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हिन्दी सिनेमा की भाषा के विभिन्न आयाम

सुशील यती।

हिंदी ‘पॉपुलर’ सिनेमा मुख्य तौर पर ‘नरेटीव’ सिनेमा है, जिसमे कहानी महत्वपूर्ण होती है। दूसरे शब्दों में कहे तो विभिन्न ‘प्रॉडक्शन’ तकनीक, कैरेक्टर (किरदार), और कहानी के विभिन्न तत्व मिलकर एक कथानक (नरेटीव) का निर्माण करते है, जिसे सिनेमा की भाषा मे ‘नरेटीव’ कहा जाता है। फिल्म कथानक या फिल्म ‘नरेटीव’ को दर्शकों और समीक्षकों की कसौटी पर कसने के लिए कुछ आयाम है, हालांकी मैं यहाँ पर स्पष्ट करना चाहता हूँ की किसी भी फिल्म के अध्ययन या समझने के स्तर पर केवल यही पहलू अंतिम नही होंगे। सिनेमा की संस्कृति बहुत ही व्यापक और जटिल है, तथा इसकी बहुत सी पहलू है जिन पर बात की जानी चाहिए। लेकिन एक आधारभूत समझदारी को विकसित करने के लिए हम सिनेमा निर्माण प्रक्रिया मे स्क्रीप्ट तथा कहानी को आधार बनाकर अपनी बात शुरू कर सकते है जिससे शुरुआती तौर पर यह स्पष्ट हो कि स्क्रीप्ट का ‘फ्लो’ फिल्म के नेरेटिव (कथानक) मे किस प्रकार होता है, और साथ ही यह स्क्रीप्ट को सही तरिके से परदे पर उकेरने के लिए कितना आवश्यक हो जाता है।

सिनेमा के इन पहलुओं का शुरुआती तौर पर अध्ययन किया जाना चाहिए। यहाँ फिल्म स्क्रीप्ट पर अपनी बात केंद्रित करते हुए अपनी बात कहने का प्रयास किया गया है। इस क्रम मे विभिन्न तकनीकी शब्दावलियों का जिक्र करते हुए सिनेमा की भाषा को समझने का प्रयास किया गया है। जिससे यह पता चल पाए की सिनेमा दर्शकों के साथ किस प्रकार एक संवाद स्थापित करता है। यह आमतौर पर देखा भी गया है कि सिनेमा के दर्शक भी अपनी आम बोलचाल की भाषा मे इन तकनीकी शब्दावलियों का प्रयोग करते है और सिनेमा निर्माण के इस क्राफ्ट को समझने के क्रम मे लगातार सीखने की जीजीविषा का परिचय देते है। आइऐं थोड़ा विस्तार से फिल्म के कुछ तकनीकी पहलुओं के बारे मे जानें और चर्चा करे –

1. स्टोरीलाइन – किसी भी फिल्म का प्लॉट, लिनियर (एक ही क्रम मे चलते हुए) या नॉन-लिनियर (कथानक क्रम बदलते हुए आगे बढ़ता है, उदाहरण के लिए फ्लैश-बैक के माध्यम से किसी मोड़ पर फिल्म आपको फिल्म के शुरुआती भाग मे पहुँच जाए) हो सकता है। इसमे मुख्य प्लॉट के साथ-साथ बहुत से ‘सब-पलॉट्स’ शामिल हो सकते है, जो मुख्य नरेटीव के साथ कभी कभी मिलते भी है, और कई बार कुछ जोड़ते भी है।

2. ओपनिंग – फिल्म की ओपनिंग को सामान्यतौर पर सभी समझते है – इसका तात्पर्य फिल्म के कथानक (नरेटीव) का फिल्म या टीवी में दर्शकों के साथ एक परिचय कराना होता है। आपने बहुत सी फिल्मों और टीवी सीरियल मे देखा होगा की फिल्म का कोई किरदार एक खास तरह से फिल्म में एन्ट्री (प्रवेश) करता है। (आमतौर पर इस तरह के दृश्य दर्शकों का किरदार व फिल्म के साथ परिचय करवाता है।)

फिल्म या टीवी के लिए ओपनिंग मे सामान्यतौर पर दर्शकों के लिए ढ़ेर सारी सूचनाएं भी छुपी रहती है। जो इस कथानक (नरेटीव) को स्थापित करती है जैसे ‘समय’ (फिल्म किस समय या काल मे स्थित है), स्थान, लोकेशन, मूड और बहुत बार फिल्म को विभिन्न किरदारों को भी नरेटीव के अनुसार स्थापित किया जाता है। किसी भी फिल्म की ओपनिंग फिल्म से जुड़ी बहुत सी सूचनाएं तो अपने दर्शकों तक पहुंचाती ही है, साथ ही यह फिल्म को लेकर बहुत सी संभावनाओं के लिए भी जगह तलाशती है, तथा दर्शकों को फिल्म के बारे मे कुछ अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाने के लिए भी ‘स्पेस’ का निर्माण करती है – जिसके साथ मिलकर फिल्म धीरे-धीरे विकास करती है और अपने क्लाइमेक्स की तरफ बढ़ती है।

किसी भी फिल्म का यह हिस्सा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्यूंकी यह दर्शको को फिल्म के कथानक में शामिल होने के लिए आमंत्रित करती है और संवाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है। किसी भी फिल्म की यह खासियत होती है की वह दर्शकों के साथ या इसके उलट यूं कहें की दर्शक फिल्म के साथ एक रिश्ता बना पाए और इस रचना संसार मे दर्शक शामिल हो पाए। और यही सूत्र किसी भी फिल्म के लिए सफलता के दरवाजे भी खोलता है।

यहाँ पर मै फरहान अख्तर निर्देशित फिल्म ‘दिल चाहता है’ (2001) की ओपनिंग की बात करना चाहूंगा। फिल्म की शुरुआत स्ट्रीट लाइटो के बीच सड़क पर दौड़ती एक एम्बुलेंस से होती है। इस सीक्वेंस मे एम्बुलेंस के साइरन की आवाज का धीरे धीरे तेज होना भी दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने मे मदद करता है। अगले ही सीक्वेंस मे आप अस्पताल मे होते है, और अगले कुछ दृश्यों मे ही दर्शको को यह अंदाजा हो जाता है की फिल्म का कथानक(नरेटीव) के केंद्र मे तीन दोस्त है और उनकी गहरी दोस्ती है। इसी तरह राम गोपाल वर्मा निर्देशित ‘सत्या’ (1998)की ओपनिंग भी दर्शकों को मुख्य किरदार से परिचय कराने के साथ साथ फिल्म के परिदृश्य की जानकारी भी दे जाती है। यह फिल्म अपने ओपनिंग सीक्वेंस मे एक भूमिका हमारे सामने रखती है और फिल्म का परिचय हमे देती है की आखिर फिल्म किसके बारे मे है, बीच-बीच मे पुलिस एनकाउन्टर, मर्डर, बंबई शहर के दृश्य, और समुद्र के दृश्य हमारे सामने आते है। जिससे हमे फिल्म के बारे मे एक साफ तस्वीर बनाने मे मदद मिलती है।

3. क्लोजर (समापन) – इस चरण में कहानी अपने अंत की तरफ बढ़ती है। यहाँ फिल्मकार कथानक (नरेटीव) की सभी संभावनाओं को अपने अंत की तरफ पहुँचाते हुए फिल्म को आगे बढ़ाता है। यह कथानक तथा उसके किरदारों की परिणीती का चरण होता है। दूसरे शब्दों मे कहे तो फिल्म अपनी शुरुआत से जितनी भी संभावनाओं की तरफ बढ़ रही होती है, उन सभी स्थितियों और संभावनाओं की इस चरण मे परिणीती होती है। दरअसल, यह फिल्म का वह चरण होता है जहाँ पर फिल्म टेक्स्ट को कसा जाता है। सभी मुख्य किरदार अब अपनी पूरी धार के साथ पर्दे पर होते है। यहाँ पर उस फिल्म कथानक को अच्छा नहीं माना जाएगा – जो इस चरण में भी अपने सीरें खुले छोड़ दे। फिल्मकार के लिए इन सिरों को एक समग्र एवं समुचित अंत की तरफ पहुँचाना आवश्यक है।

4. कन्फ्लीक्ट (संघर्ष) – फिल्म कथानक (नरेटीव) बिना ‘कन्फ्लीक्ट’ के पूर्ण नही होता है। यह फिल्म के लिए बहुत ही आवश्यक है – मुख्यतौर पर फिल्म मे एक मुख्य कन्फ्लीक्ट और साथ ही कई सारे ‘कन्फ्लीक्ट’ या संघर्ष की स्थिति उपस्थित हो सकती है। फिल्म नरेटीव मे बहुत बार कन्फ्लीक्ट या संघर्ष की स्थिति किसी समस्या या कुछ सवालों के तौर पर पेश या प्रस्तुत किया जाता है। बिना ‘कन्फ्लीक्ट’ को सुलझाए फिल्म का कथानक आगे नही बढ़ सकता और अगर ऐसा किसी फिल्म के कथानक के साथ होता है तो वह दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने मे विफल साबित होगा।

5. कारण व प्रभाव – यह फिल्म की कहानी का एक तत्व है, जिसका मुख्य उद्देश्य फिल्म के नरेटीव (कथानक) को आगे बढ़ाना है। इसे इस तरह समझिए की प्रत्येक घटना का कोई सही/उचित कारण होना चाहिए। उसी तरह फिल्म की स्क्रीप्ट मे ऐसे बहुत से मोड़ आते है जब किसी घटना से किसी किरदार का जीवन बदल जाता है – फिल्म के कथानक में घटी घटनाओं का महत्व होता है – क्योंकि वह ही कहानी को आगे बढ़ाने और उसे अपने अंजाम तक पहुँचाने के लिए आवश्यक है। यहाँ पर रामगोपाल वर्मा निर्देशित फिल्म ‘सत्या’ (1998)का उदाहरण देना उचित होगा। सत्या जब बंबई पहुँचता है और एक बार मे काम शुरू कर देता है। उस बार मे जो कुछ भी घटता है इससे उसकी जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है। और यही वो कारण होता है जिस वजह से वह जेल जाता है और वहाँ उसकी मुलाकात ‘भीखू म्हात्रे’ से होती है।

6. कलाइमेक्स – इस शब्द का प्रयोग फिल्मों से जुड़ी बातचीत मे आमतौर पर आ ही जाता है, क्लाइमेक्स फिल्म कथानक (नरेटीव) मे ‘कन्फ्लीक्ट’ की स्थिति का चरम बिंदु होता है – फिल्म कथानक के अपने चरम (क्लाइमेक्स) पर पहुँचने की स्थिति मे सही मायनों मे फिल्म का कथानक (नरेटीव) आगे बढ़ने के लिए तैयार होता है जिसकी अगले चरण मे फिल्म की कहानी अपने निराकरण की तरफ बढ़ती है। साथ ही, यह बात स्क्रीप्ट के ट्रीटमेंट से भी जुड़ी हुई है।

फिल्म का क्लाइमेक्स ही फिल्म के कथानक (नरेटीव) का वह भाग होता है जहाँ पर दर्शकों की जिज्ञासा सबसे ज्यादा बढ़ी हुई होती है। यह वो स्थिति होती है जब दर्शक जानना चाहता है की अब क्या होगा? लेकिन यह कोई जरुरी बात नहीं है की यह सभी फिल्मों पर लागू ही हो। यह इस बात पर भी निर्भर करेंगा की फिल्म किस विधा (जेनर) की है – जैसे की एक्शन, कॉमेडी, फैमिली ड्रामा, सस्पेंस थ्रीलर, साइन्स फिक्शन, हॉरर इत्यादी। फिल्म कथानक के विभिन्न चरणों मे बहुत बार छोटे छोटे क्लाइमेक्स मिलकर भी एक बड़े क्लाइमेक्स का निर्माण करते है।

7. रिसॉल्यूशन (समाधान) – यह फिल्म नेरेटिव (कथानक) का वह चरण है जहाँ सभी तरह के कन्फलीक्ट ‘रिसॉल्व’ या जिनका समाधान हो जाता है, या फिर यही वो चरण है जहां पर आप ‘सिक्वेल’ या इसी कहानी को आगे बढ़ाते हुए दूसरी फिल्म शुरू कर सकते है – उदाहरण के लिए ‘पीके’ फिल्म का अंत देखिए – इस तरह का अंत फिल्मकार को फिल्म का सीक्वेल बनाने मे मदद करता है। ऐसे ही बहुत से उहाहरण हो सकते है जैसे की क्रिश, धूम इत्यादी। यहाँ गौर करने वाली बात यह है की बहुत सी जटिल ‘सीक्वेन्स’ का एक तार्किक अंत ही इस चरण मे प्रस्तुत किया जाता है। अंत ऐसा होना चाहिए जिसमे दर्शक फिल्म के साथ अपने को जोड़ कर देख पाए और संवाद की स्थिति उत्पन्न हो।

8. फिल्म विधा (फिल्म जॉनर) – फिल्म-लेखन के दौरान अगर आप इस बात को लेकर स्पष्ट नही है कि आप किस विधा की फिल्म लिख रहे है, तो ऐसी स्थिति मे भटकाव की संभावना सर्वाधिक होगी। फिल्मों के अध्ययन के स्तर पर भी यह जानना आवश्यक है की फिल्म किस विधा (जेनर) की है – उदाहरणस्वरुप साइन्स फिक्शन, हॉरर, फैमिली ड्रामा, एक्शन इत्यादी। यह ध्यान रखना चाहिए की दर्शकों का एक बड़ा वर्ग भी अपने अनुभवों की बदौलत विभिन्न फिल्म विधाओं की पहचान रखता है, और इसी क्रम मे वह भी फिल्म के साथ संवाद स्थापित करने की कोशिश करता है, इस तरह कुछ फिल्मकार जैसे सूरज बड़जात्या, रामगोपाल वर्मा, अनुराग कश्यप अपनी खास तरह की फिल्मों के लिए जाने जाते है – और दर्शकों का एक बड़ा समूह इन निर्देशकों के काम को पहचानता है और विभिन्न कारणों से इनकी प्रशंसा भी करता है।

यह गौर करने वाली बात है की सिनेमा के क्षेत्र मे रोज नए तकनीकी बदलाव आ रहे है। साथ ही साथ, फिल्म-निर्माण और उसे देखने और दिखाने के तौर-तरिकों मे भी आमूल-चूल परिवर्तन आ रहे है। सिनेमा को लेकर दर्शको की समझदारी समय के साथ और उन्नत हो रही है। भारतीय सिनेमा नित नए विषयों को लेकर सामने आ रहा है तथा समय समय पर बहुत से प्रयोग भी कर रहा है। इन परिवर्तनों ने हमे बहुत से नए फिल्मकार और फिल्म-लेखक भी दिए है जो इस बदलते समय मे नए तरह का सिनेमा हम तक पहुँचा रहे है।

सुशील यती जेनयू में रिसर्च स्कॉलर हैं।

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