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विज्ञापन अब मांग पैदा करते हैं

प्रो.डॉ.सचिन बत्रा | अब तक यह माना जाता था कि विज्ञापन किसी उत्पाद या सेवा की जानकारी देने सहित प्रचार के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन आज के दौर में विज्ञापन का निर्माण और चयन मांग पैदा करने के पैमाने पर किया जाता है। इसमें तरह—तरह की युक्तियां प्रचलित हैं। जैसे सेलेब्रेटी एंडोसमेंट यानि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से विज्ञापन करवाकर मांग को बढ़ाना। जैसे इन दिनों फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन तेल से लेकर खाद्य उत्पाद ही नहीं ज्वेलरी के दर्जनों विविध विज्ञापनों में दिखाई दे रहे हैं। सेलेब्रिटी एंडोसमेंट के तहत फिल्मी सितारे, टीवी कलाकार, गायक, खिलाड़ी और मॉडलिंग की दुनियां में शोहरत प्राप्त शख्सियतों को शामिल किया जाता है। इसके पीछे तर्क यह है कि उनकी फैन फॉलोइंग का लाभ मिलता है यानि उत्पाद या सेवा का विस्तार होता है। यही नहीं आज के युवाओं को विज्ञापन के बाण से घायल करने के कुछ नवप्रयोग भी इस्तेमाल हो रहे हैं। इन्हें टीजर्स और इमोश्नल ब्लेकमेलिंग की श्रेणी में रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए 4जी से जुड़े विज्ञापन और डब्बा है डब्बा, अंकल का टीवी डब्बा के माध्यम से ठेस पहुंचाकर नए ज़माने की सेवाओं पर खर्च करने के लिए उकसाया जाता है। वहीं रिश्तों और उनकी संवेदनाओं को भुनाने के लिए हर दोस्त ज़रूरी होता है और परिवार के लिए कार ज़रूरी है जैसे विज्ञापनों के माध्यम से आर्थिक रूप से असमर्थ को भी किश्तों पर उत्पाद खरीदने को प्रोत्साहित करते हैं । दरअसल यह एक नई रणनीति है जिसमें हर आम आदमी को बड़ा खर्च करके सामाजिक प्रतिष्ठा और विशेष बनने की नसीहत दी जाती है। सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि बचत ज्ञान के इतर खर्च के विज्ञान को ऐसे समझाया जाता है कि हैसियत न होने पर भी आप मान लेते हैं कि सपनों को सच किया जा सकता है। लिहाज़ा कई उपभोक्ताओं का जीवन दीर्घकालीन इएमआई यानि लंबी किश्तो के मायाजाल में उलझ जाता है।

इसीलिए विज्ञापन को बेहद घातक या असरदार बनाने के लिए मनोवैज्ञानिक अध्ययन, सर्वेक्षण और विस्तार के लिए उत्प्रेरकों का अध्ययन किया जाता है। इसके तहत परिवार के सदस्यों की उम्र और खरीददारी के क्षेत्र में महिलाओं की निर्णायक या प्रबल प्रभावी भूमिका को ध्यान में रखते हुए विज्ञापनों की मारक क्षमता को बढ़ाया जाता है। यानि विज्ञापनों को बच्चों और महिलाओं में भावनात्मक आवेग पैदा करने वाली विषय—वस्तु सम्मिलित की जाती है। यही नहीं आज की दुनिया सोशल मीडिया पर है तो वहां भी विज्ञापनो के मारक हमलों ने बसेरा बना लिया है, क्योंकि हर जेब में मोबाइल है और एक आंकलन के मुताबिक भविष्य में सोशल मीडिया पर विज्ञापनों की भरमार होगी यानि विज्ञापन का भारी भरकम प्रतिशत सोशल मीडिया पर खर्च होगा। इन स्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि आप विज्ञापनों की मार से बचकर बचत के अपने परंपरागत फार्मूले नहीं चला पाएंगे।

अगर हम विज्ञापन के मूल में उसकी रणनीति को जानने की कोशिश करें तो जनसंचार के कई सिद्धांत आज भी सटीक लगते हैं जोकि उत्पाद या सेवा की मांग पैदा करने की तर्ज को परिभाषित करते हैं। जैसे बुलेट यानि हाइपोडर्मिक निडिल थ्योरी में कहा गया है कि पहली बार टीवी देखने वाले, अवयस्क मस्तिष्क या संचार के नए साधन के उपयोग में असमर्थ लोग टीवी की हर बात को सच मान लेते हैं। अगर इस पुराने सिद्धांत को आधार माना जाए तो बच्चे इसकी जद में आते हैं। साथ ही अगर सोशल मीडिया जैसे नए मंच को आधार माने तो वे भी वॉयरल हो रही हर बात को सच मान रहे हैं। ऐसे में कई कंपनियां अपनी प्रतियोगी कंपनियों की मांग को कम करने के लिए सोशल मीडिया पर उत्पाद या सेवा के खिलाफ ठेका देकर दुशप्रचार करवा रही हैं। हालांक इनकी सच्चाई उजागर करने के लिए भी न्यूज़ चैनल्स पर सोशल मीडिया कंटेंट की सच्चाई की पड़ताल जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए हैं लेकिन सारे कंटेंट की जांच करना तो असंभव सा काम है। जनंसचार के सिद्धांतों में कल्टीवेशन थ्योरी में यह बताया गया है कि मीडिया अपने संपर्क में आने वालों के दिमाग में किसी तयशुदा विचार का बीजारोपण करता है। यह आज भी सच है। यह बात कितनी पुख्ता है इसका अंदाज़ा लगाने के लिए आप सोचिए कि पिछले दो साल में आपको अपने घर परिवार में किसने किसी नए उत्पाद या सेवा पर चर्चा की। बच्चों ने और परिवार की महिलाओं ने टीवी से प्रेरित होकर कौनसी नई मांग के प्रति कौतुहल प्रदर्शित किया। इससे आपको खुद ही अंदाज़ा हो जाएगा कि मनोरंजन के साधन टीवी ने कैसे धीरे—धीरे खरीदने की मानसिक स्थिति को पैदा किया यानि कल्टीवेट कर दिया। इसी प्रकार यूजेस एंड ग्राटिफिकेशन थ्योरी यानि उपयोगिता एवं परितुष्टि सिद्धांत कहता है कि मीडिया कंटेंट का इस्तेमाल लोग उपयोगिता और संतुष्टि के तय मापदंड के आधार पर करते हैं। लेकिन परिवार में तो बच्चे से लेकर बड़े सभी की उपयोगिता और परितुष्टि भिन्न—भिन्न है और उसी अनुरूप वे अपनी पसंद के कार्यक्रम और उसमें शामिल विज्ञापन देख रहे हैं। ऐसे में विज्ञापन कंपनियां तो अपने तय लक्ष्य को हासिल कर ही रही हैं। इसके लिए उन्होंने आपके मनोरंजन में भी सेंध लगा दी है और आप समझ रहे है कि आप अपनी उपयोगिता और संतुष्टि को प्राप्त कर रहे हैं। जैसे सबसे पहले फिल्म स्टार खान ने अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए एक ऐसे सीरियल में पेश होकर फिल्म प्रमोशन किया जो सबसे ज्यादा देखा जाता था। इसका सच यह भी है कि ऐसा करके उन्होंने मांग पैदा करने में कामयाबी पाई और उनके बाद कई फिल्मों के प्रमोशन में इसी पैंतरे का इस्तेमाल किया गया, जो आज तक जारी है। इसके अलावा भी सीरियल और फिल्मों में भी कलाकारों और सितारों को भी अब उत्पाद या सेवा का उपयोग करते हुए दिखाया जाता है। जो मांग के ट्रेंड को बढ़ाती है। वहीं प्ले थ्योरी कहती है कि लोग अपने मनोरंजन या तनाव से मुक्ति पाने के लिए मीडिया कंटेंट में से पसंद को ही चिन्हित कर देखते हैं। लेकिन अब लोगों के इस मनोविज्ञान को भांपकर मीडिया में भी ऐसे ही कार्यक्रमों के बीच विज्ञापन की सेंधमारी देखने को मिलती है। जैसे एक अरसे से दर्शकों के बीच अपनी पैठ बना चुके शो कॉमेडी नाइट विद कपिल में फिल्म से लेकर मोबाइल और अन्य उत्पाद व सेवाओं का विज्ञापन प्रमुखता से प्रचारित होते हैं। या ऐसा कह सकते हैं कि कॉमेडी को विज्ञापन या प्रचार की आड में ही गढ़ा जा रहा है। इस प्रकार के नवप्रयोगों ने आज विज्ञापनों को मांग पैदा करने का हथियार बना दिया है। हकीकत यह है कि अब विज्ञापन, मनोरंजक कार्यक्रमों के परिधानों में पेश किए जाने लगे हैं। ऐसे में कोई थ्योरी या सिद्धांत अब नहीं बचा जो आपको मांग के इस हमले से बचे रहने की तकनीक सिखा सके। क्योंकि हम अब ट्रेडिशनल नहीं रहे मॉडरेट हो गए हैं।

लेखक परिचयः 
प्रोफेसर (डॉ.) सचिन बत्रा एमिटी विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन में डीन और डॉयरेक्टर पब्लिक रिलेशन कार्यरत हैं।उन्होंन जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में एमए और पीएचडी की है, साथ ही फ्रेंच में डिप्लोमा भी प्राप्त किया है।उन्होंने आरडब्लूजेयू और इंटरनेश्नल इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म, ब्रेडनबर्ग, बर्लिन के विशेषज्ञ से पत्रकारिता का प्रशिक्षण लिया है।वे दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और दैनिकनवज्योति जैसे समाचार पत्रों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं और उन्होंने राजस्थान पत्रिका की अनुसंधान व खोजी पत्रिका नैनो में भी अपनी सेवाएं दी हैं। इसकेअलावा वे सहारा समय के जोधपुर केंद्र में ब्यूरो इनचार्ज भी रहे हैं। इस दौरान उनकी कई खोजपूर्ण खबरें प्रकाशित और प्रसारित हुई जिनमें सलमान खान का हिरण शिकारमामला भी शामिल है। उन्होंने एक तांत्रिका का स्टिंग ऑपरेशन भी किया था।

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