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Tag Archives: फेसबुक

नेपाल त्रासदी में भारतीय मीडिया

आशीष कुमार ‘अंशु’। भारतीय मीडिया को लेकर नेपाल से आ रही खबरों से यह जाहिर था कि मीडिया में जो कुछ आ रहा है, उसे देखकर नेपाल के लोग भारतीय मीडिया के प्रति आक्रोश में हैं। क्या नेपाल के लोगों का यह गुस्सा वास्तव में भारतीय मीडिया से था, या ...

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हिंदी पत्रकारिता की सदाबहार गलतियां

डॉ. महर उद्दीन खां। पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोग को अनुचित नहीं कहा जा सकता मगर उन का सही प्रयोग किया जाना चाहिए। देखने में आता है कि जाने अनजाने या अज्ञानता वष कई उर्दू और अंग्रेजी शब्दों ...

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सोशल मीडिया : खबरों की चौपाल

धनंजय चोपड़ा। माना जा रहा है कि वर्ष 2040 में प्रिंट न्यूज पेपर दुनिया से विदा हो जायेगा। दुनिया का कोई भी कागजी अखबार तब तक नहीं बचेगा। सब कुछ डिजिटल हो चुका होगा। बीसवीं सदी के मध्य में संचार शास्त्री मार्शल मैक्लुहान ने घोषणा की थी कि संचार माध्यम ...

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पत्रकारिता की विसंगतियों के केंद्र में है उसका कारोबार

प्रमोद जोशी। मार्शल मैकलुहान के अनुसार पत्रकारिता पहला औद्योगिक उत्पाद है। यानी बाजार में बेचा जाने वाला और बड़े स्तर पर तैयार होने वाला माल। पाठकों का एक बड़ा बाजार है, जिन्हें जानकारी की जरूरत है। यह जानकारी उनके आसपास की हो सकती है और वैश्विक भी। इसमें सामान्य राजनीतिक, ...

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कोर्ट रिपोर्टिंग : बेहद सतर्क रहने की जरूरत

अनूप भटनागर। न्‍यायपालिका और इसकी कार्यवाही से जुड़ी छोटी बड़ी सभी सभी खबरों में नेताओं, नौकरशाहों और कार्पोरेट जगत के लागों की ही नहीं बल्कि आम जनता की भी हमेशा से ही गहरी दिलचस्‍पी रही है। महांत्‍मा गांधी की हत्‍या से लेकर इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय द्वारा इन्दिरा गांधी का चुनाव ...

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क्राइम रिपोर्टिंग : 24 x 7 x 365 दिन : चाक चौबंद

इंद्र वशिष्ठ। अपराध की खबर सिर्फ किसी वारदात की सूचना भर नहीं होती है अपराध की खबर लोगों को सतर्क और जागरूक करती है। अपराधी वारदात के कौन से तरीके अपना कर लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं इसकी जानकारी अपराध के समाचारों से मिलती है। लोग यदि अपराध ...

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उग्रवाद की रिपोर्टिंग में अटूट लगन, अनुशासन जरूरी

इरा झा। उग्रवाद प्रभावित इलाकों में रिपोर्टिंग के लिए संयम, कल्‍पनाशीलता, धैर्य, जी-तोड़ मेहनत और अटूट लगन की आवश्‍यकता होती है। इनमें सामान्‍य खबरों की तरह कुछ भी और कभी भी नहीं लिखा जा सकता। यह काम बेहद जोखिम भरा है, लिहाजा इस वास्‍ते सावधानी और तथ्‍यों तथा स्रोतों की ...

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कॉरपोरेट रिपोर्टिंग : कंपनी जो बताए वह विज्ञापन, जो छुपाए वह है खबर

शशि झा। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ कहा जाता रहा है। पर विडंबना यह है कि प्रिंट से लेकर इलैक्‍ट्रानिक तक कमोबेश इनके सभी अहम समूहों के मालिक बड़े पूंजीपति, उद्योगपति और बड़े बिजनेसमैन रहे हैं। कोढ़ मे खाज यह है कि पिछले कुछ वर्षों में चिट फंड, रियल ...

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रीजनल रिपोर्टिंग : गंभीरता का ध्‍यान हमेशा रखें

महेश शर्मा। देश की करीब सवा सौ करोड़ आबादी के लिए दो जून की रोटी जुटाने वाले ग्रामीण किसान की लाइफ स्‍टाइल आजादी के इतने वर्ष बाद भी हमारी मीडिया की विषय वस्‍तु नहीं बन सकी है। वास्‍तविकता यह है कि मीडिया से गांव दूर होते जा रहे हैं। परिणाम ...

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‘डाउन टू अर्थ वीआईपी’ : देवकीनंदन पांडे

उमेश जोशी। देवकीनंदन पांडे समाचार प्रसारण जगत का एक ऐसा नाम है जो कई दशक तक हर किसी की जुबान पर था। चाहे वो कितना ही बड़ा नेता हो या अभिनेता, जनसाधारण की तो बिसात ही क्‍या। 1990 तक किसी भी भारतीय ने दुनिया की बड़ी घटना का कोई समाचार ...

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नव पत्रकारों के लिए विशेष

भगवती प्रसाद डोभाल। पत्रकारिता का पेशा अपनाने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देने की आवश्‍यकता है। कुछ वर्षों पूर्व पत्रकारिता के षिक्षण संस्थान बहुत कम थे। या कहें कि इतने बड़े देश और उसकी आवादी के हिसाब से पत्रकारिता शिक्षण संस्थान ना के बराबर थे। सहत्तर के दशक में ...

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रोमांच है आर्थिक पत्रकारिता

नीरज कुमार। हम विकास की राजनीति करते हैं। राजनीतिक पार्टियों में यह जुमला इन दिनों आम है। मई 2014 में लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे के ईर्द-गिर्द लड़ागया। विकास का संबंध ऐसी अर्थव्यवस्था से है, जिसमें समाज के हर वर्ग को आर्थिक रूप से सशक्त होने का मौक़ा मिले। ...

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