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पत्रकारिता

ग्रामीण पत्रकारिता: हर गांव एक खबर होता है

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डॉ. महर उद्दीन खां | भारत गांवों का देश है। शिक्षा के प्रसार के साथ अब गांवों में भी अखबारों और अन्य संचार माध्यमों की पहुंच हो गई है। अब गांव के लोग भी समाचारों में रुचि लेने लगे हैं। यही कारण है कि अब अखबारों में गांव की खबरों ...

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पीत पत्रकारिता : दाव पर पत्रकारीय सिद्धांतों की साख

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राजेश कुमार पत्रकारिता अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। जिसके जरिए समाज को सूचित, शिक्षित और मनोरंजित किया जाता है। पत्रकारिता के माध्यम से आने वाले किसी भी संदेश का समाज पर व्यापक असर पड़ता है, जिसके जरिए मानवीय व्यवहार को निर्देशित और नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे में एक ...

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समाचार लेखन : कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे?

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सुभाष धूलिया। परंपरागत रूप से बताया जाता है कि समाचार उस समय ही पूर्ण कहा जा सकता है जब वह कौन, क्या, कब, कहां, क्यों और कैसे सभी प्रश्नों या इनके उत्तर को लेकर लोगों की जिज्ञासा को संतुष्ट करता हो। हिंदी में इन्हें छह ककार ( Five W and ...

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समाचार, सिद्धांत और अवधारणा: समाचार क्‍या है?

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सुभाष धूलिया समाचार क्‍या है? पत्रकारिता के उदभव और विकास के पूरे दौर में इस प्रश्‍न का सर्वमान्‍य उत्‍तर कभी किसी के पास नहीं रहा। आज प‍त्रकारिता और संपूर्ण और संपूर्ण मीडिया जगत की तेजी से बदलती तस्‍वीर से इस प्रश्‍न का उत्‍तर और भी जटिल होता जा रहा है। ...

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न्यूज मीडिया और अपराध

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– डॉ वर्तिका नन्दा तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं। तस्वीरें बिना शब्दों के भी हकीकत बयान करने की ताकत रखती हैं। यही तस्वीरें जब चलने-फिरने लगती हैं और बतियाती हैं तो इनकी ताकत को कुछ और पंख मिल जाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद यही हुआ है। पंखों ...

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता

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श्‍याम कश्‍यप हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का दर्पण हैं। इस दृष्टि से दोनों में द्वन्द्वात्मक (डायलेक्टिकल) और आवयविक (ऑर्गेनिक) एकता सहज ही लक्षित की जा सकती है। वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हमारे आधुनिक साहित्यिक इतिहास का अत्यंत गौरवशाली ...

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तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है?

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मनोज कुमार | इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो ...

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अनुवाद और हिंदी पत्रकारिता

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महेंद्र नारायण सिंह यादव सामान्य तौर पर अनुवाद को पत्रकारिता से अलग, और साहित्य की एक विशिष्ट विधा माना जाता है, जो कि काफी हद तक सही भी है। हालाँकि हिंदी पत्रकारिता में अनुवाद कार्य एक आवश्यक अंग के रूप में शामिल हो चुका है और ऐसे में हिंदी तथा ...

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किसके प्रति उत्तरदायी है मीडिया?

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सत्येंद्र रंजन | कभी मीडिया खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताकर गर्व महसूस करता था। यह बात आज भी कही जाती है, लेकिन तब जबकि सरकार या संसद की तरफ से उसके लिए कुछ कायदे बनाने की मांग या चर्चा शुरू होती है। बाकी समय में मीडिया लोकतंत्र की ...

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मीडिया के सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों की सैद्धांतिकी

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  दिलीप ख़ान | 2010 में अमेरिका में गैलप वर्ल्ड रेलिजन सर्वे में दिलचस्प नतीजे सामने आए। सर्वे में अमेरिका के अलग-अलग प्रांतों के लोगों से धर्म और उनके अनुयाइयों के बारे में सवाल पूछे गए। 63 फ़ीसदी अमेरिकियों ने माना इस्लाम के बारे में उन्हें या तो ‘ज़रा भी ...

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समाचार : अवधारणा और मूल्य

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सुभाष धूलिया | आधुनिक समाज में सूचना और संचार का महत्व बहुत बढ़ गया है। देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसकी अधिकांश जानकारियां हमें समाचार माध्यमों से मिलती हैं। यह भी कह सकते हैं कि हमारे प्रत्यक्ष अनुभव से बाहर की दुनिया के बारे में हमे अधिकांश जानकारियां ...

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आर्थिक पत्रकारिता: राजनीति पर अर्थव्यवस्था का बोलबाला

Photo Courtesy - fraserinstitute.org

शिखा शालिनी | एक दौर था जब देश में राजनीति और राजनीतिक व्यवस्था सबको नियंत्रित करती थी। लेकिन अब हालात कुछ और हैं अब राजनीति से ज्यादा अर्थव्यवस्था का बोलबाला है क्योंकि इससे सभी प्रभावित हो रहे हैं। यह बात दमदार तरीके से स्थापित हो रही है कि दुनिया के ...

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