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खेल, तमाशा और ‘चीयरलीडर्स’

सुशील यति | विस्मय भरे चकाचौंध और आश्चर्य-मिश्रित प्रस्तुतीकरण के साथ आईपीएल के दसवें संस्करण का समापन हुआ, आईपीएल अब सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि अपनी उत्सवधर्मिता और भव्यता के कारण दर्शकों के लिए खेल से कहीं बढ़कर है। दूसरे शब्दों में कहें तो आईपीएल टेलीविजन का एक ऐसा उत्सव जहाँ उमंग और विलासिता अपने चरम पर है, जहाँ वैभव की नुमाइश है। शहरी जीवन भी कितना रोचक और उत्सवधर्मी हो सकता है इसका मुजायरा करना हो तो आईपीएल देखिए। साथ ही, हमारी आकांक्षाओं को बाजार, कैसे एक ‘कॉमोडिटी’ या वस्तु में बदल देता है इसका उदाहरण है आईपीएल। पिछले डेढ़ महीने से टीवी, रेडियों और अख़बार में आईपीएल की धूम मची रही। लोगों ने अपनी-अपनी पसंदीदा टीमों का भरपूर समर्थन किया, और इस हंगामें में शायद ही कोई  ऐसा हो जिसने अपने पसंदीदा टीम का कोई मैच छोड़ना पसंद किया हो। एक-एक मैच निर्णायक रहा, अपने ‘फॉर्मेट’ अनुरुप लगातार उलटफेर की संभावना बनी रही। आइए पड़ताल करते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर क्या अलग और विशेष है, क्रिकेट के इस नए रुप में?

इसमें कोई शक नहीं है कि सेटेलाइट चैनलों की चकाचौंध से भरे प्रस्तुतीकरण ने इस खेल को और ज्यादा मनोरंजक और प्रभावशाली बनाया है जिससे टीवी पर प्रसारित हो रहे चित्रों और दर्शकों के बीच एक सामाजिक संबन्ध का निर्माण हुआ। इसे संचार युग की सफलता ही मानना चाहिए जिसने सूचना तकनीक और बाजार की ताकतों के साथ मिलकर एक ऐसे प्रचार का मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसके दम पर लोगो का समर्थन और विश्वास हासिल किया जा सकता है, दर्शकों की बढ़ी हुई संख्या इसका एक उदाहरण है। आंकड़ों पर अगर गौर करें तो आईपीएल के दर्शकों की संख्या हर साल बढ़ रही है। स्टेडियम से कहीं ज्यादा, आईपीएल के दर्शक टेलीविजन के सामने बैठ कर इस खेल का आनंद लेते हैं। आईपीएल के 10 सालों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि टीवी दर्शकों की संख्या 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 18.57 करोड़ के आंकड़े को छू गई है। आईपीएल से होने वाली कमाई करोड़ो में है जिसमें कंपनियों के प्रसारण अधिकार के साथ-साथ विज्ञापनों और विभिन्न उत्पादों के ‘ब्रांड’ का प्रमोशन शामिल है, जिसकी गवाही खिलाड़ियों की जर्सियों पर लगी ‘चिप्पियां’ दे रही हैं।

पिछले साल सोनी पिक्चर्स नेटवर्क को विज्ञापनों से 1021 करोड़ की आय हुई। इस वर्ष आयोजित हो रहे आईपीएल के दसवें संस्करण के लिए सोनी ने 1300 करोड़ का लक्ष्य रखा गया था। यह आंकड़ा विभिन्न कंपनियों को विज्ञापन के लिए ‘स्पोट्स’ बेच कर पहले ही हासिल किया जा चुका है। इन कंपनियों में मोबाइल कंपनी ‘विवो’ मुख्य प्रायोजक रही, तथा टेलीकॉम कंपनी ‘वोडाफोन’ और ऑनलाइन मार्केट कंपनी ‘अमेजन’ सह-प्रायोजक थे। अब इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कि बाजार इसे लेकर कितना उत्साहित है, आईपीएल के टेलीविजन प्रसारण अधिकार और इंटरनेट और मोबाईल संबधित अधिकार 2017 में समाप्त हो रहे हैं और अगले वर्ष के प्रसारण अधिकारों के लिए अभी से बाजार में हलचल तेज हो गई है। आज यह खेल केवल टेलीविज़न या स्टेडियम तक ही सीमित न रहकर हम सब की हथेलियों तक पहुँच चुका है।  2015 (आईपीएल-8) में डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे कि ‘हॉटस्टार’ पर 4 करोड़ 10 लाख उपभोक्ताओं ने आईपीएल मैच देखा, जो अगले साल बढ़कर 10 करोड़ तक पहुँच गया। गौरतलब है कि भारत में स्मार्टफोन की संख्या 2016 में 30 करोड़ थी जिसके इस वर्ष बढ़कर 50 करोड़ को पार कर जाने की उम्मीद है। साथ ही 4जी तकनीक के विकास और इंटरनेट की स्पीड के बढ़ने के साथ ही इस क्षेत्र में और भी संभावनाएं देखी जा रही हैं।

खिलाड़ियों की नीलामी और खेल की भव्यता को देखकर लोग आमतौर पर कहते हैं कि आईपीएल में बहुत पैसा है। दर्शकों का इस खेल में दिख रहे पैसे से कोई सीधा संबन्ध नहीं है, वह केवल और केवल उपभोक्ता की जगह से ही इसमें शामिल है। कुछ लोगो का यह भी मानना है कि इस खेल मे बाजार की अपनी हिस्सेदारी और मुनाफें की रणनीति ने इस खेल को अतिरंजना और भव्यता के शीर्ष तक पहुँचाया है जिससे अतंतः ‘खेल’ को नुकसान हुआ है। लेकिन अगर आईपीएल के सफल आयोजन और इसके संसाधन जुटाने में बाजार की एक भूमिका है, तो दूसरी तरफ इस माध्यम से अपने हितों को साधना भी बाजार की प्राथमिकता होगी ही। अगर सिक्के के दूसरे पहलू पर गौर करें तो हम पाते हैं कि बाजार इस आयोजन के बहाने और भी बहुत कुछ करता है जिससे वो अपने वर्चस्व को मध्यमवर्ग पर कायम रख सके और इससे जुड़े विचार का प्रचार-प्रसार कर सके। बाजार में बहुत से खिलाड़ी और सिने-अभिनेता उत्पादों का प्रचार करते हुए उन्हें मुनाफा पहुँचाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, जिसके बदले मे वे इन कंपनियों से एक मोटी रकम वसूलते हैं। कंपनियों को इन सितारों की जरुरत इसलिए भी होती है ताकि उपभोक्ता उनके उत्पादों पर भरोसा कर सके। हमारे समाज मे इन सितारों की विशेष पहचान होती है – लोग इन्हें देखना चाहते है – इनके जैसा होना चाहते हैं।

आर्थिक रुप से समृद्ध होने तथा उद्योगों तथा पूंजी में वृद्धि के कारण बड़े शहरों का गांवों तथा कस्बों की तुलना में भव्यता और चमक-दमक के साथ बहुत ही नजदीकी रिश्ता उभर कर सामने आता है। और कोई भी शहर लगातार इस बात का प्रयास करता रहता है कि कैसे वह अपनी इस भव्यता को बनाए रखते हुए इसमें इजाफा भी करे। वर्तमान आर्थिक व्यवस्था को ये भव्यवता ही न्यायसंगत ठहरा पाती है। इस क्रम में अगर देखें तो हम इस प्रकार के बहुत से आयोजनों को देखते हैं जिसका तात्कालिक समय और समाज से कोई खास रिश्ता नहीं होता है, बल्कि वह सब कुछ एक विडम्बना के रुप में ही निकल कर सामने आता हैं। राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ) के समय भी कुछ इस तरह की बातें निकल कर सामने आई थी कि कैसे इस तरह के आयोजनों के पीछे एक खास तंत्र कार्य करता है, जो इन्हें समग्र विकास और शक्तिप्रदर्शन के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजनस्थल सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित कर देने को लेकर भी सवाल उठाए गए और यह माना गया कि इस खेल के ऊपर होने वाले खर्च को आनन-फानऩ में खर्च न करके बल्कि एक दूरगामी रणनीति के तहत खेलों की जनमानस तक व्यापक पहुँच के ‘रोड़मैप’ के अनुसार निगमन अधिक आवश्यक था। हालांकि यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि आईपीएल का आयोजन राष्ट्रमंडल खेलों से बिल्कुल अलग है। आईपीएल में बाज़ार की सीधे-सीधे हिस्सेदारी है और इसके सरोकार किसी खेल भावना या सामाजिक सौदेश्य से नहीं बल्कि सीधे-सीधे विभिन्न कंपनियों के मुनाफें से संचालित होते हैं।

दरअसल, यह क्रिकेट के खेल का एक नया ‘फॉर्मेट’ है जिसमें मनोरंजन की अधिकता है। जो एक खास माध्यम में तकनीक की मदद से एक ऐसी दुनिया रचने में सफल होता है जिसे एक खास विचार और नई वैश्विक दृष्टि के तौर पर पहचान दिलाई जाती है साथ ही साथ जिसका इस्तेमाल बाजार के लिए एक उद्देश्यपरक ताकत के तौर पर किया जा सके। साथ ही, यह भी याद रखिए की भारत पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा बाजार भी है। यह आयोजन बाजार के लिए एक सुनहरा मौका भी है ताकी वह मध्यमवर्ग खासतौर पर युवाओं के बीच अपने विभन्न उत्पादों को ‘पॉपुलर’ कर सके।

टेलीविजन की स्क्रीन पर खेल का आनंद लेते हँसते मुस्कुरातें चेहरों को देखकर कोई भी कह सकता है कि यह सब एक स्वस्थ समाज की ही निशानी है। हालांकि यहां बाजार पुनः एक मिथक गढ़ने में सफल होता है और उसे वैध ठहराने का प्रयास भी करता है। जो टीवी की स्क्रीन पर बिखरी तस्वीरों तथा विज्ञापनों की मुस्कान के जरिए ही संभव हो पाता है। इससे एक ऐसी भ्रामक प्रामाणिकता का उदय होता है जिसे एक स्वस्थ, विकसित और जीवंत समाज के रुपहले आईनें के तौर पर प्रस्तुत किया जा सके। एक ऐसा आईना जिसमें समाज की हकीकत न हो और आपके आस पास एक ‘बनावटी करुणा’ का दायरा बना रहे। यह एक खतरनाक स्थिति है। आज जब हमारा समाज वर्तमान समय की वास्तविक तस्वीरों से कोसों दूर है। आज का मध्यमवर्ग इसी प्रकार की चेतना की जकड़न में है जहाँ वो अपने ड्राइंग रुम के सोफे पर बैठ आईपीएल की ‘चीयरलीडर’ के साथ खुशी और ग़म की लहर में तैर सके, और जिसका ‘हैंगओवर’ अगले कुछ दिनों तक उसकी आँखों में नजर आये।  यह एक ऐसा खेल है जहां मनोरंजन की अधिकता के साथ चौकों-छक्कों की बरसात है, स्टेडियम मे खिलाड़ियों के साथ संगीत की धुन पर नाचती खूबसूरत ‘चीयरलीडर्स’ है जो इस खेल का एक अहम हिस्सा है, जो दर्शकों के उत्साह भरें मनोरंजन के दाब को समय-समय पर ऊपर-नीचें चढ़ाती-उतारती है। संगीत की धुनों पर थिरकती ये देशी-विदेशी बालाऐं स्टेडियम में एक नया समां रचती हैं। स्टेडियम के खेल के साथ तेज आवाज़ न सिर्फ खिलाड़ियों की धमनियों के प्रवाह को तेज करती है बल्कि दर्शकों के लिए भी एक नए अनुभव-क्षेत्र की खोज करती है। ‘चियरलीडर्स’ इस खेल और मनोरंजन की ऐसी ही एक कड़ी है जो इस रोमांचकारी यात्रा में एक नया पुट जोड़ती है। और हाँ, उनका गोरा होना पहली शर्त है। एक बाजार प्रायोजित खेल, और एक ऐसे समाज में, जहां महिलाएं दोयम दर्जे का जीवन जी रही हों – उस बाजार और समाज से उनके लिए इसी तरह के पूर्वागृह ग्रसित, मर्दवादी एकरुपक व्यवहार की उम्मीद के सिवा किया ही क्या जा सकता है।

 

गौरतलब है कि जिस प्रकार टेलीविज़न की स्क्रीन पर खिलाड़ियों की क्षमताओं का ‘एनीमेटेड विश्लेषण’ प्रस्तुत किया जाता है, जिसका प्रभाव विडियोगेम की तुलना में कम नहीं होता। जैसे विडियो गेम के खेल में एक ‘सुपरपावर’ लड़ाके की आवश्यकता होती है जो अपने प्रतिद्वन्द्धी को मात देनें के लिए पूरी समझदारी से अस्त्र-शस्त्रों का चुनाव करें और बड़े कौशल के साथ अपनी रणनीति तैयार कर सके। जिस प्रकार इन खिलाड़ियों की योग्यताओं और पिछले प्रदर्शन को इनकी खास शक्तियों के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है वह इन खिलाड़ियों को किसी तकनीकी / मशीनी योग्यता वाले ‘सुपरहीरो’ से कम करके नहीं आंकता। दरअसल यही वो शक्तियां है जिनके बल पर बाज़ार इनकी कीमत तय करता है। सभी खिलाड़ियों से कुछ जादू रचने और चौंकानें वाले प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है। यह अवश्यम्भावी है कि कोई खिलाड़ी अगर ये ‘जादू’ रचने में कामयाब न हो तो अगले ‘रणक्षेत्र’ में उसकी बोली कम करके आंकी जाती है। यहाँ हमें यह भी याद रखना चाहिए कि आईपीएल सिर्फ एक खेल ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन बिजनेस मॉडल भी है।  अपने शुरुआती दौर मे आईपीएल अंडरवर्ल्ड से अपनी नजदीकियों, इसमें लगने वाले पैसों, टीम मालिकों और चीयरलीडर्स की डायरियों और देर रात तक चलनें वाली पार्टियों को लेकर विवादों मे रहा। इसके साथ ही, फिल्मी सितारों की मौजूदगी और उनसे जुड़े विवादों ने भी सुर्खियां बटोरी। वहीं दूसरी तरफ, आज यह खेल रफ्तार और चकाचौंध से भरपूर एक ग्लैमरस छवि हासिल कर चुका है जिसमें फिल्मी हस्तियों से लगाकर देश के बड़े औद्योगिक घरानों की सीधी हिस्सेदारी है। अब किसी खेल से भला कोई और क्या ही चाहेगा!

 

 

लेखक के बारें में:

सुशील यति ‘स्कूल ऑफ जर्नलिज्म और न्यू मीडिया स्टडीज, इग्नू’ में शोधार्थी हैं। ये सिनेमा के गहरे जानकार है। सिनेमा, कला-संस्कृति, मीडिया तकनीक व न्यू मीडिया के साथ-साथ समसामयिक मामलों  में गहरी रुचि। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से अध्ययन। समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। बंबई फिल्म उद्योग के ‘एक्सट्रा’ सिने-कलाकारों पर एक महत्वपूर्ण शोध जो शीघ्र ही पुस्तक के रुप में प्रकाशित होने जा रहा है।

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