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Contemporary Issues

पहले शिक्षा में तो लाइए हिन्दी

गोविन्द सिंह | अनेक बार ऐसा लगता है कि शिक्षा की दुनिया का इस देश से, इस राष्ट्र के लक्ष्यों से कोई लेना-देना नहीं है. शिक्षा नीति के करता-धरता चाहते ही नहीं कि अंग्रेज़ी की बजाय हिन्दी को स्कूलों-कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए. इस देश का शिक्षाविद, अपना शोध पत्र ...

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भारत में मीडिया स्वामित्व: हालात और चुनौतियां

दिलीप ख़ान | मीडिया के पत्रकारिता और उद्योग के पक्ष को अलग–अलग कर नहीं देखने के चलते मिशन, सरोकार और भावुकता जैसे शब्दों को टीवी और प्रिंट के इस साम्राज्य में जब कोई तलाशता है तो उसे असफ़लता हासिल होती है। मीडिया कंपनियां शेयर बाज़ार में ठीक उसी तरह सूचीबद्ध ...

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खेल, तमाशा और ‘चीयरलीडर्स’

सुशील यति | विस्मय भरे चकाचौंध और आश्चर्य-मिश्रित प्रस्तुतीकरण के साथ आईपीएल के दसवें संस्करण का समापन हुआ, आईपीएल अब सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि अपनी उत्सवधर्मिता और भव्यता के कारण दर्शकों के लिए खेल से कहीं बढ़कर है। दूसरे शब्दों में कहें तो आईपीएल टेलीविजन का एक ऐसा उत्सव जहाँ ...

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ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म की ओर

मनोज कुमार | ‘ठोंक दो’ पत्रकारिता का ध्येय वाक्य रहा है और आज मीडिया के दौर में ‘काम लगा दो’ ध्येय वाक्य बन चुका है। ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता से टारगेटेड जर्नलिज्म का यह बदला हुआ स्वरूप हम देख रहे हैं। कदाचित पत्रकारिता से परे हटकर हम प्रोफेशन की तरफ आगे बढ़ ...

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वर्किंग जर्नलिस्टर ऐक्ट  के दायरे में  कब आयेंगे टीवी पत्रकार ?

उदय चंद्र सिंह | देश में उदारीकरण का दौर शुरु होने के साथ हीं  तमाम उद्योग धंधों की तरह खबरों का बाजार भी खूब चमका । टेलीविजन न्यूज चैनलों की तो जैसे बाढ़ सी आ गई है ।  हर कोई यही कहता फिर रहा है कि टीवी मीडिया बहुत ‘ताकतवर’ ...

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विज्ञापन अब मांग पैदा करते हैं

प्रो.डॉ.सचिन बत्रा | अब तक यह माना जाता था कि विज्ञापन किसी उत्पाद या सेवा की जानकारी देने सहित प्रचार के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन आज के दौर में विज्ञापन का निर्माण और चयन मांग पैदा करने के पैमाने पर किया जाता है। इसमें तरह—तरह की युक्तियां प्रचलित हैं। जैसे ...

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मीडिया और लोकतंत्र : एक दूसरे से पूरक या विरोधी

राजेश कुमार।  यह शोध पत्र मुख्य रूप से वैश्विक स्तर पर मीडिया और विभिन्न देशों की राजनीतिक‚ सामाजिक‚ आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के साथ उसके अंतरसंबंधों पर प्रकाश डालता है। विभिन्न समयकाल में विकसित होने वाली राजनीतिक व्यवस्थाओं ने मीडिया को किस हद तक प्रभावित किया? इन परिस्थितियों में मीडिया ...

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पेड न्यूज़ और निर्भीक पत्रकारिता का दौर

डॉ॰ राम प्रवेश राय। हर वर्ष 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इस संदर्भ मे आयोजित अनेक गोष्ठियों और विचार विमर्श में पत्रकारिता के गिरते मूल्यों पर घोर चिंता भी व्यक्त की जाती है। पिछले वर्ष भी अनेक स्थानो पर गोष्ठियाँ आयोजित की गई ...

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चुनाव-सर्वेक्षणों की होड़ में पिचकती पत्रकारिता

उर्मिलेश | राजनीतिक दलों या नेताओं के जीतने-हारने या उनकी सीटों के पूर्वानुमान लगाने वाले ओपिनियन-पोल राजनीति और राजनेताओं के लिए कितने फायदेमंद या नुकसानदेह हैं, इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं अपने अनुभव की रोशनी में बेहिचक कह सकता हूं कि चुनाव-अधिसूचना ...

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पत्रकारों का भविष्य और भविष्य की पत्रकारिता

दिलीप मंडल।… सूचनाओं और समाचार का प्राथमिक स्रोत सोशल मीडिया बनता जा रहा है। फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन जैसे माध्यम अब बड़ी संख्या में लोगों के लिए वह जरिया बन चुके हैं, जहां उन्हें देश, दुनिया या पड़ोस में होने वाली हलचल की पहली जानकारी मिलती है। ऐसे लोग कई बार ...

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भविष्य का मीडिया: क्या हम तैयार हैं?

प्रभु झिंगरन | हिन्दुस्तान में आने वाले दिनों में मीडिया के स्वरूप और भविष्य को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के अनुभव बताते हैं मीडिया का भविष्य और स्वरूप तेजी से बदलने का ये सिलसिला आने वाले सालों में भी जारी रहेगा। मीडिया उद्योग ...

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अखबारों के अंदाज़ निराले!

प्रो. डॉ.सचिन बत्रा | आज दुनियां भर में लाखों की संख्या में समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिनके अलग अंदाज ने पाठकों का मन ही मोह लिया हैऔर अपनी विशिष्ठता के दम पर अपना एक अलग स्थान बनाया है। डेली लिबरेशन फ्रांस की ...

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