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हिंदी पत्रकारिता का ‘संडे स्पेशल’

मनोज कुमार।

पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता पहली शर्त होती है। यह स्मरण रखा जाना चाहिये कि समाचार पत्र समाज के लिये एक नि:शुल्क पाठशाला होती है। समाचार पत्रों के माध्यम से हर उम्र वर्ग के लोग अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं

संडे स्पेशल शीर्षक देखकर आपके मन में गुदगुदी होना स्वाभाविक है। संडे यानि इतवार और स्पेशल मतलब खास यानि इतवार के दिन कुछ खास और इस खास से सीधा मतलब खाने से होता है लेकिन इन दिनों मीडिया में संडे स्पेशल का चलन शुरू हो गया है। संडे स्पेशल स्टोरी इस तरह प्रस्तुत की जाती है मानो पाठकों को खबर या रिपोर्ट पढऩे के लिये न देकर खाने के लिये कह रहे हों। हिन्दी पत्रकारिता के सवा दो सौ साल के सफर में हिन्दी और समृद्ध होने के बजाय कंगाल होती चली जा रही है। हर साल 30 मई को जब हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं तब हमारा सिर गर्व से ऊंचा नहीं होता है बल्कि हम अपनी करतूतों से स्वयं को छिपाने का भरसक यत्न करते हैं। हिन्दी के साथ जो ज्यादती हम लगातार कर रहे हैं, वह हमें आत्ममुग्ध तो कर ही नहीं सकता है।

हिन्दी के साथ अंग्रेजी के घालमेल पर तर्क और कुतर्क दोनों हो सकते हैं लेकिन इस घालमेल पर तर्क कम और कुतर्क अधिक होगा। कुतर्क के रूप में यह बात रखी जाती है कि आज का पाठक हिन्दी नहीं समझता है और इससे आगे जाकर कहेगा कि स्कूल में पढऩे वाला बच्चा भी अंग्रेजी के अंक समझता है। उसे उनसठ कहा जाये तो उसके समझ से परे होगा लेकिन फिफ्टी नाइन कहा जाये तो वह समझ जाएगा। यह बात सही है लेकिन इसके लिये दोषी कौन है? बच्चा या हम और आप? अंग्रेजी शिक्षा पाये, इससे किसी को क्या एतराज हो सकता है लेकिन अपनी भाषा भूल जाए, यह तो एतराज की बात है ही। यहीं से हिन्दी की चुनौती शुरू होती है और हर दिन, हर पल हिन्दी के लिये चुनौती भरा होता है।

मीडिया ने भाषा का मटियामेट किया है, इस बात से कौन इंकार कर सकता है। खासतौर पर इसके लिये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पूरी तरह दोषी है। यह माध्यम भाषा के नाम पर न केवल कंगाल है बल्कि दरिद्र भी। टेलीविजन के पर्दे पर जब रिपोर्ट की जाती है, साक्षात्कार होता है, परिचर्चा में समन्वयक की भूमिका निभा रहे उद्घोषक के उच्चारण को देखें तो सिर पीट लेने की इच्छा होती है।

यह माध्यम स्वयं को हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की पत्रकारिता से परे स्वयं को देखता है और वह अपने को विश्व ग्राम में पाता है। इंटरनेट के विस्तार के साथ ग्लोबल विलेज की अवधारणा प्रतिपादित की गई। अब यहां भी देखिये कि विश्व ग्राम अथवा ग्लोबल विलेज अर्थात गांव यहां भी केन्द्र में है। ऐसे में यह बात ध्यान में रखना होगा कि भारत गांवों का देश है और इस देश की भाषा अंग्रेजी हो नहीं सकती। विश्व ग्राम की कल्पना कर लें और उसका हिस्सा भी बन जायें लेकिन भारत ग्राम को भूल कर हम किसी भी कीमत पर विकास नहीं कर सकते हैं।

मुद्रित माध्यम का अपना स्वर्णिम इतिहास है और हम गर्व कर सकते हैं कि भारत को स्वाधीनता दिलाने में इस माध्यम का सबसे अहम योगदान रहा लेकिन आज दुर्र्र्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हम अपने ही स्वर्णिम इतिहास से स्वयं को दूर कर रहे हैं। हमें अपनी भाषा-बोली की ताकत का अंदाज ही नहीं है और हम अंग्रेजियत का अंधानुकरण कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खिचड़ी भाषा का हम अनुसरण कर रहे हैं। मुझे तब इस बात का दुख ज्यादा होता है जब मैं पाता हूं कि अच्छे स्कॉलर भी हिन्दी से स्वयं को दूर रख रहे हैं।

शोध पत्रिका समागम का सम्पादन करते हुये बार बार इस बात की पीड़ा होती है जब स्कॉलर मीडिया के आलेख में खबरों को परोसा जाना जैसे वाक्य का उपयोग करते हैं। क्या खबर कोई भोज्य पदार्थ है जिसे परोसा जा रहा है? इस तरह फलां समाचार पत्र निकलते हैं जैसे वाक्य भी स्कॉलर की समझ पर सवालिया निशान लगाते हैं। समाचार पत्र निकलता नहीं है बल्कि वह प्रकाशित होता है और खबरें परोसी नहीं जाती है बल्कि उसकी प्रस्तुति होती है। अंधानुकरण का आलम यह हो गया है कि सौ शब्दों के वाक्य में 40 से 50 शब्द अंग्रेजी के होते हैं जो न केवल खबर के प्रति रूचि को कम करते हैं बल्कि समाचार पत्र की गरिमा भी प्रभावित होती है।

पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता पहली शर्त होती है। यह स्मरण रखा जाना चाहिये कि समाचार पत्र समाज के लिये एक नि:शुल्क पाठशाला होती है। समाचार पत्रों के माध्यम से हर उम्र वर्ग के लोग अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं। मेरे हमउम्र अनेक लोग होंगे जो भिनसारे से समाचार पत्र आने की प्रतीक्षा करते थे और समाचार पत्र आते ही उसमें छपे शीर्षक को पढक़र सीखते थे। मैं तब से लेकर अब तक समाचार पत्रों को पढक़र अपने शब्द भंडार को समृद्ध कर रहा हूं लेकिन आज के समाचार पत्रों में जिस तरह की भाषा का उपयोग हो रहा है, वह सिखाने के बजाय जो आता है, उसे भी दूषित कर रही हैं। मैं इस बात को निरपेक्ष रूप से कह सकता हूं कि इस घालमेल के दौर में हिन्दी के लिये जनसत्ता हमारे बीच शेष रह गया है। प्रभाष जोशी जी ने जो भाषा और बोली के प्रति चेतना जागृत करने का अभियान चलाया, जो परम्परा डाली, आज उसके बूते हिन्दी पत्रकारिता में जनसत्ता का विशेष स्थान है। ऐसा नहीं है कि अन्य हिन्दी के समाचार पत्र भाषा के मामले में नकारा हो गये हैं लेकिन उनका अंग्रेजी प्रेम उनके लिये बाधक है, इस बात को मानना ही होगा।

अपनी ही भाषा-बोली से परहेज करती हिन्दी पत्रकारिता के लिये पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी दोषी नहीं है बल्कि यह दोष हिन्दी पत्रकारिता के उन मठाधीशों का है जिन्होंने अपनी जवाबदारी और जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया। इन मठाधीशों का भाव हमेशा से चलेगा का, रहा। वे स्वयं भाषा-बोली के मामले में दरिद्र रहे इसलिये भी हिन्दी पत्रकारिता आज अपनी ही भाषा-बोली से परहेज करती दिख रही है। यदि ऐसा नहीं होता तो अंग्रेजी के पत्रकार राजेन्द्र माथुर हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा के रूप में याद नहीं किये जाते। सब जानते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता के यशस्वी हस्ताक्षर राजेन्द्र माथुर अंग्रेजी के मझे हुये पत्रकार थे लेकिन उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध किया। श्री माथुर की पत्रकारिता का आरंभ एक हिन्दी दैनिक से होता है और वे जानते थे कि अपनी बात भारत की असंख्य जनता तक पहुंचाने का माध्यम केवल हिन्दी है और वे आम आदमी के पत्रकार और सम्पादक बनकर हिन्दी पत्रकारिता में स्थापित हुये।

मैं इस बात से भी इत्तेफाक रखता हूं कि अंग्रेजी के जो शब्द चलन में आ गये हैं, उनका उपयोग किया जाना चाहिये। जैसे कि ट्रेन, सिगरेट, मोबाइल, कम्प्यूटर, कलेक्टर, कमिश्रर आदि-इत्यादि लेकिन संडे स्पेशल, इम्पेक्ट, सटरडे, वीकएंड, सिटी फ्रंट पेज जैसे शब्दों के उपयोग से परहेज किया जाना नितांत आवश्यक प्रतीत होता है। हिन्दी पत्रकारिता की भाषा को मटियामेट करने में बाजार एक बड़ा कारण है। जिस तरह से बाजार कहता है और हम उसके अनुगामी बन जाते हैं।

दिवस शब्द हमारे शब्दकोश से गुम हो गया है, डे पर हमारी निर्भरता बढ़ गयी है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि हिन्दी डे और हिन्दी वीक मनाते हैं। हिन्दी मंथ भी चलन में है। भाषा की यह दुर्दशा हमारे लिये दुर्भाग्य की बात ही कही जाएगी। बाजार के हाथों में खेलती पत्रकारिता अब सरोकार नहीं, स्वार्थ की पत्रकारिता बनती जा रही है। पत्रकारिता से हटकर वह मीडिया बन गयी है।

हिन्दी भाषा और बोली इतनी समृद्ध है कि इनके उपयोग से हम और भी धनवान हो जाते हैं। प्रभाष जी ने कृषक के स्थान पर किसान और गृह के स्थान पर घर जैसे सरल और मीठे शब्दों के उपयोग पर बल दिया था। ऐसे असंख्य शब्द हैं जिनके उपयोग से हिन्दी पत्रकारिता का वैभव बढ़ेगा लेकिन ऐसा नहीं किया गया और विदेशी भाषा का अंधानुकरण किया गया तो हम केवल दिवस मनाने की औपचारिकता पूर्ण करते रहेंगे।

मनोज कुमार मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम के सम्पादक हैं

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