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हर ख़बर सच नहीं, हर सच ख़बर नहीं

सुभाष धूलिया|

आज यह कहा जाता है कि मानव सभ्यता सूचना युग में प्रवेश कर रही है। पिछले 50 वर्षों में संचार और सूचना के क्षेत्र में एक क्रांति आई है। आज दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली किसी घटना की जानकारी हमे चंद पलों में मिल जाती है। हमारे जीवन में समाचार माध्यमों का महत्व बहुत बढ़ गया है। देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसकी अधिकांश जानकारियां हमें समाचार माध्यमों से मिलती हैं। यह भी कह सकते हैं कि हमारे प्रत्यक्ष अनुभव  से बाहर की दुनिया के बारे में हमे अधिकांश जानकारियां समाचार माध्यमों द्वारा दिए जाने वाले समाचारों से ही मिलती है। इसलिए प्रश्न पैदा होता है- समाचार क्या हैï?

देश – दुनिया में हजारों घटनाएं होतीं हैं पर चंद घटनाएं ही समाचार बनती हैं। हर घटना के अनेक पक्ष होते हैं पर कुछ पक्ष हाईलाइट होते हैं और कुछ की अनदेखी होती है। हर घटना में बहुत  तथ्य होते हैं पर कुछ तथ्य ही समाचार बन पातें हैं। समाचारों और तथ्यों की यह दुनिया जटिल है। क्या समाचार बने और क्या  न बनें – बनने और न बनने की  यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे समझना हर पत्रकार की लिए आवश्यक है। किस घटना को समाचारीय माना जाये और किसे नहीं ? और क्यों ? समाचार में कितना सच छिपा है यह निर्भर करता है कि किन घटनाओं  का चयन किया गया और इन घटनाओं में निहित किन तथ्यों का  चयन किया गया?

समाचार क्या हैï? पत्रकारिता के उद्भव और विकास के पूरे दौर में इस प्रश्न का सर्वमान्य उत्तर कभी किसी के पास नहीं रहा। आज पत्रकारिता और संपूर्ण मीडिया जगत की तेजी से बदलती तस्वीर से इस प्रश्न का उत्तर और भी जटिल होता जा रहा है। लेकिन हर खास परिस्थिति और वातावरण में चंद घटनाएं ऐसी होती हैं जो समाचार बनने की कसौटी पर खरी उतरती हैं और उससे कहीं अधिक बड़ी संख्या ऐसी घटनाओं की होती है जो समाचार नहीं बन पाती। यहां समाचार से आशय समाचार माध्यमों में प्रकाशित- प्रसारित किए जाने वाले ‘‘समाचारों’’ से है।

लेकिन क्या हर घटना, समाचार है? क्या वह हर बात समाचार है जिसके बारे में पहले जानकारी नहीं थी? क्या वह सब समाचार है जिसके बारे लोग जानना चाहते हैं या जिसके बारे में लोगों को जानना चाहिए? क्या समाचार वही है जिसे एक पत्रकार समाचार मानता है? क्या वही सब समाचार हैं जिन्हें मीडिया के मालिक और संचालक समाचार मानते हैं और जिनके बारे में वे अपने ही तरह के अनुसंधान के आधार पर यह मान लेते हैं कि लोग यही चाहते हैं इसलिए यही समाचार है? समाचार निश्चय ही अपने समय के विचार, तथ्य और समस्याओं के बारे में ही लिखे जाते हैं। अनेक विद्वानों ने अपने ही ढंग से समाचार की विशेषताओं का उल्लेख किया है। हर प्रेरक और उत्तेजित कर देने वाली सूचना समाचार है। समय पर दी जाने वाली हर सूचना समाचार का रूप अख्तियार कर लेती है। किसी घटना की रिपोर्ट ही समाचार है। समाचार जल्दी में लिखा गया है। वह सब समाचार है जो आने वाले कल का इतिहास है।

देश – दुनिया में हजारों घटनाएं होतीं हैं पर चंद घटनाएं ही समाचार बनती हैं। हर घटना के अनेक पक्ष होते हैं पर कुछ पक्ष हाईलाइट होते हैं और कुछ की अनदेखी होती है। हर घटना में बहुत  तथ्य होते हैं पर कुछ तथ्य ही समाचार बन पातें हैं। समाचारों और तथ्यों की यह दुनिया जटिल है। क्या समाचार बने और क्या  न बनें बनने और न बनने की  यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे समझना हर पत्रकार की लिए आवश्यक है।

समाचार निश्चय ही कोई किस्सा-कथानक वृत्तांत और रिपोर्ट है। इसके संप्रेषण के अनेक रूप हो सकते हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को समाचार का संप्रेषण कर सकता है। इसके अलावा समाचार अनेक तरह के समाचार माध्यमों से भी प्रकाशित और प्रसारित किए जाते हैं,

एक पत्रकार के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि क्या उसने समाचार को इस तरह लिखा और प्रस्तुत किया कि वह वही अर्थ और संदर्भ अपने पाठक/दर्शक/श्रोता को प्रेषित कर पाया जो वह चाहता था। अक्सर ऐसा नहीं होता और इन दिनों तो अधिकधिक ऐसा नहीं हो रहा है। समाचार में संभावित सूचनाओं या तथ्यों के स्रोत क्या हैं इससे भी भारी अंतर पैदा होता है। सूचना स्रोत के भी सूचना देने के पीछे कुछ मकसद हो सकते हैं और होते हैं। इन मकसदों का चरित्र और स्वरूप क्या है- इस पर भी समाचार की सत्यता निर्भर करती है। अनेक मौकों पर स्रोत गलत सूचनाएं भी देते हैं जिससे समाचार निहित स्वार्थों की पूर्ति में ही अधिक सहायक होते हैं और सच्ची तस्वीर लोगों तक नहीं आ पाती।

एक पत्रकार ही किसी भी समाचार के आकार और उसकी प्रस्तुति का निर्धारण करता है। इसी तरह रेडियो और टेलीविजन में प्रस्तुतकर्ता समाचार में अपनी आवाज और हाव-भाव से भी बहुत कुछ कह सकता है। एक समाचारपत्र में एक समाचार मुख्य समाचार (लीड स्टोरी) हो सकता है और किसी अन्य समाचारपत्र में वही समाचार भीतर के पृष्ठï पर कहीं एक कॉलम का समाचार भी हो सकता है। एक टेलीविजन चैनल के लिए अमिताभ बच्चन के जन्मदिन का समाचार पहला मुख्य समाचार हो सकता है तो संभव है कि कोई अन्य चैनल इराक में युद्ध को अपनी मुख्य खबर बनाने को प्राथमिकता दे। इस तरह के अनेक कारण और कारक हैं जो समाचार रूपी संदेश के प्राप्तकर्ता को इसकी स्वीकार्यता का स्तर तय करते हैं। किसी भी पाठक/दर्शक/श्रोता की अपनी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठïभूमि होती है जिनसे उसके अपने मूल्य उपजते हैं। इसलिए हर समाचार को वह अपने ही ढंग से स्वीकार या अस्वीकार करता है। सच्चाई का उसका अपना ही एक पैमाना होता है जिस पर वह हर समाचार/संदेश की माप-तौल करता है।

समाचार के उपभोक्ता अपने मूल्यों, रुचियों और दृष्टिïकोणों में बहुत विविधताएं और भिन्नताएं लिए होते हैं। इन्हीें के अनुरूप उनकी प्राथमिकताएं भी निर्धारित होती हैं। हाल ही के वर्षों में समाचारों का भी एक बाजार तैयार हुआ है और एक खास बाजार के लिए एक खास समाचार होता है। एक आदर्श स्थिति में एक पत्रकार के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती होती है कि किस तरह वह अपने ‘उपभोक्ता’ समूह (ऑडिएंस) के व्यापकतम तबके को संतुष्टï कर सके।

समाचार की एक सर्वमान्य विशेषता यह है कि यह किसी विचार, घटना या समस्या का विवरण है। लोग सोचते हैं और विचार उपजते हैं। विभिन्न संचार माध्यमों के जरिए जब विचारों का आदान-प्रदान होता है तो हलचल पैदा होती है। इनसे नए उत्पाद पैदा हो सकते हैं। कोई नई सेवा अस्तित्व में आ सकती है। लोगों को कोई नया मकसद मिल सकता है। इसे अमन-शांति और टकराव की नई सीमाओं का निर्धारण हो सकता है। इनसे शांति और युद्ध के रास्ते बदल सकते हैं।

समाचार की परिभाषा

लोग आमतौर पर अनेक काम मिलजुल कर ही करते हैं। सुख-दु:ख की घड़ी में वे साथ होते हैं। मेलों और उत्सवों में वे साथ होते हैं। दुर्घटनाओं और विपदाओं के समय वे साथ ही होते हैं। इन सबको हम घटनाओं की श्रेणी में रख सकते हैं। फिर लोगों को अनेक छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गांव, कस्बे या शहरी की कॉलोनी में बिजली-पानी के न होने से लेकर बेरोजगारी और आर्थिक मंदी जैसी समस्याओं से उन्हें जूझना होता है। विचार, घटनाएं और समस्याओं से ही समाचार का आधार तैयार होता है। लोग अपने समय की घटनाओं, रुझानों और प्रक्रियाओं पर सोचते हैं। उन पर विचार करते हैं और इन सब को लेकर कुछ करते हैं या कर सकते हैं। इस तरह की विचार मंथन की प्रक्रिया के केंद्र में इनके कारणों, प्रभाव और परिणामों का संदर्भ भी रहता है। समाचार के रूप में इनका महत्त्व इन्हीं कारकों से निर्धारित होना चाहिए। किसी भी चीज का किसी अन्य पर पडऩे वाले प्रभाव और इसके बारे में पैदा होने वाली सोच से ही समाचार की अवधारणा का विकास होता है।  किसी भी घटना, विचार और समस्या से जब काफी लोगों का सरोकार हो तो यह कह सकते हैं कि यह समाचार बनने के योग्य है।

समाचार बनने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू इसकी तथ्यात्मकता है। किसी की कल्पना की उड़ान कोई समाचार नहीं है। समाचार एक वास्तविक घटना है और एक पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती या दायित्व यह है कि कैसे वह ऐसे तथ्यों का चयन करे, जिससे वह घटना उसी रूप में पाठक या उपभोक्ता के  सामने पेश की जा सके जिस तरह वह घटी। इस तरह के तथ्यों यानि वे तथ्य जो इस घटना के समूचे यथार्थ का प्रतिनिधित्च करते हैं, का चयन करने के लिए एक खास तरह का बौद्धिक कौशल चाहिए। इस तरह का बौद्धिक कौशल होने पर ही हम किसी को प्रोफेशनल पत्रकार कह सकते हैं।

किसी भी घटना, विचार या समस्या का समाचार बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि वह नया हो। कहा भी जाता है ‘न्यू’ है इसलिए ‘न्यूज’ है। समाचार वही है जो ताजी घटना के बारे में जानकारी देता है। समाचार का नया होना आवश्यक है। वह अपने ऑडिएंस के लिए नया है होना चाहिए। एक दैनिक समाचारपत्र के लिए आम तौर पर पिछले 24 घंटों की घटनाएं ही समाचार होते हैं। एक चौबीस घंटे के टेलीविजन और रेडियो चैनल के लिए तो समाचार जिस तेजी से आते हैं उसी तेजी से अनेक समाचार बासी भी होते चले जाते हैं।

किसी विचार, घटना और समस्या के समाचार बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि लोगों की उसमें दिलचस्पी है। वे इसके बारे में जानना चाहते हों। कोई भी घटना समाचार तभी  बन सकती है, जब लोगों का एक बड़ा तबका इसके बारे में जानने में रुचि रखता हो। स्वभावत: हर समाचार संगठन अपने लक्ष्य समूह (टार्गेट ऑडिएंस) के संदर्भ में ही लोगों की रुचियों का मूल्यांकन करता है। लेकिन हाल के वर्षों में लोगों की रुचियों और प्राथमिकताओं में भी तोड़-मरोड़ की प्रक्रिया काफी तेज हुई है और लोगों की मीडिया आदतों में भी परिवर्तन आ रहे हैं। इसलिए यह भी कह सकते हैं कि रुचियां कोई स्थिर चीज नहीं हैं, गतिशील हैं। कई बार इनमें परिवर्तन आते हैं तो मीडिया में भी परिवर्तन आता है। लेकिन आज मीडिया लोगों की रुचियों में परिवर्तन लाने में अधिकाधिक भूमिका अदा कर रहा है। इसलिए ऐसे अनेक समाचार आज उनके लिए रुचिकर हो सकते हैं जिनसे कल तक वे अपने आपको नहीं जोड़ते थे। संक्षेप में किसी घटना, तथ्य, विचार या समस्या समाचार में लोगों की रुचि का होना उसके समाचार बनने के लिए आवश्यक शर्त है।

इस विवेचन के उपरांत अब हम समाचार को इस तरह परिभाषित कर सकते हैं :

समाचार किसी भी ताजी घटना, विचार या समस्या का विवरण या रिपोर्ट है जिसमें अधिक से अधिक लोगों की रुचि है।

 समाचार की इस परिभाषा में शायद कोई विवाद न हो। इसे एक तरह से समाचार की सर्वमान्य परिभाषा कहा जा सकता है। लेकिन लोगों की रुचि किन घटनाओं, विचारों या समस्याओं (आगे इसके लिए केवल घटनाओं शब्द का प्रयोग किया गया है) में है? यह रुचि क्यों होती है और इसमें परिवर्तन कैसे और क्यों आते हैं? लोगों की रुचियों और प्राथमिकताएं ही समाचार जगत और मीडिया पर होने वाले तमाम विचार-विमर्श और अनुसंधान के केंद्र में होती है। इस दृष्टिïकोण से समाचार की परिभाषा में विस्तार करना आवश्यक हो जाता है।

समाचार किसी भी ताजी घटना, विचार या समस्या की रिपोर्ट है जिसमें लोगों की रुचि हो लेकिन विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल में समाचार की अवधारणाएं और अर्थ भी भिन्न हो जाते हैं।

समाचारीय महत्व

इन तमाम विविधताओं और भिन्नताओं के बावजूद किसी घटना का अपना एक समाचारीय महत्व होता है और जिसे अनेक कारक प्रभावित करते हैं। एक घटना को एक समाचार के रूप में किसी समाचार संगठन में स्थान पाने के लिए इसका समय पर सही स्थान यानि समाचार कक्ष में पहुंचना आवश्यक है। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि उसका समायानुकूल होना जरूरी है। आज की तारीख के एक दैनिक समाचारपत्र के लिए वे घटनाएं समय पर हैं जो कल घटित हुई हैं। आमतौर पर एक दैनिक समाचारपत्र के हर संस्करण की अपनी एक डेडलाइन (समय सीमा) होती है जब तक के समाचारों को वह कवर कर पाता है। मसलन अगर एक प्रात:कालीन दैनिक समाचारपत्र कल रात 12 बजे तक के समाचार कवर करता है तो अगले दिन के संस्करण के लिए 12 बजे रात से पहले के चौबीस घंटे के समाचार समयानुकूल होंगे। इसी तरह 24 घंटे के एक टेलीविजन समाचार चैनल के लिए तो हर पल ही डेडलाइन है और समाचार को सबसे पहले टेलीकास्ट करना ही उसके लिए दौड़ में आगे निकलने की सबसे बड़ी चुनौती है।

समाचार बनने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पहलू इसकी तथ्यात्मकता है। किसी की कल्पना की उड़ान कोई समाचार नहीं है। समाचार एक वास्तविक घटना है और एक पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती या दायित्व यह है कि कैसे वह ऐसे तथ्यों का चयन करे, जिससे वह घटना उसी रूप में पाठक या उपभोक्ता के  सामने पेश की जा सके जिस तरह वह घटी। इस तरह के तथ्यों यानि वे तथ्य जो इस घटना के समूचे यथार्थ का प्रतिनिधित्च करते हैं, का चयन करने के लिए एक खास तरह का बौद्धिक कौशल चाहिए। इस तरह का बौद्धिक कौशल होने पर ही हम किसी को प्रोफेशनल पत्रकार कह सकते हैं।

इस तरह एक चौबीस घंटे के टेलीविजन समाचार चैनल, एक दैनिक समाचारपत्र, एक साप्ताहिक और एक मासिक के लिए किसी समाचार की समय सीमा का अलग-अलग मानदंड होना स्वाभाविक है, कहीं समाचार तात्कालिक है कहीं सामयिक तो कहीं समकालीन भी हो सकता है। इन तथ्यों के महत्व का निर्धारण समाचार माध्यम और पत्रकारिता लेखन के स्वभाव से होता है। यह भी कहा जा सकता है कि 24 3 7 टेलीविजन माध्यम तात्कालिक अधिक होता है तो एक समाचारपत्र का लेख सामयिक या समकालीन अधिक हो सकता है।

किसी भी समाचार संगठन के लिए किसी समाचार के महत्व का मूल्यांकन उस आधार पर भी किया जाता है कि वह घटना उसके कवरेज क्षेत्र और पाठक/दर्शक/श्रोता समूह के कितने करीब हुई। हर घटना का समाचारीय महत्व उसकी स्थानीयता से भी निर्धारित होता है। सबसे करीब वाला ही सबसे प्यारा भी होता है। यह मानव स्वभाव है और स्वाभाविक भी है कि लोग उन घटनाओं के बारे में जानने के लिए अधिक उत्सुक होते हैं जो उनके करीब होती हैं। इसका एक कारण तो करीब होना है और दूसरा कारण यह भी है कि इसका असर भी करीब वालों पर ही अधिक पड़ता है। मसलन किसी एक खास कॉलोनी में चोरी-डकैती की घटना के बारे में यहां के लोगों की रुचि होना स्वाभाविक है। रुचि इसलिए कि घटना उनके करीब हुई है और इसलिए भी कि इसका संबंध स्वयं उनकी अपनी सुरक्षा से है। अपने आस-पास होने वाली घटनाओं के प्रति लोगों की अधिक रुचि से हम सब वाकिफ हैं और समाचारों और समाचार संगठनों का अधिकाधिक स्थानीयकरण इसी रुचि को भुनाने का परिणाम है।

इसके अलावा किसी घटना के आकार से भी इसका समाचारीय महत्व निर्धारित होता है। किस कारण कोई समाचार महत्त्वपूर्ण है किसके कारण कोई अन्य समाचार महत्वपूर्ण है। अनेक मौकों पर किसी घटना से जुड़े लोगों के महत्त्वपूर्ण होने से भी इसका समाचारीय महत्त्व भी बढ़ जाता है। स्वभावत: प्रख्यात और कुख्यात अधिक स्थान पाते हैं। प्रधानमंत्री को जुखाम भी हो तो समाचार है और अन्य कोई कितने ही बुखार से ग्रसित क्यों न हों शायद समाचार नहीं बन पाए। प्रसिद्ध लोगों की छोटी-मोटी गतिविधियां भी समाचार बन जाती हैं। याद कीजिए सलमान खान पर विवेक ओबराय का गुस्सा फूटना कितनी बड़ी खबर बनी थी।

इसके अलावा घटना के आकार से आशय यही है कि इससे कितने सारे लोग प्रभावित हो रहे हैं या कितने बड़े भू भाग में पहुंचा है आदि। किसी घटना का ‘प्रभाव’ भी इसके महत्त्व को निर्धारित करता है। सरकार के किसी निर्णय से अगर दस लोगों को लाभ हो रहा हो तो यह इतनी बड़ा समाचार नहीं जितना कि अगर इससे लाभान्वित होने वाले लोगों की संख्या एक लाख हो। सरकार अनेक नीतिगत फैसले लेती हैं जिनका प्रभाव तात्कालिक नहीं होता लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं और इसी दृष्टिï से इसके समाचारीय महत्त्व को आंका जाना चाहिए।

उपभोक्ता वर्ग

आमतौर पर हर समाचार का एक खास पाठक/दर्शक/श्रोता वर्ग होता है। किसी समाचारीय घटना के इस वर्ग से भी इसका महत्त्व तय होता है। किसी खास समाचार का ऑडिएंस कौन हैं और इसका आकार कितना बड़ा है। इन दिनों ऑडिएंस का समाचारों के महत्त्व पर प्रभाव बढ़ता जा रहा है। अतिरिक्त क्रय शक्ति वाले सामाजिक तबकों, जो विज्ञापन उद्योग के लिए बाजार होते हैं, में अधिक पढ़े जाने वाले समाचारों को अधिक महत्त्व मिलता है।

हर समाचारीय घटना का महत्त्व आंकने के लिए इसके संदर्भ का विशेष महत्त्व होता है। खास तौर से महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों द्वारा दिए गए बयानों और कथनों का महत्त्व उनके संदर्भ से ही तय किया जा सकता है।

अनेक अन्य मौकों पर महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के बयान किसी संदर्भ में ही होते हैं और इस संदर्भ को जाने-समझे बिना कोई पत्रकार इस बयान के समाचारीय महत्त्व को नहीं आंक सकता। संदर्भ को समझने के लिए विषय की समझ जरूरी है। उदाहरण के लिए दुनिया के लगभग सभी देश आतंकवाद की भत्र्सना करते हैं। लेकिन जब भारत, इस्राइल, फिलिस्तीनी, अमेरिका या पाकिस्तान आतंकवाद की भत्र्सना करते है तो इनका अर्थ भिन्न होता है और इसे इसके संदर्भ में समझना होता है।

इन बयानों को इनके संदर्भ से काटकर कभी भी उचित समाचारीय महत्त्व नहीं दिया जा सकता। भारत की सबसे बड़ी चिंता कश्मीरी आतंकवाद है जो समय-समय पर देश के अन्य हिस्सों में भी वारदातें करता है मसलन संसद पर हमला। कश्मीर आतंकवाद को जिंदा रखने में पाकिस्तान की अहम भूमिका है। पाकिस्तान के समर्थन के बिना कश्मीर में आतंकवाद चलाया ही नहीं जा सकता। फिलिस्तीनीयों के लिए इस्राइल एक आतंकवादी राज्य और वहां की सरकार आतंकवादी हमले करती है। इस्राइल का मानना है कि वह फिलीस्तीनी आतंकवाद का शिकार है और उसकी हर सैनिक कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ होती है। अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है और इस युद्ध में पाकिस्तान अमेरिका का सामरिक सहयोगी है। समूचे इस्लामी और अरब राज्यों में अमेरिकी रणनीति में पाकिस्तान की अहम भूमिका है। रूस को उस आतंकवाद की चिंता है जो चेचन्या में इसे परेशान किए हुए है। नेपाल की चिंता शायद माओवादी आतंकवादी हैं।

इन तमाम संदर्भों में ही उपरोक्त संयुक्त बयानों के समाचारीय महत्त्व, उनमें लेखन, संपादन, शीर्षक आदि का चयन किया जा सकता है। जो पत्रकार इन संदर्भों से वाकिफ नहीं हैं वे इन घटनाओं के समाचार लिखने, संपादित करने और इनके महत्त्व को आंकने में विफल होने के लिए ही बाध्य है।

नीतिगत ढांचा

किसी समाचार संगठन की कोई नीति होने का मतलब लेखन की स्वतंत्रता पर अंकुश है। अगर किसी मसले पर समाचार संगठन की कोई नीति है, तो इसका मतलब वह इस नीति के अनुसार ही समाचार प्रकाशित करेगा और विचारों की अभिव्यक्ति करेगा। इसलिए कोई भी समाचार संगठन कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि व्यापक राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर उसकी कोई नीति है। लेकिन भले ही किसी सुगठित रूप में नीति न हो लेकिन हर समाचार संगठन मोटे तौर पर हर मुद्दे पर किसी नीति पर तो चलता ही है और अनेक कारक इस नीति का निर्धारण करते हैं। अनेक संपादक इसे ‘संपादकीय लाइन’ कहते हैं। मसलन समाचारपत्रों में संपादकीय होते हैं जिन्हें संपादक और उनके सहायक संपादक लिखते हैं। संपादकीय बैठक में तय किया जाता है कि किसी विशेष दिन कौन-कौन सी ऐसी घटनाएं हैं जो संपादकीय हस्तक्षेप के योग्य हैं। इन विषयों के चयन में काफी विचार-विमर्श होता है।  फिर उनके निर्धारण के बाद क्या संपादकीय स्टैंड हो क्या लाइन ली जाए यह भी तय किया जाता है और विचार-विमर्श के बाद संपादक तय करते हैं क्या रुख होगा या  क्या लाइन होगी। यही स्टैंड और लाइन एक समाचारपत्र की नीति भी होती है।

वैसे तो एक समाचारपत्र में अनेक तरह के लेख और समाचार छपते हैं और आवश्यक नहीं है कि वे संपादकीय नीति के अनुकूल हों। समाचारपत्र में विविधता और बहुलता का होना अनिवार्य है। संपादकीय एक समाचारपत्र की विभिन्न मुद्दों पर नीति को प्रतिबिंबित करते हैं। निश्चय ही समाचार कवरेज और लेखों-विश्लेषणों में संपादकीय की नीति का पूरा का पूरा अनुसरण नहीं होता लेकिन कुल मिलाकर संपादकीय नीति का प्रभाव किसी भी समाचारपत्र के समूचे व्यक्तित्व पर पड़ता है। अगर कोई समाचारपत्र भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का कट्टïर समर्थक है तो वह उन तमाम समाचारों को अधिक महत्त्व देने की कोशिश करेगा जो उसके पक्ष में जाती हैं। समाचारों का चयन और डिस्पले भी समाचारपत्र की नीतियों को प्रतिबिंबित करते हैं। अक्सर ऐसा देखने में आता है कि संपादकीय में कोई समाचारपत्र किसी खास राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक पार्टी या गठजोड़ के करीब हो तो समाचारों के चयन और प्रस्तुतीकरण में भी यह इन्हीें के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।

पिछले कुछ वर्षों में विज्ञापन उद्योग का दबाव भी काफी बढ़ गया है। मुक्त बाजार व्यवस्था के तेज विस्तार तथा उपभोक्तावाद के फैलाव के साथ विज्ञापन उद्योग का जबर्दस्त विस्तार हुआ है। समाचार संगठन अब कारोबार और उद्योग हो गए हैं और विज्ञापन उद्योग पर उनकी निर्भरता बहुत बढ़ चुकी है। इसका भी संपादकीय/समाचारीय सामग्री पर गहरा असर पड़ रहा है।

समाचार संगठन की नीतियों से किसी भी समाचार संगठन की समाचार की अवधारणाएं निर्धारित होती हैं। इसी से उसकी संपादकीय-समाचारीय सामग्री का चरित्र और स्वरूप तय होता है। इसके बाद स्थान और पत्रकारीय महत्त्व के आधार पर किसी समाचार संगठन में समाचार अपना स्थान पाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि सैद्धांतिक रूप से किसी समाचारपत्र के संपादकीय ही इसकी स्टैंड, लाइन या नीति को दर्शाते हैं और बाकी लेख, विश्लेषण और बाइलाइन वाले समाचारों में वैचारिक विविधता होती है। एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में तमाम विविधताओं को प्रतिबिंबित करने के बावजूद समाचार संगठन अपनी संपादकीय नीति के अनुसार ही समाचारों को भी छापता है।

निश्चय ही समाचार संगठन किसी व्यवस्था के तहत या इसके भीतर ही काम करते हैं। एक दृष्टि से मुख्यधारा के समाचार संगठन किसी भी व्यवस्था की प्रभुत्वकारी और शासक विचारधारा के ही प्रवक्ता होते हैं और इस दायरे के भीतर ही राजनीतिक विविधता का सृजन होता है। इसके अलावा समाचार संगठन के स्वामित्व से भी इसकी नीतियां तय होती हैं। पिछले कुछ समय से दुनिया भर में समाचार संगठनों के स्वामित्व के संकेंद्रीकरण के प्रभावों पर काफी चर्चा हो रही है। समाचार सामग्री और प्रस्तुतीकरण पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। यह तो तय है कि कोई भी समाचार संगठन अपने मालिक और उसके विचारों के खिलाफ नहीं जा सकता।

उसके बाद पिछले कुछ वर्षों में विज्ञापन उद्योग का दबाव भी काफी बढ़ गया है। मुक्त बाजार व्यवस्था के तेज विस्तार तथा उपभोक्तावाद के फैलाव के साथ विज्ञापन उद्योग का जबर्दस्त विस्तार हुआ है। समाचार संगठन अब कारोबार और उद्योग हो गए हैं और विज्ञापन उद्योग पर उनकी निर्भरता बहुत बढ़ चुकी है। इसका भी संपादकीय/समाचारीय सामग्री पर गहरा असर पड़ रहा है। समाचार संगठन पर अन्य आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव भी होते हैं। किसी छोटे स्थान से छपने वाला कोई समाचारपत्र वहां के स्थानीय माफिया के खिलाफ कुछ नहीं छाप सकता। इसी तरह के कई अन्य दबाव भी इसकी नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बाद जो स्पेस या स्थान बचता है वह पत्रकारिता और पत्रकारों की स्वतंत्रता का है। यह उनके प्रोफेशनलिज्म पर निर्भर करता है कि वे इस स्पेस का किस तरह सबसे प्रभावशाली ढंग से उपयोग कर पाते हैं। इस पत्रकारीय स्पेस पर भी निरंतर हमले होते रहते हैं और इसे छोटा करने का प्रयास होता रहता है।

पत्रकार और उसके प्रोफेशनलिज्म के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस स्पेस की हिफाजत करे और इसका अधिकतम इस्तेमाल से इसके विस्तार का निरंतर प्रयास करता रहे। कई बार किन्हीं खास परिस्थितियों में भी यह स्पेस कम-ज्यादा होता रहता है। उन्माद की परिस्थितियों में पत्रकारीय स्वतंत्रता का जबर्दस्त ह्रïास होता है चाहे वह किसी भी तरह का उन्माद क्यों न हो। 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका का उदाहरण सबसे सामने है जहां उग्र राष्टï्रवाद इस कदर हावी हो गया था कि मीडिया में असहमति का स्थान बहुत छोटा हो गया था। अनेक अवसरों पर सामाजिक वातावरण भी संपादकीय सामग्री को प्रभावित करता है। सामाजिक तनाव की स्थिति में यह प्रभाव अधिक गहरा हो जाता है।

महत्वपूर्ण जानकारियां

अनेक ऐसी सूचनाएं भी समाचारीय होती हैं जिनका समाज के किसी विशेष तबके के लिए कोई महत्त्व हो सकता है। ये लोगों की तात्कालिक सूचना आवश्यकताएं भी हो सकती हैं। मसलन स्कूल कब खुलेंगे, किसी खास कॉलोनी में बिजली कब बंद रहेगी, पानी का दबाव कैसा रहेगा आदि। इस संदर्भ में कुड क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनमें सूचनाएं देने के अपने ही खतरे हैं। कम से कम चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अनेक बार कुछ तरह की सूचनाएं गलतफहमियां पैदा करती हैं। यह सर्वविदित है कि अनुसंधान अनेक तरह की अवधारणाओं पर आधारित होते हैं और वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर अधकचरे ज्ञान को इसमें निष्कर्ष के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा दुर्घटनाओं के मामले में भी हताहतों के नाम की जानकारी देने का अपना ही महत्त्व है। हालांकि अधिकांश मौकों पर नाम पता करना मुश्किल काम होता है।

समाचार लेखन के सिद्धांत

समाचार लेखन में घटनाओं और इनसे संबंधित तथ्यों के चयन की प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। देश-दुनिया में रोज हजारों-लाखों घटनाएं घटती हैं लेकिन इनमें से कुछ ही समाचार बन पाती हैं। यूं तो हमने किसी घटना के समाचारीय होने के कारकों का भी जिक्र किया है लेकिन समाचार जगत की चयन की प्रक्रियाएं इतनी विविध, कठिन और जटिल हैं कि उनके कारणों को स्पष्टï रूप से चिन्ह्ति करना लगभग असंभव है।

समाचार लेखन के बारे में भी मोटे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि जब हम किसने, क्या, कब और कहां का उत्तर दे रहे होते हैं तो कहा जा सकता है कि यहां तथ्य ही केंद्र में हैं। हालांकि यहां इस बात का उल्लेख करना भी जरूरी है कि यह भी एक अहम मसला है कि एक पत्रकार किन तथ्यों का चयन करता है और किस आधार पर यह चयन किया जाता है। कौन सी अवधारणाएं और मूल्य तथ्यों के चयन की इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।

समाचारों के चयन और फिर समाचारों में शामिल किए जाने वाले तथ्यों के चयन में एक पत्रकार को इस बात से पूरी तरह से सचेत होना चाहिए कि इन दो कार्यों के कारण वह एजेंडा का निर्धारण कर रहा है। समाज और देश के सामने उन ज्वलंत मुद्दोंको पेश कर रहा है और इस पर कैसे सोचा जाए यह भी बता रहा है। लेकिन इस प्रक्रिया में अगर लोगों के वास्तविक मसलों और मीडिया के मसलों के बीच खाई अधिक चौड़ी होगी, तो मीडिया और समाचार अपनी साख खो बैठेंगे।

लेकिन जब एक पत्रकार (या कोई भी) क्यों और कैसे का उत्तर देता है तो यहां समाचार लेखन में व्याख्या के तत्त्व का प्रवेश हो जाता है। चंद घटनाएं ऐसी होती हैं कि उनमें सपाट तथ्य होते हैं और संभव है कि ‘क्यों’ और ‘कैसे’ में भी दृष्टिïकोण (परसेप्शन) में कोई भिन्नता न हो। लेकिन राजनीति, अर्थशास्त्र और समाज से संबंधित अनेक ऐसे मसले हैं जिन्हें कोई भी व्यक्ति किसी तटस्थ स्थान से देख ही नहीं सकता क्योंकि ऐसा कोई तटस्थ स्थान होता ही नहीं है। वह एक मूल्यबोध के साथ ही इन मसलों को देखता है और उसकी निगाह स्वयं अपने दृष्टिïकोण और मूल्यों तथा पूर्वाग्रहों से प्रभावित होती है। कहा जाता है कि आमतौर पर हम पहले देखकर परिभाषित नहीं करते हैं बल्कि पहले हम परिभाषित करते हैं और फिर देखते हैं। इस तरह हर यथार्थ की एक छवि हमारे मस्तिष्क में होती है और हम इस यथार्थ को अपनी इस छवि के अनुरूप ही देखने पर अड़े हो सकते हैं।

इस तरह संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि सबसे पहले तो हजारों-लाखों घटनाओं में से चंद घटनाओं को समाचार के रूप से निर्धारित कर यह तय किया जाता है कि लोगों को किन मुद्दों के बारे में सोचना चाहिए अर्थात जो मुद्दे समाचार हैं वही ज्वलंत हैं और उन्हीं पर चर्चा और बहस होनी चाहिए। फिर इन समाचारों में ही तथ्यों का चयन और व्याख्या इस तरह से की जाती है कि उसके सबसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर ही रोशनी डाली जा सकती है। इस तरह यह भी कहा जा सकता है कि मीडिया लोगों को यह भी बताता है कि उस विषय के बारे में किस तरह सोचना चाहिए। इसलिए समाचारों के चयन और फिर समाचारों में शामिल किए जाने वाले तथ्यों के चयन में एक पत्रकार को इस बात से पूरी तरह से सचेत होना चाहिए कि इन दो कार्यों के कारण वह एजेंडा का निर्धारण कर रहा है। समाज और देश के सामने उन ‘ज्वलंत मुद्दों’ को पेश कर रहा है और इस पर कैसे सोचा जाए यह भी बता रहा है। लेकिन इस प्रक्रिया में अगर लोगों के वास्तविक मसलों और मीडिया के मसलों के बीच खाई अधिक चौड़ी होगी, तो मीडिया और समाचार अपनी साख खो बैठेंगे। साख को बचाना समाचार लेखन का सर्वोत्तम सिद्धांत है। समाचारों की साख को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित सिद्धांतों का पालन करना जरूरी है।

         यथार्थता (Accuracy)

         वस्तुपरकता (Objectivity)

         निष्पक्षता (Impartiality)

         संतुलन (Balance)

         स्रोत (Attribution-Sourcing)

जैसी कि पहले चर्चा की गई है कि तथ्यों का चयन ही निर्धारित करता है कि समाचार यथार्थ का कैसा प्रतिबिंब कर रहे हैं। फिर जब हम इसकी व्याख्या कर रहे होते हैं तो स्वयं हमारे अपने मूल्य और प्राथमिकताएं भी घटना के, हमारे समाचारीय मूल्यांकन और प्रस्तुतीकरण को प्रभावित करती हैं। वे तथ्य हमें अधिक समाचारीय लगते हैं जो हमारे अपने दृष्टिïकोण या परसेप्शन से मेल खाते हैं और जो तथ्य हमारे दृष्टिïकोण या परसेप्शन को झुठलाते हों उन्हें स्वीकर करने में हमें एक मानसिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। यथार्थ से वास्ता पडऩे तथा स्वयं अपने अनुभव के साथ हमारे दृष्टिïकोण भी बदलते हैं। इनका बदलना भी एक गतिशील प्रक्रिया है और एक प्रोफेशनल पत्रकार में तो यह गतिशीलता आवश्यक होती है। समाज के विभिन्न तबकों में इस गतिशीलता का स्तर भिन्न होता है। कुछ तबके परिवर्तन को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं और कुछ काफी रूढि़वादी हो सकते हैं जो अपने दृष्टिïकोण को आसानी से परिवर्तित नहीं करते।

यथार्थता

एक आदर्श रूप में मीडिया और पत्रकारिता यथार्थ का प्रतिबिंब मात्र हैं। इस तरह समाचार यथार्थ की पुनर्रचना करता है। यह अपने आप में  एक जटिल प्रक्रिया है और आज तो यहां तक कहा जाता है कि समाचार संगठनों द्वारा सृजित यथार्थ की छवियां भ्रम पैदा करती हैं। लेकिन सच यही है कि मानव यथार्थ की नहीं, यथार्थ की छवियों की दुनिया में रहता है। किसी भी यथार्थ के बारे में हमें जो भी जानकारियां प्राप्त होती हैं उसी के अनुसार हम उस यथार्थ की एक छवि अपने मस्तिष्क में बना लेते हैं और यही छवि हमारे लिए वास्तविक यथार्थ का काम करती है। एक तरह से हम सूचना सृजित छवियों की दुनिया में रहते हैं।

संचार के प्रारंभ से ही ऐसा होता आया है। जो कुछ भी मानव ने देखा नहीं है और जिसके होने का उसे अहसास है उसके बारे में एक सूचना छवि उसके पास होती है। दरअसल, यथार्थ को उसकी संपूर्णता में प्रतिबिंबित करने के लिए आवश्यक है कि ऐसे तथ्यों का चयन किया जाए जो इसकी संपूर्णता का प्रतिनिधित्व करते हैं। समाचार में हम किसी भी यथार्थ को उसके बारे में अत्यंत सीमित चयनित सूचनाओं और तथ्यों के माध्यम से ही सृजित करते हैं। इसलिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि किसी भी विषय के बारे में समाचार लिखते वक्त हम किन सूचनाओं और तथ्यों का चयन करते हैं। चुनौती यही है कि ये सूचनाएं और तथ्य केंद्रीय हों और संपूर्ण विषय का प्रतिनिधित्व करते हों अर्थात तथ्यों का प्रतिनिधित्वपूर्ण होना अत्यंत आवश्यक है।

इस संदर्भ में एक भारतीय लोक कथा तथ्यात्मकता और सत्यात्मकता को काफी अच्छे ढंग से उजागर करती है। छह अंधे और एक हाथी की कहानी। छह अंधों में बहस छिड़ गई कि हाथी कैसा होता है और फिर उन्होंने इस बहस को खत्म करने के लिए स्वयं हाथी को छूकर यह तय करने का निश्चय किया कि हाथी कैसा होता है। एक अंधे ने हाथी के पेट को छुआ और कहा यह ‘‘दीवार की तरह है।’’ दूसरे ने उसके दांत को छुआ और कहा ‘‘नहीं यह तलवार की तरह है।’’ तीसरे के हाथ उसकी सूढ़ आई और उसने कहा ‘‘यह तो सांप की तरह है।’’ चौथे ने उसका पैर छुआ और चिल्लाया तुम पागल हो ‘‘यह पेड़ की तरह है।’’ पांचवें को हाथी का कान हाथ आया और उसने कहा, ‘‘तुम सब गलत हो यह पंखे की तरह है।’’ छठे अंधे ने उसकी पूंछ पकड़ी और बोला, ‘‘बेवकूफों हाथी दीवार, तलवार, सांप, पेड़, पंखे में से किसी भी तरह का नहीं होता यह तो एक रस्सी की तरह है।’’ हाथी तो गया और छह अंधे आपस में लड़ते रहे। हरेक अपने ‘तथ्यों’ के आधार पर हाथी की अपनी ‘छवि’ पर अडिग था।

तथ्य या सूचनाएं जो हर अंधे ने छूकर प्राप्त किए वे अपने आप में सच थे हाथी का कान पंखे जैसा होता है लेकिन हाथी तो पंखे जैसा नहीं होता। इस तरह हम कह सकते हैं कि तथ्य अपने आप में तो सत्य ही होते हैं लेकिन अगर किसी संदर्भ में उनका प्रयोग किया जा रहा हो तो उनका पूरे विषय के संदर्भ में प्रतिनिधित्वपूर्ण होना आवश्यक है। उसी स्थिति में तथ्य यथार्थ की सही तस्वीर प्रतिबिंबित कर पाएंगे। इसके अलावा समाचार और उनके यथार्थ को लेकर काफी कुछ कहा और लिखा गया है। कैनेथ ब्रुक ने तो 1935 में कहा था कि किसी एक पहलू पर केंद्रित होने का मतलब दूसरे पहलू की अनदेखी भी है। समाचार लेखन के संदर्भ में अपने आप को इन तथ्यों की सत्यता के दायरे में नहीं बांध सकते जो अपने आप में सत्य ही होते हैं बल्कि हमारे सामने चुनौती होती हैं सत्यपूर्ण तथ्यों के माध्यम से संपूर्ण यथार्थ को प्रतिबिंबित करने की।

एक नस्ली, जातीय या धार्मिक हिंसा की घटना का समाचार कई तरह से लिखा जा सकता है। इसे तथ्यपरक ढंग से इस तरह भी लिखा जा सकता है कि किसी एक पक्ष की शैतान की छवि सृजित कर दी जाए और दूसरे पक्ष को इसके कारनामों का शिकार। इस घटना के किसी भी एक पक्ष को अधिक उजागर कर एक अलग ही तरह की छवि का सृजन किया जा सकता है। फिर इस घटना में आम लोगों के दु:ख-दर्दों को उजागर कर इस तरह की हिंसा के अमानवीय और जघन्य चेहरे को भी उजागर किया जा सकता है। एक रोती विधवा, बिलखते अनाथ बच्चे या तो मात्र विधवा और अनाथ बच्चें हैं जिनकी यह हालत जातीय या धार्मिक हिंसा ने की या फिर ये इसलिए विधवा और अनाथ हैं क्योंकि ये किसी खास जाति या धर्म में हैं। इस तरह समाचार को वास्तव में यथार्थ के करीब रखने के लिए एक पत्रकार को प्रोफेशनल और बौद्धिक कौशल में एक स्तर का महारथ हासिल करना जरूरी है। इस तरह की तमाम घटनाओं को सतह पर नहीं एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर इनका मूल्यांकन करना पड़ेगा। वरना प्रतिनिधित्वपूर्ण तथ्यों का चयन करना मुश्किल हो जाएगा।

वस्तुपरकता

वस्तुपरकता को भी इस तरह की तथ्यपरकता से ही आंकना आवश्यक है। जैसी कि पहले ही चर्चा की गयी है कि हम किस घटना का समाचार के रूप में चयन करते हैं और दूसरा इस घटना से संबंधित ढेर सारे तथ्यों में से किन तथ्यों को समाचार गठन की प्रक्रिया में चयनित करते हैं या अस्वीकार करते हैं लेकिन उस प्रक्रिया में किस आधार पर और क्यों हम चंद तथ्यों को वस्तुपरक मान लेते हैं? वस्तुपरकता और यथार्थता के बीच काफी समान क्षेत्र भी है लेकिन दोनों विचारों के अंतर को भी समझना जरूरी है। एक होते हुए भी ये दोनों अलग विचार हैं। यथार्थता का संबंध जहां अधिकाधिक तथ्यों से है वहीं वस्तुपरकता का संबंध इस बात से है कि कोई व्यक्ति तथ्यों को कैसे देखता है। किसी विषय के बारे में हमारे मस्तिष्क में पहले से सृजित छवियां हमारे समाचार मूल्यांकन की क्षमता को प्रभावित करती हैं और हम इस यथार्थ को इन छवियों के अनुरूप देखने का प्रयास करते हैं।

हमारे मस्तिष्क में अनेक मौकों पर इस तरह की छवियां वास्तविक भी हो सकती हैं और वास्तविकता से दूर भी हो सकती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि जहां तक यथार्थता के चित्रण का संबंध है यह प्रोफेशनल कौशल की ओर अधिक झुका हुआ है और वस्तुपरकता की अवधारणा का संबंध हमारे मूल्यों से अधिक है। हमें ये मूल्य हमारे सामाजिक माहौल से मिलते हैं। बचपन से ही हम स्कूल में, घर में, सडक़ चलते हर कदम हर पल सूचनाएं प्राप्त करते हैं और दुनिया भर के स्थानों, लोगों, संस्कृतियों आदि सैकड़ों विषयों के बारे में अपनी एक धारणा या छवि बना लेते हैं। वस्तुपरकता का तकाजा यही है कि किस हद तक हम इस छवि को वास्तविकता के सबसे करीब ले जा पाते हैं। कुछ सत्य ऐसे हैं जिन पर एक विश्वव्यापी सहमति हो सकती है लेकिन ऐसे तमाम सच जो हमारे दृष्टिïकोण से निर्धारित होते हैं उन पर यह पैमाना लागू नहीं किया जा सकता। इस दृष्टिï से दुनिया हमेशा सतरंगी और विविध रहेगी। इसे देखने के दृष्टिïकोण भी अनेक होंगे। इसलिए कोई भी समाचार सबके लिए एक साथ वस्तुपरक नहीं हो सकता। एक ही समाचार किसी के लिए वस्तुपरक हो सकता है और किसी के लिए पूर्वाग्रह से प्रभावित हो सकता है।

समाचार की साख को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि इसमें शामिल की गई सूचना या जानकारी का कोई स्रोत हो और वह स्रोत इस तरह की सूचना या जानकारी देने योग्य और समर्थ हो। कुछ बहुत सामान्य जानकारियां होती हैं जिनके स्रोत का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है लेकिन जैसे ही कोई सूचना सामान्यहोने के दायरे से बाहर निकलकर विशिष्ट होती है उसके स्रोत का उल्लेख आवश्यक है। स्रोत के बिना उसकी साख नहीं होगी। उसमें विश्वसनीयता नहीं होगी।

हमें समाचार लेखन के हर सिद्धांत और अवधारणा के संदर्भ में बार-बार इस बात पर केंद्रित होना पड़ेगा कि देश और दुनिया भर की हजारों-लाखों घटनाओं से चंद घटनाओं को किस आधार पर समाचार योग्य माना जाता है और फिर समाचार योग्य माने जानी वाली घटनाएं जिस रूप में पाठकों या दर्शकों/श्रोताओं तक पहुंचती हैं तो इनमें किन तथ्यों का समावेश होता है? घटना के किन पक्षों को उछाला जाता है और किन पक्षों की अनदेखी की जाती है? ऐसा क्यों होता है और किया जाता है यह भी एक जटिल सवाल है। तात्कालिक तौर पर तो इसे इस पैमाने पर ही परखा जा सकता है कि किसी खास घटना के समाचार बनने और इसके किसी खास पक्ष को अहमियत मिलने से किसके हितों की पूर्ति होती है। हितों की पूर्ति का पैमाने का इस्तेमाल पत्रकारिता में अनेक रुझानों के मूल्यांकन के लिए किया जा सकता है।

निष्पक्षता

वैसे तो निष्पक्षता सीधे-सीधे अपना अर्थ व्यक्त करता है। लेकिन निष्पक्षता को तटस्थता के रूप में देखना पत्रकारिता के पेशे में एक गंभीर भूल होगी। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इसकी राष्टï्रीय और सामाजिक जीवन में अहम भूमिका है। इसलिए पत्रकारिता और समाचार सही और गलत, अन्याय और न्याय जैसे मसलों के बीच तटस्थ नहीं हो सकते बल्कि वे निष्पक्ष होते हुए सही और न्याय के साथ होते हैं।

जब हम समाचारों में  निष्पक्षता की बात करते हैं तो इसमें न्यायसंगत होने का तत्त्व अधिक अहम होता है। आज मीडिया एक बहुत बड़ी ताकत है। एक ही झटके में यह किसी पर बट्टï लगाने की ताकत रखता है। इसलिए किसी के बारे में समाचार लिखते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है कि कहीं किसी को अनजाने में ही बिना सुनवाई के फांसी पर तो नहीं लटकाया जा रहा है। भ्रष्टïचार और इस तरह के आचरण के मामलों में इस बात का विशेष महत्व  है। समाचार की वजह से किसी व्यक्ति के साथ अन्याय न हो जाए, इसकी गारंटी करने के लिए निष्पक्षता की अहम भूमिका है।

इसका एक आयाम यह भी है कि किसी को भी संदर्भ से काटकर उद्धृत न किया जाए। अनेक अवसरों पर यह देखा जाता है कि प्रमुख व्यक्तियों से काल्पनिक प्रश्न पूछे जाते हैं और उनके उत्तर ही समाचारों की हेडलाइन बन जाते हैं। एक काल्पनिक उदाहरण लें: किसी राजनीतिक दल में विभाजन के आसार नहीं हैं और इस दल के अध्यक्ष से पूछा जाता है ‘‘आप अपने दल में विभाजन को रोकने के लिए क्या उपाय कर रहे हैं?’’ स्वाभाविक तौर पर दल का अध्यक्ष इसका खंडन करेगा और अगले दिन अगर अखबार में यह सुर्खी हो ‘‘दल में विभाजन नहीं’’ तो पाठकों पर इसका क्या असर पड़ेगा? कहीं न कहीं उनके मस्तिष्क में यह बात तो आ ही जाएगी कि इस दल में ऐसा कुछ होने जा रहा था। यानि सब कुछ ठीक नहीं है। यह कहा जा सकता है कि इस तरह का समाचार लेखन निष्पक्ष नहीं है। यह तो एक बहुत ही सरल और स्पष्टï काल्पनिक उदाहरण था लेकिन समाचारों की वास्तविक दुनिया में निष्पक्षता का पैमाना लागू करने के लिए अत्यंत पैनी नजर होना आवश्यक है। फिर, निष्पक्षता को यथार्थता, वस्तुपरकता, सूचना स्रोत और संतुलन से काटकर नहीं देखा जा सकता है।

संतुलन

निष्पक्षता की अगली कड़ी संतुलन है। आमतौर पर मीडिया पर आरोप लगाया जाता है कि समाचार कवरेज संतुलित नहीं है यानि यह किसी एक पक्ष की ओर झुका है। हम समाचार में संतुलन के सिद्धांत की बात करते हैं तो वह इस तरह के व्यापक संतुलन से थोड़ा हटकर है। आमतौर पर संतुलन की आवश्यकता वहीं पड़ती है जहां किसी घटना में अनेक पक्ष शामिल हों और उनका आपस में किसी न किसी रूप में टकराव हो। उस स्थिति में संतुलन का तकाजा यही है कि सभी संबद्ध पक्षों की बात समाचार में अपने-अपने समाचारीय वजन के अनुसार स्थान पाए।

समाचार में संतुलन का महत्त्व तब कहीं अधिक हो जाता है जब किसी पर किसी तरह के आरोप लगाए गए हों या इससे मिलती-जुलती कोई स्थिति हो। उस स्थिति में हर पक्ष की बात समाचार में अभिव्यक्त होनी चाहिए अन्यथा यह एकतरफा चरित्र हनन का हथियार बन सकता है। व्यक्तिगत किस्म के आरोपों में आरोपित व्यक्ति के पक्ष को भी स्थान मिलना चाहिए। लेकिन यह स्थिति तभी हो सकती है जब आरोपित व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में है और आरोपों के पक्ष में पक्के सबूत नहीं हैं या उनका सही साबित होना काफी संदिग्ध है। अगर कोई ‘‘सार्वजनिक व्यक्तित्व’’ बलात्कार जैसा अपराध कर दे और मामला साफ-साफ सबके सामने हो तो पत्रकार को भी अपने विवेक से ही संतुलन के सिद्धांत का पालन करना पड़ेगा। कुख्यात अपराधियों का मामला इससे अलग है। संतुलन के नाम पर समाचार मीडिया इस तरह के तत्त्वों का मंच नहीं बन सकता जो कई मौकों पर देखने को मिलता है। कभी-कभार किसी समाचार से इस तरह के तत्त्वों को लाभ पहुंचता है। इसे रोकना भी जरूरी है।

संतुलन का सिद्धांत अनेक सार्वजनिक मसलों पर व्यक्त किए जाने वाले विचारों और दृष्टिïकोणों पर तकनीकी ढंग से लागू नहीं किया जाना चाहिए। अनेक मसलों पर प्रतिक्रिया  व्यक्त करने में राजनीतिक पार्टियां समय लेती हैं। आशय यह है कि राजनीतिक आलोचना के विषयों पर संतुलन का सिद्धांत उस तरह लागू नहीं किया जाना चाहिए जैसा व्यक्तिगत आरोपों के मामले में किया जाना चाहिए। राजनीतिक संतुलन तत्काल या रोजमर्रा की चीज नहीं है बल्कि एक समाचार संगठन को अपने कवरेज की संपूर्णता में संतुलित होना चाहिए।

संसदीय और राज्य विधायिकाओं की रिपोर्टिंग में भी संतुलन का ध्यान रखा जाना चाहिए। एक लोकतांत्रिक समाज में  समाचार माध्यकों को सभी तरह की राजनीतिक धाराओं के विचारों और विभिन्न मुद्दों पर उनके स्टैंड को प्रतिबिंबित करना चाहिए। इसके जरिए ही लोग प्रतियोगी राजनीति और इसमें भाग लेने वाली शक्तियों के बारे में सही और वैज्ञानिक समझ पैदा कर सकते हैं। संसद और विधायिकाओं में अनेक तरह के विचार व्यक्त किए जाते हैं और इन सबको संतुलित ढंग से प्रस्तुत करना आवश्यक है। लेकिन साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि देश के राजनीतिक जीवन में हर दल की अपनी ताकत और हैसियत है। इस तरह के समाचारों में संतुलन कायम करते समय इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसके अलावा सत्तापक्ष के नेताओं के कथन निश्चय ही अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं क्योंकि वे किसी न किसी रूप में सरकार की नीतियों को प्रतिबिंबित करते हैं जिसका असर सीधे लोगों के जीवन पर पड़ता है जबकि विपक्ष के नेताओं के कथन उनकी राय, आलोचना या सुझाव भर हैं। वे राज्य की नीति नहीं हैं।

स्रोत

हर समाचार में शामिल की गई सूचना और जानकारी का कोई स्रोत होना आवश्यक है। यहां स्रोत के संदर्भ में सबसे पहले यह स्पष्टï कर देना आवश्यक है कि किसी भी समाचार संगठन के समाचार के स्रोत होते हैं और फिर उस समाचार संगठन का पत्रकार जब सूचनाएं एकत्रित करता है तो उसके अपने भी स्रोत होते हैं। इस तरह किसी भी दैनिक समाचारपत्र के लिए पी.टी.आई. (भाषा), यू. एन. आई. (यूनीवार्ता) जैसी समाचार एजेंसियां और स्वयं अपने ही संवाददाताओं और रिपोर्टरों का तंत्र समाचारों का स्रोत होता है। लेकिन चाहे समाचार एजेंसी हो या समाचारपत्र इनमें काम करने वाले पत्रकारों के भी अपने समाचार स्रोत होते हैं। यहां हम एक पत्रकार के समाचार के स्रोतों की चर्चा करेंगे। आशय यह है कि समाचार के भीतर जो सूचनाएं और जानकारियां होती हैं उनका स्रोत क्या होता है और समाचार तथा स्रोत के अंतर्संबंधों का पत्रकारिता पर क्या प्रभाव पड़ता है।

एक पत्रकार का प्रोफेशनल कौशल ही है जो उसे विभिन्न सूचनाओं का मूल्यांकन करने की क्षमता प्रदान करता है। गुमनाम स्रोत अहम समाचारों का खुलासा भी करते हैं, ‘स्कूपदेते हैं लेकिन चंद मौकों पर गलत सूचनाएं भी देते हैं, जिनका मकसद कुछ खास उद्देश्यों की पूर्ति करना होता है। प्लांटेड स्टोरीजऔर मिसइनफार्मेशन कंपेनइसी तरह के गुमनाम और अनाम सूत्रों के माध्यम से चलाए जाते हैं।

समाचार की साख को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि इसमें शामिल की गई सूचना या जानकारी का कोई स्रोत हो और वह स्रोत इस तरह की सूचना या जानकारी देने योग्य और समर्थ हो। कुछ बहुत सामान्य जानकारियां होती हैं जिनके स्रोत का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है लेकिन जैसे ही कोई सूचना ‘सामान्य’ होने के दायरे से बाहर निकलकर ‘विशिष्ट’ होती है उसके स्रोत का उल्लेख आवश्यक है। स्रोत के बिना उसकी साख नहीं होगी। उसमें विश्वसनीयता नहीं होगी। एक समाचार में समाहित हर सूचना का स्रोत होना आवश्यक है और जिस सूचना का कोई स्रोत नहीं है उसका स्रोत या तो पत्रकार स्वयं है या फिर यह एक सामान्य जानकारी है जिसका स्रोत देने की आवश्यकता नहीं है।

आमतौर पर पत्रकार स्वयं किसी सूचना का प्रारंभिक स्रोत नहीं होता। वह किसी घटना के घटित होने के समय घटनास्थल पर उपस्थित नहीं होता। वह घटना घटने के बाद घटनास्थल पर पहुंचता है इसलिए यह सब कैसे हुआ इसके लिए उसे दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। अगर एक पत्रकार स्वयं अपनी आंखों से पुलिस फायरिंग में या अन्य किसी भी तरह की हिंसा में मरने वाले दस लोगों के शव देखता है तो निश्चय ही वह खुद दस लोगों के मरने का स्रोत हो सकता है। हालांकि इस बारे में कुछ लोग अलग सोच भी रखते हैं और उनका मानना है कि पत्रकार तो सूचना का वाहक भर है और हर सूचना का कोई स्रोत अवश्य होना चाहिए।

स्रोत और पत्रकारिता

पत्रकारिता और स्रोत के आपसी संबंधों से ही किसी भी समाज में पत्रकारिता का स्वरूप निर्धारित होता है। प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ ही यही है कि समाचारों के विविध और बहुल स्रोत उपलब्ध होते हैं और उनके द्वारा दी गई सूचना और जानकारी को प्रकाशित या प्रसारित करने की स्वतंत्रता होती है। किसी व्यवस्था में प्रेस की स्वतंत्रता के न होने का मतलब यही होता है कि वहां के मीडिया में छपने वाले हर समाचार और इसमें शामिल हर सूचना का स्रोत सरकारी होगा। इसलिए इस तरह के मीडिया में सरकारी पक्ष के अलावा कोई दूसरा पक्ष नहीं होगा।

मीडिया में विविधता के लिए आवश्यक है कि समाचार के स्रोत भी विविध हों। हालांकि हाल के वर्षों में मीडिया में विविधता को लेकर अनेक सवाल उठाए गए हैं और कुछ अनुसंधान इस ओर इशारा कर रहे हैं कि मीडिया में विविधता की कमी आ रही है और इसका मुख्य कारण इसकी बने-बनाए स्रोतों और पकी-पकाई सूचनाओं पर बढ़ती निर्भरता है। दूसरे खाड़ी युद्ध के दौरान जडि़त पत्रकारिता पर काफी चर्चा हुई है और इस संदर्भ में पत्रकारिता के आदर्शों और मानदंडों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। संक्षेप में यही कह सकते हैं कि पत्रकार अमेरिकी सेना के साथ संबद्ध हो गए और अमेरिकी सैनिक सूत्रों से मिली सूचनाओं के आधार पर ही वे समाचार भेजते थे। इस तरह वे अमेरिकी सेना के साथ संबद्ध या जडि़त थे। इस तरह के पत्रकार युद्ध की वस्तुपरक और संतुलित रिपोर्टिंग नहीं कर पाए क्योंकि उनका एकमात्र स्रोत अमेरिकी सेना थी और उनका इस्तेमाल काफी हद तक सैनिक प्रोपेगेंडा के लिए किया गया।

जाहिर है हर युद्ध में हर सेना प्रोपेगेंडा युद्ध को जीतना भी आवश्यक समझती है। पहले और दूसरे दोनों ही खाड़ी युद्धों के सूचना स्रोतों में विविधता न होने के कारण लोगों को युद्ध की पूरी तस्वीर नहीं मिल पाई। इन दोनों युद्धों के कवरेज में युद्ध की बर्बरता और आम लोगों के कष्टïो की ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया और आधुनिक युद्ध के ‘हाइ टैक’ चरित्र पर खूब जोर दिया गया। इससे शायद मानव इतिहास में पहली बार कोई युद्ध वीडियो गेम की तरह मनोरंजन का साधन बना। वियतनाम युद्ध में मीडिया के स्रोत विविध थे और पत्रकार अपने ही बल पर अपने स्रोतों को विकसित करते थे। वियतनाम युद्ध का कवरेज खाड़ी के दोनों ही युद्धों से कहीं अधिक विविध था। हालांकि तब संचार और इसी के अनुरूप मीडिया क्रांति का आगमन नहीं हुआ था। इस तरह समाचार के स्रोत पत्रकारिता की दिशा और दशा में अहम भूमिका अदा करते हैं।

स्रोतों को नियमित कर कवरेज को नियमित किया जा सकता है। समाचारों में विविधता के लिए स्रोतों में विविधता आवश्यक है और स्रोत तभी विविध हो सकते हैं जब पत्रकार पूल या एक झुंड के रूप में रिपोर्टिंग तभी करें जब कोई अन्य विकल्प न हो।

पत्रकारिता में सूचनाओं का अंबार लगा होता है और वह हर सूचना जिसका समाचारीय मूल्य अधिक होता है वह कहीं न कहीं, किसी न किसी पर चोट करती है। इसी तरह के समाचारों को लेकर सबसे अधिक विवाद होते हैं। इस तरह की सूचनाओं के स्रोत आमतौर पर अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते। वैसे तो आदर्श स्थिति यही है कि हर सूचना के स्रोत का समाचार में नाम हो। लेकिन अधिकांश महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील सूचनाएं ऐसे स्रोतों से प्राप्त होती हैं जो स्वयं गुमनाम रहना चाहते हैं। अमेरिका के वाटर गेट कांड में स्रोतों की अहम भूमिका से सभी वाकिफ हैं। आज तक यह पता नहीं है कि वह स्रोत कौन था जिसे ‘डीप थ्रोट’ नाम दिया गया था।

इस तरह की परिस्थितियों में एक पत्रकार का प्रोफेशनल कौशल ही है जो उसे विभिन्न सूचनाओं का मूल्यांकन करने की क्षमता प्रदान करता है। गुमनाम स्रोत अहम समाचारों का खुलासा भी करते हैं, ‘स्कूप’ देते हैं लेकिन चंद मौकों पर गलत सूचनाएं भी देते हैं, जिनका मकसद कुछ खास उद्देश्यों की पूर्ति करना होता है। ‘प्लांटेड स्टोरीज’ और ‘मिसइन्र्फोमेशन कंपेन’ इसी तरह के गुमनाम और अनाम सूत्रों के माध्यम से चलाए जाते हैं। संभव है अनेक मौकों पर सरकार या कोई भी अन्य संस्था किसी खास घटना के घटित होने के प्रभाव का जायजा लेना चाहते हों तो एक रास्ता यही है कि खबर छपने के बाद आने वाली प्रतिक्रिया देखी जाए। प्रतिक्रिया से उस घटना के वास्तविक रूप से घटित होने का मूल्यांकन किया जा सकता है।

इन दिनों राजनीतिक प्रोपेगेंडा और आर्थिक युद्ध के लिए खबरों को ‘प्लांट’ करने का सिलसिला तेज हुआ है। ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब तमाम प्रोफेशनलिज्म और बौद्धिक कौशल के बावजूद एक पत्रकार को सरकार का एक उच्च पदस्थ जानकार सूत्र कोई सूचना देता है जिस पर कोई संदेह करने की भी गुंजाइश नहीं होती। लेकिन अंतत: वह  समाचार ‘प्लांटेड’ होता है- किसी खास मकसद को हासिल करने के लिए।

इस तरह के स्रोतों का आमतौर पर ‘जानकार सूत्रों’, ‘उच्च पदस्थ सूत्रों’, ‘आधिकारिक सूत्रों’, ‘राजनयिक सूत्रों’ के रूप में उल्लेख किया जाता है। इस तरह के स्रोतों से प्राप्त समाचारों के बिना तो समाचारपत्र नीरस हो जाएंगे हालांकि कभी-कभार ऐसे स्रोत मीडिया की सवारी भी कर लेते हैं।

एक पत्रकार के लिए ‘ब्रीफिंग’ का अत्यंत महत्त्व होता है। ब्रीफिंग दो तरह की होती है : ऑन द रिकॉर्ड और ऑफ द रिकॉर्ड। ‘ऑन द रिकॉर्ड’ से आशय है कि स्रोत जो भी जानकारी दे रहा है उसका समाचार में इस्तेमाल किया जा सकता है। मसलन अगर कोई राजनेता प्रेस सम्मेलन कर रहा है तो वह ‘ऑन रिकॉर्ड’ है यानि वह जो कुछ भी कह रहा है उसे प्रकाशित या प्रसारित किया जा सकता है। आमतौर पर जब कोई स्रोत पत्रकार से बातचीत करता है तो शुरू में ही यह तय हो जाना चाहिए कि वह ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ है या ‘ऑन रिकॉर्ड’ ताकि अनावश्यक विवादों से बचा जा सके। वैसे तो आमतौर पर स्रोत और पत्रकार के बीच एक विश्वास का रिश्ता होता है और एक पत्रकार अपने स्रोत की रक्षा करता है। लेकिन एक पत्रकार के लिए ‘ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि इन दिनों हमारे देश में इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

दरअसल, यही वह ब्रीफिंग है जिससे स्रोत के माध्यम से एक पत्रकार ‘जानकार’ बना रहता है, उसके पास अपने ‘बीट’ की सारी सूचनाएं होती हैं, जो उसे मीडिया से तो मिलती ही हैं लेकिन इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण जानकारियां उसे ‘ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग’ से मिलती हैं। जानकारी के इस स्तर के कारण ही अगर उसकी बीट में कोई घटना होती है तो वह तत्काल उसके महत्त्व का आकलन कर लेता है और एक सही परिप्रेक्ष्य में इसकी रिपोर्टिंग कर सकता है। एक पत्रकार अगर इस तरह से ‘जानकार’ नहीं है तो यह खतरा हमेशा बना रहता है कि वह घटना के समाचारीय महत्त्व को उसकी संपूर्णता के साथ नहीं परख पाएगा या वह उस घटना को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत नहीं कर पाएगा।

विशिष्ट रिपोर्टिंग के लिए इस तरह के स्रोतों की जरूरत पड़ती है जिन्हें एक प्रक्रिया के तहत विकसित करना पड़ता है और आपसी विश्वास का संबंध पैदा करना होता है। दरअसल, किसी समाचार संगठन को एक विशेष पहचान देने में विशेष रिपोर्टिंग की अहम भूमिका होती है। इसके अलावा एक पत्रकार को ‘जानकार’ और ‘सूचित’ बने रहने के लिए उन तमाम सूचनाओं से भी अवगत रहना जरूरी है जो पहले ही किसी न किसी रूप में सार्वजनिक हो चुकी हैं। इस तरह ‘सूचित’ और ‘जानकार’ रहकर ही एक पत्रकार यह तय कर सकता है कि कौन सी सूचना और जानकारी ‘समाचार’ है और कौन सी नहीं?

यह भी कहा जाता है कि जो बताया जा रहा है वह समाचार नहीं बल्कि तो छिपाया जा रहा है वह समाचार है।  ( What is being revealed is not news but what is being canceled is news). कंपनी जो बताए वह विज्ञापन, जो छुपाए वह है खबर.

लेखक उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में कुलपति हैं. वे इग्नू और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन में जर्नलिज्म के प्रोफेसर रह चुके हैं. एकेडमिक्स में आने  से पहले वे दस वर्ष पत्रकार भी रहे हैं .

 

 

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