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बादलों के देश से विज्ञान लोक में

देवेंद्र मेवाड़ी।

इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरते समय मन में सिर्फ मुंबई था। वहां दो दिन तक बच्चों के लिए क्रिएटिव विज्ञान लेखन पर दूसरे रचनाकारों को सुनना और अपने अनुभव सुनाना था। लेकिन, विमान ज्यों-ज्यों हजार-दर-हजार फुट की ऊंचाइयां पार कर ऊपर उठता गया, पता लगा हम धरती से बहुत ऊपर बादलों के देश में पहुंच चुके हैं।

जहां पहले केवल नीला आसमान और दूर गोलाई में क्षितिज की रेखा दिखाई दे रही थी, वहां अब आसमान में बादलों के झुंड तैर रहे थे। कहीं हलकी सफेद कोहरे की चादर-सी दिखती तो बाबा नागार्जुन कानों में गुनगुनाने लगतेः ‘अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है!’ लेकिन, गिरि और उनके शिखर तो हजारों फुट नीचे छूट चुके थे। यहां बादलों के देश में तो बादलों के ही श्वेत पहाड़ थे, कहीं उन्हीं के श्वेत मैदान दिखाई देते थे। कहीं एक-दूसरे का पीछा करते बादल थे तो कहीं धीमी चाल में एक-दूसरे के साथ-साथ सैर करते बादल थे। उन चलते-फिरते बादलों को देख-देख कर निराला का ‘बादल राग’ सुनाई देने लगता, ‘उथल-पुथल कर हृदय/मचा हलचल/चल रे चल,-/मेरे पागल बादल!’

वहां बादल ही बादल थे- बच्चे बादल, बड़े बादल, बादल ही बादल। कभी हम बादलों के भीतर पहुंच जाते और चारों ओर होता श्वेत, दूधिया संसार! और, कभी वे विशाल नीले सागर में बड़े-बड़े हिमखंडों की तरह नजर आते। हम बादलों के देश में धरती से 10-12 किलोमीटर यानी 30,000 से 40,000 फुट की ऊंचाई के बीच उड़ रहे थे। वैज्ञानिक इसे टोपोस्फियर यानी क्षोम मंडल कहते हैं। इसी में तरह-तरह के बादल बनते हैं जो मोटे तौर पर चार तरह के होते हैं: ढेर जैसे यानी कुमुलस, परत जैसे यानी स्ट्रेटस, घुंघराले बादल यानी सिर्रस और वर्षा बादल यानी निंबस।

विमान की ऊंचाई घटने पर हम फिर बादलों के नीचे आ गए और धरती पर खड़े काले-भूरे पहाड़, रेंगती नदियां, झीलें, खेत और बस्तियां दिखाई देने लगी। अब मुंबई करीब था। वहां सहार अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतर कर अपनी मंजिल टाटा इंस्टिट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च के होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केन्द्र (एच बी सी एस ई) की राह पकड़ी। सारथी ने घाटकोपर, चैंबूर होते हुए ट्रांबे रोड के किनारे मंजिल पर पहुंचा दिया। वहां हरे-भरे पेड़ों से घिरे शांत, एकांत अतिथि गृह में रहने की व्यवस्था की गई थी।

सम्मेलन के बारे में आयोजन समिति के सदस्य और होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केन्द्र के प्रोफेसर डा. कृष्ण कुमार मिश्र ने काफी पहले जानकारी दे दी थी कि इसे नेशनल सेंटर फार साइंस कम्यूनिकेटर्स (एन सी एस सी) और होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केन्द्र के आपसी सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन का उद्घाटन प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक डा. जयंत विष्णु नार्लीकर करेंगे और कई भाषा-भाषी बाल विज्ञान लेखक अपने अनुभव साझा करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा था कि आपको जरूर आना है। मैंने उन्हें बताया कि मैं हिंदी के बाल पाठकों के लिए लिखता हूं, हिंदी में सोचता हूं और हिंदी में ही बोलता हूं। “इसीलिए, आपको आना चाहिए और हिंदी बाल विज्ञान लेखन का प्रतिनिधित्व करना चाहिए,” उन्होंने कहा। तभी सम्मेलन के संयोजक डा. ए. पी. जयरामन का आमंत्रण संदेश भी मिल गया। पता लगा सम्मेलन में डा. नार्लीकर के अलावा डा. बाल फोंडके, डा. वी. एस. वेंकटवर्धन, प्रोफेसर एस. शिवादास, विट्ठल नादकर्णी, कृष्ण कुमार, चांदना चक्रवर्ती, डा. बी.बी. सिंह जैसे नामी बाल विज्ञान लेखक और विज्ञान संचारक भी वक्ता के रूप में भाग ले रहे हैं। सम्मेलन का उद्देश्य अपने दीर्घ लेखन के अनुभव के आधार पर बच्चों के लिए ऐसे विज्ञान लेखन पर चर्चा करना है जिसे बच्चे मन लगा कर आनंद से पढ़ और समझ सकें। यानी, इसे विज्ञान लेखकों के अनुभव की क्रूसिबल में क्रिएटिव विज्ञान लेखन का प्रयोग कहा जा सकता है जो 3 और 4 अक्टूबर को दो दिन तक किया जाएगा।

सम्मेलन की भाषा अंग्रेजी थी। मैंने आयोजकों को स्पष्ट लिखा कि मैं हिंदी में लिखता हूं, इसलिए तभी आ सकता हूं जब वहां में हिंदी में बोलूं। मुझे आयोजन समिति की सहमति मिल गई। सम्मेलन में 150 विज्ञान शिक्षक-शिक्षिकाएं, वैज्ञानिक, विज्ञान संचारक, विज्ञान संपादक आदि भाग ले रहे थे।

लेकिन, सबसे पहले तो हजार शब्दों में यह बताना था कि मैं बाल विज्ञान लेखक बना कैसे? यानी, ‘हाउ आइ डिड इट?’ मैंने लिखा। लिखा कि मुझे लिखने की प्रेरणा मां और प्रकृति मां ने दी। मेरी जिज्ञासाओं के जो उत्तर मिले, उन्हें संगी-साथियों और अन्य लोगों को बताने के लिए मैं लिखता गया। विज्ञान की जानकारी को रोचक और सरस बनाने के लिए हर संभव शैली में विज्ञान लिखने लगा। और, अब देश के अनेक भागों में सीधे स्कूल-कालेजों के बच्चों के बीच जाकर उन्हें विज्ञान की बातें और विज्ञान कथाएं सुनाता हूं। डेढ़ साल में लगभग 5,000 बच्चों को विज्ञान की बातें सुना चुका हूं।

समय था। बाहर निकला। आसपास की हरियाली ने मन मोह लिया।

अतिथि गृह के ठीक बाहर सीता अशोक के वृक्षों की कतार थी। एक ओर ऊंचा बरगद, सामने गुलमोहर, किनारे अमलतास और आगे ऊंचे, घने गुलाबी शिरीष की शाखों से मनीप्लांट की बेलों की झूलती बंदनवार। और आगे, कतार में मुस्तैदी से सीधे खड़े रायल पाम के ऊंचे पेड़। हरा-भरा लान और सामने होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केन्द्र की भव्य इमारत। जिस भीड़ भरी मुंबई के बारे में सुनता आया था, उससे दूर एक शांत, एकांत आश्रम का माहौल था यहां। चारों ओर इतने हरे साथी और नमी में भीगी जमीन और पेड़ों की वह गांव-गंध। अनेक पेड़ों और झाडियों से भेंट हुई।

शाम तक डा. जयंत विष्णु नार्लीकर, कोट्टायम से आए प्रोफेसर शिवादास और उनके साथी चित्रकार वैंकी, मराठी विज्ञान परिषद् के डा. ए. पी. देशपांडे, नेशनल सेंटर फार साइंस कम्यूनिकेटर्स के उपाध्यक्ष डा. ए. पी. जयरामन और नेहरू तारामंडल, मुंबई के पूर्व निदेशक डा. वी. एस. वेंकटवर्धन से भी भेंट हो गई। प्रोफसर शिवादास और वैंकी ने बच्चों के लिए विज्ञान लेखन की बारीकियों पर काफी देर तक चर्चा की।

कहते हैं मुंबई की बरसात का कोई भरोसा नहीं। कभी भी झमाझम बरसने लगती है। वही हुआ। पौने पांच बजे बूंदाबादी शुरू हो गई और उसके बाद तो कुछ इस तरह हो गया कि तुम निकलो तो मैं बरसूं! उसी छिटपुट बारिश में जाकर कैफिटेरिया में हम सभी ने भोजन किया। बारिश थमी तो डा. नार्लीकर के साथ चहलकदमी करते हुए कैफिटेरिया से अतिथि गृह में उनके कमरे तक गया। उस बीच उनसे चंद बातें करने का सुअवसर मिला। मैंने कहा, “सर, मैंने आपकी पहली विज्ञान कथा ‘धूमकेतु’ धर्मयुग में पढ़ी थी।”

उन्होंने कहा, “हां, तब धर्मवीर भारती जी ने मेरी कुछ कहानियां धर्मयुग में छापी थीं। वह बहुत लोकप्रिय पत्रिका थी।”

“मैंने बहुत पहले ‘डक्कन हेराल्ड’ अखबार की रविवारीय पत्रिका में आपके बारे में पूरे पृष्ठ का लेख पढ़ा था। उसमें लिखा था, आपने यह कहानी हवाई अड्डे पर उड़ान का इंतजार करते हुए लिखी थी?”

“हां, फ्लाइट बहुत लेट थी।” मैंने उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ से छपे उनके कहानी संग्रह ‘यक्षोपहार’ के बारे में भी बताया।

“सर, आपको एक रोचक बात बताता हूं। आपके साथ अंतर विश्वविद्यालय खगोल एवं तारा भौतिकी केन्द्र (आयुका) में प्रसिद्ध साहित्यकार भीष्म साहनी जी के सुपुत्र डा. वरुण साहनी भी थे?”

“हां, वे वहां हैं।”

“मैं 1968 में पूसा इंस्टिटयूट, नई दिल्ली में नौकरी कर रहा था और भीष्म जी के पास जाता रहता था। वे मुझे अच्छा मानते थे। तब एक दिन उनके बेटे वरुण का डाक टिकट संग्रह का शौक देख कर मैंने अपना डाक टिकट संग्रह जाकर उसे भेंट कर दिया था। शीला जी और भीष्म जी ने कहा- “वरुण, तुम्हें देवेन को भी तो कुछ देना चाहिए।” तब वरुण ने मुझे जोनाथन एन. लियोनार्ड की पुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग साइंस’ भेंट की थी। वह पुस्तक आज भी मेरे पास है और उसके भीतर वरुण का लिखा एक लेबल चिपका हुआ है: वरुण साहनी, सनोवर, कक्षा-6 बी।”

“इंटरस्टिंग। डा. वरुण ने अपना एक आत्मवृत्तांत लिखा है जिसमें उन्होंने बताया है कि उन्हें जीवन में किस-किस से क्या मिला। नेट पर डाला है उन्होंने।”

मैंने कहा, “सर, भोपाल से छपने वाली हिंदी मासिक पत्रिका ‘इलैक्ट्रानिकी आपके लिए’ के सितंबर 2015 अंक में युवा विज्ञान लेखक मनीष गोरे का लिखा आपका इंटरव्यू छपा है। देखा आपने?“

“नहीं, अभी पत्रिका मिली नहीं।”

हम बातें करते हुए अतिथि गृह के पास पहुंच चुके थे। मैंने बाईं ओर इशारा करके कहा, “सर, ये सीता अशोक के वृक्ष हैं। कम जगहों में दिखाई देते हैं।”

वे बोले, “पहचानता हूं इन्हें। हमने आयुका में भी सीता अशोक के वृक्ष लगाए हैं। कई और वृक्ष भी लगाए हैं।”

अब तक डा. ए.पी. जयरामन भी आ गए थे। हम डा. नार्लीकर को पहली मंजिल में उनके कमरे तक पहुंचा कर लौट आए।

सुबह 5.20 बजे उठ कर नींबू पानी पिया। फिर काली चाय पी और पेड़ों से मिलने निकल पड़ा। एच बी सी एस ई की इमारत के लान में अठारह कव्वे सुबह की कवायद कर रहे थे। चार-छह मैनाएं भी भीगी घास में कलेवा खोज रही थीं। इमारत के आगे फर्न ट्री और नारियल के पेड़ से भेंट हुई। वहां दो-दो की कतार में तीखे कांटों से सजी हरी चंपा की झाड़ी मिली। इमारत के साथ चटख पीले तुरही जैसे फूलों से लदी एलामैंडा बेल इठला रही थी। बगल में महाराष्ट्र की शान जारुल यानी ताम्हण का पेड़ खड़ा था। वहीं आसपास समुद्रफल, फिजी पैन पाम, सागरगोटा, चारकोल ट्री और डिकामाली से मुलाकात हुई। दाहिनी ओर की बगिया में सफेद और लाल चंपा दोनों गले लग कर साथ-साथ खिल रही थीं। वहां खट्टा मिरी आंवला और इमली भी मिले। गमलों में कामिनी, मोगली एरंड, बिगोनिया और वोगेनवेलिया से भेंट हुई।

रात कमरे में रोशनी बुझा कर सोया तो कुछ देर पहले जिन पेड़ों और लता गुल्मों से मिला था उन्हें मन ही मन याद करने लगा, कि उस धुप्प अंधेरे में मुक्तिबोध अपनी कविता ‘मुझे मालूम नहीं’ की पंक्तियां सुनाने लगे। मैं चुपचाप सुनता रहा:

गन्ध के सुकोमल मेघों में डूबकर
प्रत्येक वृक्ष से करता हूँ पहचान,
प्रत्येक पुष्प से पूछता हूँ हाल-चाल,
प्रत्येक लता से करता हूँ सम्पर्क!!
और उनकी महक-भरी
पवित्र छाया में गहरी
विलुप्त होता हूँ मैं, पर
सुनहली ज्वाल-सा जागता ज्ञान और
जगमगाती रहती है लालसा।
मैं कहीं नहीं हूँ।
कविता सुनते-सुनते कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।

3 अक्टूबर को सम्मेलन का पहला दिन था। अपने बीज वक्तव्य में डा. नार्लीकर ने क्रिएटिविटी यानी सर्जनात्मकता, सृजन और आविष्कार का अंतर बताते हुए एक विदेशी अध्ययन का ज़िक्र किया। अध्ययन में पता लगा कि शिक्षक सर्जनात्मकता को प्रायः नहीं सराहते। आमतौर पर सभी जगह यही समझा जाता है। लेकिन, विज्ञान को अधिक आसान और रोचक बनाने के लिए हमें साहित्य का सहारा लेना चाहिए। उन्होंने माइकेल फैराडे और अन्य वैज्ञानिकों का उल्लेख करते हुए बताया कि किस तरह अपने व्याख्यानों और लेखन से उन्होंने आम लोगों को सरल भाषा में विज्ञान समझाया।

उन्होंने कार्ल सांगा के धारावाहिक ‘कास्मोस’, फ्रेड हायल के उपन्यास ‘ब्लैक क्लाउड’, रे ब्रेडबरी और स्वयं अपनी विज्ञान कथाओं का उल्लेख किया। डा. नार्लीकर ने कहा कि साइंस फिक्शन यानी विज्ञान गल्प की विधा से विज्ञान को बहुत रोचक ढंग से समझाया जा सकता है।

अन्य वक्ताओं ने अपने-अपने ढंग से बच्चों के लिए विज्ञान को सरस और रोचक बनाने के सुझाव दिए। डा. बाल फोंडके ने बच्चों के लिए विज्ञान लेखन में ऐसी सरल भाषा का प्रयोग करने का सुझाव दिया जिसे बच्चे आसानी से समझ कर विज्ञान का आनंद उठा सकें। उन्होंने कहा कि पंचतंत्र, हिमोपदेश, इसप की कहानियां और ‘एलिस इन वंडरलैंड’ जैसी रचनाएं इसीलिए लोकप्रिय हुईं कि बच्चे उन्हें आसानी से समझ सकते थे। उनकी भाषा सरल थी, उनमें जिज्ञासा और रोमांच था। उन्होंने बताया कि उन्होंने किस तरह विज्ञान समझाने के लिए ‘विक्रम और बेताल’ का सहारा लिया। उन्होंने बेताल को बीते हुए समय का और विक्रम को संवत्सर का प्रतीक बनाया। उन्होंने कहा, बच्चों के लिए तमाम विषयों पर मजेदार विज्ञान कथाएं लिखी जा सकती हैं।

भारत ज्ञान-विज्ञान समिति के अध्यक्ष कृष्ण कुमार ने अपनी खरी-खरी बातों में साफ कहा कि अक्सर शिक्षक-शिक्षिकाएं बच्चों की प्रश्न पूछने की सहज प्रवृत्ति को दबाने में कड़ी मेहनत करते हैं ताकि वे शांति से सिर्फ सुनें। लेकिन, बच्चे स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक होते हैं। उनमें क्यों, कहां, कैसे, किसलिए पूछने की जिज्ञासा होती है। यह समझना चाहिए कि विज्ञान केवल संकल्पना या सिद्धांत नहीं है। यह प्रकृति के रहस्यों का रोचक अनावरण है। इसलिए बच्चों को पूरा प्यार और सम्मान देते हुए हम अपनी विज्ञान की पुस्तकों में थोड़ा जुनून और जिज्ञासा का पुट भी डालें। अन्यथा, वे पढ़-लिख कर ऐसे विशेषज्ञ बन जाएंगे जिनके लिए मैदान में घास चरती गाय केवल प्रणिविज्ञान, घास वनस्पति विज्ञान, कंकड-पत्थर भूगर्भ विज्ञान, वहां फैली धूप भौतिकी और आसपास बहता पानी रसायन विज्ञान भर होगा। बच्चों को वह दृश्य संपूर्ण रूप में देखने, समझने दीजिए।

बच्चों के लिए 170 पुस्तकें लिख चुके वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर शिवादास और उनके साथी चित्रकार वैंकी ने बच्चों की पुस्तकों के लेखन-चित्रांकन पर विस्तार से बातें कीं। प्रोफेसर शिवादास का कहना था कि अधिकांश बच्चे विज्ञान को एक जरूरी परेशानी मानते हैं जिसे रट कर परीक्षा में अच्छे अंक और फिर नौकरी हासिल की जा सकती है। जबकि, विज्ञान बहुत आनंददायक विषय है। बच्चों को इसकी बुनियादी बातें समझा दी जाएं तो वे इसका आनंद उठाने लगेंगे। उन्हें प्रश्न पूछने दीजिए, उनके उत्तर दीजिए। उन्हें भी उत्तर खोजने दीजिए। विज्ञान को कथा-कहानी, गीत और नाटक के रूप में लिख कर उसे रोचक बनाइए। तब बच्चे विज्ञान का आनंद उठाएंगे और उनके मन में नए मौलिक विचार आएंगे। क्रिएटिव विज्ञान साहित्य विज्ञान की जमीन में पनपता और खिलता है। इसलिए उसमें विज्ञान और साहित्य, दोनों की खुशबू होती है। साहित्य रूखे तथ्यों को रोचक और रोमांचक विचारों में बदल देता है।

डा. वेकटवर्धन ने अपनी विज्ञान कविताओं से साबित कर दिखाया कि कविता और गीतों में विज्ञान को कितनी खूबसूरती से गूंथा जा सकता है। इसका उदाहरण थीं उनकी ‘आफ वाटर एंड बुक्स’, ‘लाइट’, ‘जस्ट ए सेकेंड’ और ‘मसाला दोसा’ आदि कविताएं। ‘लाइट’ यानी ‘रोशनी’ कविता की शुरूआत उन्होंने अलैक्जैंडर पोप के इस कथन से कीः ‘प्रकृति और प्रकृति के नियम अंधकार में छिपे थे। ईश्वर ने कहा, न्यूटन प्रकट हो! और, चारों ओर प्रकाश फैल गया।’

क्या है प्रकाश?
वैज्ञानिक कहते हैं “दृष्टि के लिए विकिरणकारी विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा।”
पर क्या है यह? कण या तरंग?
कभी लगता है तरंग, कभी लगता है कण
कहते हैं आप, रोशनी है
विभाजित व्यक्तित्व!

इसी तरह वे ‘बस एक सेकेंड’ कविता की शुरूआत आस्टिन डाब्सन के इस कथन से करते हैं: “बीत जाता है समय, आप कहते हैं? नहीं! हाय समय तो मौजूद रहता है, हम बीत जाते हैं।”

देर दोपहर घनघोर बारिश शुरू हो गई और देर शाम तक बरसती रही। बाद में हल्की बूंदाबादी के बीच तेजी से कमरे में लौट आया।

बहरहाल दो दिन के सम्मेलन में सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों तक विज्ञान पहुंचाने के लिए उसे साहित्य की सरसता दी जाए। इसके लिए विभिन्न शैलियों और विधाओं में विज्ञान लिखा जाए। मैंने भी अपनी यही बात हिंदी में समझाई और बच्चों के बीच बटोरे गए अपने अनुभवों को सभी के साथ साझा किया। बायोडायवर्सिटी यानी जैव विविधता जैसे विषय पर अपने गीत ‘जीवन तेरे रूप अनेक’ को सस्वर सुना कर सरस विज्ञान का उदाहरण दिया। श्रोताओं का साथ मिला।

कुछ देर प्रोफेसर कृष्ण कुमार मिश्र के साथ उनके कक्ष में विज्ञान लेखन पर चर्चा करने का भी अवसर मिला। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी भेंट कीं। अगली सुबह लौटने की तैयारी की। सहार अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से मुंबई को अलविदा कहा और बरास्ता बादलों के देश, दोपहर बाद नई दिल्ली पहुंच गया। Source: Vigyan Diary, http://devenmewari.in/

देवेंद्र मेवाड़ी जाने–माने विज्ञान लेखक हैं. संपर्क : फोनः 28080602, 9818346064, E-mail: dmewari@yahoo.com

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