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‘बड़ी खबर’ कितनी बड़ी?

कुमार कौस्तुभ |

मीडिया, खासकर समाचारों की दुनिया की शब्दावली में ‘बड़ी खबर’ जाना-पहचाना टर्म है। आमतौर पर इसे ‘हेडलाइन’ भी माना जाता है। लेकिन, ‘हेडलाइन’ और ‘बड़ी खबर’  की टर्मिनोलॉजी में कुछ बुनियादी फर्क है जिसे ‘बड़ी खबर’ पर चर्चा करने से पहले साफ कर देना जरूरी है। टीवी और रेडियो जैसे सबसे डायनेमिक समाचार माध्यमों के लिए कोई खबर पहले ‘बड़ी खबर’ हो सकती है और बाद में ‘हेडलाइन’। सबसे महत्वपूर्ण बात- ‘बड़ी खबर’ के लिए ‘हेडलाइंस’ तक ड्रॉप हो सकती हैं, ‘हेडलाइंस’ के लिए ‘बड़ी खबर’ नहीं रोकी जा सकती। इसे और आसानी से इस तरह समझें कि टीवी पर जब भी कोई खबर ब्रेक होती है या किसी भी स्लॉट में चल रहे प्रोग्राम या शो या बुलेटिन की निरंतरता को तोड़कर अचानक पेश की जाती है, तो वह उस वक्त की सबसे ‘बड़ी खबर’ हो सकती है। जाहिर है, ये ‘बड़ी खबर’ हेडलाइन बनेगी और टॉप ऑफ द ऑवर या बुलेटिन की शुरुआत या अंत में पेश की जानेवाली हेडलाइंस के पारंपरिक ढांचे में भी जगह हासिल करेगी औऱ तब वो खबर ‘हेडलाइन’ कहलाएगी। एक न्यूज़ चैनल तेज़ ने तो अब हेडलाइंस से पहले ‘अभी की बड़ी खबर’ दिखाने की परंपरा शुरु की है। पहले भी आईबीएन7, इंडिया टीवी जैसे कई चैनल हेडलाइंस से ठीक पहले 3 बड़ी खबरें या इस तरह से बुलेटिन में आगे दिखाई जानेवाली खबरों की झलक दिखाने के प्रयोग कर चुके हैं, हालांकि वो अलग मामले हैं। ‘बड़ी खबर’ की प्रस्तुति के मामले में बात उलटी भी हो सकती है, कई घंटों से हेडलाइंस में चल रही कोई खबर किसी खास स्लॉट में ‘बड़ी खबर’ के रूप में पेश की जा सकती है क्योंकि उस पर खास फोकस हो सकता है। ये ‘बड़ी खबर’ और ‘हेडलाइन’ खबर के बुनियादी फर्क हैं। इंटरनेट आधारित समाचार माध्यमों में यह व्यवस्था अलग हो सकती है क्योंकि खबरों की प्रस्तुति का सिस्टम भी वहां अलग है।

बहरहाल, ‘बड़ी खबर’ पर आधारित इस विमर्श के कुछ और भी पहलू हो सकते हैं। लेकिन, ये बात सबसे महत्वपूर्ण और गौर करने योग्य है कि खासतौर से वो लोग जो 24 घंटे समाचारों की दुनिया में जीते हैं, काम करते हैं, और टीवी न्यूज़रूम की चालू भाषा में कहें तो खबरों से खेलते हैं, उनके लिए ‘बड़ी खबर’ की अहमियत बहुत ज्यादा होती है। टीवी हो या रेडियो, या फिर इंटरनेट के समाचार चैनल या अखबार या समाचार पत्रिकाएं, समाचार संप्रेषण के हर माध्यम में ‘बड़ी खबर’ का मुद्दा उठता ही उठता है और हर खबरिया आदमी हर पल ये तय करने में जुटा रहता है कि आखिर उसके लिए किसी समय विशेष में बड़ी खबर क्या है? ऐसे में ये सवाल शाश्वत है कि आखिर क्या है ‘बड़ी खबर’? कोई एक खबर कब बड़ी हो सकती है, कैसे बड़ी हो सकती है, कितनी बड़ी हो सकती है, आखिर ‘बड़ी खबर’ की पहचान क्या है?‘बड़ी खबर’ को कैसे पेश किया जाना चाहिए? किसी पल के लिए ‘बड़ी खबर’ आखिर कब तक बड़ी रहती है या रह सकती है? ये तमाम सवाल ‘बड़ी खबर’ के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं और खबरों की दुनिया में काम करनेवाले तमाम लोग इन सवालों से दो-चार होते रहते हैं।

असल में देखें तो ‘बड़ी खबर’ कितनी देर बड़ी रहती है और कितनी देर बाद वो छोटी खबर में तब्दील होकर आखिकार मर जा सकती है ये तय करना तो वास्तव में खबरिया लोगों का ही काम है, और ये भी कहा जा सकता है कि कोई भी खबर ‘बड़ी खबर’ हो सकती है, ये भी खबरों की दुनिया के लोग ही तय करते हैं, लेकिन आमतौर पर ये तो मान ही लिया जाता है कि अमुक खबर में ‘बड़ी खबर’ होने का पोटेंशिय़ल है, काबिलियत है और अमुक में नहीं है। ये काबिलियत वाली बात तय़ होती है मीडिया माध्यमों की मानसिकता से, उनके स्वरूप से, उनके टार्गेट ऑडिएंस से और, और भी कई ऐसे पहलुओं के जरिए जो खबरों में, उनके विस्तार में, उनके संसार में निहित होते हैं। समाचार माध्यमों में काम करनेवाले लोगों को रोज ही ‘बड़ी खबर’ के बड़े पहलुओं से रूबरू होने का मौका मिलता है। लेकिन, इस मुद्दे पर गहराई से विचार करना अकादमिक अध्ययन का भी विषय हो सकता है, इस पर शायद ही कभी चर्चा हुई हो। पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में खबरों, हेडलाइंस, स्क्रिप्टिंग और खबरों से जुड़े अन्य पहलुओं की चर्चा होती है, पर अमूमन इस बात पर विचार नहीं होता, इसका संधान नहीं होता कि ‘बड़ी खबर’ अपने-आप में खबरिया क्रियाकलापों का कितना जरूरी पहलू है। वास्तव में ये तो पत्रकारिता के व्यावहारिक पक्ष से जुड़ा पहलू है, जिसकी जानकारी छात्रों को पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद किसी समाचार संगठन, किसी टीवी चैनल या अखबार या किसी और माध्यम में काम करते हुए ही मिलती है और वरिष्ठ सहयोगियों के संसर्ग में इसकी समझ भी विकसित होती है कि कब कोई खबर वाकई ‘बड़ी खबर’ हो सकती है या नहीं। पत्रकारिता के छात्रों की जरूरत को देखते हुए यहां अलग-अलग माध्यमों में ‘बड़ी खबर’ के कांसेप्ट पर विस्तार से विचार करने की कोशिश की गई है।

टीवी के लिए बड़ी खबर क्या है?

5 अप्रैल 2014, समय दोपहर 1.25 बजे –एक टीवी न्यूज़ चैनल के न्यूज़रूम में डेढ़ बजे का बुलेटिन प्रोड्यूसर बुलेटिन को अंतिम रूप देने में लगा हुआ है। उस वक्त की खबरों में बीजेपी के नेता अमित शाह के विवादित बयान और उस पर प्रतिक्रियाओं की झड़ी लगी हुई है। उसी वक्त, गुजरात के गांधीनगर से बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी के लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरने की लाइव तस्वीरें न्यूज़रूम के फीड मॉनिटर पर लाइव आ रही हैं। नरेंद्र मोदी भी लंबे समय बाद आडवाणी के साथ नज़र आ रहे हैं। पल भर में संपादकीय सलाह-मशविरा होता है और एजेंडा बदल जाता है। बुलेटिन की शुरुआत आडवाणी और मोदी की एक साथ तस्वीरों से होती है, जो लाइव मिल रही होती हैं और बुलेटिन का तकरीबन आधा से ज्यादा वक्त इन्हीं तस्वीरों को दिखाते हुए गुजरता है। ये एक उदाहरण है ‘बड़ी खबर’ का जिससे टीवी चैनल का बुलेटिन शुरु हुआ और उस पर केंद्रित हो गया। सवाल इसमें ये है कि ‘बड़ी खबर’ इसमें क्या थी? टीवी के नजरिये से देखें तो उस वक्त की बड़ी खबर मोदी और आडवाणी के मिलन की तस्वीरें थीं क्योंकि पहले पीएम पद की दावेदारी, फिर गांधीनगर सीट से उम्मीदवारी के विवाद के बाद, लंबे समय बाद बीजेपी के बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी और बीजेपी के नए क्षत्रप नरेंद्र मोदी एक साथ दिख रहे थे, एक-दूसरे की तारीफ के कसीदे पढ़ रहे थे। वाकई टीवी पर दिखाने के लिए ये उस खास वक्त की सबसे अच्छी तस्वीर थी। क्योंकि, एक तो दिन सियासी खबरों का था, साथ ही साथ, ये उसी वक्त की लाइव तस्वीरें थीं, जब बुलेटिन चलना था। अमित शाह के बयान पर विवाद से जुड़ी खबरें दर्शक सुबह से देख रहे थे और शायद कोई और ऐसी खबर थी ही नहीं जो इतनी बड़ी हो कि बुलेटिन की पहली खबर और सबसे महत्वपूर्ण खबर बन सके। ये एक उदाहरण भर है।

उदाहरण और भी हो सकते हैं और रोज देखने को मिलते हैं। ऐसा भी नहीं है कि जब भी किसी घटना की लाइव तस्वीरें आ रही हों, तो उनसे बुलेटिन की शुरुआत करना जरूरी हो। टीवी के बुलेटिन की सबसे महत्वपूर्ण खबर क्या हो, ये तात्कालिकता और सामयिकता के साथ-साथ खबरों की प्रकृति, उनके स्थान और परिवेश पर भी निर्भर करता है। साथ ही साथ इस पर भी निर्भर करता है कि प्रतिद्वंद्वी चैनल क्या चला रहे हैं, यानि किस खबर को प्रमुखता से दिखा रहे हैं। उस वक्त अगर चैनल के टार्गेट एरिया से जुड़े किसी इलाके में किसी बड़े हादसे की खबर, और तस्वीरें मिल रही होतीं, तो ये तय करना शायद और मुश्किल होता कि प्रमुखता किस खबर को दी जाए, सियासी खबर को, य़ा हादसे में हुए नुकसान से जुड़े मानवीय पहलू से जुड़ी खबर को। ऐसे तमाम मौके रोज ही आते हैं, जब बुलेटिन प्रोड्य़ूसर को बुलेटिन को अंतिम रूप देते हुए इस चुनौती से जूझना पड़ता है कि आखिर बुलेटिन की सबसे ‘बड़ी खबर’ क्या हो। ऐसे में वो वरिष्ठ सहयोगियों, संपादकीय प्रभारियों की सलाह लेता है और अपने विवेक का भी इस्तेमाल करता है और चैनल के स्वरूप, उसकी मानसिकता, उसके टार्गेट को ध्यान में रखते हुए ‘बड़ी खबर’ का चयन करता है। राष्ट्रीय चैनलों की बात छोड़ दें, तो दिल्ली-एनसीआर या यूपी या एमपी या राजस्थान के किसी क्षेत्रीय चैनल के लिए मोदी-आडवाणी की खबर ‘बड़ी खबर’ नहीं भी हो सकती थी, वैसे ही किसी बिज़नस चैनल के लिए भी मोदी-आडवाणी मिलन का खबरिया महत्व इतना नहीं हो सकता।

टेलीविजन के समाचार चैनलों में अक्सर ‘बड़ी खबर’ का अर्थ ब्रेकिंग न्यूज़ से भी लिया जाता है, यानी जिस वक्त किसी महत्वपूर्ण घटना से जुड़ी खबर आए, उसी वक्त उसे प्रसारित कर दिया जाए। लेकिन, जहां तक मेरा मानना है, ब्रेकिंग न्यूज़ ‘बड़ी खबर’ का एक रूप हो सकती है, ‘बड़ी खबर’ को पेश करने का एक जरिया हो सकती है। लेकिन जो विस्तार ‘बड़ी खबर’ की प्रस्तुति में होना चाहिए, वो ब्रेकिंग न्यूज़ में अक्सर नहीं होता क्योंकि खबर से जुड़ी जानकारी, तस्वीरों और अन्य अंगों के अभाव में किसी खबर को ब्रेकिंग न्यूज़ के ढ़ांचे में पेश करके टीवी चैनल के बुलेटिन में दूसरी खबरों को भी दिखाने की पूरी कोशिश रहती है। हां, अगर, कोई खबर लगातार डेवलप हो रही है, उससे जुड़ी जानकारियां बढ़ रही हैं, तस्वीरें औऱ बाइट्स मिल रही हैं, तो ब्रेकिंग न्यूज के ढांचे में भी 10-15 मिनट से लेकर आधे-एक घंटे तक का वक्त उसके लिए कम पड़ सकता है और वो खबर न सिर्फ एक बुलेटिन बल्कि पूरे दिन या 24 घंटे के लिए बड़ी खबर बनी रह सकती है बल्कि अगले दो-चार दिन उसका असर दिख सकता है। याद रहे, मुंबई में 2008 के आतंकवादी हमले की खबरें तकरीबन ढाई-तीन दिन से ज्यादा लगातार टीवी चैनलों पर छाई रही थीं, जब तक कि पूरा ऑपरेशन संपन्न नहीं हो गया।

लेकिन, ऐसा भी देखा जाता है कि ब्रेक्रिंग न्यूज़ के तौर पर किसी बुलेटिन में सबसे पहले दिखाई जानेवाली कोई खबर अगले बुलेटिन्स से नदारद हो और उसकी जगह कोई और खबर ले ले। ऐसा इसलिए क्योंकि समय और परिस्थितियों के मुताबिक, बुलेटिन के लिए दूसरी कोई खबर ‘बड़ी खबर’ के तौर पर मुफीद हो सकती है। ये सब टीवी चैनलों के संपादकीय प्रभारियों और बुलेटिन प्रोड्यूसर्स को तय करना होता है कि किस वक्त, किस बुलेटिन में कौन सी खबर ‘बड़ी खबर’ के तौर पर पेश की जाए। इस प्रक्रिया में तमाम खबरों पर हमेशा नज़र रखना अतिआवश्यक है ताकि कहीं कोई ‘बड़ी खबर’ नज़रअंदाज न हो जाए। ‘बड़ी खबर’ खबरों की प्रस्तुति का एक ऐसा कांसेप्ट है जिसके तहत किसी खबर को दिखाने के लिए प्रिसाइज़ रहने या विस्तार में जाने की पूरी छूट होती है। ये न्यूज़ प्रोड्यूसर औऱ संपादकीय टीम पर निर्भर करता है कि वो किसी खबर को कितनी देर ‘बड़ी खबर’ बनाए रखना चाहते हैं। कई बार ये सीमा प्रतिद्वंद्वी न्यूज़ चैनलों पर किसी खबर की कवरेज को देखकर भी तय की जाती है, तो कई बार किसी और नई ‘बड़ी खबर’ के आगमन पर। मूल उद्देश्य खबर से जुड़े हर एलिमेंट को पूरी तरह पेश करना होना चाहिए, ना कि खबर को खींचकर उस पर बने रहना।

अगर किसी खबर से जुड़े विजुअल, बाइट, बैकग्राउंडर, रिपोर्टर के वॉकथ्रू, फोन-इन, विश्लेषकों के इनपुट और सबसे बढ़कर खबर में हो रहे विकास औऱ विस्तार से जुड़ी जानकारियां लगातार हासिल हो रही हों,  और चैनल उन्हें सही तरीके से दिखाने की स्थिति में हो, जिससे दर्शकों की दिलचस्पी उस खबर में बनी रह सके, तो उस ‘बड़ी खबर’ पर बने रहना चाहिए ताकि दर्शकों को पूरी खबर भी मिल सके औऱ दर्शक भी आपके चैनल पर टिके रहें। अगर कई चीजें दोहराई जा रही हों, तो फिर उस बड़ी खबर’ पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण कश्मीर में कई बार हुई मुठभेड़ों की लाइव कवरेज और मुंबई में 26/11 के आतंकवादी हमले की तकरीबन ढाई-तीन दिन चली लाइव कवरेज है। हालांकि मुंबई हमले की लाइव कवरेज को लेकर कई नैतिक औऱ वैधानिक सवाल भी उठे, लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि जब इतनी बड़ी खबर पर लगातार नए-नए इनपुट यानी विजुअल, बाइट औऱ दूसरी तमाम चीजें चैनलों को हासिल हो रही हों, तो उस खबर से भला कौन हटना चाहेगा।

रेडियो के लिए बड़ी खबर क्या है?

रेडियो पर ‘बड़ी खबर’ का कांसेप्ट टेलीविजन से कुछ अलग है। क्योंकि, एक तो ब्रेकिंग न्यूज़ वाली बात रेडियो में आमतौर पर नहीं सुनने में आती ( कभी नया प्रयोग दिख जाए तो बात और है), साथ ही, श्रव्य माध्यम होने के चलते तस्वीरों की कोई जगह नहीं । हां, बुलेटिन के वक्त या उससे ठीक पहले कोई बड़ी घटना की जानकारी आ जाए, तो उसे छोड़ना मुनासिब नहीं समझा जाता, भले ही वो खबर कुछ आगे-पीछे हो जाए। रेडियो में आमतौर पर समग्र बुलेटिन का कांसेप्ट है, जिसमें हर तरह की खबरें हों। ऐसे में किसी एक खबर के बड़े या छोटे होने का सवाल आमतौर पर नहीं उठता। रेडियो बुलेटिन के लिए अगर कोई खबर बड़ी हो, तो वो शुरुआती खबरों में और हेडलाइन में होगी, उस पर ज्यादा वक्त दिया जाए, ऐसा भी कम ही पाया जाता है। खबर को खींचनेवाली बात रेडियो में इसलिए नहीं, क्य़ोंकि तस्वीरों और एंबिएंस की मदद से किसी एक खबर पर ज्यादा देर टिकना यहां मुमकिन नहीं और एक ही लाइन को बार-बार दोहराने की बात हो नहीं सकती। हां, खबर से जुड़ी और भी खबरें हों, तो उन्हें साथ-साथ जरूर पेश किया जा सकता है। वर्ना रेडियो के लिए ‘बड़ी खबर’ का मतलब या तो शुरुआती खबर, या फिर जब आ जाए, तभी पेश कर दी जानेवाली खबर। टेलीविजन के मुकाबले, रेडियो की अपनी सीमाएं हैं। बुलेटिन में हर तरह की खबरें शामिल करने की परंपरा है। ऐसे में बड़ी खबर का मतलब यहां मुख्यतः हेडलाइंस से ही होता है।

इंटरनेट के लिए बड़ी खबर क्या है?

तकनीकी तौर पर सबसे उन्नत होने के कारण इंटरनेट चुंकि टेलीविजन, रेडियो और अखबार- तीनों ही समाचार माध्यमों की सुविधा और संसाधन इस्तेमाल कर सकता है, ऐसे में, इंटरनेट की न्यूज़ साइट्स और सोशल मीडिया के लिए ‘बड़ी खबर’  का मतलब मिला-जुला है। इंटरनेट पर बुलेटिन का वक्त निश्चित नहीं होता, ऐसे में जब जी चाहे, कोई खबर पेश की जा सकती, टेक्स्ट, वीडियो, साउंड अपलोड किए जा सकते हैं। ऐसे में ये सबसे तेज़ गति से खबरों को पेश करने का सबसे आसान माध्यम है। लेकिन, टेलीविजन के मुकाबले इंटरनेट की साइट्स पर किसी वक्त की ‘बड़ी खबर’ की प्रस्तुति थोड़ी धीमी दिखती रही है। इसकी वजह ये हो सकती है कि इंटरनेट के न्यूज़ साइट अभी तक टीवी और अखबार की छाया से उबर नहीं सके हैं। एक तो कम से कम भारत में ज्यादातर न्यूज़ साइट्स किसी न किसी टीवी चैनल या अखबार का हिस्सा हैं, ऐसे में पहले कोई भी खबर टीवी चैनल या अखबार के हिसाब से आती है, फिर वेबसाइट पर आती है। विदेशों में, जहां भी खबरों की स्वतंत्र वेबसाइट्स काम कर रही हैं, वो अपने हिसाब से खबरें पेश करती हैं। मसलन, दुनिया के किसी महत्वपूर्ण हिस्से में भूकंप, या सूनामी या ऐसे किसी औऱ हादसे की खबरें हों, या फिर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जैसे बड़े इवेंट्स की खबरें हों, उन्हें न्यूज़ साइट्स पर तेजी से फॉलो किया जाता है। याद रहे, पॉप गायक माइकल जैक्सन की मौत से जुड़ी खबरें टीवी चैनलों के मुकाबले www.tmz.com जैसी वेबसाइट्स ने ज्यादा तेजी से पेश कीं। ऐसा ही, सुमात्रा के सूनामी और भूकंप के हादसों के बाद भी देखा गया। इन दिनों सोशल मीडिया की माइक्रोब्लॉगिंग साइट्स, ट्विटर और फेसबुक पर खबरों की पेशकश ज्यादा बढ़ गई है। बल्कि, ये कहना गलत नहीं होगा कि ट्विटर और फेसबुक भी टीवी चैनलों, रेडियो और अखबार के समान ही खबरों के माध्यम बन चुके हैं। किसी तय समय में जो भी बड़ी खबरें सोशल मीडिया पर बड़ी हो सकती हैं, या दूसरे शब्दों में जिन मुद्दों पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही हो, उनकी जानकारी ‘ट्रेंडिंग’ के जरिए मिलती है। यानी सोशल मीडिया पर ‘बड़ी खबर’ का मतलब है ‘ट्रेंडिंग’ में जो मुद्दे शामिल हों, आगे चल रहे हों। तो अगर आप ‘ट्रेंडिंग’ पर नज़र रख रहे हैं, तो बड़ी खबरों की जानकारी से महरूम नहीं रह सकते। लेकिन, किसी टीवी चैनल के लिए जो खबर ‘बड़ी खबर’  हो, जरूरी नहीं, वो ‘ट्रेंडिंग’ में भी दिखे। क्योंकि सोशल मीडिया का संसार कुछ तो अलग है ही, टीवी, रेडियो या अखबार की ‘बड़ी खबर’ वहां से गायब भी रह सकती है और जो खबर सोशल मीडिया पर ‘ट्रेंडिंग’ में हो, वो जरूरी नहीं कि टीवी, रेडियो या अखबार में मिल ही जाए। हर माध्यम के लिए ‘बड़ी खबर’ का कांसेप्ट अलग हो सकता है, ये हमेशा ख्याल रखना होगा।

अखबारों के लिए बड़ी खबर क्या है?

बात अखबारों की ‘बड़ी खबर’ की। अखबारों के संस्करण तो 24 घंटे में एक बार छपते हैं, तो उनके लिए बड़ी खबर जाहिर है अलग ही होगी। अखबारों में पहले पन्ने पर सुर्खियों में शामिल खबर ‘बड़ी खबर’ मानी जाती है। अखबारों में चुंकि पिछले दिनभर की खबरें होती हैं, तो उन्हीं में से सबसे महत्वपूर्ण खबरों को सुर्खियों में जगह मिलेगी और वही बड़ी खबरें होंगी, चाहे वो सियासत की खबरें हों, खेल की, या अपराध की या किसी और मुद्दे से जुड़ी खबर। हर अखबार का अपना रोज का एजेंडा होता है, जिसका असर उसकी ‘बड़ी खबर’ पर देखा जा सकता है। मौसम चुनाव का है, तो सियासी बयानबाजी की कोई खबर पहले पन्ने की पहली खबर यानी सबसे बड़ी खबर हो सकती है। किसी बड़ी घटना से जुड़ी खबर भी बड़ी खबर हो सकती है। इतना जरूर ध्यान रखना पड़ता है कि चुंकि अखबार छापकर बेचे जाते हैं और एक बार छप जाने के बाद पन्नों में बदलाव नहीं हो सकता , तो खबर में ऐसा कुछ न जाए, जो या तो पुराना पड़ चुका हो, बासी लगे, या फिर उसकी जानकारी में आमूल-चूल कोई बदलाव हो। ऐसे में अखबार के लिए ‘बड़ी खबर’ चुनना ज्यादा बड़ी चुनौती है टीवी या इंटरनेट के बनिस्पत। हालांकि आजकल ज्यादातर अखबारों के इंटरनेट संस्करण भी चल रहे हैं, लिहाजा, वो भी ‘बड़ी खबर’ को अपने तरीके से पेश कर सकते हैं।

समाचार पत्रिकाओं के लिए क्या है बड़ी खबर?

रही बात समाचार पत्रिकाओं में ‘बड़ी खबर’ की, तो एक बात साफ है कि समाचार पत्रिकाओं को साप्ताहिक या पाक्षिक तौर पर खबरों का लेखा-जोखा देना होता है। ऐसे में उनके लिए ‘बड़ी खबर’ किसी ऐसे खास मुद्दे से जुड़ी हो सकती है, जिसका दूरगामी महत्व हो, जिसमें पाठकों की दिलचस्पी लंबे समय तक बनी रहे। आम तौर पर समाचार पत्रिकाओं में ‘कवर स्टोरी’ या ‘आवरण कथा’ पेश की जाती है, जिन्हें ‘बड़ी खबर’ की श्रेणी में रखा जा सकता है। जैसा कि शीर्षक से ही साफ है, ‘आवरण कथा’ का जिक्र पत्रिका के पहले पन्ने यानी कवर पर रहता है ऐसे में वो ही पत्रिका की प्रमुख खबर हुई। समाचार पत्रिकाओं में बड़ी खबर क्या हो, ये तय करना संपादकों का काम है और दूरदर्शी अनुभवी संपादकगण इसका पूरा ख्याल रखते हैं कि बड़ी खबर वही हो, जो पत्रिका को बेचे। ऐसे में सबसे रोचक, दिलचस्प या सनसनीखेज खबर आमतौर पर ‘कवर स्टोरी’ या ‘आवरण कथा’ बनती है।

 

‘बड़ी खबर’ कितनी बड़ी?

मीडिया की शब्दावली में ‘बड़ी खबर’ इस्तेमाल कब  और कैसे शुरु हुआ, ये तो कहना मुश्किल है। लेकिन, इतना जरूर कहा जा सकता है कि ये टीवी समाचार की भाषा के सरलीकरण की ही देन है। आम बोल चाल में हेडलाइन कही जानेवाली खबरों को बड़ी खबरें कहा जाने लगा, फिर कई टीवी चैनलों ने हेडलाइंस का ही नाम बदलकर बड़ी खबर रख दिया। ज़ी न्यूज़ ने तो ‘बड़ी खबर’ के नाम से समाचार कार्यक्रम ही शुरु किया था जिसे काफी समय तक मशहूर एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी पेश करते थे। दरअसल, ‘बड़ी खबर’ किसी भी प्रमुख खबर को अहमियत के साथ पेश करने का एक तरीका, एक ढांचा बन गया, जिसका इस्तेमाल अलग-अलग समाचार चैनल, अखबार और दूसरे माध्यम अपने-अपने तरीके से करते आ रहे हैं। लेकिन, ‘बड़ी खबर’ का कांसेप्ट एक तरह से देखें तो सिर्फ प्रमुख खबर तक ही केंद्रित है और कोई खबर किसी समय, किसी परिस्थिति, किसी बुलेटिन, किसी चैनल के लिए कब महत्वपूर्ण हो सकती है, कब बड़ी हो सकती है, ये तो पूर्ण रूप से संपादकीय सरोकारों पर निर्भर है, पत्रकारिता की भाषा और व्याकरण पर नहीं।

कुमार कौस्तुभ : टीवी पत्रकार, फिलहाल एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस से संबद्ध.नौकरी के अलावा ‘मीडिया और रूस में आतंकवाद पर संवाद’ विषय पर शोध प्रगति पर. 2014 में हिंदी टीवी पत्रकारिता पर ‘टीवी समाचार की दुनिया’ नाम की किताब किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित. मीडिया में आने से पहले 2000 में रूसी भाषा से हिंदी में रूसी कवि अलेक्सांद्र पूश्किन की कविताओं का अनुवाद ‘ओ मेरे वसंत के वर्ष’ प्रकाशित. 1999 में IIMC, नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा, 2003 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से पत्रकारिता औऱ जनसंचार में मास्टर्स डिग्री, 1997 में रूसी भाषा में एमए जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से। जनसंचार और पत्रकारिता में NET, रूसी भाषा और साहित्य में जूनियर रिसर्च फेलोशिप प्राप्त. टीवी पत्रकारिता के सिलसिले में टीवी टुडे-आजतक, श्री विनोद दुआ, ज़ी न्यूज़, दूरदर्शन समाचार, आकाशवाणी से जुड़े रहे।

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