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पपराज़ी पत्रकारिता की सीमाएं

गोविन्‍द सिंह। ‘पपराज़ी’ (फ्रेंच में इसे पापारात्सो उच्चारित किया जाता है) यह एक ऐसा स्वतंत्र फोटोग्राफर जो जानी-मानी हस्तियों की तस्वीरें लेता और पत्रिकाओं को बेचता है। ‘ पपराज़ी’ शब्‍द कहां से आया? ‘ पपराज़ी’ की उत्‍पत्ति महान इतालवी फिल्‍मकार फेरेरिको फेलिनी की 1960 में बनी फिल्‍म ‘ला डोल्‍से विटा’ ...

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कैसे शुरू करें विज्ञान लेखन?

देवेंद्र मेवाड़ी। मैंने विज्ञान लेखन कैसे शुरू किया? अपने आसपास की घटनाओं को देखा, मन में कुतूहल हुआ, उनके बारे में पढ़ा, लगा कितनी रोचक बात है- मुझे दूसरों को भी बताना चाहिए। सर्दियों की शुरूआत में हमारे गांव का सारा आकाश प्रवासी परिंदों से भर जाता था। मां ने ...

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आर्थिक-पत्रकारिता क्या है?

आलोक पुराणिक | 1-आर्थिक पत्रकारिता है क्या 2- ये हैं प्रमुख आर्थिक पत्र-पत्रिकाएं  और टीवी न्यूज चैनल 3-बाजार ही बाजार 4- बुल ये और बीयर ये यानी तेजड़िया और मंदड़िया 5- मुलायम, नरम, स्थिर, वायदा 6- शेयर बाजार पहले पेज पर भी 7-  रोटी, कपड़ा और मकान से मौजूदा रोटी, ...

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संवेदनशीलता चाहिए पत्रकारिता में !

सुरेश नौटियाल। समाचार लिखते समय ऑब्जेक्टिव होना अत्यंत कठिन होता है, चूंकि पत्रकार की निजी आस्था और प्रतिबद्धता कहीं न कहीं अपना असर दिखाती हैं। इसी सब्जेक्टिविटी के कारण एक ही समाचार को दस संवाददाता दस प्रकार से लिखते हैं। पर, उद्देश्य और नीयत खबर को सही प्रकार और सार्वजनिक ...

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जानिए कैसे होता है एक अखबार में काम ?

मुकुल व्यास.. सुबह चाय की चुस्कियों के साथ आप जिस अखबार का आनंद लेते हैं उसे बंनाने के लिए बहुत परिश्रम की आवश्यकता होती है। संपादक के नेतृत्व में पत्रकारों की एक सुव्यवस्थित टीम इस अखबार का निर्माण करती है। पत्रकारों की टीम को अलग-अलग विभागों में विभाजित किया जाता ...

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तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है?

मनोज कुमार | इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो ...

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पत्रकारिता मिशन नहीं प्रोफेशन है

मधुरेन्द्र सिन्हा। टेक्नोलॉजी ने दुनिया की तस्वीर बदल दी है। ऐसे में पत्रकारिता भला कैसे अछूती रहती। यह टेक्नोलॉजी का ही कमाल है कि दुनिया के किसी भी कोने की घटना की खबर पलक झपकते ही सारे विश्व में फैल जाती है। दरअसल पत्रकारिता संवाद का दूसरा नाम ही तो ...

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समकालीन हिन्‍दी मीडिया की चुनौतियां

प्रियदर्शन। हिन्‍दी और भाषाई मीडिया के लिए यह विडंबना दोहरी है। जो शासक और नीति-नियंता भारत है, वह अंग्रेजी बोलता है। इस अंग्रेजी बोलने वाले समाज के लिए साधनों की कमी नहीं है। वह इस देश की राजनीति चलाता है, वह इस देश में संस्‍कृति और साहित्‍य के मूल्‍य तय ...

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नए दौर की पत्रकारिता?

अतुल सिन्हा। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि देश में साहित्य, संस्कृति, विकास से जुड़ी खबरें या लोगों में सकारात्मक सोच भरने वाले कंटेट नहीं दिखाए जा सकते? कौन सा ऐसा दबाव है जो मीडिया को नेताओं के इर्द गिर्द घूमने या फिर रेटिंग के नाम पर जबरन ‘कुछ भी’ ...

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ग्रामीण पत्रकारिता: हर गांव एक खबर होता है

डॉ. महर उद्दीन खां | भारत गांवों का देश है। शिक्षा के प्रसार के साथ अब गांवों में भी अखबारों और अन्य संचार माध्यमों की पहुंच हो गई है। अब गांव के लोग भी समाचारों में रुचि लेने लगे हैं। यही कारण है कि अब अखबारों में गांव की खबरों ...

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समाचार लेखन : कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे?

सुभाष धूलिया। परंपरागत रूप से बताया जाता है कि समाचार उस समय ही पूर्ण कहा जा सकता है जब वह कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे सभी प्रश्नों या इनके उत्तर को लेकर लोगों की जिज्ञासा को संतुष्ट करता हो। हिंदी में इन्हें छह ककार ( Five W and ...

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मीडिया के सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों की सैद्धांतिकी

  दिलीप ख़ान | 2010 में अमेरिका में गैलप वर्ल्ड रेलिजन सर्वे में दिलचस्प नतीजे सामने आए। सर्वे में अमेरिका के अलग-अलग प्रांतों के लोगों से धर्म और उनके अनुयाइयों के बारे में सवाल पूछे गए। 63 फ़ीसदी अमेरिकियों ने माना इस्लाम के बारे में उन्हें या तो ‘ज़रा भी ...

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