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पहले शिक्षा में तो लाइए हिन्दी

गोविन्द सिंह |

अनेक बार ऐसा लगता है कि शिक्षा की दुनिया का इस देश से, इस राष्ट्र के लक्ष्यों से कोई लेना-देना नहीं है. शिक्षा नीति के करता-धरता चाहते ही नहीं कि अंग्रेज़ी की बजाय हिन्दी को स्कूलों-कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए. इस देश का शिक्षाविद, अपना शोध पत्र यूरोप-अमेरिका की शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाना चाहता है. हिन्दी में छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं का उसके लिए कोई महत्व नहीं है

हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी मास. यानी सरकारी कामकाज में हिन्दी लागू करने-कराने का अभियान. इस अभियान के तहत हम अक्सर उन नौकरशाहों को जी-भर के कोसते हैं, जो हिन्दी को सरकारी फाइलों में नहीं घुसने देते, जो सरकारी चिट्ठियों में हिन्दी नहीं लिखने देते. हम उस सरकारी व्यवस्था को भी कोसने से नहीं चूकते, जो हर साल हिन्दी लागू करने के फर्जी आंकड़े पेश करवाती है और सरकार के पास यह रिपोर्ट भेजती है कि हिन्दी 99 फीसदी आ चुकी है. जबकि सचाई यह होती है कि हिन्दी वहीं की वहीं होती है. लेकिन कई बार मुझे लगता है कि हम फिजूल ही नौकरशाहों को कोसते हैं. हम उनसे यह अपेक्षा रखते हैं कि वे मरियल पौधों के फूलों को सींचें और पूरी फुलवारी लहलहा उठे.

असल चुनौती है जड़ों को सींचने की. लेकिन दुर्भाग्य से अपने यहाँ जड़ों में पानी डालने की सख्त मनाही है. हमारी सरकार, हमारे नेता, हमारे राजनीतिक दल, हमारे शिक्षक, हमारे नौकरशाह और समूचे तौर पर हमारा समाज भी इस गुपचुप अभियान में शामिल है कि जड़ों में पानी न दिया जाए. जी हाँ, मैं शिक्षा में हिन्दी की बात कर रहा हूँ. आप राजभाषा के तौर पर हिन्दी को लागू करने के लाख जतन कर लें, वह तब तक लागू नहीं हो सकती, जब तक कि आप शिक्षा में अंग्रेज़ी को बढ़ावा देने की अपनी नीति को नहीं बदल लेते. आप लाख विश्व हिन्दी सम्मलेन कर लें, आप उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बना डालें, लेकिन जब तक अपने नौनिहालों के मन से हिन्दी के प्रति घृणा को नहीं निकाल फेंकेंगे, तब तक कोई लाभ नहीं होने वाला. क्षमा कीजिए, नौनिहाल ही नहीं, उनके मन में घृणा-

भाव भरने वाले अध्यापक भी. हम कैसी दोमुंही बात करते हैं? एक तरफ बच्चों को जबरन अंग्रेज़ी बोलने, लिखने और उसी में सपने देखने को कहते हैं, क्लास में हिन्दी बोलने पर प्रताड़ित करते हैं, यही नहींउन्हें हिन्दी से घृणा करने की हिदायत देते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं स्कूलों-कालेजों से पढ़कर ऊंचे पदों पर बैठे अफसरों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अंग्रेज़ी छोड़ कर हिन्दी को अपनाएँ. वे ऐसा क्यों करें? उन्हें ऐसा क्यों करना चाहिए?

अनेक बार ऐसा लगता है कि शिक्षा की दुनिया का इस देश से, इस राष्ट्र के लक्ष्यों से कोई लेना-देना नहीं है. शिक्षा नीति के करता-धरता चाहते ही नहीं कि अंग्रेज़ी की बजाय हिन्दी को स्कूलों-कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए. इस देश का शिक्षाविद, अपना शोध पत्र यूरोप-अमेरिका की शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाना चाहता है. हिन्दी में छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं का उसके लिए कोई महत्व नहीं है. आज भी अध्यापक के चयन में विषय-ज्ञान की जगह अंग्रेज़ी भाषा ज्ञान को तरजीह दी जाती है. अब, हिन्दी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा के रूप में लागू करवाने के लिए हर साल तरह-तरह के संकल्प लिए जाते हैं. लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं. हर मंत्रालय से कहा जाता है कि वह इस लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भरसक कोशिश करे. लेकिन शिक्षा जगत इस सबसे अछूता रहता है. पता नहीं शिक्षा मंत्रालय क्यों चुप्पी साध लेता है? यहाँ लगातार हिन्दी पिछडती जा रही है.

जब मैं बच्चा था, मेरे जिले में एक भी अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल नहीं था. अमीर-गरीब सब हिन्दी माध्यम की समान शिक्षा ग्रहण करते थे. आज उस जिले के दो जिले हो गए हैं और अकेले मेरे जिले में ही तथाकथित अंग्रेज़ी माध्यम के 500 स्कूल खुल गए हैं. वे अंग्रेज़ी सिखा रहे हों या नहीं, नहीं मालूम, इतना तय है कि वे हिन्दी से दूर रहने की हिदायत जरूर देते हैं. गाँव-गाँव तक यह सन्देश पहुंचा दिया गया है कि यदि आगे बढना है तो अंग्रेज़ी सीखना जरूरी है. हम यह नहीं कहते कि हिन्दी नहीं बढ़ रही. वह भी बढ़ रही है लेकिन अंग्रेज़ी उससे दस गुना तेज रफ्तार से बढ़ रही है. पहले समझा जाता था कि हिंदी दलितों-पिछड़ों की भाषा है. लेकिन उन्हें भी यह समझ में आ गया है कि हिन्दी के भरोसे वे बहुत आगे नहीं बढ़ पायेंगे. उनके एक नेता चन्द्रभान प्रसाद ने इसीलिए ‘अंग्रेज़ी देवी’ की पूजा करने का आह्वान किया है. उनका कहना है कि तरक्की का राजमार्ग अंग्रेज़ी से होकर ही गुजरता है.

आजादी के समय कहा गया था कि दस साल के भीतर हिन्दी में अनुवाद की सारी व्यवस्था कर ली जाये. विज्ञान और इंजीनियरिंग की किताबों को हिन्दी में कर लिया जाए. यानी भविष्य में उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी की बजाय हिन्दी में हो. उसके लिए कोशिशें भी हुईं. वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग बना. केन्द्रीय हिन्दी संस्थान बना, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय बना, राज्यों के भाषा विभाग और हिन्दी अकादमियां बनीं. शब्दकोष बने. किताबें लिखी गयीं. लेकिन हिन्दी माध्यम लागू करने की दिशा में हम एक कदम आगे तो दो कदम पीछे ही रहे. गणतंत्र हुए 65 साल हो गए. 1950 में हिन्दी माध्यम की जो किताबें थीं, वे भी गायब हो गयीं. जिन राज्यों में छठी कक्षा से अंग्रेज़ी लागू होती थी, उन्हें भी लगा कि उनके बच्चे पिछड़ रहे हैं. लिहाजा वहाँ भी पहली से ही अंग्रेज़ी लागू होने लगी. उच्च शिक्षा तो दूर, स्कूलों से ही हिन्दी-माध्यम गायब होता जा रहा है. हिन्दी पढ़ना मजबूरी की भाषा बन गयी है. इस देश में जर्मन को तो पिछले दरवाजे से जबरन लागू किया जा सकता है, लेकिन हिन्दी को नहीं.

यही हाल उच्च शिक्षा में हिन्दी का है. एक तरफ कहा जाता है कि हिन्दी में विज्ञान की किताबें नहीं हैं. केंद्र सरकार की राजभाषा नीति के तहत ही हर मंत्रालय हिन्दी में मौलिक लेखन के लिए, अंग्रेज़ी किताबों को हिन्दी में अनूदित करने के लिए लेखकों को हर साल लाखों रुपये के पुरस्कार देता है. इस नज़रिए से देखें तो विज्ञान की सैकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं. समाज विज्ञानों में तो पहले ही हिन्दी में पुस्तकें हैं. लेकिन ये किताबें पुस्तकालयों में घुन का भोजन बनती रहती हैं. क्योंकि इन्हें विद्यार्थियों तक नहीं पहुँचने दिया जाता. हिन्दी माध्यम लागू हो तब न! अब पत्रकारिता का ही उदाहरण लीजिए. यहाँ 70 प्रतिशत नौकरियाँ हिन्दी में हैं. लेकिन नए खुले केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता का माध्यम केवल अंग्रेज़ी रखा गया है. हिन्दी माध्यम से स्नातक परिक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्रो के लिए इन विश्वविद्यालयों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं.

पिछले दिनों दिल्ली से दूर एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में जाने का मौक़ा मिला. वहां जो छात्र स्नातकोत्तर कर रहे थे, उन्हें देखकर कहीं से भी नहीं लग रहा था कि वे अंग्रेज़ी वाले होंगे. फिर उसी शहर के एक प्रमुख हिन्दी अखबार के सम्पादक से मिलना हुआ. (वहाँ से हिन्दी के ही अखबार छपते हैं.) उनका कहना था कि जो बच्चे उनके पास प्रशिक्षण के लिए आते हैं, उन्हें भाषा आती ही नहीं. कहाँ से आयेगी? उन्हें तो जबरन अंग्रेज़ी रटाई जा रही थी. वास्तव में वे न हिन्दी के रह गए थे और न अंग्रेज़ी ही सीख पाए थे.यानी गणतंत्र के 65 वर्ष बाद भी जिस देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालय हिन्दी के साथ इस तरह का भेदभाव बरतते हैं, उस देश में आप किस भाषाई आजादी की बात करते हैं? तमाम निजी विश्वविद्यालयों से हिन्दी बाहर है. इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रबंधन संस्थानों में हिन्दी के लिए कोई स्थान नहीं है. सब जगह अंग्रेज़ी के विभाग हैं, हिन्दी के नहीं. ऐसे में आप हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा भी बना लेंगे तो कौन-सा एवरेस्ट फतह कर लेंगे?

हम चाहे लाख विश्व हिन्दी सम्मलेन आयोजित कर लें, जब तक शिक्षा से हिन्दी को दूर रखेंगे, तब तक कोई लाभ होने वाला नहीं है.( हिंदुस्तान, १४ सितम्बर, २०१५ को प्रकाशित लेख का विस्तारित रूप.)

प्रोफ़ेसर गोविंद सिंह उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी के पत्रकारिता एवम मीडिया अध्ययन विद्याशाखा के निदेशक हैं. आरंभिक शिक्षा गाँव में ही. उच्च शिक्षा- चंडीगढ़ में. बी ए आनर्स (हिंदी) में पंजाब विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया. एम् ए., एम् फिल (हिंदी) में भी प्रथम श्रेणी प्रथम स्थान. पीजी डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन और पीएच डी भी पंजाब विश्वविद्यालय से ही. पीजी डिप्लोमा इन जर्नलिज्म भारतीय विद्या भवन से. संपादन के पर्चे में देश भर में प्रथम. फ्रैंक मोरेस पदक प्राप्त. राष्ट्र की भावात्मक एकता पर निबंध में हजारी प्रसाद द्विवेदी स्वर्ण पदक.

हिंदी पत्रकारिता में समग्र योगदान के लिए राष्ट्रपति के हाथों गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार- हिंदी सेवी सम्मान. बलराज साहनी राष्ट्रीय पुरस्कार, उत्तराखंड गौरव सम्मान और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय का विशिष्ट शिक्षक सम्मान.

पत्रकारीय स्वतंत्र लेखन 1978 से. 1982 में टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप में प्रशिक्षार्थी पत्रकार के रूप में शुरुआत. धर्मयुग और नव भारत टाइम्स में प्रशिक्षण के बाद नव भारत टाइम्स, मुंबई में उप संपादक. चार वर्ष तक अखबार के लिए नियमित नाट्य समीक्षा की.

नव भारत टाइम्स, दिल्ली में 1990 से 1999 तक सहायक संपादक. इस दौरान अखबार का साप्ताहिक परिशिष्ट ‘रविवार्ता’ और बाद के चार वर्ष सम्पादकीय पृष्ठ का का प्रभार. 1999 से 2002 तक जी न्यूज और आजतक चैनलों में क्रमशः डिप्टी एडिटर और वरिष्ठ निर्माता और उनके अनुसंधान विभागों का प्रभारी. 2002 में आउटलुक साप्ताहिक शुरू होने पर असोशिएट एडिटर के रूप में ज्वाइन किया और पत्रिका की आरंभिक संरचना बनाने और स्तरीय स्वरुप देने में योगदान.

2003 में अमेरिकी दूतावास से प्रकाशित होने वाली पत्रिका स्पैन का हिन्दी संस्करण शुरू हुआ तो इसके संपादक का दायित्व मिला.

2005 में असोशिएट एडिटर के तौर पर दैनिक अमर उजाला ज्वाइन किया. और इसके फीचर और विचार पृष्ठों का कार्यभार सम्भाला. दो वर्ष में ही अमर उजाला में कार्यकारी संपादक बन गया. और मुख्य संस्करण के अतिरिक्त कई कम्पैक्ट संस्करणों का भी कार्यभार. अमर उजाला बरेली और दिल्ली संस्करणों का संपादन. मार्च 2010 से अगस्त 2011 तक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी में कार्यकारी संपादक का दायित्व.

दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैम्पस में 15 वर्षों तक हिन्दी पत्रकारिता में विजिटिंग फैकल्टी के तौर पर अध्यापन. साथ ही भारतीय जनसंचार संस्थान, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, राजस्थान विश्वविद्यालय और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, वाईएमसीए तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से भी जुडाव..

अब अगस्त 2011 से उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी में पत्रकारिता एवम जनसंचार में प्रोफ़ेसर एवम अध्यक्ष.

दो अनुदित और दो संपादित पुस्तकें प्रकाशित. दो पुस्तकें प्रकाशनाधीन.

 

 

 

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