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Monthly Archives: July 2017

व्‍यावसायिकता के विरुद्ध

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कुमार कौस्तुभ | मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान भारतीय पत्रकारिता सामाजिक दायित्‍व से शून्‍य है। प्रकाशित सामग्री में चटखारे और चापलूसी की ही प्रमुखता होती है। यह बात खास तौर से उन पत्र-पत्रिकाओं पर लागू होती है जिनके पीछे बड़ी-बड़ी थैलियां हैं। छोटी पत्रिकाएं अभी ...

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खबरों का खेल बनाम एजेंडा सेटिंग

agenda-setting-theory

विनीत उत्पल | मालूम हो कि एजेंडा सेटिंग तीन तरीके से होता है, मीडिया एजेंडा, जो मीडिया बहस करता है। दूसरा पब्लिक एजेंडा जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग बातचीत करते हैं और तीसरा पॉलिसी एजेंडा जिसे लेकर पॉलिसी बनाने वाले विचार करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा ...

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ख़बरों का अद्भुत संसार, छवियां और यथार्थ

journalism

सुभाष धूलिया। व्यवस्था के भीतर भी वस्तुपरक और संतुलित रिपोर्टिंग के लिए आवश्यक है कि सत्ता और पत्रकार के बीच एक ‘सम्मानजक दूरी’ बनाए रखी जाए। लेकिन आज जो रुझान सामने आ रहे हैं उसमें यह दूरी लगातार कम होती जा रही है और मीडिया पर सत्ता के प्रभाव में ...

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World at your fingertips!

digital-world

Ashok Ogra | Television and Radio have been with us for nearly a century; print for more than 500 years. Yet in just last two decades, we have connected over two billion people through internet and communication devices. And by 2016 over half the world’s population will have the option ...

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संवेदनशीलता चाहिए पत्रकारिता में !

journalism

सुरेश नौटियाल। समाचार लिखते समय ऑब्जेक्टिव होना अत्यंत कठिन होता है, चूंकि पत्रकार की निजी आस्था और प्रतिबद्धता कहीं न कहीं अपना असर दिखाती हैं। इसी सब्जेक्टिविटी के कारण एक ही समाचार को दस संवाददाता दस प्रकार से लिखते हैं। पर, उद्देश्य और नीयत खबर को सही प्रकार और सार्वजनिक ...

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जानिए कैसे होता है एक अखबार में काम ?

मुकुल व्यास.. सुबह चाय की चुस्कियों के साथ आप जिस अखबार का आनंद लेते हैं उसे बंनाने के लिए बहुत परिश्रम की आवश्यकता होती है। संपादक के नेतृत्व में पत्रकारों की एक सुव्यवस्थित टीम इस अखबार का निर्माण करती है। पत्रकारों की टीम को अलग-अलग विभागों में विभाजित किया जाता ...

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बादलों के देश से विज्ञान लोक में

Clouds-Science

देवेंद्र मेवाड़ी। इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरते समय मन में सिर्फ मुंबई था। वहां दो दिन तक बच्चों के लिए क्रिएटिव विज्ञान लेखन पर दूसरे रचनाकारों को सुनना और अपने अनुभव सुनाना था। लेकिन, विमान ज्यों-ज्यों हजार-दर-हजार फुट की ऊंचाइयां पार कर ऊपर उठता गया, पता लगा ...

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तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है?

news-editor

मनोज कुमार | इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो ...

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लोकतन्‍त्र में मीडिया के खतरे

फोटो साभार: openmedia.ca

पुण्‍य प्रसून वाजपेयी | लोकतन्‍त्र का चौथा खम्‍भा अगर बिक रहा है तो उसे खरीद कौन रहा है? और चौथे खम्‍भे को खरीदे बगैर क्‍या सत्‍ता तक नहीं पहुँचा जा सकता है? या फिर सत्‍ता तक पहुँचने के रास्‍ते में मीडिया की भूमिका इतनी महत्‍वपूर्ण हो चुकी है कि बगैर ...

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‘बड़ी खबर’ कितनी बड़ी?

media-news

कुमार कौस्तुभ | मीडिया, खासकर समाचारों की दुनिया की शब्दावली में ‘बड़ी खबर’ जाना-पहचाना टर्म है। आमतौर पर इसे ‘हेडलाइन’ भी माना जाता है। लेकिन, ‘हेडलाइन’ और ‘बड़ी खबर’  की टर्मिनोलॉजी में कुछ बुनियादी फर्क है जिसे ‘बड़ी खबर’ पर चर्चा करने से पहले साफ कर देना जरूरी है। टीवी ...

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समाचार, सिद्धांत और अवधारणा: स्रोत और पत्रकारिता

writers-block

सुभाष धूलिया पत्रकारिता और स्रोत के आपसी संबंधों से ही किसी भी समाज में पत्रकारिता का स्‍वरूप निर्धारित होता है। प्रेस की स्‍वतंत्रता का अर्थ ही यही है कि समाचारों के विविध और बहुत स्रोत उपलब्‍ध होते हैं और उनके द्वारा दी गई सूचना और जानकारी को प्रकाशित या प्रसारित ...

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पत्रकारिता मिशन नहीं प्रोफेशन है

Journalism-profesional

मधुरेन्द्र सिन्हा। टेक्नोलॉजी ने दुनिया की तस्वीर बदल दी है। ऐसे में पत्रकारिता भला कैसे अछूती रहती। यह टेक्नोलॉजी का ही कमाल है कि दुनिया के किसी भी कोने की घटना की खबर पलक झपकते ही सारे विश्व में फैल जाती है। दरअसल पत्रकारिता संवाद का दूसरा नाम ही तो ...

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