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संचार मॉडल: अरस्तू का सिद्धांत

डॉ. कुमार राज्यवर्धन।

संचार की प्रक्रिया का अध्ययन एक विज्ञान है। यह प्रक्रिया जटिल है। विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न तरीके से इस प्रक्रिया का वर्णन किया है। संचार की प्रक्रिया को बताने वाला चित्र मॉडल कहलाता है। इन मॉडलों से हमें संचार की गतिशील और सक्रिय प्रक्रिया समझने में आसानी होती है। ये संचार के सिद्धांत और इसके तत्वों के बारे में भी बताते हैं। संचार मॉडल से हमें पता चलता है कि संचार में किन-किन तत्वों की क्या भूमिका है और ये एक दूसरे का कैसे प्रभावित करते हैं?

संचार की शुरुआत लाखों साल पहले जीव की उत्पत्ति के साथ मानी जाती है। संचार की प्रक्रिया और इससे जुड़े कई सिद्धांत की जानकारी हमें प्राचीन ग्रथों से मिलती है। लेकिन उन जानकारियों पर और अध्ययन की आवश्‍यकता है। अरस्तू की व्याख्या के आधार पर कुछ विद्वानों ने संचार के सबसे पुराने मॉडल को बनाने की कोशिश की है। आप उसके बारे में जानते हैं?

करीब 2300 साल पहले ग्रीस के दार्शनिक अरस्तू ने अपनी किताब ”रेटॉरिक” में संचार की प्रक्रिया के बारे में बताया है। रेटॉरिक का हिन्दी में अर्थ होता है भाषण देने की कला। अरस्तू ने संचार की प्रक्रिया को बताते हुए पॉंच प्रमुख तत्वों की व्याख्या की है। संचार प्रेषक (भेजने वाला), संदेश (भाषण), प्राप्तकर्त्ता, प्रभाव और विभिन्न अवसर।

अरस्तू के विश्‍लेशण को निम्नलिखित चित्र या मॉडल के द्वारा समझा जा सकता है।
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अरस्तू के अनुसार संचार की प्रक्रिया रेखीय है। रेखीय का अर्थ है एक सीधी लाईन में चलना। प्रेशक श्रोता को संदेश भेजता है जिससे उस पर एक प्रभाव उत्पन्न होता है। हर अवसर के लिए संदेश अलग-अलग होते हैं।

अरस्तू के अनुसार संचार का मुख्य उद्देष्य है श्रोता पर प्रभाव उत्पन्न करना। इसके लिए प्रेषक विभिन्न अवसरों के अनुसार अपने संदेश बनाता है और उन्हें श्रोता तक पहुंचाता है जिससे कि उनपर प्रभाव डाला जा सके। विभिन्न अवसरों पर संदेश कैसे तैयार किये जाये? इसका विश्लेषण भी अरस्तू करते हैं। संदेश तैयार करने के लिए वे तीन प्रमुख घटकों की चर्चा करते हैं, पैथोस्, इथोस् और लोगोस्।

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पैथोस् का शाब्दिक अर्थ है दुःख। अरस्तु के अनुसार यदि संदेश इस तरह से तैयार किये जायें, जिससे कि श्रोता के मन में दुःख या इससे संबधित भाव उत्पन्न हो सके तो श्रोता के मस्तिष्क पर प्रभाव डाला जा सकता है। आसान शब्दों में कहें तो अपनी बात मनवाई जा सकती है। इसे समझने के लिए मैं एक उदाहरण देता हूँ। मान लीजिए कि आपका छोटा भाई आपके साथ बाजार जाने की जिद करता है, लेकिन आप उसे नहीं ले जाना चाहते हैं। लेकिन, जब वो जोर-जोर से रोने बिलखने लगता है तो आप मजबूर होकर तैयार हो जाते हैं। इस प्रकरण का विश्लेषण करके देखिए। बच्चे ने संचार की शुरुआत की और अपने संदेश को उसने दुःख से इस तरह भर दिया कि श्रोता उसकी बात मानने को मजबूर हो गया। अर्थात प्रेषक ने अवसर के अनुरूप अपने संदेश का निर्माण किया। जिससे कि श्रोता पर इच्छित प्रभाव उत्पन्न हो सके।

मैंने पहले कहा था कि रेटॉरिक का अर्थ होता है भाषण देने की कला। यह मुख्य रूप से प्राचीन काल में राजनेताओं को सिखाई जाती थी, आज भी कई कुशल राजनेता ऐसे हैं जो अरस्तू की व्याख्या को अपने भाषण में आत्मसात करते हैं। तो क्या आप के दिग्गज नेता आशुतोष ने भी गजेन्द्र हत्याकान्ड मामले में अरस्तू के संदेशों से सीख ली थी? आपको याद होगा कि वे दहाड़े मारकर रोने लगे थे।

”इथॉस्” का शाब्दिक अर्थ है विश्वशनीयता। विश्वशनीयता को लंबे समय में हासिल किया जा सकता है। इसके लिए प्रेषक को अपने आचार-व्यवहार में इस तरह के परिवर्तन लाने होते हैं जिससे कि सामान्य जन का विश्वास उस पर मजबूत हो सके। जब लोगों का विश्वास उस पर होगा तो वो जो भी संदेश देगा उसका प्रभाव श्रोता पर अनुकूल पड़ेगा। इसे समझने के लिए शेक्सपियर के नाटक जूलियस सीजर को याद करिये। सीजर की हत्या हो गयी है। मार्क अंटोनी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए अपना भाषण देता है। उस प्रसिद्ध भाषण के बाद विद्रोह हो जाता है। अंटोनी पर लोगों का विश्‍वास है क्योंकि उसकी छवि भरोसेमंद है। अंटोनी के इस प्रसिद्ध भाषण में अरस्तू के बताये तीनों तत्व पैथॉस्, इथॉस् और लोगॉस् का बखूबी प्रयोग किया है। इसी तरह महाभारत में युधिष्ठिर पर इतना विश्‍वास है कि उसके कहे झूठ पर विश्‍वास करके उसके गुरू द्रोणाचार्य अपना हथियार जमीन पर रख देतें हैं, और उनकी हत्या हो जाती है। यह भी इथॉस् का ही एक उदाहरण है।

लोगॉस् का शाब्दिक अर्थ है तर्क। अरस्तू कहते हैं कि प्रेषक का संदेश तर्क से भरपूर होना चाहिए। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि प्रेशक को अपनी बात तार्किक तरीके से रखनी चाहिए जिससे कि श्रोता पर प्रभाव पड़े। जूलियस सीजर नाटक में अंटोनी के भाषण में संदेश बड़े तार्किक तरीके से रखे गये हैं। इसे एक और उदाहरण से समझिए। न्यायालय में वकील मुकदमें की पैरवी करता है। इस दौरान वो प्रेषक है जबकि न्यायाधीश महोदय श्रोता। वकील को अपने संदेश या बातों से जज को प्रभावित करना है। इसके लिए वो तर्क का सहारा लेता है और घटना का तार्किक विश्‍लेषण न्यायाधीश के सामने रखता है। यदि संदेश तर्कपूर्ण है तो इसका प्रभाव पड़ता है और वकील साहब न्यायाधीश महोदय से अपने पक्ष में फैसला ले लेते हैं।

ये तो हुई अरस्तू के संचार के सिद्धांत की चर्चा। अगली कड़ी में लॉसवेल मॉडल की चर्चा करेंगे। यदि अरस्तू के सिद्धांत से संबधित कोई समस्या या कोई प्रश्‍न हो तो आप लेखक से पूछ सकते हैं। ई मेल vardhan.reporter@gmail.com, kumar.rajyavardhan@iuu.ac मोबाईल 8755973711।

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