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Monthly Archives: December 2017

कूप-जल नहीं, भाखा बहता नीर

language

अकबर रिज़वी | भाषा सिर्फ हिन्दी, अँग्रेज़ी, उर्दू आदि ही नहीं होती, बल्कि हाव-भाव भी एक भाषा ही है। भाषा का कोई स्थाई मानक नहीं होता। ख़ास-तौर से जनभाषा न तो विशुद्ध साहित्यिक हो सकती है और न ही व्याकरण के कठोर नियमों से बांधी जा सकती है। जन-साधारण में ...

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Development and Rural Reporting

Development and Rural Reporting

Archana Kumari | We have discussed how vast the arena of development is. So it is not easy for a journalist to handle all the areas of development. Also if a reporter wants to be established as a good journalist, he should try to specialize in a particular area of ...

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Rural Reporting

rural-journalism

Archana Kumari | Why poverty and problems in rural area do not make news for the urban population? It can if presented professionally with rich social content, it can make itself relevant for urban audience and they can relate themselves to rural India. The media division into Urban and rural ...

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Impact of Globalisation on Feminism and Media

Femisism

  Archana Kumari |   While technological advancements and globalization of media have created and strengthened structural disadvantages for women, these same trends have also opened more avenues for alternatives and networking among women. Some forms of feminist strategies in advancing women’s rights within and through the media include efforts ...

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क्या आप जानते हैं ड्रोन 16वीं शताब्दी से हमारे बीच मौजूद हैं?

drawn

ड्रोन एक ऐसा यांत्रिक पक्षी है जो पॉयलट के इशारे पर आसमान में उड़ाया जाता है और उसकी मशीनी आंखों को आसमान में तैनात कर एरियल यानि ऊंचाई से वांछित दृश्यों व तसवीरों को रिकार्ड किया जा सकता है. दिलचस्प बात यह है कि बचपन के दौर में हम सेना ...

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डाटा जर्नलिज्म : सूचनाओं के महासागर से कैसे निकालें खबर ?

data journalism

Amit Dutta 1. डाटा जर्नलिज्म क्या है? 2. डाटा जर्नलिज्म का इतिहास 3. डाटा जर्नलिज्म की अहमियत (परिभाषाएं) 4. खबरों में आँकड़ों का इस्तेमाल जरूरी क्यों? 5. आँकड़े कहां से जुटाएं? 6. आँकड़ों को कैसे समझें 7. आसान शब्दों में आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण 8. भारत में डाटा जर्नलिज्म 9. डाटा ...

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जिंदगी के कुछ सबक को पहले ही पढ़ाए जाएं

classroom

उमेश चतुर्वेदी… वो किताबों में दर्ज था ही नहीं, सिखाया जो सबक जिंदगी ने…. मिशनरी भाव लेकर तमाम इतर प्रोफेशनल को छोड़ कर समाज बदलने की चाहत लेकर जिन्होंने पत्रकारीय कर्म को अख्तियार किया है, उन्हें पत्रकारीय जिंदगी में पग–पग पर जिस तरह के अनुभवों से दो–चार होना पड़ता है, ...

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व्‍यावसायिकता के विरुद्ध

news collection

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान भारतीय पत्रकारिता सामाजिक दायित्‍व से शून्‍य है। प्रकाशित सामग्री में चटखारे और चापलूसी की ही प्रमुखता होती है। यह बात खास तौर से उन पत्र-पत्रिकाओं पर लागू होती है जिनके पीछे बड़ी-बड़ी थैलियां हैं। छोटी पत्रिकाएं अभी भी जहां-तहां कुछ ...

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