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तकनीक की विचारधारा और पूर्वाग्रह

Tech- politics

ओमप्रकाश दास

आज, जब तकनीक तेज़ी से बदल रही है, ऐसे में ये सोचना-समझना बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आख़िर तकनीक और उसके लगातार बदलाव ने अपना क्या असर हमारी दुनिया पर डाला है। विशेषकर सूचना के प्रवाह पर, सामाजिक मूल्यों पर और उससे आगे बढ़कर वैश्विक राजनीति पर? तकनीक और उसकी ख़बरों की संरचना को निर्धारित करने की शक्ति पर इस समय चर्चा इसलीए भी ज़रूरी है, क्योंकि दिन ब दिन तकनीक अपना दायरा हमारे आसपास कसती जा रही है।

ऐसे में इस पर हम रोज़मर्रा के बातचीत में ख़बरों की निष्पक्षता की चर्चा तो करते हैं, लेकिन तकनीक की शक्ति को सिर्फ ख़बरों तक पहुंचने और पहुंचाने तक ही सीमित कर देते हैं। लेकिन मुद्दा ये है कि क्या तकनीक अपने आप में निरपेक्ष होता है? तकनीक और संचार के कई विचारकों और दार्शनिकों ने तकनीक को निरपेक्ष नहीं, बल्कि उसके अपने दर्शन की पुष्टि की है। एन्ड्रयू फिनबर्ग जैसे विचारक ने संचार के परिप्रेक्ष में तकनीक को दो पैमानों पर समझने की कोशिश की। पहला पैमाना था कि क्या तकनीक अपने आप में निरपेक्ष होती है और दूसरा ये कि क्या तकनीक के अपने मूल्य भी होते हैं, जो तकनीक का इस्तेमाल करते ही आप पर अपना असर डालना शुरु कर देते हैं।

औद्योगिक क्रांति के बाद, जब तकनीक घर घर में अपनी पहुंच बनाने लगा तो उसके लक्ष्यों और प्रभावों पर भी चर्चा शुरु हुई। कहा तो ये गया था कि तकनीक यानी प्रौद्योगिकी एक ऐसे समाज का निर्माण करेगी जो ज्यादा सक्षम होगा, समाज में मौजूद कई समस्याओं को एक झटके में हल कर लिया जाएगा। लेकिन जैसे जैसे तकनीक हमारे जीवन में ज्यादा से ज्यादा पहुंच बनाता गया, वैसे वैसे ये धारणा टूटती गई। यही नहीं, तकनीक एक अधिकारवादी और तानाशाही तरीके से आम लोगों पर एक तरह से शासन करने लगा, जहां समाज तकनीक के संदर्भ में बंटने लगा या कहें एक ख़ाई जन्म लेने लगी।

आख़िर ऐसा क्यों हुआ? अगर ग़ौर दे देखें तो जो सवाल पिछली सदी के पांचवे दशक के आसपास प्रमुखता से यूरोप में पूछी जा रही थी, हमारे देश में भी पिछले दो दशकों से पूछी जा रही है। गांधीजी ने शायद तकनीक के दर्शन को काफी पहले ही समझ लिया था, और तकनीक और उसके इस्तेमाल को लेकर चेताया था। कई विचारक, जो क्रिटिकल सिद्धांत को आगे बढ़ाते हैं, इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि तकनीक को उसके इस्तेमाल की प्रकृति से अलग नहीं किया जा सकता। इतिहास बताता है कि तकनीक का विकास, तकनीक पर अधिकार रखने वाले समुदाय का निर्माण करती है। ये वो समाज होता है, जो पूंजी पर भी अपना अधिकार रखता है। ये शक्तिशाली समुदाय, अपना प्रभुत्व उन लोगों देशों पर लादने लगता है, जो तकनीक को ख़रीद नहीं सकते या कहें उसका इस्तेमाल करने की स्थिति में नहीं हैं।

यहां ये समझना बेहद ज़रूरी हो जाता है कि तकनीक के विकास और विस्तार के पीछे पूंजी होती है और उसके विस्तार के केंद्र में कुछ उत्पाद होते हैं। यही व्यवस्था आगे चलकर, उत्पादन के विस्तार को आगे बढ़ाने के लिए एक प्रभुत्वशाली वैश्विक राजनीतिक संरचना का निर्माण करती है, जो अपना असर विकासशील देशों पर ज्यादा बड़े स्तर पर डालता है।

इस मुद्दे को समझने के लिए, अगर ‘आई-फोन’ को उदाहरण के रूप में लें, तो हम साफ समझ पाएंगे कि एक मोबाईल फोन अपने साथ कितने आर्थिक, समाजिक और सांस्कृतिक सवाल लेकर हमारे सामने आता है। लेकिन कैसे? अब देखिए, एक ‘आई-फोन’ इस्तेमाल करने के पीछे आर्थिक सवाल छुपे हैं क्योंकि उसकी कीमत ही आपको भीड़ से अलग कर देगी। एक परिष्कृत तकनीक का इस्तेमाल आपको सामाजिक रूप से भी एक पहचान दिलाता है और साथ ही आप एक अलग सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़ जाते हैं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि तकनीक की बहस कई बार एक उत्पाद तक भी सिमट सकती है।

तकनीक को समझने का यही पैमाना, हम कई दूसरे उत्पादों के परिप्रेक्ष में भी देख सकते हैं। आम रोज़मर्रा के जीवन में हम तकनीक के सामाजिक पहलू को भले नज़रअंदाज कर दें, लेकिन ये अपना काम जारी रखता है। एक और उदाहरण, जलवायु परिवर्तन के लिए सब जानते हैं कि तकनीक का इस्तेमाल बड़ा अंतर पैदा कर सकता है, लेकिन हम देख रहे हैं कि कैसे तकनीक का हस्तांतरण विकसित देशों से विकासशील देशों की तरफ बेहद धीमी गति से हो रहा है। लेकिन क्यों? जवाब वही कि इसके पीछे एक प्रमुत्व का तत्व है, जो पूंजी के एकाधिकार से तो जुड़ता ही है, साथ ही ये एक विशेष भूराजनीतिक दशा-दिशा का निर्माण करता है। यही बात हथियारों के वैश्विक व्यापार के लिए भी कही जा सकती है।

मशहूर विचारक हर्बर्ट मार्कस एक जगह लिखते हैं कि जैसे विज्ञान को बिना राजनीतिक के नहीं समझा जा सकता, वैसे ही तकनीक को भी बिना उसकी विचारधारा के नहीं समझा जा सकता। और इसे अगर एक साथ देखें तो विज्ञान और तकनीक की कार्य पद्धति को बिना उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के नहीं जाना जा सकता। लेकिन यहां पर सांस्कृतिक और समाजिक बदलाव के बिना बात अधूरी ही रहेगी। ‘एक आयामी मनुष्य’ के लेखक मार्कस, एक पते की बात करते हैं और कहते हैं कि तकनीक ने जीवन के ऐसी भावनाएं और अहसासों, जैसे ख़ुशी, डर और तारीफ को भौतिक चीज़ों में बदल दिया। जो भावनाएं सिर्फ महसूस की जा सकती थीं, उसे अब हम सोशल मीडिया में लाईक्स की संख्या में गिन सकते हैं और गिन रहे हैं। एक मनुष्य का व्यक्तित्व तकनीक के कुछ हिट्स की मोहताज हो रही है।

बात चुकी, सूचना संसार और ख़बरों की संरचना से शुरु हुई थी, तो ख़बरों के प्रसारण का बदलते स्वरूप ने काफी कुछ बदल दिया है। अगर आज कोई न्यूज़ पोर्टल मल्टीमीडिया का इस्तेमाल करता है तो वो ख़बरों के कथ्य को तकनीक के सांचे में एक तरह से ढालता भी है। ट्वीटर अगर ख़बरों को कुछ शब्दों तक सीमित करता है, तो ये सूचना का प्रवाह सीधे सीधे रोकना ही हुआ। व्हाट्सएप, न्यूज़ एप्स, वीडियो न्यूज़ क्लिप्स अगर नए साधन बन रहे हैं, तो देखना ये भी होगा कि तकनीक, अपने कौन से समाजिक आर्थिक और राजनीतिक मूल्य थोप रही है। वैसे, ताज़ा ताज़ा चर्चित ‘फेक न्यूज़’ का दानव भी इसी तकनीक के चलते ही फलफूल रहा है।
संदर्भ
 द बायस ऑफ टेक्नॉलजी, क्रिटिकल थ्योरी, सेज प्रकाशन, लंदन (2004)
 पचौरी, सुधीश. उत्तर आधुनिक मीडिया विमर्श. वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली (2009)
 फिनबर्ग, एंड्रयू. व्हाट इज़ फिलॉसफी ऑफ टेक्नॉलजी? (https://www.sfu.ca/~andrewf/books/What_is_Philosophy_of_Technology.pdf)
 बोट्टोन, अलिन डे. द न्यूज़ः ए यूज़र्स मैन्युल. पैंग्विन बुक्स, लंदन (2014)
 बौद्रिलार्ड, जीन. द मिरर ऑफ प्रोडक्शन. टेलोस प्रेस, यूएस (1975)
 मैक्लूहान, मार्शल. द मीडियम इज़ द मैसेज. अंडरस्टैंडिंग मीडियाः द एक्सटेंशन ऑफ मैन. मैक्ग्रीयू-हिल, न्यू-यॉर्क (1964)

-ओमप्रकाश दास, एक टेलीविज़न पत्रकार और मीडिया शोधार्थी हैं
संपर्कः omsdas2006@gmail.com
मोबाइल: 09717925557

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