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Contemporary Issues

लॉकडाउन: न्यूज़ चैनलों को खूब देख रहें हैं लोग

साभार: समाचार4मीडिया नीलसन-बार्क रिपोर्ट के दूसरे एडिशन के अनुसार, कोरोनावायरस महामारी से पहले की तुलना में लॉकडाउन के दूसरे हफ्ते में टीवी न्यूज की व्युअरशिप काफी बढ़ी है कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सरकार द्वारा किए गए लॉकडाउन के बाद से टीवी पर न्यूज ...

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“मैं न्यूज़ एंकर नहीं रहा, न्यूज़ क्यूरेटर बन गया हूं”

रवीश कुमार अख़बार पढ़ लेने से अख़बार पढ़ना नहीं आ जाता है। मैं आपके विवेक पर सवाल नहीं कर रहा। ख़ुद का अनुभव ऐसा रहा है। कई साल तक अख़बार पढ़ने के बाद समझा कि विचारों से पहले सूचनाओं की विविधता ज़रूरी है। सूचनाओं की विविधता आपको ज़िम्मेदार बनाती हैं। ...

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तकनीक की विचारधारा और पूर्वाग्रह

ओमप्रकाश दास आज, जब तकनीक तेज़ी से बदल रही है, ऐसे में ये सोचना-समझना बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आख़िर तकनीक और उसके लगातार बदलाव ने अपना क्या असर हमारी दुनिया पर डाला है। विशेषकर सूचना के प्रवाह पर, सामाजिक मूल्यों पर और उससे आगे बढ़कर वैश्विक राजनीति पर? ...

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Is ‘Watchdog’ Journalism a Western Mythology?

By Kalinga Seneviratne In January 2003, French Communications Professor Ignacio Ramonet told an audience of over 5,000 young people, mainly from Latin America, attending the World Social Forum in Porto Alegre in Brazil that Corporations now own and produce not only traditional media, but everything which we call culture and ...

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Why The News is Dangerous For You?

Anoop Abraham “Truth and news are not the same thing.” — Katharine Graham, Former Publisher Washington Post Right from the time we are young, we are conditioned by our parents and society to believe that following the news is necessary to be an informed and responsible citizen. Since it’s followed ...

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संसद में ख़बरें कैसे घूमती हैं?

ओम प्रकाश दास… साठवें दशक में टाईम्स आफ इंडिया समूह के हिन्दी अखबार नवभारत टाईम्स के लिए एक अलग ब्यूरो का गठन किया गया। ब्यूरो बनाने के पीछे टाईम्स ग्रुप के अध्यॿ शाहू शांतिलाल जैन का तर्क था कि संसद और विभिन्न मंत्रालयों की अलग से और विशिष्ट रिपोर्टिंग के लिए ब्यूरो ...

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‘बड़ी खबर’ कितनी बड़ी?

कुमार कौस्तुभ | मीडिया, खासकर समाचारों की दुनिया की शब्दावली में ‘बड़ी खबर’ जाना-पहचाना टर्म है। आमतौर पर इसे ‘हेडलाइन’ भी माना जाता है। लेकिन, ‘हेडलाइन’ और ‘बड़ी खबर’  की टर्मिनोलॉजी में कुछ बुनियादी फर्क है जिसे ‘बड़ी खबर’ पर चर्चा करने से पहले साफ कर देना जरूरी है। टीवी ...

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अख़बारों से ग़ायब होता साहित्य

फ़िरदौस ख़ान। साहित्य समाज का आईना होता है। जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है। साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे ख़ुद द नहीं हुआ है। साथ ही उस समाज की ...

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प्रभावी पत्रकारिता के लिए प्रिंटेड सामग्री अभी भी काफी प्रासंगिक

राजदीप सरदेसाई समाचार4मी‍डिया ब्यूरो इन दिनों टीवी पर परोसी जा रही न्यू्ज और असली न्यू ज के बीच बहुत बड़ा अंतर है। न्यूतज के नाम पर कई चैनल कुछ भी दिखा रहे हैं। अधिकांश चैनल आपको शोरशराबा, एंटरटेनमेंट और ब्रेकिंग न्यूयज परोस रहे हैं। क्या वे घटना का संदर्भ, उसका ...

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जिंदगी के कुछ सबक को पहले ही पढ़ाए जाएं

उमेश चतुर्वेदी… वो किताबों में दर्ज था ही नहीं, सिखाया जो सबक जिंदगी ने…. मिशनरी भाव लेकर तमाम इतर प्रोफेशनल को छोड़ कर समाज बदलने की चाहत लेकर जिन्होंने पत्रकारीय कर्म को अख्तियार किया है, उन्हें पत्रकारीय जिंदगी में पग–पग पर जिस तरह के अनुभवों से दो–चार होना पड़ता है, ...

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Rethinking international TV flows research in the age of Netflix

Ramon Lobato (RMIT University)   ramon.lobato@rmit.edu.au   Forthcoming in Television and New Media   April 2017   ABSTRACT This article considers how established methodologies for researching television distribution can be adapted for subscription video-on-demand (SVOD) services. Specifically, I identify a number of critical questions – some old, some new – ...

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मीडिया ने अपनी पत्रकारीय जिम्मेदारी खो दी है

संतोष भारतीय प्रधान संपादक, चौथी दुनिया वे कैसे संपादक हैं, जो सामने आई स्क्रिप्ट में से सत्य नहीं तलाश सकते या ये नहीं तलाश सकते कि इसमें कहां मिर्च-मसाला मिला हुआ है। आप भारतीय जनता को, भारत के दर्शक को वो दे रहे हैं, जो नहीं देना चाहिए। ये सिर्फ ...

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