंगा नदीं के प्रदूषण पर बनने वाली वृत्तचित्र में अगर गंदे पानी से होने वाली किसी बिमारी का जिक्र करना है तो ऐसे व्यक्ति को ढूंढना होगा जो सचमुच में इस परिस्थितियों में हो या इससे गुज़र चुका हो।

इस अध्याय में चुकि हम गैर-काल्पनिक मुद्दों के टीवी प्रोडक्शन पर जोर दे रहे हैं, इसलिए हम विशेष तौर पर इसी संदर्भ में बात करेगें।

गैर-काल्पनिक मुद्दों को लेकर पटकथा लेखन प्रोडक्शन पूर्व के स्तर पर मोटे तौर पर एक रूपरेखा का निर्माण करना होता है। यानी इसे ऐसे समझ सकते हैं कि जब आप किसी घटना का मुद्दे को लेकर घटना स्थल पर जाते हैं तो परिस्थितियों को आप नियंत्रण में नहीं रख सकते, हो सकता है कि जिन दृश्यों को आप कैमरे में कैद करना चाहते हैं वो पूरी तरह वैसा न हो जैसा कि किसी निर्देशक या रिपोर्टर ने कल्पना की हो, या कोई चरित्र कैमरे पर बात करने का इच्छुक न हो या उपलब्ध न हो। इन हालातों में कोई पटकथा लेखक पहले से ही कोई पूर्ण स्क्रिप्ट तैयार नहीं कर सकता। ऐसे में शुरुआती पटकथा के बाद शूटिंग होती है, और शूटिंग के बाद अंतिम स्क्रिप्ट लिखी जाती है।

निर्माण (PRODUCTION STAGE):
स्क्रिप्टिंग यानी पठकथा लेखन के संदर्भ में जैसा कि हम प्री-प्रोडक्शन चरण में चर्चा कर चुके हैं कि प्रोडक्शन या निर्माण अपने विषय के अनुसार थोड़ा थोड़ा बदल जाता है। जिसमें मोटे तौर पर काल्पनिक लेखन यानी फिक्शन और सचुमच की कोई घटना यानी नॉन-फिक्शन होता है। टेलीविज़न न्यूज़ चैनल के संदर्भ में भी निर्माता की भूमिका अलग हो जाती है। फिक्शन में जहां अनिनेताओं, निर्देशक और लेखक प्रमुख लोग होते हैं, तो किसी वृतचित्र या ख़बर की कवरेज के संदर्भ में घटना या मुद्दे से जुड़े लोग, घटना का स्थान और घटना के जुड़े तथ्यों को जमा करना प्रमुख होता है।

शूटिंग (फिल्मांकन):
टेलीविजन प्रोडक्शन का सबसे महत्वपूर्ण भाग यही चरण होता है, विशेषकर गैर-काल्पनिक विषयों के प्रोडक्शन के संदर्भ में। यह इसलिए भी है क्योंकि गैर-काल्पनिक घटनाओं की शूटिंग के बाद ही अंतिम पटकथा का अस्तित्व संभव हो पाता है। शूटिंग की गुणवत्ता इस बात को तय कर देती है कि टेलीविजन प्रोडक्शन अंतिम रूप से कैसा होगा, जिसकी शुरुआती तौर पर कल्पना की गई थी।

प्रकाश व्यवस्था (Lighting):
प्रकाश के बिना कैमरे की कल्पना नहीं की जा सकती, यानी जब तक प्रकाश यानी रौशनी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होगी, कैमरे से शूटिंग करना संभव नहीं। कैमरा चाहे जैसा भी हो, उसे एक निश्चित मात्रा में लाईट यानी प्रकाश की ज़रुरत होगी। प्रकाश के उपयोग के अनुसार प्रकाश व्यवस्था को बुनियादी रूप से दो रूपों में बांटा जाता है।

पहला- डायरेक्शनल यानी किसी ख़ास दिशा या वस्तु/व्यक्ति पर केंद्रीय प्रकाश। दूसरा- डिफ्यूजड प्रकाश यानी प्रकाश की ऐसी व्यवस्था जिसमें किसी एक वस्तु/व्यक्ति को केंद्र में न रखकर पूरे दृश्य या पृष्ठभूमि को आलोकित/प्रकाशित किया जाता है।

प्रकाश व्यवस्था के लिए कई तरह के उपकरण होते हैं, जिन्हें मूल रूप से डायरेक्शनल प्रकाश व्यवस्था के लिए स्पॉट लाईट का इस्तेमाल होता है। जबकि डिफ्यूज़ड प्रकाश व्यवस्था के लिए फ्लड लाईट उपकरणों का इस्तेमाल होता है।

यह एक समय सिद्ध तथ्य है कि अच्छे इलेक्टॉनिक प्रोडक्शन चाहे वो फिल्म, हो वृत्तचित्र हो या खबरें ही क्यों न हो अच्छी प्रकाश व्यवस्था तस्वीरों के प्रभाव में कई गुणा बढोत्तरी कर देता है। हालांकि प्रकाश व्यवस्था अपने आप में एक पूरा विज्ञान और विधा है, जिसके लिए अपने अलग विशेषज्ञ होते हैं। लेकिन टेलीविज़न में मोटे तौर पर प्रकाश की देखरेख कैमरामैन ही करते हैं।

पोस्ट-प्रोडक्शन
पोस्ट-प्रोडक्शन, चाहे वो फिल्म निर्माण हो या किसी तरह का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का प्रोडक्शन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाग होता है। पोस्ट प्रोडक्शन मुख्य रूप से फिल्म निर्माण, रेडियो कार्यक्रम निर्माण, विज्ञापन, फोटोग्राफी, डिजिटल आर्ट और टेलीविज़न प्रोडक्शन का तीसरा और आख़री हिस्सा होता है। प्रोडक्शन का ये चरण कैमरा शूटिंग या कहें कि रिकॉर्डिंग (फिल्मांकन) पूरा होने के बाद ही शुरु होता है। फिल्म प्रोडक्शन जैसे दूसरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के निर्माण के साथ साथ टेलीविजन प्रोडक्शन भी कम्प्यूटर के इस्तेमाल शुरु होने के बाद काफी तेज़ी से बदला है। कम्प्यूटर ने सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से न सिर्फ पोस्ट प्रोडक्शन को काफी सरल बनाया है, बल्कि इसकी गुणवत्ता में काफी वृद्धि भी हुई है।

पोस्ट-प्रोडक्शन की प्रक्रियाः
पोस्ट-प्रोडक्शन की प्रक्रिया अपने आप में कई अलग अलग प्रक्रियाओं को समेटे है, जिसे एक नाम दिया गया है पोस्ट-प्रोडक्शन। इसमें मुख्य रूप से ये तत्व शामिल हैं।

पटकथाः
जैसा कि हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं कि नॉन-फिक्शन यानी ग़ैर-काल्पनिक कहानियों/घटनाओं/खबरों से जुड़े टेलीविजन प्रोडक्शन में स्क्रिप्ट को अंतिम रूप इसी चरण में दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि दृश्यों को कैमरे में कैद करने के बाद अब आपके सामने घटना से जुड़े सारे दृश्य हैं, किस व्यक्ति ने सबंधित मुद्दे को लेकर क्या कहा है। निर्देशक/लेखक/रिपोर्टर ने जो विचार पहले सोचा था उसके बाद अब क्या नई बाते सामने आई है, इसी आधार पर पटकथा को अंतिम रूप सामने आता है।

यहां पर एक कौशल जिसकी ज़रुरत सबसे ज्यादा होती है, वो है दृश्यों के लिए लिखना। इस पटकथा लेखन में दृश्यों के साथ साथ उपलब्ध ध्वनियों को भी ध्यान में रखकर शब्दों को पिरोया जाता है।

दृश्य संपादन (विडियो एडिटिंग):
न्यूज़ डेस्क पर खबर लानेवालों, वृत्तचित्र निर्माण, टेलीफिल्म निर्माण और उनकी स्क्रिप्टिंग करनेवालों के लिए सबसे अहम बात ये होती है कि खबर किसी तरीके से पर्दे पर आ जाए, प्रसारित हो जाए। कुछ इफेक्ट्स, कुछ कलर कंबिनेशन, कलर करेक्शन, कुछ विजुअल प्रॉपर्टीज़ में बदलाव- वीडियो एडिटिंग के सॉफ्टवेयर्स के इस्तेमाल से जहां एक ओर स्टोरी में जान डाली जा सकती है।
सबसे पहले ये बात समझनी चाहिए कि जिस तरीके से आप खबरों की स्क्रिप्टिंग करते हुए घटनाक्रम को व्यवस्थित करके पेश करते हैं, वैसे ही वीडियो एडिटिंग के जरिए खबर से जुड़े विजुअल्स को एक ऐसे क्रम में सजाया जाता है, जिसका कुछ मतलब निकले। कहा जाता है कि टेलीविजन तो विजुअल माध्यम है, लिहाजा तस्वीरें खुद खबर की कहानी कह दें, ऐसा होना चाहिए। ये काम वीडियो एडिटिंग के जरिए संभव हो सकता है, बशर्ते तस्वीरें खुद बोलनेवाली हों और बगैर कुछ अलग से कहे, खुद ही खबर बयां कर दें।

विशेष प्रभाव (स्पेशल इफेक्ट):
पटकथा को अंतिम रूप देना, फिर विडियों संपादन, अलग अलग ध्वनियों को प्रोडक्शन में शामिल करना, इसी दौर में होता है। साथ ही इसी दौरान स्पेशल इफेक्ट यानी कम्प्यूटर की मदद से कुछ एनिमेटेड तस्वीरें बनाई जाती हैं जो प्रोडक्शन यानी टीवी पर किसी कहानी के प्रभाव में वृद्धि कर देता है। उदाहरण के लिए जनसंख्या बढ़ोत्तरी पर आधारित किसी खबर को किसी चैनल पर दिखाने के दौरान हम अलग अलग आंकड़े सामने रखते हैं। हम ये भी बताते हैं कि किस राज्य की जनसंख्या अब कितनी है। इस आंकड़ों को सामने रखने के लिए हम दृश्यों के साथ साथ ग्राफिक्स का इस्तेमाल करते हैं। ग्राफिक्स के लिए कई तरह के सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जो जल्दी और बेहतरीन ग्राफिक्स बनाए जा रहे हैं। तकनीकी शब्दों में इसे कंप्यूटर जेनरेटेड इमेजरी यानी सीजीआई कहा जाता है।

एक रेखिय संपादन (Linear editing):
अभी ज्यादा नहीं 15-16 साल पहले तक भारत में Linear editing का चलन था, जिसे आसान भाषा में इस तरह समझा जा सकता है कि एक रिकॉर्डेड टेप से सामग्री लेकर दूसरी टेप में कॉपी करना। इसके लिए एक बार में एक सोर्स वीडियो प्लेयर और एक वीडियो रिक़ॉर्डर का इस्तेमाल किया जाता था।

इस तरीके से एक बार में एक टेप से ही दूसरे टेप में विजुअल्स, या ऑडियो या दूसरे तत्वों का ट्रांसफर मुमकिन था, यानी ये प्रक्रिया एक ही सीधी रेखा के समान पूरी होती थी, इस तरह अलग-अलग टेप से एक स्टोरी के लिए विजुअल का इस्तेमाल आसान नहीं था और ये प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली थी। साथ ही इसमें गलतियों की भी संभावना काफी होती थी। वैसे ये अभ्यास और अनुभव का ही मामला है, कई लोग अब भी Linear editing को ही आसान और सरल मानते है।

नॉन-लीनियर विडियो संपादन (Non-Linear Editing):
टेलीविजन के समाचार चैनलों से लेकर बड़े बड़े टेलीविज़न प्रोडक्शन, फिल्म निर्माण में भी आजकल कंप्यूटर आधारित digital non-linear editing का चलन है। भारत में ये चलन सन 2000 के बाद से लगभग पूरे प्रसारण जगत में छा गया है। Non-linear editing में इससे अलग कई स्रोतों से एक साथ इनपुट लेने और एक समग्र आउटपुट हासिल करने की सुविधा होती है, इसीलिए इसे non-linear कहा जाता है यानी कई माध्यम स्रोतों से एक साथ एक आउटपुट हासिल करना । इसके मुख्यतः तीन पहलू हैं- Capture, Edit और Output यानी फुटेज जमा करना, उन्हें एडिट करना और एडिटेड स्टोरी हासिल करना।

वीडियो एडिटिंग की प्रक्रिया में आएं तो Velocity, Adobe Premiere, FCP, Dayang, Incite जैसे तमाम स़ॉफ्टवेयर्स हैं, जिनमें एडिटिंग की प्रक्रिया सैद्धांतिक तौर पर समान ही है।

वीडियो एडिटिंग का एक और पहलू है ‘Live editing’ या ‘Online editing’. ये प्रक्रिया Live television coverage के दौरान या फिर प्रसारण के दौरान Panel Control Room में देखी जा सकती है, जब कई सोर्स से एक साथ आ रहे वीडियो और ऑडियो का संयोजन सीधे प्रसारित होते हुए देखा जा सकता है।

सारांश
किसी विचार का पैदा होना, उस विचार को टीवी के माध्यम के अनुसार प्रस्तुत करने की संकल्पना। इस संकल्पना को तकनीकी बाध्यताओं और संभावनाओं के आधार पर लिपिबद्ध करना। जब विचार शब्दों में समा जाते हैं, तब शुरु होता है, इन शब्दों को मूर्त रूप देना, जो हम कैमरे की शूटिंग के द्वारा करते हैं। विचारों को लिपिबद्ध करते समय हमने कही जाने वाली कहानी के पात्रों को भी उकेर लिया होगा, तब बच जाता है उस चरित्र को कैमरे में समेटना। अंत में बारी आती है अब तक जो जो जमा हुआ है, उसे तकनीक के इस्तेमाल से सजा देना। लेकिन खबरिया चैनलों के अंदर कई बार तीन स्तरीय तैयारी महज़ सिर्फ एक स्तर पोस्ट प्रोडक्शन स्तर पर ही सिमट सकता है। कोई निर्देशक चाहे तो सिर्फ पहले के दृश्यों और बोले गए वक्तव्यों को इकठ्ठा कर एक बेहतरीन कार्यक्रम का निर्माण कर सकता है।

अगर आज ऐसी स्थिति संभव है तो इसका एक बड़ा कारण है, विडियो एडिटिंग की जादूई दुनिया। वीडियो एडिटर का मुख्य कार्य मोशन पिक्चर, केबल और ब्रॉडकास्ट विजुअल मीडिया उद्योग के लिए साउंटट्रेक, फिल्म तथा वीडियो का संपादन करना है। वीडियो एडिटर फिल्माए गए टेप में से विजुअल के सिक्वेंस को सिलसिलेवार तरीके से जमाने के साथ-साथ दर्शकों को आकर्षित करने के लिए जो भी आवश्यक हो, ध्वनि संगीत तथा प्रभाव को जोड़ता है। यह वीडियो एडिटर के कौशल का कमाल होता है कि वह अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता और प्रभाव का निर्धारण करता है।

ओमप्रकाश दास दूरदर्शन समाचार से जुड़े एंकर-संवाददाता और डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर हैं और पिछले 11 सालों से कई टीवी चैनलों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

Email: omsdas2006@gmail.com Mobile no.: 9717925557

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फोटो साभार: openmedia.ca

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