Home / Contemporary Issues / व्‍यावसायिकता के विरुद्ध

व्‍यावसायिकता के विरुद्ध

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान भारतीय पत्रकारिता सामाजिक दायित्‍व से शून्‍य है। प्रकाशित सामग्री में चटखारे और चापलूसी की ही प्रमुखता होती है। यह बात खास तौर से उन पत्र-पत्रिकाओं पर लागू होती है जिनके पीछे बड़ी-बड़ी थैलियां हैं। छोटी पत्रिकाएं अभी भी जहां-तहां कुछ मूल्‍यों और आदर्शों को ले कर चल रही हैं, लेकिन उनका स्‍वर भारतीय पत्रकारिता का मूल स्‍वर नहीं है। यह मूल्‍यहीनता खास तौर से उन पत्र-पत्रिकाओं पर छायी है जो हजारों या लाखों में छपती और बिकती हैं। इस व्‍यावसायिक सफलता का नशा इन पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों पर इस कदर छाया है कि ये इस विचार का कि पत्रकारिता सोद्देश्‍य भी हो सकती है, मजाक तक उड़ाते हैं। उनके लिए प्रतिबद्धता की पत्रकारिता वैसी ही अरुचिकर या अनजान वस्‍तु है जैसे साज-सज्‍जा और देह व्‍यवसाय में लगी वेश्‍याओं के लिए मदर टेरेसा जैसी महिलाओं का समर्पित जीवन। हमारे पांच सितारा पत्रका‍रों को शायद यह तुलना कुछ तीखी लगे, लेकिन हमें भूलना नहीं चाहिए कि प्रख्‍यात लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने कलम का व्‍यवसाय करनेवाले ऐसे ही लोगों को ‘पेन प्रॉस्टिच्‍यूट’ कहा था। इन दोनों स्थ्‍िातियों में फर्क इतना ही है कि वेश्‍याओं और समाज सेवा के लिए समर्पित महिलाओं ने शुरू में ही परिस्थितिवश या भावनावश अलग-अलग तरह का जीवन अपना लिया होता है, जबकि पत्रकारिता के क्षेत्र में हुआ परिवर्तन कुलवधू के हरजाईपन पर उतर आने जैसा है। पत्रकारिता के इतिहास पर विचार करने से सहज ही इस बात की सत्‍यता जाहिर हो जाती है।

व्‍यावसायिक पत्रों के कुछ संपादक पत्रकारिता के बदले हुए रूप और भूमिका के समर्थन में यह तर्क देते हैं कि आजादी की लड़ाई के समय प्रतिबद्धता की पत्रकारिता के लिए स्‍थान था, लेकिन अब ‘प्रोफेशनलिज्‍म’ या व्‍यावसायिकता की जरूरत है। मतलब यह कि पत्रिका की बिक्री ही महत्‍वपूर्ण है, उसके लिए चाहे जो उपाय किए जायें। किस चीज की बिक्री हो रही है यानी पाठकों को कैसी सामग्री दी जा रही है, इसका महत्‍व इतना ही भर है कि लोगों को भूख ऐसी सामग्री के लिए निरंतर बनी रहे। यहां यह बतला देना जरूरी है कि इस विचार के प्रतिपादन में हमारे पत्रकार कोई मौलिक बात नहीं कह रहे हैं, बल्‍कि पश्चिमी देशों में फैल रही एक खास तरह की व्‍यावसायिक पत्रकारिता के तर्क का ही तोतारटंत कर रहे हैं।

पश्चिमी समाज के बुनियादी मूल्‍य व्‍यावसायिक हैं और इस व्‍यावसायिकता के दबाव में पत्रकारिता पर भी यह मूल्‍य काफी हद तक छा गया है। फिर भी वहां लोगों में शुद्ध रूप से व्‍यावसायिक पत्रिका (जिसकी चरम परिणति पीत पत्रकारिता है) और गंभीर पत्रकारिता में फर्क करने की तमीज है। इसीलिए, हालांकि इंग्‍लैंड में सनसनीखेज खबरें देनेवाले कुछ अखबारों की बिक्री दसियों लाख है और दैनिक ‘टाइम्‍स’ की महज चंद लाख लोगों के विचार को प्रभावित करने में ‘टाइम्‍स’ की खास भूमिका होती है। जब ‘टाइम्‍स’ के मालिकों ने इसे शुद्ध व्‍यावसायिक सांचे में ढालना शुरू किया यानी ‘प्रोफेशनलिज्‍म’ अपनाना शुरू किया, तो इसके संपादन से संबद्ध अनेक प्रभावशाली लोगों ने नौकरी छोड़ एक अलग अखबार ‘इंडिपेंडेंट’ निकालना शुरू कर दिया। अब यह अखबार न सिर्फ चल निकला है, बल्‍क‍ि इसने काफी प्रतिष्‍ठा हासिल कर ली है। इससे यह जाहिर होता है कि ‘प्रोफेशनलिज्‍म’ का तर्क अखबारों को बाजारू बनाने का बहाना भर है।

भारतीय पत्र-पत्रिकाओं की साज-सज्‍जा देखने से लगता है जैसे हम बाजार के बीच खड़े हों और फेरीवाले चिल्‍ला-चिल्‍ला कर अपने माल की ओर हमारा ध्‍यान खींच रहे हों। बिक्री का सर्वमान्‍य फार्मूला है ‘रेप, ऐंड रुइन मेक ए न्‍यूजपेपर सेल’ यानी बलात्‍कार, दंगे और बरबादी की खबरों से अखबार बिकते हैं। भारती पत्रकार देश के आम नागरिकों को वयस्‍क मान कर भी नहीं लिखते, बल्‍कि यह मान कर चलते हैं कि देश के लोग आर्थिक रूप से निर्धन होने के साथ बौद्धिक रूप्‍ से भी निर्धन है, अत: सारी सामग्री का चयन भी उनकी बौद्धिक निर्धनता के हिसाब से ही होता है। पत्र-पत्रिकाओं में चित्रों, खासकर रंगीन चित्रों या रंगीन पृष्‍ठों का प्रकाशन (चाहे वह लेखों से जुड़ा हुआ हो या विज्ञापन के लिए) दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह बच्‍चों को तस्‍वीरों या रंगों से रिझाने के प्रयत्‍न जैसा ही है। इससे पाठकों की आदत ऐसी बनती जा रही है कि वे ऐसी पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ ही नहीं सकते जो पहली ही नजर में तस्‍वीर की तरह सब कुछ व्‍यक्‍त न कर देती हों या मनोरंजक न हों। पत्रकारिता के प्रारंभिक दिनों में ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों के बीच पहुंचने के लिए पतिकाओं को सस्‍ते दाम पर उपलब्‍ध कराने के प्रयास होते हैं, लेकिन अब भारतीय पत्रकारिता में बिक्री बढ़ाने के लिए पत्र-पत्रिकाओं को नहीं, बल्‍क‍ि प्रकाशित सामग्री को रास्‍ता बनाने की होड़ लगी हुई है।

राजनीतिक रपटों के नाम पर सत्‍ताधारी दल के नेताओं के भाषणों और वक्‍तव्‍यों, खासकर प्रधानमंत्री के वक्‍तव्‍यों, से अखबार भरे होते हैं। बीच-बीच में होते हैं विरोधी दलों के उन नेताओं के आलाप, जिनकी सत्‍ता में आने की संभावना होती है। चूंकि अभी पत्र-पत्रिकाओं की आवाज बहुत कुछ उनके मालिकों की आवाज बन गई है, कभी-कभी मालिक और राजनेताओं के समीकरण के हिसाब से भी यह तय किया जाता है कि किस नेता के बारे में कितना या क्‍या प्रकाशित किया जाए। राजनीति विश्‍लेषण के नाम पर नेताओं के निजी संबंधों के विवरणों और स्‍कैंडलों की प्रचुरता होती है। लेकिन सबसे अधिक ध्‍यान रखा जाता है चटखारा प्रदान करने का। सामूहिक बलात्‍कार की घटनाओं की रपटें घोस पीड़ा और त्रासदी का एहसास करानेवाली हो सकती हैं, लेकिन अखबारों में इनकी रपटों से लोगों में इस तरह की भावना नहीं पैदा होती और न आक्रोश होता है। इन घटनाओं के विवरण इस तरह छपते हैं और अक्‍सर तस्‍वीर आदि से इन्‍हें ऐसा सजाया जाता है, ताकि लोग इनमें चटखारे का आनंद ले सकें। इससे लोगों में ऐसी रपटों को पढ़ने की लत लगती है। इस तरह पाठकों और अखबारों, दोनों के लिए जरूरी हो जाता है कि ऐसी घटनाएं होती रहें, ताकि लोगों का मनोरंजन हो और अखबारों की बिक्री बढ़े। कलाकृतियों के विषय में कहा जाता है कि वे त्रासद घटनाओं से भी आनंद की अनुभूति पैदा कर देती हैं। इस अर्थ में भारतीय पत्रकारिता एक खास तरह की कला में महारत हासिल कर रही है, जहां देश की सभी त्रासदियां पत्रिकाओं के पाठक वर्ग के लिए मनोहारी आनंद का स्रोत बन रही हैं। कुछ मिलाकर भारतीय पत्रकारिता उस अफीम का काम कर रही है जो लोगों की संवेदनशीलता को इस हद तक कुंद कर दे कि उनके लिए देश में घटनेवाली घटनाएं अच्‍छी या बुरी नहीं, महज कम या अधिक मनोरंजक यानी पत्रकारिता की कसौटी के अनुसा कम ‘न्‍यूज वैल्‍यू’ वाली या अधिक ‘न्‍यूज वैल्‍यू’ वाली हो जायें। ऐसी सामग्री को पढ़ते-पढ़ते लोगों की भूख उत्‍तरोत्‍र अधिक उत्‍तेजक अनुभूति के लिए बढ़ती जाती है। बर्नार्ड शॉ ने उन्‍नीसवीं सदी के अंद में देह प्रदर्शन के जरिए लोकप्रिय बनने के ब्रिटिश रंगमंच के प्रयास पर अपने नाटक ‘मिसेज वैरेंज प्राफेशन’ की भूमिका में यह टिप्‍पणी की थी कि ऐसी प्रक्रिया की परिणति सिर्फ एक ही हो सकती है—नाटक की विधा का मिसेज वैरेंस के प्रोफेशन (यानी संगठित वेश्‍वावृत्ति) में तब्‍दील हो जाना। अपने आज के रास्‍ते पर हमारी पत्रकारिता पर तो यह आरोप भी है कि मालिक और सत्‍ताधारी लोगों के बीच दलाली उनका मुख्‍य पेशा है, पत्रकारिता तो एक मुखौटा भर है। इसलिए अक्‍सर बड़े अखबारों के संपादक अपनी संपादकीय प्रतिभा के कारण नहीं, बल्‍क‍ि सत्‍ता के गलियारे में अपनी घुसपैठ के कारण नियुक्‍त किये जाते हैं।

पश्चिमी देशों की पत्रिकाएं भी त्रासदियों को चटखारे के रूप में पेश करती हैं, लेकिन तभी जब ऐसी रपटें तीसरी दुनिया की घटनाओं से संबद्ध हों। उनके अपने देश की ऐसी घ्‍ज्ञटनाओं के प्रति वे इतना तीव्र प्रतिरोध पैदा करती हैं कि कभी-कभी सरकार का तख्‍ता पलट जाता है। राष्‍ट्रपति निक्‍सन का पदत्‍याग एह हाल की मिसाल है।

भारतीय पत्रकारिता का ऐसा चरित्र आकरण नहीं है। इसका कारण सिर्फ यह भी नहीं है कि बड़े अखबारों और पत्रिकाओं के मालिक पूंजीपति हैं, जो मुनाफे के लिए या सरकार पर दबाव डालने के लिए अखबारों का प्रकाशन करते हैं। हालांकि यह भी एक कारण है, लेकिन असल कारण है पत्रकारों का अपना वर्ग चरित्र। इक्‍का-दुक्‍का अपवाद को छोड़कर इस देश के सभी पत्रकार, खासकर वे जो शीर्ष स्‍थानों पर हैं, उस औपनिवेशिक अभिजात वर्ग के जाते हैं, जिसे अंग्रेजों ने इस देश में अपनी सत्‍ता चलाने के लिए पैदा किया था और जो आज भी मूल्‍यों और मान्‍यताओं के धरातल पर साम्राज्‍यवादियों की विरासत जी रहा है। हवाई सैर, विदेशी शराब और मौज-मस्‍ती–बस यही इस वर्ग के अरमान हैं। यही वर्ग आज सत्‍तासीन है और देश के बड़े हिस्‍से के शोषण पर संपन्‍नता का सुख ठीक उसी तरह भोग रहा है जैसे पहले साम्राज्‍यवादी शासक भोगते थे। आम लोगों पर होने वाले अत्‍याचारों से वे भावनात्‍मक रूप से असंपृक्‍त हैं, क्‍योंकि ऐसे अत्‍याचार अंततोगत्‍वा उनकी अपनी संपन्‍नता का भी आधार हैं। पत्रकार रस्‍मी तौर पर ऐसे अत्‍याचारों के खिलाफ चाहे जो लिख-बोल लें, कहीं-न-कहीं उनके मन में यह एहसास है कि देश की गरीबी के समुद्र में वे संपन्‍नता के उस द्वीप के हिस्‍से हैं, जो बाकी देश के घोर शोषण पर टिका है। इसलिए वे कभी कुछ ऐसा नहीं लिखेंगे जिससे व्‍यवस्‍था की बुनियाद हिल जाये। फिर भी चूंकि पाठकों के एक हिस्‍से में अन्‍याय के विरुद्ध आक्रोश भी होता है और उसकी जानकारी प्राप्‍त करने की भूख होती है, इसलिए कभी-कभी कुछ प्रतिरोध पैदा करनेवाली रपटें भी छपती हैं, लेकिन वे इतने सतही ढंग से और तोड़मोड़ कर छापी जाती हैं कि अन्‍याय के विरुद्ध आंदोलन का कोई व्‍यापक आधार न बन पाये।

देश में बलात्‍कार की शिकार खास तौर से आदिवासी, हरिजन या अन्‍य गरीब वर्गों की महिलाएं  ही होती हैं। पुलिस लॉकअप में जिनकी हड्डियां तोड़ी जाती हैं या जिन्‍हें मार डाला जाता है, वे भी ज्‍यादातर इन्‍हीं समूहों से आते हैं। इस समूहों के लोग बड़े बंगलों या सजे-धजे फ्लैटों में मौज की जिंदगी जीनेवाले पत्रकारों के लिए एक अलग दुनिया के लोग हैं। इसलिए इन पर होनेवाले अत्‍याचार महज ‘न्‍यूज वैल्‍यू’ के हिसाब से आंके जाते हैं। अगर बड़े अखबारों के संपादकों की पत्नियां पुलिस के सामूहिक बलात्‍कार की शिकार होने लगें या इन संपादकों की हड्डियां पुलिस लॉक्‍अप में तोड़ी जाने लगें, तब स्थिति भिन्‍न होगी। तब ये घटनाएं सिर्फ चटखारे का मसाला नहीं होंगी। तब पत्रकारों की कलम में वहतीखापन आयेगा जिससे कभी पत्रकारों ने इस देश में भी सत्‍ता की जड़ हिला दी थी और जिसे अब अतीत की चीज बता नये संपादक और पत्रकार खारिज कर रहे हैं। वैसी हालत में पत्रकार स्‍कैंडलों की जगह समस्‍याओं के विश्‍लेषण पर अपनी ऊर्जा लगाने लगेंगे, क्‍योंकि तब समस्‍या उनकी अपनी बन जायेगी और उसके समाधान की तलाश शुरू होगी।

‘प्रोफेशनलिज्‍म’ के नाम पर जो तर्क वर्तमान ढंग की पत्रकारिता के पक्ष में दिए जा रहे हैं, वे या तो गुमराह करनेवाले हैं या पत्रकारिता के बुनियादी रोल के प्रति घोर अनभिज्ञता जाहिर करते हैं। अगर इसका उद्देश्‍य महज लोगों का मनोरंजन करना होता तो इसे जनता का ‘सेंटिनल’ (पहरेदार) या आधुनिक लोकतांत्रिक सज्ञा के उदय काल के तीन इस्‍टेटों—लॉर्ड, क्‍लर्जी और कॉमन्‍स (सामंत, पुरोहित, जनता) के साथ ‘फोर्थ इस्‍टेट’ (चौथा इस्‍टेट) की उपाधि से क्‍यों विभूषित किया जाता? असलियत यह है कि पत्रकारिता का विकास मोटे तौर से लोकतांत्रिक संस्‍थाओं और व्‍यवस्‍था के विकास के साथ ही हुआ और इस व्‍यवस्‍था में पत्रकारिता की एक खास भूमिका थी।

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्‍य एथेंस के नगर राज्‍य की तरह नहीं होते, जिसमें सभी नागरिक एक-दूसरे से मिल सकते हों तथा घटनाओं और राज्‍य की नीतियों पर आमने-सामने चर्चा कर किसी निर्णय पर पहुंच सकते हों। आधुनिक राज्‍यों का सीमा विस्‍तार इतना अधिक हो चुका है कि नागरिकों के लिए एक-दूसरे को जानना या राज्‍य के विभिन्‍न क्षेत्रों में होने वाली घटनाओं की प्रत्‍यक्ष जानकारी प्राप्‍त करना असंभव हो गया है। इसलिए पत्र-पत्रिकाओं का रोल लोगों को घटनाओं की सूचना देने, इन घटनाओं को विश्‍लेषण कर उनके पीछे के अदृश्‍य कारणों को खेल कर रखने तथा आवश्‍यकता होने पर आम हितों के प्रश्‍न पर किसी नीति के प्रश्‍न में लोगों की राय बनाने में सर्वोपरि महत्‍व का हो जाता है। अगर लोगों को राज्‍य के भीतर या उससे संबंद्ध दूर की घटनाओं की सही सूचना और इनके कारणों की जानकारी न मिले, अगर उनके सामने आनेवाली समस्‍याओं के समाधान के मुतल्लिक वैकल्पिक नीतियों की कोई तस्‍वीर न हो, तो फिर वे नीतियों और नेताओं का चयन किस आधार पर करेंगे? जब पत्रकारिता अपनी इस भूमिका से छुट्टी ले लेती है तब मुट्ठी भर लोगों के स्‍वेच्‍छाचारी शासन का पथ प्रशस्‍त करती है। स्‍वेच्‍छाचारी शासक स्‍वतंत्र प्रेस की भूमिका समझते हैं और इसीलिए उनका पहला काम होता है पत्र-पत्रिकाओं को नियंत्रित करना ताकि वे गंभीर राजनीतिक विवेचना से मुंह मोड़ लें। नेपोलियन ने इस संबंध में बड़ी सूझ दिखलायी थी, जब उसने कहा था कि चार अखबार एक लाख सशस्‍त्र दुश्‍मनों के मुकाबले ज्‍यादा नुकसान पहुंचानेवाले होते हैं। इसीलिए उसने 1800 में पेरिस के इलाके में सेंसरशिप के अंदर चलनेवाले पत्रों को छोड़कर बाकी सभी राजनीतिक पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया था। अगर पत्रकारिता की कोई साफ राजनीतिक भूमिका नहीं है, तो इंदिरागांधी ने इमरजेंसी के समय अखबारों को मुंह क्‍यों बंद कर दिया? भारतीय पत्रकारों ने जिस आसानी से इस स्थिति को कबूल कर लिया और अपने कार्य पर सरकार के नियंत्रण को लागू (सेल्‍फ-सेंसरशिप) कर लिया, वह अपने आपमें भारतीय पत्रकारों के चरित्र पर एक गंभीर टिप्‍पणी है।

जनता को राजनेताओं के कार्य कलाप से अवगत कराने के अधिकार को पत्रकारों ने काफी कीमत चुका कर हासिल किया था। इंग्‍लैंड में भी, जहां लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था और पत्रकारिता दूसरी जगहों से पहले विकसित हो रही थी, स्‍वयं पार्लियामेंट अपनी बहसों की रपटों के छपने के खिलाफ थी। लेकिन वहां के पत्रकारों ने जनता के प्रति अपने दायित्‍व को समझते हुए जोखिम उठा कर यह काम किया। एडवार्ड केव नामक एक व्‍यक्ति को 1727 में पार्लियामेंट की बहस को ‘ग्‍लाउसेस्‍टर जर्नल’ में छपवाने के लिए जेल जाना पड़ा था। फिर 1762 में जॉन विल्‍के ने ‘नॉर्थ ब्रिटन’ नामक पत्र में सत्‍ताधारियों की आलोचना के अधिकार के लिए जिहाद शुरू किया। इस पर उसे अपराधी घोषित कर दिया गया और कुछ काल के लिए उसे देश छोड़ भागना पड़ा। लेकिन ऐसे प्रयत्‍नों से जन मानस बदला औश्र 1768 में वह पुन: वापस आया तथा बाद में पार्लियामेंट का सदस्‍य भी चुना गया।

इसी तरह अमेरिका में पत्रकारों ने काफी जोखिम उठा कर राजनीतिक समस्‍याओं पर लोगों को प्रशिक्षित करने की जवाबदेही निभायी। 1733 से प्रकाशित ‘न्‍यू यॉर्क वीकली जर्नल’ के संपादक पीटर जेंगलर को ब्रिटिश शासन की आलोचना के लिए जेल जाना पड़ा था और इस घटना से प्रेस की आजादी का सवाल राजनीति का महत्‍वपूर्ण मुद्दा बन गया। ‘न्‍यू यॉर्क ट्रिब्‍यून’ के संस्‍थापक होरेस ग्रीली ने, जिसे अमरीकी पत्रकारिता का पिता कहा जाता है, साफ तौर पर समाज सुधार को अपनी पत्रकारिता का मिशन बनाया। ध्‍यान देने की बात यह है कि उसने न तो स्‍कैंडल प्रकाशित किये और न ही गलत तरह से विज्ञापन छापे। इसके बावजूद उसने अपनी पत्रिका को सफलता से चलाया। इसी तरह ‘न्‍यू यॉर्क टाइम्‍स’ के संस्‍थापक-संपादक हेनरी जे रेमंड ने अपने पत्र में न तो चटखारे के लिए खबरों को स्‍थान दिया और न ही गलत तरह के विज्ञापन को। फिर भी रेमंड ज‍नहित में सही और सुरुचिपूर्ण रपटें दे कर अपने पत्र को निखार सका। पत्रकारिता में प्रतिबद्धता के ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। फ्रांस में ड्रेफस के बहुचर्चित मामले में सैनिक व्‍यवस्‍था के यहूदी विरोधी पूर्वाग्रहों को अखबारों में खुली चुनौती देने के कारण एमिल जोला जैसे प्रख्‍यात लेखक को साल भर जेल काटनी पड़ी। ऐसी निर्भीक पत्रकारिता से ही ड्रेफस को न्‍याय मिल सका। ध्‍यान देने की बात यह है‍ कि एक को छोड़ ये सब घटनाएं स्‍वतंत्र देशों की थीं। इसलिए, आजाद और गुलाम मुल्‍कों की पत्रकारिता के रेाल को किसी विभाजन रेखा से साफ-साफ अलग करना बेमानी है।

सच तो यह है कि विदेशी शासन के अंत से पत्रकारों का सामाजिक दायित्‍व और भी बढ़ जाता है। विदेशी शासन के समय शासन के प्रति सही और गलत रुख में भेद करना अति सरल था। गोरी चमड़ी और विदेशी बर्बरता अलग से दिख सकती थी। अपने देश के विभिन्‍न समूहों के दावों के बीच नि‍र्णयकरने में ही खोजपूण रपटों और गहरे विश्‍लेषणों की जरूरत खास तौर से होती है। लेकिन प्रश्‍न सिर्फ सामाजिक-राज‍नीतिक रपटों या विश्‍लेषणों का ही नहीं है। जब दुनिया में वैज्ञानिक या तकनीकी खाजें बड़े पैमाने पर हो रही हैं या कला आदि के क्षेत्र में तरह- तरह के प्रयोग हो रहे हैं, तब इन सबके संबंध में आम लोगों को जानकारी देना और प्रशिक्षित करना भी पत्रकारिता का काम हो जाता है। यह काम सिर्फ इन क्षेत्रों के प्रोफेशनल पत्रों का नहीं है, जो सीमित पाठक वर्ग के लिए होते हैं और जिनकी तकनीकी शब्‍दावली आम लोगों के पल्‍ले नहीं पड़ती। सरल भाषा में इनका अर्थ बताना और फिर लोक जीवन से इनके संबंध बतलाना, यह भी पत्रकारिता की जवाबदेही है। लेकिन इन सबकी रपटें हमारी पत्र-पत्रिकाओं में ‍सि‍र्फ खानापूरी के लिए छपती हैं, जिनसे कोई स्‍पष्‍ट जानकारी नहीं होती। कुछ अपवादों को छोड़कर कला, साहित्‍य, पुस्‍तकों आदि की समीक्षाएं पाठकों की जानकारी या रुचि बढ़ानेवाली नहीं होती और अक्‍सर बेसिरपैर की होती हैं, क्‍योंकि संपादक जानते हैं कि जैसा पाठक वर्ग वे तैयार कर रहे हैं या जो उनके टार्गेट (लक्ष्‍य) समूह हैं, उनके लिए ये सब अर्थहीन हैं।

  • आज जिस तरह की पत्रकारिता देश पर छा रही है, वह किसी नयी आवश्‍यकता की पूर्ति के लिए नहीं, बल्‍क‍ि देश में लूट-खसोट से जल्‍दी संपन्‍न बनने का जो माहौल एक वर्ग में पैदा हो गया है, उसी के अनुरूप आचरण का परिणाम है। लेकिन पत्रकार अभिव्‍यक्ति के धनी होते हैं और विचारों के व्‍यापारी, इसलिए अपनी लिप्‍सा को ‘प्रोफेशनलिज्‍म’ का अप-टू-डेट जामा पहना कर कुत्सित कामों को भी प्रतिष्ठित बना पेश कर सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि इस काम में आज के ‘सफल’ पत्रकारों ने काफी सफलता पायी है।

 

Check Also

Time to Imagine a Different Internet: Curbing Big Giants to Ensure Diversity of Perspectives and Ideas

Addressing the tech giants’ control over a wide range of economic and expressive activity   ...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *