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कॉरपोरेट रिपोर्टिंग : कंपनी जो बताए वह विज्ञापन, जो छुपाए वह है खबर

शशि झा। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ कहा जाता रहा है। पर विडंबना यह है कि प्रिंट से लेकर इलैक्‍ट्रानिक तक कमोबेश इनके सभी अहम समूहों के मालिक बड़े पूंजीपति, उद्योगपति और बड़े बिजनेसमैन रहे हैं। कोढ़ मे खाज यह है कि पिछले कुछ वर्षों में चिट फंड, रियल ...

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रीजनल रिपोर्टिंग : गंभीरता का ध्‍यान हमेशा रखें

महेश शर्मा। देश की करीब सवा सौ करोड़ आबादी के लिए दो जून की रोटी जुटाने वाले ग्रामीण किसान की लाइफ स्‍टाइल आजादी के इतने वर्ष बाद भी हमारी मीडिया की विषय वस्‍तु नहीं बन सकी है। वास्‍तविकता यह है कि मीडिया से गांव दूर होते जा रहे हैं। परिणाम ...

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रोमांच है आर्थिक पत्रकारिता

नीरज कुमार। हम विकास की राजनीति करते हैं। राजनीतिक पार्टियों में यह जुमला इन दिनों आम है। मई 2014 में लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे के ईर्द-गिर्द लड़ागया। विकास का संबंध ऐसी अर्थव्यवस्था से है, जिसमें समाज के हर वर्ग को आर्थिक रूप से सशक्त होने का मौक़ा मिले। ...

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सुदृढ़ हिंदी के साथ जरूरी है अच्छा इंग्लिश ज्ञान

मुकुल व्यास | एक जमाना था जब हिंदी के अखबारों को प्रमुख ख़बरों के लिए इंग्लिश संवाद एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता था। शुरू-शुरू में अस्तित्व में आईं हिंदी संवाद एजेंसिया खबरों की विविधता और विस्तृतता के मामले में इंग्लिश संवाद एजेंसियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाती थीं। धीरे-धीरे स्थितियां ...

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राजनीति के मीडियाकरण का दौर: सरकारी योजनाओं पर आलोचनात्मक क्यों नहीं है मीडिया?

सीमा भारती। इन दिनों टेलीविज़न पर प्रधानमंत्री के स्वच्छता मिशन से सम्बद्ध एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है। इस विज्ञापन में “जहां सोच वहां शौचालय” के टैग लाइन के साथ शौचालय बनवाओ और इस्तेमाल करो की बात कही जाती है। संदेश देने वाली अभिनेत्री विद्या बालन है, जिसकी छवि एक ...

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न्‍यूज और उसके आवश्‍यक तत्‍व

शैलेश और डॉ. ब्रजमोहन। इंसान आज चांद से होता हुआ मंगल पर कदम रखने की तैयारी कर रहा है और उसकी खोजी आंखे बिग बैंग (महाविस्‍फोट) में धरती के जन्‍म का रहस्‍य तलाश रही है। दरअसल इंसान को समय के पार पहुंचाया है, उसकी जिज्ञासा ने। सब कुछ जानने की ...

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जनसंचार: आखिर विकल्प क्या हैं?

देवाशीष प्रसून। पूंजी संकेन्द्रण की अंधी दौड़ में मीडिया की पक्षधरता आर्थिक और राजनीतिक लाभ हासिल करने में है। कभी-कभार वह जनपक्षीय अंतर्वस्तु का भी संचरण करता है, परंतु जनहित इनका उद्देश्य न होकर ऐसा करना केवल आमलोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाये रखने हेतु एक अनिवार्य अभ्यास है। मीडिया ...

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पत्रकारिता के विविध आयाम

सुभाष धूलिया | अपने रोजमर्रा के जीवन की एक नितांत सामान्य स्थिति की कल्पना कीजिए। दो लोग आसपास रहते हैं और लगभग रोज मिलते हैं। कभी बाजार में, कभी राह चलते और कभी एक-दूसरे के घर पर। उनकी भेंट के पहले कुछ मिनट की बातचीत पर ध्यान दीजिए। हर दिन ...

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खोजी पत्रकारिता : कैसे, क्यों और विभिन्न आयाम

डॉ . सचिन बत्रा। खोजी पत्रकारिता को अन्वेषणात्मक पत्रकारिता भी कहा जाता है। सच तो यह है कि हर प्रकार की पत्रकारिता में समाचार बनाने के लिए किसी न किसी रूप में खोज की जाती है यानि कुछ नया ढूंढने का प्रयास किया जाता है फिर भी खोजी पत्रकारिता को ...

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अखबार की भाषा : कैसे चुस्त बनाएं?

कुमार मुकुल। बाजार के दबाव में आज मीडिया की भाषा किस हद तक नकली हो गयी है इसे अगर देखना हो तो हम आज केअखबार उठा कर देख सकते हैं। उदाहरण के लिए कल तक भाषा के मायने में एक मानदंड के रूप में जाने जाने वाले एक अख़बार ही ...

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मीडिया लेखन के बदलते स्वरूप: मैगज़ीन के लिए कैसे लिखें?

भाषा सिंह। पत्रकारिता की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। सोशल मीडिया, वेब, मोबाइल ऐप्स में खबरें सरपट दौड़ती हुई नजर आती हैं। पल-पल की खबर देने के दावों से बाजार अटे पड़े हैं। जैसे ही खबर मिले, वैसे ही इसे जनता-जनार्दन तक पहुंचाने का जबर्दस्त क्रेज है। ऐसे ...

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दैनिक अखबार के डेस्क पर रहें हमेशा सतर्क, वरना…

मुकुल व्यास। करीब 30 साल पहले अपने अखबार के मुख्य डेस्क पर रात्रि शिफ्ट में काम करते हुए मेरे सामने एक न्यूज फ्लैश आया, जिसे पढ़कर मैं चौंक गया। यह फ्लैश उत्तराखंड के एक प्रमुख तीर्थ स्थल पर रेल दुर्घटना के बारे में था, जहां कोई रेल लाइन नहीं है। ...

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