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पत्रकारिता की विसंगतियों के केंद्र में है उसका कारोबार

प्रमोद जोशी।

मार्शल मैकलुहान के अनुसार पत्रकारिता पहला औद्योगिक उत्पाद है। यानी बाजार में बेचा जाने वाला और बड़े स्तर पर तैयार होने वाला माल। पाठकों का एक बड़ा बाजार है, जिन्हें जानकारी की जरूरत है। यह जानकारी उनके आसपास की हो सकती है और वैश्विक भी। इसमें सामान्य राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, खेल और मनोरंजन से जुड़ी घटनाएं होती हैं। इसमें विचार और विमर्श भी होता है। नागरिक और वृहत व्यवस्था के बीच सूचना का आदान-प्रदान भी इसके मार्फत होता है। इस गतिविधि के बीच से ही मास कम्युनिकेशन यानी जन-संचार जैसा शब्द निकला और मास-मीडिया यानी जन-संचार माध्यम विकसित हुए।

जब हम मीडिया के विकास, क्षेत्र विस्तार और गुणात्मक सुधार की बात करते हैं, तब सामान्यतः उसके आर्थिक आधार के बारे में विचार नहीं करते। करते भी हैं तो ज्यादा गहराई तक नहीं जाते। इस वजह से हमारे एकतरफा होने की संभावना ज्यादा होती है। जब हम मूल्यबद्ध होते हैं, तब व्यावहारिक बातों को ध्यान में नहीं रखते। इसके विपरीत जब व्यावहारिक होते हैं तब मूल्यों को भूल जाते हैं। जब पत्रकारिता की बात करते हैं, तब यह नहीं देखते कि यह वृहत आर्थिक गतिविधि का अंग है। यानी इतने लोगों को रोजी-रोज़गार देना और साथ ही इतने बड़े जन-समूह के पास सूचना पहुँचाना मुफ्त में नहीं हो सकता।

क्या हैं विसंगतियाँ?
मीडिया से आपकी शिकायत सही है, पर हमें उस दोष को समझना चाहिए, जिसे लेकर हम परेशान हैं। ये परेशानियाँ कई तरह की हैं। कुछ व्यक्तिगत हैं तो कुछ व्यवस्थागत। शिकायती लहज़े में अक्सर कुछ लोग सवाल करते हैं कि मीडिया की आलोचना के पीछे आपकी कोई व्यक्तिगत पीड़ा तो नहीं? ऐसे सवालों के जवाब नहीं दिए जा सकते। दिए भी जाएं तो ज़रूरी नहीं कि पूछने वाला उत्तर से संतुष्ट हो। बेहतर है कि हम चीज़ों को बड़े फलक पर देखें। व्यक्तिगत सवालों के जवाब समय देता है।

पत्रकार होने के नाते हमारे पास अपने काम का अनुभव और उसकी मर्यादाओं से जुड़ी धारणाएं हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हम कारोबारी मामलों को महत्वहीन मानें और उनकी उपेक्षा करें। मेरा अनुभव है कि मीडिया-बिजनेस में तीन-चार तरह की प्रवृत्तियाँ हैं, जो व्यक्तियों के मार्फत नज़र आती हैं। एक है कि हमें केवल पत्रकारीय कर्म और मर्यादा के बारे में सोचना चाहिए। यानी कारोबार हमारी चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। या वह हमारी समझ के बाहर है। पत्रकारीय कर्म के भी अंतर्विरोध हैं। एक कहता है कि हम जिस देश-काल को रिपोर्ट करें, उससे निरपेक्ष रहें। जिस राजनीति पर लिखें, उसमें शामिल न हों। दूसरा कहता है कि राजनीति एक मूल्य है। मैं उस मूल्य से जुड़ा हूँ। मेरे मन में कोई संशय नहीं। मैं ऍक्टिविस्ट हूँ, वही रहूँगा।

तीसरा पत्रकारीय मूल्य से हटकर कारोबारी मूल्य की ओर झुकता है। वह पत्रकारीय मूल्यों से जुड़ा होने के साथ-साथ कारोबार की ज़रूरत को भी आंशिक रूप से समझना चाहता है। चौथा कारोबारी ऍक्टिविस्ट है। यानी वह खुलेआम बिजनेस के साथ रहना चाहता है। उसे धंधा ही करना है। यानी अख़बार का सम्पादक मार्केटिंग हैड से बड़ा एक्सपर्ट खुद को साबित करना चाहता है। पाँचवाँ बिजनेसमैन है, जो कारोबार जानता है, पर पाठक के दबाव के कारण पत्रकारीय मर्यादाओं को तोड़ना नहीं चाहता। वह इस कारोबार की साख बनाए रखना चाहता है। छठे को मूल्य-मर्यादा नहीं धंधा चाहिए। पैसा लगाने वाले ने पैसा लगाया है। उसे मुनाफे के साथ पैसे की वापसी चाहिए। आप इस वर्गीकरण को अपने ढंग से बढ़ा-घटा सकते हैं। इस स्पेक्ट्रम के और रंग भी हो सकते हैं। एक संतुलित धारणा बनाने के लिए हमें इस कारोबार के सभी पहलुओं का विवेचन करना चाहिए।

आर्थिक आधार
कुछ साल पहले ब्लॉगिंग चर्चित विषय था। हिन्दी में कई नए ब्लॉग लेखक सामने आए। उनके सहारे कारोबार चलाने के लिए ब्लॉग एग्रेगेटर भी सामने आए। पर यह कारोबार चला नहीं। चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी जैसे लोकप्रिय एग्रेगेटर बंद हो गए। इन दिनों हमारी वाणी, ब्लॉगावली, ब्लॉगवार्ता, रफ्तार, इंडीब्लॉगर जैसे अनेक प्रयास हुए हैं। इनमें इंडीब्लॉगर ही व्यावसायिक रूप से सफल है। इसका कारण है कि उसके संचालकों ने इसका बिजनेस मॉडल सफलता पूर्वक तैयार कर लिया है। यह सब कारोबार से भी जुड़ा है। हाल में गूगल एडसेंस ने हिन्दी ब्लॉगरों को भी विज्ञापन देने शुरू किए हैं। सवाल है कि क्या ब्लॉगर ऐसे ब्लॉग लिख पा रहे हैं, जिन्हें लोग पढ़ें? कोई सिर्फ जनसेवा के लिए एग्रेगेटर नहीं बना सकता। उसका कारोबारी मॉडल अभी कच्चा है। जिस दिन अच्छा हो जाएगा, बड़े इनवेस्टर इस मैदान में उतर आएंगे। फेसबुक और ट्विटर का उदाहरण सामने है।

मुफ्त में कोई चीज़ नहीं मिलती। मुफ्त में देने वाले का कोई न कोई स्वार्थ होता है। ऐसे में गुणवत्ता और वस्तुनिष्ठता नहीं मिलती। हमें समझना चाहिए कि डिजिटल इकोनॉमीकी शक्ल कैसी बनने वाली है और इसमें ‘विचार और प्रचार’ का द्वन्द किस रूप में खड़ा होगा।

संचार की ताकत को समझना, फिर उसके आर्थिक आधार को खोजना और फिर उसके हिसाब से कंटेंट को तैयार करना एक-दूसरे से जुड़ा है। संचार हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था से भी जुड़ा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था भी एक प्रकार के बाजार से संचालित है। वोटर एक प्रकार से राजनीतिक विचारधारा का खरीदार है। उसे जो जितना प्रभावित कर ले जाएगा, उतना बेहतर कारोबार करेगा। सन 2014 के लोकसभा चुनाव में मीडिया का कारोबारी इस्तेमाल चर्चा का विषय था। अब सोशल मीडिया के दोहन का दौर है। पत्रकार के रूप में हम अपनी साख, और सूचना की पवित्रता को लेकर विचार करते रह गए और कारोबारी आँधी ने हमें घेर लिया। यह आँधी अभी चल ही रही है। इसका मतलब यह नहीं कि सूचना की वस्तुनिष्ठता, साख और सच्चाई का दौर खत्म हो गया।

मूल्यबद्ध पत्रकारिता
सच को जनने की इच्छा मनुष्य की बुनियादी प्रवृत्तियों में से एक है। कुछ देर के लिए वह सूचना की आँधी से घिर कर विस्फरित हो सकता है, पर अंततः उसे मानवीय मूल्यों से जुड़ी पत्रकारिता की जरूरत है। इस लिहाज से पत्रकारिता के मूल्य उसके औद्योगिक उत्पाद बनने के काफी पहले से हैं, बल्कि मानव समाज की उत्पत्ति के समय से हैं। जानकारी हासिल करने, विचार-विमर्श और संवाद करने के बाद फैसला करने की प्रवृत्ति कायम रहेगी। यही बात पत्रकारीय मूल्यों के बने रहने का कारण है।

भारत में अभी प्रिंट मीडिया का अच्छा भविष्य है। कम से कम दस साल तक इसका बेहतरीन विस्तार देखने को मिलेगा। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विस्तार हो रहा है। वह भी चलेगा। उसके समानांतर इंटरनेट का मीडिया आ रहा है, जो निश्चित रूप से सबसे आगे जाएगा। पर उसका कारोबारी मॉडल अभी शक्ल नहीं ले पाया है। मोबाइल तकनीक का विकास इसे आगे बढ़ाएगा। तमाम चर्चा-परिचर्चाओं के बावज़ूद इंटरनेट मीडिया-कारोबार शैशवावस्था में, बल्कि संकट में है।

इंटरनेट का युग
दुनिया के ज्यादातर बड़े अखबार इंटरनेट पर आ गए हैं। वॉशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्डियन, टेलीग्राफ, इंडिपेंडेंट, डॉन, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दू से लेकर जागरण, भास्कर, हिन्दुस्तान और अमर उजाला तक। ज्यादातर के ई-पेपर हैं और न्यूज वैबसाइट भी। पर इनका बिजनेस अब भी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुकाबले हल्का है। विज्ञापन की दरें कम हैं। इनमें काम करने वालों की संख्या कम होने के बावजूद उनका वेतन कम है। धीरे-धीरे ई-न्यूज़पेपरों की फीस तय होने लगी है। रूपर्ट मर्डोक ने पेड कंटेंट की पहल की है। अभी तक ज्यादातर कंटेंट मुफ्त में मिलता है। रिसर्च जरनल, वीडियो गेम्स जैसी कुछ चीजें ही फीस लेकर बिक पातीं हैं। संगीत तक मुफ्त में डाउनलोड होता है। बल्कि हैकरों के मार्फत इंटरनेट आपकी सम्पत्ति लूटने के काम में ही लगा है।

मुफ्त में कोई चीज़ नहीं मिलती। मुफ्त में देने वाले का कोई न कोई स्वार्थ होता है। ऐसे में गुणवत्ता और वस्तुनिष्ठता नहीं मिलती। हमें समझना चाहिए कि डिजिटल इकोनॉमीकी शक्ल कैसी बनने वाली है और इसमें ‘विचार और प्रचार’ का द्वंद्व किस रूप में खड़ा होगा। कभी मौका मिले तो हफिंगटनपोस्ट को पढ़ें। इंटरनेट न्यूज़पेपर के रूप में यह अभी तक का सबसे सफल प्रयोग है। पिछले साल अगस्त के महीने में इस साइट पर साढ़े 11 करोड़ यूनीक विज़िटर आए।

ज्यादातर बड़े अखबारों की साइट से ज्यादा। यह तादाद बढ़ रही है। इस अख़बार का भारतीय संस्करण भी निकल रहा है। पिछले साल इसका राजस्व तकरीबन 20 करोड़ डॉलर हो गया, जो दो साल पहले तीन करोड़ डॉलर था। अब भी यह रिवेन्यू बड़े अखबारों की तुलना में कम है।

हफिंगटनपोस्ट इंटरनेट की बढ़ती ताकत का प्रतीक है। करीब दस हजार ब्लॉगर इसकी मदद करते हैं। इसके साथ जुड़े पाठक बेहद सक्रिय हैं। हर महीने इसे करीब दस लाख कमेंट मिलते हैं। इतने पत्र अखबारों को नहीं मिलते। चौबीस घंटे अपडेट होने वाला यह अखबार दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अखबारों की कोटि की सामग्री देता है। साथ में वीडियो ब्लॉगिंग है। सन 2005 से शुरू हुई इस न्यूज़साइट को-फाउंडर एरियाना हफिंगटन को 2014 की दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं की फोर्ब्स सूची में 52वं नम्बर पर रखा था।

साख का सवाल
इंटरनेट के मीडिया ने अपनी ताकत और साख को स्थापित कर दिया है। पर इंटरनेट भरोसेमंद नहीं है। इसपर आसानी से अफवाह फैलाई जा सकती है। गलत सूचनाएं परोसी जा सकती हैं। सेकंडों में किसी का चरित्र हनन किया जा सकता है। तकनीक सूचना के प्रसार की आँधी ला रही है तो हमें उस आँधी को काबू में रखने के बारे में भी सोचना होगा। सन 1450 में गुटेनबर्ग ने मूवेबल टाइप के मार्फत जो तकनीकी क्रांति की थी, उसका नया दौर चल रहा है। मीडिया की साख बने और गुणवत्ता में सुधार हो इसके लिए इसके कारोबारी मॉडल के बारे में सोचना होगा।

हम कैशलेस आर्थिक प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं। नेट पर पेमेंट लेने की व्यवस्था करने वाली एजेंसी पेपॉल को छोटे पेमेंट यानी माइक्रो पेमेंट्स के बारे में सोचना पड़ रहा है। जिस तरह भारत में मोबाइल फोन के दस रुपए के रिचार्ज की व्यवस्था करनी पड़ी उसी तरह इंटरनेट से दो रुपए और पाँच रुपए के पेमेंट का सिस्टम बनने जा रहा है। चूंकि नेट अब मोबाइल के मार्फत आपके पास आने वाला है, इसलिए बहुत जल्द आपको चीजें बदली हुई मिलेंगी। और उसके बाद कंटेंट के कुछ नए सवाल सामने आएंगे। पर जो भी होगा, उसमें कुछ बुनियादी मानवीय मूल्य होंगे। वे मूल्य क्या हैं, उनपर चर्चा की जरूरत है। और मीडिया के स्वामित्व पर विचार करने की भी।

प्रमोद जोशी चार दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं. करीब दस वर्षों तक वे हिंदुस्तान से जुड़े रहे और अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया. इससे पहले वे स्वतंत्र भारत , नवभारत टाइम्स , सहारा टेलीविज़न से भी जुड़े रहे. हिंदी पत्रकारिता में उनका महत्वपूर्ण योगदान है. अभी उनका एक ब्लॉग है जिस पर वे समकालीन मुद्द्दों पर लिखते रहतें हैं. उनला ब्लॉग है: जिज्ञासा http://pramathesh.blogspot.com

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