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Contemporary Issues

कंप्यूटरों के आने से हुआ अखबारों का कायाकल्प

मुकुल व्यास। एक समय था जब हिंदी के अखबार बहुत ही साधारण ढंग से निकलते थे। उनमें खबरों के स्थान निर्धारण और पृष्ठों की सजावट में प्लानिंग का अभाव साफ दिखाई देता था। भारी भरकम लाइनों मशीनों पर खबरें कम्पोज होती थीं और खबरों के स्लग हाथ से पेज पर ...

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संचार की हत्या है निष्पक्षता की अनदेखी

पाणिनि आनंद। भारत में पत्रकारिता के लिए पिछले दो दशक साधन, तकनीक और प्रसार की दृष्टि से बहुत उत्पादक रहे हैं। टीवी ने तेज़ी से अपने पांव पसारे हैं। रेडियो कई और रूपों में सामने आया है। प्रिंट के कागज़ और प्रेसों, प्रकाशकों तक की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। ...

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टीवी विज्ञापनों में महिलाएं : आजादी या उपभोक्तावाद

दीक्षा चमोला दीक्षित। महिलाओं की भूमिका हर क्षेत्र में तेज़ी से बदल रही है. राजनीति से लेकर शिक्षा, कंप्यूटर से लेकर कॉर्पोरेट जगत में महिलाएं अपना लोहा मनवा रही हैं। पर क्या महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में सुधर पाई है? क्या मीडिया में उसके प्रस्तुतिकरण में कोई परिवर्तन आया ...

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मोबाइल कम्युनिकेशन : शिष्टाचार सीखना भी है जरूरी

डॉ. देवव्रत सिंह। हाल ही में दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने भारत के सभी मोबाइल प्रदाता कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे अपने ग्राहकों को मोबाइल शिष्टाचार का पाठ पढायें। सार्वजनिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति अब ये महसूस करने लगा है कि मोबाइल सुविधा बनने के साथ-साथ असुविधाजनक भी साबित ...

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